शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

दुनिया का सबसे बड़ा वजनी सलाद बनायाऔर गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया

दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में स्थित पेरू देश के एक विश्वविद्यालय ने सबसे ज्यादा वजन  सलाद  का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया।  1,729.59 पाउंड (लगभग 784 किलोग्राम) वजन के आर्टिचोक का विशाल सलाद  बनाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड नाम दर्ज किया।

सैन इग्नासियो डे लोयोला विश्वविद्यालय ने 16 फीट लंबे और 5 फीट चौड़े ट्रे पर आटिचोक सलाद को इकट्ठा करने के लिए प्लाजा डे अरमस डी ट्रूजिलो में 200 स्वयंसेवकों को इकट्ठा किया।रिकॉर्ड दर्ज होने के बाद  वहां  उपस्थित  लोगों में यह सलाद बांटा गया। आयोजकों ने कहा कि आयोजन का लक्ष्य पेरू में आर्टिचोक की खपत को बढ़ावा देना था।

बुधवार, 18 सितंबर 2019

सीबीएसई ने सत्र 2020 का जारी किया परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नपत्र का ब्लूप्रिंट


प्रयागराज। सीबीएसइ ने सभी विषयों की परीक्षाओं में बदलाव करने के लिए कई कदम उठाए हैं। से अंतर्गत सीबीएसइ ने नए परीक्षा पैटर्न 2020 के सभी सभी विषयों का प्रारूप जारी कर दिया है।
सीबीएसई में कक्षा 9, 10, 11व 12 कक्षा में प्रश्न पूछने के तरीकों में बदलाव किया है और इसमें आतिलघु उत्तरीय प्रश्नों की संख्याएं बढ़ा दिया है।
नीचे दिए गए लिंक पर जाकर आप प्रश्न पत्र के विषय वार नए कलेवर को सीबीएसई की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते हैं। नए क्वेश्चन पेपर की स्कीम को जानने के लिए सबसे पहले सीबीएसई के वेबसाइट (cbseacademic.nic.in) पर जाएं और वहां पर नेवीगेशन बटन  curriculum  पर क्लिक करें और 2019 20 एकेडमिक ईयर के विभिन्न विषयों का प्रश्न पत्र की ब्लू प्रिंट मीडिया फाइल में डाउनलोड कर सकते हैं नीचे लिंक दिया गया है गूगल क्रोम में टाइप करने पर आप डायरेक्ट एक्सेस कर सकते हैं-
cbseacademic.nic.in/curriculum.html


मिमिक्री कैसे करें

आशीष कांत पाण्डेय रंगमंच की दुनिया में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय है, आइए जानते हैं, उनसे अभिनय की बारीकियों के बारे में—


यदि मुझसे यह पूछा जाता कि आपने अभिनय करने के लिए कहां से प्रेरणा प्राप्त की या यूँ पूछा जाए कि आप को अभिनय करने की प्रेरणा कहाँ से मिली। इस तरह के प्रश्न आज उन कामयाब अभिनेता से पूछा जाता है जो
अभिनय के क्षेत्र में नित्य नए मुकाम हासिल कर रहे हैं। परन्तु मैंने अभी तक कोई खास मुकाम हासिल तो नहीं किया है। यदि मुझसे कोई यह प्रश्न पूछ ले तो मैं सीधा सा उत्तर दूंगा- मिमिक्री से। जी हां! यदि मुझे भगवान ने मिमिक्री करने की कला उपहार में न दी होती तो शायद ही मैं अभिनय के क्षेत्र में आ पाता।
मिमिक्री कला मेरे जीवन की एक सुखद घटना रही है, जब मैं लगभग 10 वर्ष का ​था, तब मुझे अच्छे से याद है कि मैं किसी भी घटना की बड़ी काल्पनिक और दिलचस्प व्याख्या करता था। मेरे मोहल्ले के बड़े, बुजुर्ग मुझे रोककर, बैठाकर मुझसे बातें करते मैैं उनके प्रश्नों का उत्तर बहुत मजाकिया लहजे में और बहुत ही तत्परता से देता था। मैं बहुत तेजी से बङे-बङे वाक्यों को काल्पनिक अभिनय करके लोग के सामने प्रस्तुत कर देता, इसी कारण मेरा मोहल्ले में एक उपनाम था, फुटुकलाल इस उपनाम से मैं कभी चिढ़ता नहीं था बल्कि कोई मुझे फुटुकलाल कह कर पुकारता तो मैं उत्तर भी देता था, उनसे मैं बात करता था, मुझे आनंद आता था।
मेरे फुटुक से बोलने के अंदाज से लोग ने मेरा नाम फुटुकलाल रख दिया। यहाँ तक की मेरे घर में भी मेरे पिता, भाई, बहन भी मुझे कभी-कभी फुटकलाल कहकर के पुकारते थे, मैं इस नाम से जीवंत होता चला गया।
इन दिनो मेरे साथ एक और सुखद घटना घटी। एक दिन मैं अपने मोहल्ले में ही टहल रहा था कि वहां एक बिजली मिस्त्री का घर था, जो प्रतिदिन अपने डेक यानी म्यूजिक सिस्टम को ठीक रखने के लिए मिमिक्री की कैसेट बजाता था। उसे मैं लगातार सुनता और घर पर आकर उन आवाजों की नकल करता। एक दिन मुझे मिमिक्री करते हुए मेरे पिता जी ने मुझे सुन लिया और उन्होंने सुनते ही कहा— ये तो फिल्म स्टार जगदीप की आवाज है। उन्होंने कि  आवाज बदलने की इस विधा को मिमिक्री कहते हैं। पिता जी ने बताया कि तुम मिमिक्री कर रहे थे, वह प्रतिदिन मेरी मिमिक्री को सुनते और सुधार करवाते कोई भी मेहमान आते मुझे उनके सामने खड़ा कर देते। उनसे प्रेरित करने पर मैंने नाट्य की कार्यशालाओं में भाग लिया और धीरे-धीरे मैं सक्रिय रंगमंच से जुड़ गया।
यहाँ आकर मुझे अपने अंदर के अभिनेता को जानने का मौका मिला और फिर मैं अभिनय के लिए अपनी मिमिक्री की कला को एक टूल्स की तरह इस्तेमाल करने लगा। हालांकि शुरूआत में रंगमंच में मिमिक्री को लोगों ने अलग समझा, जहां तक मेरा यह अनुभव रहा है कि जब भी मैं किसी पारम्परिक किरदार का अभिनय करता, जैसे उस किरदार की अपनी एक विशेष आवाज का पैटर्न हो या उस किरदार की अपनी एक विशेष भाव—भंगिमा हो तो जिसे मैं एक एक्टर होने के नाते इम्प्रूवाइजेशन के जरिए से बड़ी आसानी से अभिनित कर लेता था। पर मेरे साथी कलाकार यही समझते कि मैं मिमिक्री कर लेता हूँ, इसलिए मेरे लिए आसान है। हां मेरे लिए मिमिक्री टूल की सहायता से ऐसा करना आसान हो रहा है परन्तु उतना भी नहीं।
दरअसल जब हम किसी ख्यातिलब्ध व्यक्ति अभिनेता, नेता या किसी भी व्यक्ति की नकल हूबहू करते हैं, तो हमें कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है कि अमुक व्यक्ति के आवाज की वास्तविक टोन क्या है, वह व्यक्ति मुंह के किस भाग में ज्यादा घर्षण करता है और सांसों का इस्तेमाल कैसे करता है? गले, दांत, होंठ, दांत—जीभ को किस प्रकार संयोजित करता है। फिर अंतिम रूप से शब्दों व उसके आवाज की पिच क्या है। शब्दों को कहां-कहां स्ट्रेस देता है। सांस कब लेता है चेहरे की भाव भंगिमा कैसे बनती हैं? पूरे शरीर की संरचना किस प्रकार की होती है। वह किस मनोविज्ञान के माध्यम से अपने को प्रस्तुत करता है। वह किरदार वास्तविक रूप से हमारे मनोविश्लेषण के अंतर्गत आ जाता है।
 कभी ऐसा भी होता है कि हम किसी और के द्वारा मिमिक्री करते हुए भी मिमिक्री सीख लेते हैं। क्योंकि हम उस बिंदु को आसानी से पकड़ सकते हैं कि उस व्यक्ति की  मिमिक्री कैसे करना है। अभिनय मे मिमिक्रीका विशेष सहयोग होता है। हमें एकल अभिनय या अभिनय में जब अभिनेता एक ही होता या देशकाल वातावरण के अनुसार अभिनय करता है तो वह अभिनय में एक प्रकार की मिमिक्री करने लगता है। एक पल में वह जवान आदमी का अभिनय करता है तो दूसरे पल में ही वह वृद्ध व्यक्ति का अभिनय करने लगता है और अपनी आवाज व शरीरिक संरचना को उसी के अनुरूप ढालता है। इसके लिए उस अभिनेता को अपने जीभ, होंठ, नाक, सांसों, मूड, लार शब्दों के उच्चारण आदि को नियंत्रित करते हुए उस आवाज को बनाता है, जो वास्तविक रूप में काल्पनिक होता है। इसी से वह अभिनय मे विभिन्नता लाता है, यही समानता है अभिनय और मिमिक्री में।
जब इतनी ही समानता है मिमिक्री और अभिनय मे तो एक मिमिक्री कलाकार अच्छा अभिनय तभी कर सकता है जब वह अपने खुद की आवाज को पहचाने यानि की जब वह मिमिक्री करे तो मिमिक्री के सारे सिद्धांत को लागू करें। जब वह अभिनय करे तो मिमिक्री का एक टूल्स की तरह ही इस्तेमाल करे, और एक अभिनेता होने के नाते देशकाल वातावरण के अनुसार अभिनय करे। तभी यह एक सफल अभिनय कर सकता है।
रेडियों नाटक, डंबिग या वाइस ओवर एक्टर आवाज के उतार चढ़ाव से अभिनय करता है जिसमें मिमिक्री उसकी सहायता करती है। कार्टून किरदार की काल्पनिक आवाज को ईजाद किया जाता है, और वह अभिनय के वास्तविक प्रक्रिया से परिपूर्ण होता है तभी तो कार्टून की आवाज हमे पूर्ण अभिनय का आभास देती है।
जब हम किसी किरदार की मिमिक्री करते है तो उस आवाज के पैटर्न की कॉपी करते है। जैसे जब पंडित जी पूजा करते है तो मंत्री को के उच्चारण की एक पैटर्न होती है उसी हैदराबादी, पंजाबी, ये सब जब हिंदी बोलते है तो इनकी आवाज की पैटर्न और उनके हिन्दी बोलने की शैली की नकल की जाती है। डबिंग के लिए अच्छी मिमिक्री के साथ दृ साथ अच्छी एक्टिंग आनी जरूरी है यही परफ्केशन ही आपको अच्छा एक्टर बनाती है।   

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

अलविदा पॉलिथीन

 बाल कविता पप्पू गप्पू खेल रहे थे
पड़ा पैर फिसले वे, गप्पू ने पप्पू को संभाला गप्पू खुद भी गिरते-गिरते बचा।
 देखा तो नीचे पड़ा था मुँह फुलाए पॉलिथीन।
 पप्पू ने बोला- तुम मेरे घर कैसे आए?
पॉलिथीन ने कड़क आवाज़ में कहा- मैं तो हूँ तुम्हारे घर के अंदर बाहर,
सब जगह है मेरा साम्राज्य।
रोज सुबह - शाम लाते तुम्हारे पापा, सब्जी, आटा-चावल पॉलिथीन में
 और तुम्हारा दूध वाला पॉलीथीन यहाँ वहाँ मैं फेंक दिया जाता हूँ।
 नाली के सीवर में मैं हँसकर करता नाली को जाम।
 तुम्हारे घर के सामने वाले कूड़े के ढेर में है मेरा साम्राज्य।
 गाय आती धोखे में खा लेती मुझको उसे होती कितनी तकलीफ़।
मैं हजारों साल तक नहीं गलता, क्योंकि मेरा नाम है पॉलिथीन।
पॉलिथीन की बात सुन गप्पू और पप्पू डर गएँ
तभी आया हवा का एक झोंका उड़ गया पॉलिथीन बाहर।
 पप्पू और गप्पू भागे पापा के पास पापा को बताई सारी बात।
 पापा ने कसम खाई,
आज के बाद कुछ भी खरीदने जाएँगे झोला साथ लेकर जाएँगे
 नहीं लाएँगे साथ में कोई पॉलिथीन।
पापा का निर्णय सुन बच्चे खुशी से लगे झूमने यह देख पेड़-पौधे बोले- अलविदा पॉलिथीन।

 Copy right 2019 अभिषेक कांत पांडेय

रविवार, 8 सितंबर 2019

*सीबीएसई द्वारा आयोजित हिंदी कार्यशाला*

 *हिंदी अध्यापकों ने पाठ्यक्रम व प्रश्न पत्र के कलेवर पर रखे अपने विचार*

 प्रयागराज। सीबीएसई  द्वारा  हिंदी अध्यापन के उद्देश्य की पूर्ति हेतु विष्णु भगवान पब्लिक स्कूल  में 7 सितंबर को  प्रश्नपत्र कलेवर से संबंधित कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में हिंदी विषय अध्यापन व प्रश्नपत्र के कलेवर एवं विद्यार्थियों में भाषा के विकास के संबंध में कई विद्यालयों के हिंदी अध्यापकों ने अपने अपने सुझाव प्रदान किया।
 इस अवसर पर विभिन्न विद्यालयों से आए हुए हिंदी के अध्यापकों ने कक्षा 9 एवं 10 के पाठ्यक्रम पर चर्चा किया और प्रश्न पत्र में बदलाव संबंधित अपने सुझाव प्रदान किया।
  कार्यशाला का आरंभ विष्णु भगवान पब्लिक स्कूल के हिंदी डिपार्टमेंट के अध्यक्ष श्री धनंजय के द्वारा किया गया।  इस अवसर पर आए हुए शिक्षकों को छह-छह समूहों में बाँटा गया और निर्धारित क्रियाकलाप दिए गएँ।
 हर एक समूह ने आपस में परिचर्चा करके  संबंधित सुझाव प्रस्तुत किया।  इस अवसर पर समूह संख्या तीन का नेतृत्व क्राइस्ट ज्योति कॉन्वेंट विद्यालय के हिंदी के प्रवक्ता अभिषेक कांत पांडेय ने किया। श्री पांडेय ने व्याकरण से पूछे जाने वाले सवालों को पारंपरिक तरीके से पूछने के तरीकों में बदलाव करने का सुझाव दिया। इसके साथ ही रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के लिए लेखन खंड में संवाद लेखन से संबंधित प्रश्न हाईस्कूल की परीक्षा में पूछे जाने  का सुझाव दिया। इसके साथ ही निबंध  के अधिभार को  10 अंक  से घटाकर 5 अंक अधिभार दिए जाने का सुझाव दिया गया। उन्होंने बताया कि लिखित परीक्षा 80 अंक का होता है लेकिन भाषा में  लेखन के साथ श्रवण और वाचन का भी उतना ही महत्व है। इसके लिए 20 अंक का अतिरिक्त मूल्यांकन अधिभार में 10 अंक का श्रवण एवं वाचन से संबंधित क्रियाकलाप विद्यालय में कराया जाए और उस अंक को बोर्ड के अतिरिक्त 20 अंकों में 10 अंक अधिकार के रूप में दिया जाना चाहिए। इस बात पर सभी शिक्षकों के बीच सहमति बनी।
 समूह तीन की ही दूसरी प्रतिभागी रामानुजन पब्लिक स्कूल की अध्यापिका श्रीमती शिवानी श्रीवास्तव ने हाईस्कूल के प्रश्नपत्र में अपठित गद्यांश एवं काव्यांश के प्रश्नों को बहुविकल्पी प्रश्नों में बदलने  का सुझाव दिया। इस बात पर मिली-जुली सहमति बनी। समूह तीन की ही संत जोसेफ स्कूल की अध्यापिका नम्रता द्विवेदी ने पद-परिचय से संबंधित प्रश्न के मूल्यांकन में होने वाली दुविधा के निवारण के लिए इस प्रश्न को बहुविकल्पी प्रश्न के तौर पर शामिल करने की बात कही। जिससे कि सटीक मूल्यांकन हो सके।
  अन्य समूह संख्या के अध्यापक वी०के० शास्त्री ने उपभोक्तावादी संस्कृति पाठ से बोर्ड की परीक्षा में प्रश्न न पूछे जाने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि इस पाठ से बच्चे विज्ञापन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव  से होने वाले नुकसान से जागरूक होते हैं। विज्ञापन  का प्रभाव सामाजिक मूल्यों को  प्रभावित करते हैं  और  केवल खरीदारी का संस्कार डालते हैं। ऐसे में यह पाठ हमें उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बनने से रोकती है और हर विज्ञापन को तार्किक शक्ति से पहचानने और समझने की सीख देती है। इसलिए उन्होंने कहा कि बोर्ड की परीक्षा में इस पाठ से सवाल अवश्य पूछा जाए।
इस संदर्भ में विभिन्न शिक्षकों ने अपनी राय रखी।  हिंदी अध्यापक श्री अभिषेक कांत पांडेय ने हिंदी के महत्व को व्यक्त करते हुए  फादर कामिल बुल्के के जीवन पर आधारित पाठ 'दिव्य करुणा की चमक'  की चर्चा किया। फ़ादर कामिल बुल्के ने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अपने जीवन को भारत  के लिए समर्पित कर दिया था। इस पाठ से हिंदी की महत्ता पर विस्तृत चर्चा किया। उन्होंने इस पाठ की महत्ता को बच्चों में किस तरह समझाया जाए और इसी तरह  दूसरे पाठ के अध्यापन में भी नवाचार अपनाने पर बल दिया। सुझाए गए अध्यापन के नये तरीके पर सभी अध्यापकों में सहमति बनी।
 कार्यशाला का समापन विष्णु भगवान पब्लिक स्कूल के शिक्षकों ने धन्यवाद प्रकट किया और सभी शिक्षकों ने राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी को सशक्त बनाने के लिए एक दूसरे को सहयोग करने का वचन भी दिया।
 इस कार्यशाला में अन्य प्रतिभागियों ने भी अपने विचार प्रमुखता से  रखा
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script> <script> (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({ google_ad_client: "ca-pub-3199975652916073", enable_page_level_ads: true }); </script>

यह ब्लॉग खोजें

नये प्रयोग के रूप में मृच्छकटिकम् नाटक का सफल मंचन

रंगमंच नाटक समीक्षा- अभिषेक कांत पांडेय प्रयागराज। उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में  प्रख्यात  संस्कृत नाटक  'मृच्छकट...