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कविता क्या होती है

कविता क्या होती है
मुख्यधारा की कविता के अलावा बची खुची खुरचन कविताएं  भी हैं,  जो साहित्य का हिस्सा हो सकती है पर आलोचक की नजर नहीें पडती है, यही है पीडि़त,  छटपटाती, बाहर से जर्जर लेकिन अंदर से मजबूत कविताएं, उनकी या उनके लिए जो मजबूर है,  पिछड़ा है , बिछडा है,  असुर है, असुरक्षित है ।
कविता तो एडिशन के उस बल्ब के अविष्कार की तरह है, जो 1000 प्रयोगों के बाद सफल हुआ।
मन से मन और संवेदना के जन्म के बीच शब्दों की सूची मैं बैठी कई अनगिनत कविताएं जन्म लेती है और खत्म होती जाती है। हजार जन्म-मरण के पश्चात;  कविता कालजयी एडिशन रोशनी वाले बल्ब की तरह जन्म लेती है।
कविता के एक-एक शब्द का वजन और उसका प्रभाव सोच समझ के रखा जाता है या दिल से उतनी ही वजन के शब्दों में लिखी कविता का जन्म होता है।
 लिखने का तरीका आपका लेकिन बयानबाजी, नारा, विज्ञापन कविता नहीं होती है।


करोड़ों दिलों में से कुछ शब्दों में बंधी कविता उन संवेदनशील कवियों के हृदय से निकलती है जो संसार को बिना राग द्वेष से देखते हैं। यही कविता है। बयानबाजी, भड़ास, नारा और उलझी कविता-स्वयं से न्याय नहीं कर पाती; ऐसी कविता किसी विचारधारा…
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अब मैं कहूं

अब मैं कहूं
?
कुछ भी कहूं न अब क्यों?
पीडा मन में लिए रिसता  रहूं पहाडों से,
तब भी कुछ नहीं कहूँ।

जब तडपता रहूं
रेत में तपता रहूं
तो क्यों न कहूं?

जिस संसार में तुम हो
उसका मैं हिस्सा हूं।
आंखों में मैं आंसू बनूं
और तुम हंसते रहो
तब भी मैं कुछ न कहूं।

दुनिया न जान ले तब,
क्या ये मर्यादा मैं ही ढोऊं
आखिर कब तक न कहूं।

परछाई सी होती  जिंदगी
जिंदगी को क्यों ढोऊं?
आखिर कब तक यूं,
उडता रहे मजाक।
अब मैं कहूं?

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

अभिषेक कांत पाण्डेय

प्लाट

कविता
प्लाट

कुछ दिन बाद यहां
 बन जाएंगे मकान-दुकान
फिर बिकेगा ईमान
जब होगी बरसात
तो गंगा खोजेगी अपनी जगह
नहीं मिलेगा उसका वह जमीन
 क्योंकि उस पर बन चुके होंगे मकान
आखिर थक हार कर वह बहेगी
शहरों-नालो से होकर
दुकानों, मकानों में
फिर कोसा जाएगा
प्रकृति को
दिया जाएगा नाम
बाढ़ बाढ़ बाढ़ बाढ़़।

अभिषेक कांत पांडेय

समानांतर हिंदी कविता-श्रीरंग

सन 80 के बाद की दलित आदिवासी एवं स्त्री कविता के विशेष संदर्भ में श्रीरंग की ताजा आलोचना पुस्तक समानांतर हिंदी कविता, वास्तव में 80 के बाद की वास्तविक कविता की प्रकृति को प्रकट करती है एक आलोचक के तौर पर श्रीरंग कि यह आलोचनात्मक दृष्टि बिल्कुल पैन है क्योंकि जिस तरह एक समय आधुनिकता के प्रत्यय को साहित्य के क्षेत्र में इतना ज्यादा खींचा गया था कि उसकी व्याप्ति की सीमा का प्रश्न उठाया जाना जरूरी हो गया था। उसी तरह बाद में समकालीनता की परिधि को कितना बढ़ाया जाए यह सवाल आलोचकों के लिए एक समस्या बन कर उपस्थित हो गया अर्थात जिस तरह आधुनिकता की परिधि में बहुत दूर तक रचनात्मक प्रयासों को समेटना संदिग्ध हो उठा। उसी तरह समकालीनता के दायरे में भी नई काव्य प्रवृतियों को रेखांकित करना एक  घिरी पाटी बात हो गई। दलितों और आदिवासियों स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त रूप में होने लगी कि उन्हें केवल समकालीन प्रवृत्ति के नाम पर चिन्हित कर पाना संभव नहीं रह गया।
 श्रीरंग की आलोचना का दायरा इन कविताओं के परिपेक्ष में समकालीन कविताओं से किस तरह से और कैसे अपना नया मुकाम बना रही है यह समझना और समझाना…

शिक्षा के साथ खिलवाड़

असल जड़ क्या है यह अखबार में गायब है।आरटीई एक्ट का पालन सरकार स्वयं ही नहीं कर पा रही है।योग्य शिक्षकों का अभाव है क्योंकि शिक्षक पात्रता परीक्षा में तकरीबन  सत्तर प्रतिशत शिक्षक फेल हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य का उदाहरण ले तो यहां पर पिछले 10 साल से सरकारी शिक्षा को वोट बैंक की डोरी सेनापा  गया है।
जो बुनियादी जरूरतें हैं, वह सरकारी स्कूल में नहीं है। देखा जाए तो मीडिया से लेकर अभिभावकों में सरकारी स्कूल के प्रति कोई जागरूकता नहीं है।
 केवल 2 परसेंट प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी शिक्षा मिलती है। उसके अलावा छलावा वाली शिक्षा है क्योंकि अध्यापन के क्षेत्र में प्रतिभाएं जाती नहीं है। यहां आकर्षक वेतनमान नहीं है। गौर करें,  अधिकतर दोयम दर्जे के ही अध्यापक इन सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में है, क्योंकि प्रशिक्षित शिक्षकों की बहुत बड़ी कमी है और जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया है, वह प्रशिक्षण विधि मानक के अनुसार खरा नहीं है। यानी कि  शिक्षा के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है। मीडिया भी प्राइवेट स्कूल को तवज्जो देती है क्योंकि उसके विज्ञापन उनके अखबारों में छपता है इसलिए उनकी खबरों को कई…

मां

(कविता मेें मां और मैं।)

कोख से जन्म लेते ही
ब्रह्मांड भी हमारे लिए  जन्म ले चुका होता है
जिंदगी का यह पहला चरण
मां की  सीख के साथ बढता चलता
लगातार अपडेट होते हम
मां की ममता
थाली में रखा खाना
हमारी हर ग्रास में मां प्रसन्न होती
हम अब समझ गये
मां जन्म देती है
धरती खाना देती है
मां का अर्थ पूर्ण है,
हमें जीवन देती
और सिखाती है जीना।
हर मां वादा करती है कुदरत से
हर बच्चे में माएं भरती जीवनराग
लोरी की सरल भाषा में।

तोतली बातें समझनेवाली भाषा वैज्ञानिक मां
मां मेरी डाक्टर भी
मां मेरे लिए ईश्वर भी,
मां सिखाती सच बोलना।
आटे की लोई से लू लू, चिडिया बनाना
चिडचिडाता जब मैं, मां बन जाती बुद्ध
समझ का ज्ञान देती।
नानी  की घर की और
जानेवाली ट्रेन में बैठे ऊब चुके होते हम
शिक्षक बन समझा देती रोचक बातें
कैसे चलती ट्रेन, कैसे उड़ान भरता हवाई जहाज।

अब मेरी मां
नानी भी है दादी भी
बच्चे बोलते अम्मा
तब अपने बच्चों में मुझे अपना बचपन नजर आता।
सच में मां ही है
मां के हाथों का खाना आज भी  लगता है
दिव्य भोजन
इंद्र का रसोईया
नहीें बना पाता होगा
मां से अच्छा भोजन।
मां तुम्हारी वजह से ब्रह्मांड को जाना
इस दुनिय…
कैसी है तुम्हारी भाषा सबसे बड़ी भाषा
संकेत की भाषा
मूक होकर विरोध या सहमति की भाषा
नहीं है कोई व्याकरण, न ध्वनि है
प्रेम, दया व करुणा की भाषा की।
​बदल दिया जिसने अशोक को
तुम क्यों नहीं बदले अह्म।
तुम्हें पसंद नहीं रोते मासूमों की भाषा
तुम्हें पसंद नहीं करुण पुकार की भाषा
नहीं है क्या पसंद मिट्टी से उगते पौधे की भाषा।
क्रंक्रीट सा मन तुम्हारा
पसंद है तुम्हें खट खट की भाषा
पसंद है तुम्हें टूटती सड़कों, गिरते पुल की ध्वनि
तुम्हें पसंद है मेहनतकश हडि्डयों की चरचराने की भाषा
तुम्हें तो पसंद है नोट फड़फड़ी तिंजोरी में बंद आवाजें।
माना तुम्हारी भाषा संस्कार नहीं
पर तुम तो आदिम भी नहीं
उनके पास भी थी एक सरल भाषा
वे महसूस कर लेते थे इंसानियत
बचा लेते थे अपने जैसे इंसानो को
पर तुम तो अपने पूर्वजों से हो अलग
तुम्हारी भाषा व तुम्हारी परिभाषा
बांटती है इंसानों को
और तुम विजेता बन
गढ़ लेते हो एक नया व्याकरण
हर बार तुम नकार देते हो इंसानियत की भाषा। सर्वाधिकार सुरक्षित
अभिषेक कांत पाण्डेय
8 अक्टूबर, 2017