मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कक्षा 1 से 3 तक के लिए अंग्रेजी वर्क शीट

कक्षा 1 से 3 तक के लिए अंग्रेजी वर्क शीट
 निशुल्क डाउन लोड करें, प्रिंट करके बच्चों से भरवायें।

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

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वह तंत्र, मैं लोकतंत्र

कविता
​अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी

कमाल की बात है
सत्ता वंश में है
वंश बनाम लोकतंत्र
वंश को एक प्रसिद्धि चाहिए।
वंश कहता बन जाओ सिपाही
बगावत करो मेरे लिए
सूझ बूझ का बाण
पैनी समझ की तीर छोड़ता
वह जानता
जनता नहीं कहेगी
सिंघासन खाली करो।
उसी ने तो बैठाया है
वंश के वेश में मैं
कहीं कोई जोगी तो कहीं कोई लड़का,
कोई वंश हुकूमत का सीख रहा ककहरा।
उसी धरती का किसान
जोत रहा है नये खेत
खाद पानी से सीचेगा
नये बीज डालेगा
बीजपत्र से निकलेगा
एक नई चेतना।
वह जवाब होगी
उस राजमहल के अंदर चल रही
सूझ बूझ का
जो लोकतंत्र को बदल दिया है
वंश की बेल में,
जिसकी शाखाएं
उलझी जनता के मन में।
जनता इस उलझन में नहीं
वो तो एक लोहार की तरह
बना रहा है नया औजार
भरोसे की पॉलिस से मांजकर
न लगने वाले जंग से
खराब होने वाले इस तंत्र में
एक मरम्मत करेगा।
बस एक बार इसलिए उस सूझ बूझ को जो
सत्ता दीवारों और उन परिवारों के बीच खेली जाती है
इतिहास से अब तक।
वहीं इसी बीच
उन सरकारी रिपोर्टों पर
प्रहार है
जो वादे में, जो परिवार से लिखती है बनावटी स्क्रिप्ट
जनता को समझाती है
​फिर लोकतंत्र में हासिल करती
बाप दादाओं के मार्फत एक नई जमीन।
फिर सत्ता में लौट
बिखेरीती एक घड़ियाली नई मुस्कान
इस बार हम तैयार हैं।

कॉपी राइट
copy right 2017

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

जीव जंतुओं की संवेदना व्यक्त करती बेचैन कविताएं

काव्य संग्रह




अभिषेक कांत पाण्डेय

मन को बेचैन करती कविताओं का संसार रचनेवाले श्याम किशोर बेचैन उन युवा कवियों में हैं जो कविता को मिशन के रूप में देखते हैं। बस सही समय पर सही बातों को कविता के रूप में जन समुदाय के सामने सरल प्रभावी भाषा में अपनी बात कह देने वाली प्रतिभा के धनी है बैचैन। बैचेन खुद कहते हैं कि कविता उनके लिए उस नदी के समान है जो उन्हें रचनेवाले के साथ ही पढ़नेवाले को भी सुखानुभूति देती है। श्याम किशोर बेचैन लखीमपुर खिरी जिले के रहनेवाले हैं। भारत के कोने कोने में मंचों पर कविता के जरिये अपनी अलग पहचान बनाई है। गीत, गजल, चौपाई विधा में आधुनिक संसार में उपजे समस्याओं को बखूबी उजागर करती रचनाएं बेचैन की पहचान है। इसी श्रृंखला में श्याम किशोर बेचैन की नई कविता संग्रह वन्य जीव और वन उपवन जनमानस को समर्पित कविता संग्रह है। इस संग्रह में हमारे आसपास जंगलों में रहने वाले जीव जंतुओं पर 70 कविताएं हैं, जो हमें सीख तो देती है वहीं रचनाधर्मिता के उस आयाम को छूती है जहां पर हर विषय में वेदना भी छिपी है तो संवेदना भी। यह जीवन का सत्य है कि प्रकृति ही हमें पालती पोसती है लेकिन आधुनकता के दौर में हम प्रकृति के अन्य भागीदारों जैसे जीव जंतुओं और पेड़ पौधों को भूले जा रहे हैं। नदिया, जंगल, प्रकृति संसाधन ही इस संसार को पालनेवाले हैं जोकि कवि बेचैन की कविता में बार बार बरबस आती है और चेतावनी देती नजर आती है कि हे! मनुष्य अब सावधान हो जाओ, प्रकृति से खिलवाड़ नुकसानदायक साबित होगा। कविता मन की उपज होती है लेकिन जब वह प्रकृति के सच से साक्षात्कार करती है तो वो कविता इंसान को सीख दे जाती है। इस संग्रह में बैचेन जी ने बैल से लोमड़ी तो केंचुए तक की उपयोगिता को प्रभावशाली शब्दों के साथ कविता विधा में उतारा है। सर्प, बिच्छी, गिरगिट के प्रकृति स्वभाव की चेतावनी देती कविता मनुष्य को सीख देती है कि प्रकृति बूरे कार्यों का दंड देती है तो वहीं अच्छे कर्मों के लिए पुरस्कार भी देता है। सरल शब्दो और आमजन की भाषा में जीव जंतुओं और प्रकृति की स्वाभाव के बारे में अद्भुत चित्रण किया गया है।
शत्रु प्रकृति शीर्षक कविता देखियेखून खराबा करने वाले, आतताई हैवानो के। लालच बैठ गया है अन्दर, बेकाबू बेईमानों के।
वनों में इंसानों की दखलअंदाजी से उपजने वाले खतरों को अगाह करती कविता बेचैन के मन में बैठे उस डर को बयान करती है,जहां प्रकृति के साथ खिलवाड़ इंसानों की जाति के लिए खतरा साबित होगा। बेचेन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नजरियों से वन संपदा और वहां के जीव जंतुओं को उनके इस प्रकृति आवास से अलग करने की सीख देते हैं। इनकी कविता का स्वर कहीं कहीं आक्रोशित हो उठता है लेकिन यह जरूरी है।
एक बानगी देखिएजीने दो वन्य जीवों को वन के माहौल में। जीना किसी भी जीव का दुश्वार करो। बंधन से किया जैसे शेर भालू को आजाद। आजाद करो सर्प को विचार करो।।
चिरइया से जुड़ी परंपराओं को बयान करते हैं तो सांप के अस्तित्व को वनों के लिए जरूरी मानते हैं। कवि का हृदय विशाल है मगर चेतना के स्वर को लिए हुए वे मन से नहीं कर्म से जंगल की सेवा करने की बीड़ा उठाने का संकल्प लेता है। लखीमपुर जिले में दुधवा नेश्नल पार्क के अंदर के हाल को बयां करती कविताएं हैं, यहां पर मौजमस्ती के लिए आये इंसानों को चेतावनी देती कविताएं हैं तो वहीं जंगल के जीव जंतुओं के लिए इन्हें यहां शांति से जीने देने की सीख भी है
वन्य शत्रु की सच्चाई शीर्षक कविता की यह बानगी आपके अंतरमन को छू जाएगीमैं हूं खाने का शौकीन/ पीता हूं व्हिस्की रंगीन।/ समय नहीं करता बेकार।/ रहता हूं हरपल तैयार।/ जब मिलता अवसर।/ मार गिराता हूं हिरन सुअर।
वहीं गधा पर लिखी कविता सच्चाई को सामने लाती है
हिंसक हत्यारा।
फिर भी गधा है बेचारा।।
अहित किसी का करें नहीं।
मेहनत से ये डरे नहीं।।
बस्ती में बसता है।
वाहन सबसे सस्ता है।।
ढेंचूढेंचू करता है।
अपनी धुन में रहता है।
श्याम किशोर बेचैन का कविता संग्रह हिंदी काव्य में जन समुदाय की भाषा में बिल्कुल सरल औरचित्रित शब्दों के माध्यम से जन संदेश देती है तो वहीं तुक में लिखी कविता उन नये लोगों को कविता साहित्य से जोड़ती है, जो कविता इसलिए नहीं पढ़ते हैं कि उन्हें कविता क्लिष्ट लगती है। यहां पर सादगी और संजीदगी दोनों है। छिपकली, गैंडा, चींटी, चूहा, बकरा इत्यादि विषयों पर लिखी कविता बताती है कि बेचैन अपनी विषय वस्तु सामान्य से सामान्य समझे जानेवाले जीव जंतुओं में भी खोज लेते हैं।

कविता संग्रह
वन्य जीव और वन उपवन
मूल्य— 80 रुपये
कविश्याम किशोर बेचैन
प्रकाशकनमन प्रकाशन, 2010 चिन्टल्स हा

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

नोटबंदी के बाद राजनीति


अभिषेक कांत पाण्डेय
नोट बंदी के बाद से देश की राजनीति दो खेमों में बंट गई है। सत्ता पक्ष जहां नोटबंदी के फायदे गिना रही है तो वहीं विपक्ष नोटबंदी से जनता को हो रही परेशानी को मुद्दा बनाकर राजनीति कर रही है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नोटबंदी के बाद आम जनता को नोट बदलने के लिए लम्बी लम्बी कतरों में लगना पड़ रहा है। बैंकों में सही मैनेजमेंट न होने के कारण आम लोगों काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। देखा जाए तो नोटबंदी से होने वाले फायदे भी हैं तो नुकसान भी। विपक्ष ने आम जनता की परेशानियों को आगे लाकर राजनीति शुरु किया तो संसद की कार्यवाही भी बाधित रही। वहीं नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के समर्थन पर सर्वे कराकर जनता की राय मांगी, जाहिर है एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में नोटबंदी पर यह सर्वे बेईमानी ही है लेकिन यह तय है कि मोबाइल फोन रखनेवालों में से नब्बे प्रतिशत से अधिक ने नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है। सच्चाई यह है कि भारत में नोटबंदी जैसे फैसला लेना राजनीतिक रूप से जरूरी था और भ्रष्टाचार के जरिये कमाये गए काले धन को ध्वस्त करने के लिए भी। वहीं सवाल यह है कि जिन्होंने काला धन इकट्ठा किया है, वे आम जनता के साथ लाइन में लगे नजर नहीं आए, आखिर कौनसी खामियां रह गई कि सारी परेशानियां आम जनता के खाते में आई। इससे यही जाहिर होता है कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार रूपी दीमक की सफाई के लिए नोटबंदी ही काफी नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी को कुछ और बड़ा करना होगा। सफाई अभियान में भ्रष्टाचार के संक्रमण को जड़ से मिटाना होगा। वहीं नोटबंदी के बाद जब ये खबरें आती हैं कि बैकडोर से पुराने एक हजार व पांच सौ के नोट बदले गए तब जाहिर है कि इस तरह की खबरें नोटबंदी की सफलता पर संदेह उठाती हैं।

नोटबंदी पर घमासान
नोटबंदी की तारीख आठ नवंबर से पहले भाजपा पार्टी ने अलग अलग राज्यों के जिलों में पार्टी के दफ्तर खोलने के लिए पुराने नोटों को ठिकाने लगाया, विपक्ष का यह आरोप संगीन है, इस पर जांच की जानी चाहिए। बहरहाल, ये संयोग भी हो सकता है कि नोटबंदी से पहले संपति की खरीद फरोख्त आदि को इस समय संदेह की निगाह से देखा जा रहा हो लेकिन जांच से दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा कि सच्चाई क्या है? पर विपक्ष की अपनी पीड़ा है कि नोटबंदी लागू होने से उन्हें राजनैतिक व आर्थिक नुकसान हुआ है क्योंकि कई सर्वे भी बाताते हैं कि चुनावों में लगभग हर पार्टी काले धन को खपाती है, वहीं ऐन वक्त में नोटबंदी के कारण चुनावों में गैर कानूनी तरीके से खर्च होने वाले काला धन अब किसी काम का नहीं रहा है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने काले धन को सफेद कर लिया है, नोटबंदी एक बड़ा घोटाला है। इन सब सवालों का उठाना विपक्ष की एक खींझ ही है।
सत्ता पक्ष ने नोटबंदी यानी विमुद्रीकरण का साहसिक फैसला लेकर आम लोगों का विश्वास जीत लिया है तो वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भरतीय जनात पार्टी ने अपने पैसे मैनेज करने का उसे पूरा समय मिला गया हो क्योंकि जिस तरह से राजीनीति भ्रष्ट है उस नजरिये से देखा जाए तो दूध का धुला कोई नहीं है। वहीं इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि मुट्ठीभर अच्छे नेताओं के बदौलत राजनीति में स्वच्छता बची हुई है, लेकिन ऐसे लोगों के अच्छे मनसूबे पर भ्रष्ट राजनीति पानी फेर देता है। नोटबंदी लागू होना जनता के लिए बड़ी जीत इसलिए भी है कि राजनीति में गैर कानूनी तरीके से खर्च होने वाला धन अब कूड़ा हो गया है। भले ये एक तरफा रहा हो लेकिन जो सियासत जनता को वोट बैंक के रूप जातिवादी, भाई भतीजावाद के नजरिये से देखती थी, आज उस पर करारा प्रहार हुआ है। ऐसे भ्रष्ट नेता व अधिकारियों का कालाधन अब किसी काम का नहीं है। देखा जाये तो नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और उनकी रणनीति के पार इस समय कोई नहीं है, विपक्ष गलत मुद्दे उठाती रही है और उन मुद्दों पर बिखर जाती है। इसीलिए नीतीश कुमार ने नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है, नीतीश कुमार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, मौका और नजाकत को समझते हैं इसीलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए विरोध की राजनीति करना सही नहीं समझा। वैसे नीतीश ने बिहार में शराबबंदी का फैसला लेकर नोटबंदी से पहले ही एक साहसिक काम कर चुके हैं। बीजेपी ने इस फैसले की आलोचना भी की। ये तो राजनीति का चाल चरित्र है कि एक दूसरे के विरोधी इसलिए भी अच्छे फैसलों का विरोध करते हैं ताकि उनके वोट बैंक पर सेंध कोई और न मार ले। लेकिन इन सब फैसलों से एक बात साफ हो गई कि भारत की जनता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नशाखोरी, बिजली की समस्या, खराब सड़क, खराब शिक्षा व्यवस्था, असंवेदनशील पुलिस व्यवस्था, रेत माफिया, शिक्षा माफिया, घोटालों से बेहद परेशान है। इसलिए भारत की जनता ठोस सुधार हर कीमत में चाहती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली जैसे राज्यों में वहां की सरकारें सुधार की पहल शुरू कर दिया लेकिन ये पहल ठोस व जमीनी स्तर पर नहीं है, कवेल वोट बैंक को अपनी ओर खींचने और चुनावी भाषण में गिनाने की केवल कवायद है। वहीं सवाल यह है कि मोदी सरकार नये तरीके प्रयोग करके दूसरे राज्यों में गैर भाजपा सरकारों के लिए चुनौती पेश कर रही है, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
विरोध के लिए विरोध की राजीनीति क्यों
विपक्ष नोटबंदी के खिलाफ मोदी सरकार का विरोध इसलिए कर रही है कि वे नोटबंदी से होने वाले नफा और नुकसान के परिधि में ही खुद को देख रही हैं, वहीं ये सवाल लाजिमी है कि आखिर कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए इस तरह के फैसले क्यों नहीं लिए गए। अगर कांग्रेस नोटबंदी का फैसला पिछले 10 साल के शासनकाल में ले लेती तो जाहिर है जैसी राजनीति हम देखते आए उस पर विराम लगता और एक नई पहल का जनता स्वागत करती। साफ है कि नोटबंदी से होने वाले नुकसान के साथ ही फायदे भी है लेकिन केवल विरोध के विरोध की राजनीति ओछी है, इसीलिए विपक्ष के विरोध के कारण अगर संसद की कार्यवाही नहीं हो पा रही है तो जनता के पैसों की बर्बादी ही है। हालांकि देश में राजनीति हर घटना पर होती है लेकिन जब यह राजनीति केवल विरोध के विरोध की जबरजस्ती की हो तो ऐसी राजनीति से उल्टे नुकसान ही होता है।


राजनैतिक दलों में बढ़ेगा काॅम्पटीशन
नोटबंदी के लागू होने के फायदे व नुकसान को लेकर चर्चा हो रही है। राजनीति लाभ में भाजपा को इसका फायदा मिलेगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि मानसून की तरह नोटबंदी से होने वाले लाभ की जगह अगर बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे फैक्टर पर काबू नहीं पाया गया तो जाहिर है, इसका अभी का फायदा लंबे समय तक वोटों में कनवर्ट नहीं हो पायेगा। लोगों ने नोटबंदी को कालेधन पर नकेल कसने का सही तरीका बताया है लेकिन अगर इससे होने वाली परेशानियां नहीं थमी तो विपक्ष यानी एंटी भजपा पार्टी इसका फायदा उठा सकती है। वहीं अगर नोटबंदी के फायदे जनता के सामने प्रत्यक्ष रूप से आने लगे तो कुछ महीने बाद उत्तर प्रदेश व पंजाब का चुनाव है ऐसे में नोटबंदी से खुश हुए लोग भारतीय जनता पार्टी की नैया पार लगा सकती है।
वहीं उत्तर प्रदेश में वर्तमान समाजवादी सरकार ने नोटबंदी से जनता को होने वाली परशानियों को मुद्दा बनाया है। गरीब, किसान, आम लोगों को हो रही दिक्कतों के कारण नोटबंदी का विरोध किया लेकिन बाद में खुद को नोटबंदी के खिलाफ न होने की सफाई भी देना पड़ा है। लेकिन आने वाले समय में राज्य सराकारों के लिए काॅम्पटीशन जबरजस्त होगा। कारण साफ है कि जनधन योजना, नोटबंदी, सोने में खरीदकर काले धन को सफेद करने के धन्धे पर मोदी सरकार ने प्रहार किया है। सोना रखने की सीमा तय कर दिया। वहीं बेनामी जमीन और गलत तरीके से जमीन जायदाद बनाने वाले पर नकेल कसने का इशारा भी कर चुकी है। जाहिर है सुधारवादी नजरिये के साथ नरेंद्र मोदी जनता के सामने आये हैं। इससे एक कदम आगे लोगों को एक मुश्त पैसा देने की योजना को भी अमल कर सकते हैं। माना जा रहा है कि नोटबंदी के बाद पुराने एक हजार व पांच सौ के नोटों पर मिले टैक्स का फायदा आम जनता को मोदी सरकार दे सकती है लेकिन इसके लिए कानूनी तरीके ढूढ़े जा रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो अपने पारंपिरक वोटर के साथ ही अब भाजपा गरीब, किसान, छोटे व्यवसायी, महिलाओं जैसे वर्गों को लुभाना चाहती है, जाहिर है वोट की राजनीति में अब तक जाति वर्ग के पैमाने में क्षेत्रीय दल अपने वोट टटोलती रही है, ऐसे में मोदी के फैसले भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता की कुर्सी का रास्ता आसान बना सकती है।
उत्तर प्रदेश में होने वाले पिछले कई चुनाव में समाजवादी पार्टी व बसपा में खास जाति वर्ग को लुभाकर आसानी से वोट हासिल करने की परंपरा इस चुनाव में टूटेगी इसीलिए भाजपा ने विकास मुद्दे के साथ अब सुधार मुद्दा का राग छेड़ दिया है। नोटबंदी, कैसलश इकोनाॅमी, सोना रखने की तय सीमा इन सब मुद्दे ने वर्तमान गैर भाजपा दल के राज्य सरकारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। राज्य सरकारों को काॅम्पटीशन में टिके रहना है तो मोदी की तरह परफार्म करना होगा। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
यूपी चुनाव पर नजर
वहीं देखा जाए तो अखिलेश यादव की मेट्रों योजना, 108 एम्बूलेंस योजना, आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे, स्मार्ट मोबाइल फोन योजना आदि ऐसे फैसले हैं जो चुनाव में भुनाने वाले हैं। वहीं लखनऊ में पटरियों पर मेट्रो का ट्राॅयल उद्घाटन हुआ, ये अलग बात है कि आम लोगों के लिए अभी मेट्रो से घूमने का मौका छह महीने बाद मिलेगा, वहीं आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उद्घाटन। इन सब विकास की बातों को चुनाव में रख कर अपने कार्यों को बताने की कवायद में सपा भारतीय जनता पार्टी के आमने सामने होगी। लेकिन देखना है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता इसे किस नजरिये से देखते हैं। लेकिन इतना तय है कि मोदी की योजनाओं ने आम लोगों को अपने ओर खींचा है, इसी कारण बीजेपी विरोधी अन्य पार्टियों में भी विकास के कार्यों को जनता तक पहुंचाने की होड़ लगी है। भले वह आधी अधूरी ही क्यों न हो, इससे ये भी तय है कि शिक्षा, पानी, सड़क, बेराजगारी, पुलिस सुधार, भ्रष्टचार आदि पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकारों को भी नोटबंदी जैसे साहस भरे फैसले की जरूरत है।

नोटबंदी तो सही लेकिन कब सुधरेगा सरकारी तंत्र
नोटबंदी क्या सभी समस्याओं का एक मात्र संजीवनी वटी है। नोटबंदी के साइड इफेक्ट के तौर पर आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इन सबके बावजूद सवाल यह कि काले धन का कारोबार घटेगा कि नहीं है? क्या हमारी अर्थव्यवस्था बिना नकदी के हो पायेगी?  इन सवालों के बीच यह भी सवाल है कि क्या यह राजनीति फायदा उठाने के लिए लिया गया फैसला है? जाहिर है देश के लोग भ्रष्टाचार और काली कमाई वाले पर लगाम लगाने के लिए वे हर सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखती है लेकिन जब इस तरह का साहासिक फैसला लिया जाता है तो उस हुक्मरान के प्रति जनता आशा भरी नजरों से देखती है, जिस देश में एक प्रतिशत लोग की हैसियत इतनी अधिक है कि उनमें से ऐसे लोग ही काला धन की सबसे बड़ी कालाबाजारी करते हैं, जिन्हें बड़ी मछलियां कहा जाता है, ऐसे लोगों को पकड़ पान इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार का सिस्टम कितना दुरूस्त व ईमानदार है।
जाली नोटों पर कार्यवाई जरूरी
फर्जी नोटों का शिकंजा भारतीय अर्थव्यवस्था में दूर दूर तक फैला है। फर्जी नोटों को बाहर करने के लिए सरकारें अपने नोटों के फीचर्स में लगातार बदलाव करती रही हैं लेकिन जालसाज इसका तोड़ निकाल लेते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो अचानक एक हजार व पांच सौ के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला काबिले तारीफ है। लेकिन नये दो हजार के जाली नोट जालसाजों ने बनाना शुरू कर दिया है, कई मामले सामने भी आए हैं। इसलिए जाली नोटों पर पुख्ता कार्यवाई करने की जरूरत हमेशा बनी रहती है, ताकी जाली करेंसी जब्त किया जा सके।
जमीन जायदाद की हो जांच
अनुमान यह है कि देश में काला धन का छह प्रतिशत नकद के रूप में है। हालांकि कुछ लोग इसे आठ तक प्रतिशत बताते हैं, बाकी पैसा सोना, रियल एस्टेट के रूप में या बेनामी खातों में या देश से बाहर जमा है। काला धन को नकद के रूप में नहीं रखा जाता क्योंकि इसकी कीमत कम हो जाती है। आयकर विभाग, सीबीआई या किसी सरकारी संस्थान द्वारा की गई छापेमारी की खबरों में पकड़े गए धन-संपत्ति में नकद कम होता है जबकि सोने व जमीन जायदाद के रूप में ज्यादा काला धन इनवेस्ट किया जाता है। ऐसे में नोटबंदी के फैसले से सारा काला धन खत्म हो जाएगा तो यह सोच केवल राजनीतिक फायदा उठाने तक ही सीमित है। असल में नोटबंदी के बाद पूरा प्रहार इस बात पर होना चाहिए कि इसके बाद कालाधन न पनप पाए और अगर कोई काला धन जमीन जायदाद, सोना या धन के रूप में हो तो उसे पकड़ने का बेहतर सिस्टम बनाना होगा।
नोटबंदी के बाद इसका फायदा आम जनता को मिलने लगे तो कहा जा सकता है कि नोटबंदी आम जनता के लिए फायदे में रही है लेकिन इसके लिए अभी इंतजार करना होगा हालांकि नोटबंदी सही से लागू होने के बाद इसके असर दिखने चाहिए। आम लोग लाइन में लगकर दिक्कतों के बावजूद इसलिए खुश है कि उन्हें इसका फायदा आने वाले समय में जरूर मिलेगा। जाहिर है नये सुधार लागू होने के समय दिक्कतों का सामना लोग असानी से कर ले रहे हैं लेकिन तब भी अगर सुधार दिखाई नहीं दिया तो लोगों के आक्रोश सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करेगा, संभव हो इसका फायदा विपक्षी दल एकजुट होकर इसका उठा ले जाए। नोटबंदी के बाद जनता की उम्मीदें मोदी सरकार से बढ़ गई हैं। इन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए मोदी सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदारी से फैसले लेने होंगे।
मोदी सरकार के पास ये हैं चुनौतियां
भ्रष्टाचार से कमाया गया धन या कर-चोरी की रकम भी काला धन होता है। यानी आम लोगों को इस पहल का फायदा इस तरह से मिलना चाहिए कि अब भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, राजनीतिक व्यवस्था पारदर्शी हो जाएगी, कर चोरी नहीं होगी, भ्रष्ट आचरण बंद हो जाएंगे। केवल नोटबंदी से संभव नहीं इसके मोदी सरकार को कई और सुधार करने होंगे-पुलिस-नौकरशाही सुधार, पारदर्शी सरकारी तंत्र, प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम सेलरी, आधार कार्ड को हर जगह पहचान के लिए लागू करना, न्याय को सस्ता व सुगम बनाना, जिनके पास घर नहीं ऐसे लोगों को घर उपलब्ध कराना, शिक्षा व्यवस्था पर एक पाठ्यक्रम व गुणवत्ता वाली शिक्षा हर किसी को देने की नीति, बेनामी सम्पति को अधिग्रहण करना, अपराधिक मामलों से जुड़े व्यक्ति को चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए, अगर इस तरह के सुधार जल्द न किए गए तो नए नोटों से तमाम काले काम फिर होना षुरू हो जाएगा। वहीं नोटबंदी के जरिये भले काला धन का जमा भंडार (छह से आठ फीसदी) खत्म कर देंगे, मगर संपूर्ण सुधार नहीं हुआ तो उसके प्रवाह को रोक पाना संभव नहीं होगा।

बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोट बंदी


नोट कर लो
ये नोट
वक्त के साथ
आपका साथ छोड़ जाता है,
वक्त चाहे जितना हो
एक दिन वो भी खत्म हो जाता है।
अगर रह जाता है तो वह तुम
पर वह तुम में मैं नहीं रह पाता।
तुम समझ पाते हो
कैसे फर्क पड़ता है उन लोगों पर।
कुछ वक्त पहले तुम
काली तिजोंरी में
झांकते थे इठलाते थे,
जाने कितने इंसानों का मार हक
बंद था तुम्हारी तिंजोरी में,
नोटों की शक्ल में काली करतूत।
वक्त आज एक है
नोट अनेक
पर सब मिट्टी के ढेर।
सोचो जानो
एक बार फिर पढ़ लो
महावीर, गौतम को
क्या पता चले तुम
माया में जोड़ रहे हो नोट
कहीं हक मार रहे हो
कई जिंदगियों का।
काले तिंजोरी में कैद
उन नोटों को मिली अजादी
जिसे तुमने कमाया तिकड़म से।
फिर वक्त आ गया
तुम्हारी तिंजोरी में काली कमाई
वाली नोटे
साथ में रखी उन बेनामी कागजों
को भी क्रांति सिखा गई
अब वे कागज तुम्हारे
खिलाफ हैं
अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी

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बुधवार, 28 सितंबर 2016

अब बातें नहीं, विकास करके दिखाओ


अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी
इस बार उत्तर प्रदेश में होने वाला आम चुनाव, क्या अमूलचूल परिवर्तन लायेगा। किसकी बनेगी अगली सरकार? क्या सपा की वापसी होगी, या बसपा सत्ता की चाबी पाएगी या क्या कांग्रेस का यूपी में 27 साल का निर्वासन खत्म होगा, या मोदी का करिश्मा भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने में के लिए मददगार सबित होगा। इन सवालों के जवाब जाति, धर्म, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, लचर कानून व्यवस्था बनाम विकास की बातों पर समझ रखने वाला मतदाता के वोटों की ताकत पर निर्भर करता है, कि किसने किया है अब तक यूपी का विकास।
केंद्र में भाजपा की सरकार और यूपी में सपा की सरकार है, पिछले दो वर्षों से विकास की बातें हो रही हैं, पर सबसे बड़ा सवाल है कि अब तक यूपी में विकास क्यों नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व भाजपा ने यहां पर शासन किया लेकिन यूपी की स्थिति आज भी बदतर है। देश की राजनीति में यूपी का एक अहम रोल रहा है। यूपी का समीकरण केंद्र की सत्ता में कौन बैठेगा या किसका पत्ता साफ होगा, यह तय करता है। राजनीति की नर्सरी कहे जाने वाले यूपी ने कई प्रधानमंत्री देश को दिए है, लेकिन इसके बावजूद भी यूपी की तरक्की नहीं हो पायी, न उद्योग-धंधों को ढंग से विकास हुआ, न ही यहां पर फिल्म उद्योग का विकास हुआ, ताकि बेरोजगारों को अधिक से अधिक रोजगार दिला सके। लैपटॉप व बेरोजगारी जैसी योजनाओं के जरिये वोटों को खींचने का तरकीब यही बताता है कि राजनीतिक दल जानते हैं कि उन्हें सत्ता पाने के लिए लोकलुभावन वादे कर मतदाता को आकर्षित करना जरूरी है। लेकिन अब जनता जानती है कि ये सब छलावा है, ठोस तरक्की की जरूरत है जिससे गरीबी व बेरोजगारी से लड़ा जा सके। लेकिन जिस तरह से यहां पर चुनाव के ऐन वक्त पर धर्म, जाति और संप्रदायिकता का जहर बोया जाता है तो दो खेमों में वोटों को आसानी से बांटने की सबसे बड़ी साजिश की जाती है, ताकि तरक्की की बात न की जाए, नहीं ंतो नेताओं को जवाब देते नहीं बनेगा कि यूपी में पहला आम चुनाव 1951 से अब तक, लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारों ने गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्या जैसे मुद्दों पर क्या किया। 68 साल बाद भी समस्या जस की तस है। यूपी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य है, लेकिन यहां पर बेरोजगारी, गरीबी, कानून व्यवस्था की समस्या आज भी बनी हुई है।
27 साल पहले यानी 1989 को नरायण दत्त तिवारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, उसके बाद से यूपी में कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आई। निश्चित ही प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को नकारा, ताकि यूपी में विकास की गति नए दल लेकर आये, लेकिन जैसे ही सपा और बसपा ने यूपी की सत्ता हासिल की, तो लगता था कि राजनीति की दशा बदलेगी, लेकिन यूपी के दसवीं विधानसभा चुनाव 1989 में जनता पार्टी की सरकार बनी, मुलायम सिंह यादव ने सत्ता संभाली, उम्मीद थी कि बदलाव आएगा। यह एक ऐसा बदलाव होगा कि आने वाले 15 वर्षों मंें यूपी देश का नंबर वन राज्य बन जाएगा। खैर, इसके बाद भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में शासन किया लेकिन यूपी की तकदीर नहीं बदली, नहीं बदली तस्वीर। कानून व्यवस्था व संप्रदायिकता को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। वोटों को ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति ने एक और रंग ले लिया, वह था दलितों और पिछड़ों के हिमायती बनने वाले नेताओं का जन्म लेना। वहीं राम मंदिर के जरिये हिंदुत्व कार्ड खेलकर वोट बैंक बनाने का एक नया रास्ता भाजपा को मिला। यूपी बदल रहा था राजनीतिक समीकरण के ताने बाने अब दलितों, पिछड़ों व मुस्लिमों मे ंवोटों को जाति व धर्म के नाम पर राजनीतिक दल साधना जान गए थे। तरक्की की बात कौन करता, जब वोट जाति व धर्म के नाम पर मिलने लगे, मंदिर, मस्जिद, तुष्टीकरण, जातिवाद के साये में यूपी के विकास की फिक्र किसे थी। बेरोजगारों, गरीबों और किसानों की दयनीय स्थिति को जानने की जरूरत किसी दल ने नही समझी। केवल खानापूर्ति की स्थिति रही है। वही स्थिति आज भी बनी हुई है।
विकास के नाम पर दिखावा
केंद्र में 2014 के आम चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन से लोगों में उम्मीदें जगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि क्या आज बदलाव हुआ है? यह तो तय है कि विकास को दिखाने की होड़ राज्यों की सरकारों में तेजी से हुआ है। मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन है, दुबारा मुख्यमंत्री बने शिवराज चौहान की सरकार अपने योजनाओं और विकास के कार्यों का खूब प्रचार कर रही है। केजरीवाल की सरकार भी प्रचार-प्रसार में खूब पैसा खर्च कर रही है। वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने अब प्रचार-प्रसार का दामन थाम लिया। अखिलेश यादव हमेशा कहते रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के अच्छे कामों का प्रचार जनता के सामने नहीं आ पाता है। इसीलिए सरकार के विकास कार्यक्रमों का प्रचार खूब किया जा रहा ताकि जनता जान सके। जाहिर है आने वाला यूपी विधानसभा का चुनाव अखिलेश यादव के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है, वे इस पर खरा उतरना चाहते हैं, लेकिन अब जनता को फैसला करना है कि उनका विकास किसने किया है।

किसानों की कौन सुने

राजनीति दल चुनाव से पहले वादे करते हैं लेकिन जैसे ही सत्ता मिलती है, वे अपने वादे भूल जाते हैं। किसानों से हर दल चुनाव के समय वादा करता है लेकिन सत्ता में आने के बाद वही दल किसानों को छलना शुरू कर देता है। चार-पांच हजार रूपये कर्ज न चुका पाने पर किसान को जेल में डाल दिया जाता है, जबकि अरबों रूपये डकार जानेवाले उद्योगपतियों पर सरकारें महरबान रहती हैं। उन्हें सब्सिडी के तौर पर हर तरह की सुविधा देने में कोई कोताही नहीं बरती जाती है, लेकिन सूखे के कारण खराब हो गई फसल के मुवाब्जे के लिए चंद रूपये देकर सरकार किसानों के साथ मजाक करती रही है। देखा जाए तो 1970 के मुकाबले आज चपरासी तक की तनख्वा में 150 गुना बढ़ोतरी हुई, वहीं शिक्षक व प्रोफेसर की आय में 170 गुना, उच्चे दर्जे के अधिकारियों की आय में हजार गुना का इजाफा हुआ है लेकिन किसान को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में केवल 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दरअसल किसानों की जरूरत और उनके विकास के लिए योजनाओं में अनदेखी की गई है। सूखा, बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदा के कारण उनके खेतों और घरों के नुकसान की भरपाई के लिए मिलने वाली धनराशि इतना कम होता है कि उससे क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती है। वहीं सरकारीतंत्र में फैले भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों की कमीशनबाजी के कारण किसान परेशान रहते हैं। जहां एक ओर किसान को कुदरत की मार सहनी पड़ती है, वहीं सरकारीतंत्र की उदासीनता को भी सहना पड़ता है। गुलाम भारत में किसानों को खूब शोषण हुआ, अंग्रेजों ने किसानों की मेहनत से उगाये फसलों का औने-पौने दामों में जबरजस्ती लेकर इंग्लैंड की तरक्की में लगाया। वहीं जमीदारों ने किसानों का आर्थिक व सामाजिक शोषण किया। लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद उम्मीद थी कि किसानों के अच्छे दिन आएंगे, लेकिन सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारों ने वोट बैंक पाने के लिए किसानों से खोखले वादे किए। आज खेती घाटे का सौदा है, किसानों की मेहनत को बिचौलिये खा रहे हैं, भ्रष्टतंत्र किसानों के हिस्से के सब्सिडी, कर्जमाफी के पैसों को डकार जाते हैं। केवल दिखाने के लिए योजनाएं होती हैं, असल में जरूरतमंद किसानों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचत पाता है। नेता और कर्मचारी मिलकर किसानों को मिलने वाली योजनाओं मंे फर्जीवाड़ा कर अपात्रों को इसका लाभ देकर उनसे अपना कमीशन ले लेते हैं। इस तरह छोटे व मध्यम किसानों का हक मारा जाता है। 
किसानों को महाजनों के कर्ज से मुक्त कराने के लिए 1950 के बाद कोऑपरेटिव सोसायटियंा शुरू की गईं। साठ के दशक में इनकी संख्या दो लाख बारह हजार तक पहुंच गई। इनसे लघु और सीमांत किसानो ंको फायदा भी हुआ, पर 1969 में बैंक के राष्ट्रीयकरण और ग्रामीण बैंक के अस्तित्व में आने के बाद सोसायटियों को बेकार मान लिया गया। यह वही समय था जब भारत में भ्रष्टाचार का उदय हुआ। करप्शन के घुन ने व नकारा नौकरशाहों के नकारेपन ने कोऑपरेटिव सोससायटियों के आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया। वहीं विश्व बाजार से बैंकों ने बहुत कुछ सीख लिया था। इधर किसान अब बैंकों से ऋण लेने लगा, इन बैंकों के लिए किसान एक क्लाइंट ही थे, बैंकों ने किसानों को से लाभ कमाना शुरू कर दिया। इस तरह साहूकार-महाजनों, उसके बाद कॉपरेटिव सोसायटी के बाद बैंकों के मकजड़जाल मे ंकिसान फंसता चला गया। हालांकि सरकारों ने समय-समय पर किसानों के लिए कई योजनाएं चलाती रही हैं लेकिन इसका फायदा बिचौलिये या फिर बैंक उठा लेते हैं।

बेरोजगारों के लिए कौन

सरकारी सेक्टर में रोजगार सीमित है, तो वहीं प्राइवेट सेक्टर में रोजगार की आपार संभावनाएं हैं लेकिन अब तक की सरकारों ने इस दिशा में उचित पहल नहीं की। देखा जाए तो भारत में यूपी व बिहार जैसे राज्यों के बेरोजगारों को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। शिक्षा के जानकार भी मानते हैं कि यूपी व बिहार जैसे राज्यों में स्किल एजुकेशन को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। सरकारी शिक्षा की बदहाली और शिक्षा जैसे महकमें राजनीति के शिकार हैं। उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के नियुक्ति से लेकर ट्रांसफर व प्रमोशन में पैसों की डिमांड होती है। अधिकारी बिना पैसे के काम नहीं करते हैं, वहीं दोषपूर्ण चयननीति के कारण अयोग्य शिक्षकों को भर्ती कर लिया जाता है। इससे आप अंदाजा लाग सकते हैं कि ऐसे शिक्षक बच्चों को क्या शिक्षा देते होंगे। माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा की यही स्थिति है, मानक को नजरअंदाज कर स्कूल व कॉलेजों को मान्यता दे दिया जाता है। इस कारण ऐसे शिक्षण संस्थान केवल डिग्री बांटने की दुकान ही साबित हो रहे हैं, यहां पर गुणवत्ता की बात करना बेईमानी है। यूपी का उदाहरण ले तो चुनाव जीतने मंे ंखर्च होने वाले रूपये की भरपाई के लिए ऐसे शिक्षामाफियों को पैदा किया गया है जो फला पार्टी को चुनाव के वक्त पैसा देते हैं और सत्ता में आने के बाद उस पार्टी की सरकार इन शिक्षामफियों को संरक्षण देती हैं। अब तो सरकार किसी की बने शिक्षामाफियों को संरक्षण आराम से मिलता है। इन पर कोई सरकार कार्यवाई नहीं करना चाहती है क्योंकि नेताओं के लिए ये शिक्षामाफिया दूधारू गाय की तरह हैं। देखा जाए तो यूपी की अब तक की सरकारें बेरोजगारों के हित मे ंरोजगार के अमूलचूल साधन पैदा करने में नाकामयाब ही रही है। सरकारी क्षेत्र में सीमित नौकरियां हैं, वहीं प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार है लेकिन यहां पर शासन करनेवाली सरकार सही कानून व्यवस्था, बिजली, पानी, सड़क व्यवस्था को दुरूस्त नहीं कर पाई है, इसीलिए यूपी में इन्वेस्टर यहां पर पूंजी लगाने से हिचकिचाते हैं। यूपी में 68 साल से ये स्थिति नहीं बन पाई कि यहां पर बाहरी कंपनियां आये और यहां के बेरोजगारों को प्रक्षिशित कर रोजगार मुहइया कराए। बेरोजगारी दूर करने के वादे के नाम वोट हर राजनीति दल मंागती आई है लेकिन कार्यकाल पूरा होने के बाद भी बेरोगारों को रोजगार दिलाने के अपने वादे पूरा नहीं कर पाती है। अपनी नकामयाबी को छिपाने के लिए सीमित सरकारी नौकरियों के कुछ हजारों पद भर कर, उसी का प्रचार-प्रसार कर, बेरोजगारी के नाम अपने चुनाव के समय किये गये अपने वायदों से बचने की कोशिश करती हैं, सरकारें। देखा जाए तो इन सरकारी नौकरी के सौ-दो सौ सीटों के लिए लाखों बरोजगार फार्म भरते हैं। लेकिन जाब कुछ लोगों को मिलती है। साफ है कि सरकारी ठोस नीति बेराजगारों के लिए नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में रोजगार पैदा करने के तरीके में सरकारीतंत्र फेल रही है या कहें कि इस ओर वे दृंढ़ इच्छा शक्ति से काम करने से सरकारें भागती रही हैं।