सोमवार, 31 दिसंबर 2012

haivaniyat

दिल्ली में हुई घटना के बाद हम आने वाले साल की शुभकामना कैसे दे सकते है देश की बेटी हैवानियात की शिकार हुई और हम आज़ादी के इतने सालो के बाद भी स्त्री की इज़त नहीं करना सीखे   ये हमारी हार है की  हम देश में ऐसे लोगो चुनते है  जो हमारी रक्षा नहीं कर सकते है केवल बयानबाज़ी करते है इस  साल की ये घटना इंसानियत के मुह पर तमाचा है।  कब हम जागेंगे ..........

लघु कहानी : आदमी


एक कहानी आप सभी को सुनाता हू की एक गौव था उसका नाम आधा गाव था वहा कोई औरत, माँ, बहन, पत्नी , बेटी 

बच्ची, सहेली, कोई नहीं था बस था तो सिर्फ आदमी .....आदमी ......आदमखोर आदमी  ....बलात्कारी आदमी .............


                                                                                                                                   आशीष कान्त पाण्डेय 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी का मतलब क्या है जिओ और जीने दो यह लोकतंत्र का मूल मन्त्र है शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार और भोजन सभी को  मिलाना उनका अधिकार है लेकिन आज भारत में गरीबो को उनका ये हुक नहीं मिल रहा है इसके लिए कौन जिम्मेदार है यह प्रश्न सभी के मन में कौंधता है और हम जानते है की कही न कही हम जिमेदार है भ्रष्टाचार के खिलाफ लोक पल बिल की मांग और आन्दोलन के बाद लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव लड़कर एस हक़ को पाने की बात अब चुनाव लड़ना एक मात्र विकल्प है  सही भी है अगर नेता सही चुने जाये तो देश तरक्की कर सकता है लेकिन सही लोगो को चुनाव लाकने के लिए आगे आने की जरूरत है आशा कारते है की आगामी चुनाव में देश के लिए कार्य करने वाले नेता चुने जायेंगे
स्वंतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई 

रविवार, 10 जून 2012

मनरेगा मे केवल तीन दिन रोजगारॽ



अभिषेक कांत पाण्डेय
मनरेगा मे केवल तीन दिन रोजगारॽ
ग्रामीणों को सम्मान से जीने के लिए मनरेगा कानून के तहत १०० दिन के लिए काम मांगने पर काम देने की जिम्मेदारी संबधित अधिकारियों की है। लेकिन हकीकत इससे अलग है। खासतौर पर महिलाओं को मनेरेगा के तहत काम के समय कूल मजदूरों की संख्या के ३३ प्रतिशत की संख्या महिलाओं की होनी चाहिए     लेकिन इसके उलट यह संख्या केवल कागजों पर दिखाकर पूरी की जाती है। इस स्तर पर प्रधान रोजगार सेवक मिली भगत से उत्तर प्रदेश में मनरेगा में रूपयों का हेर–फेर हो रहा है। इस बाबत जब नारी संघ की महिला सदस्यों ने ग्राम प्रधान से कहा जता है तो प्रधान धमकी देकर मामला दबाने की कोशिश करता है। यह सब खेल वाराणासी के काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायतों में धड़ल्ले से चल रहा है। इस पर जब वहां की संगठित १० ग्राम पंचायत की महानारी संघ की महिलाओं ने इस बाबत ब्लाक में शिकायत की तो काम तो मिला केवल तीन दिन के लिए। इस तरह कई बार नारी संघ की  महिला सदस्यों ने इसके बारे में ब्लाक अधिकारी से शिकायत की तो भी को सार्थक हल नहीं मिला। वहीं महिलाओं ने काम के आवेद के बाद केवल तीन दिन का मननेगा के तहत काम मिलता है। जबकि नियमता एक बार काम मागने पर १५ दिन तक काम मिलना चाहिए लेकिन प्रधान व रोजगार सेवक इनके हिस्से के बाकी बारह तेरह दिन के काम को कागजों पर अपने चहतों के नाम पर दिखाकर मिले मजदूरों के पैसे का बंदर बाट किय जा रहा है।
वहीं मनरेगा के तहत अब तक सारे नियम कानून को ताक में रखकर ग्रामीणों का उनके सौ दिन का काम पाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। इस सबंधं में देखा जाए तो ग्राम प्रधान से लेकर ब्लाक अधिकारी अपने जिम्मेदरियों का निर्वाह केवल कागज में निभा रहें यह कई ग्राम पंचायतों में गठित नारी संघ की  महिलाओं कहना है।
जाब कार्ड के लिए भटकना पड रहा है
  काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत मुडादेव की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से १९ मार्च २०१२ को जाब कार्ड के लिए आवेदन किया था लेकिन  दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जाब कार्ड नहीं मिला। नारी संघ की महिला ने मुडादेव ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान व रोजगार सेवक से बात की तो उन्होंने महिलाओं को केवल आश्वासन दिया। इसी ग्राम पंचायत की नारी संघ की सदस्य महिला चंपा देवी का कहना है कि इस संबंध में ब्लाक अधिकारी को अर्जी दी तो भी कोई कार्यवाई नहीं हुई।
मनरेगा में मिला तीन दिन काम बाकी कागज पर हुआ काम
    इसी तरह का मामला वाराणसी के काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत देल्हना की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से काम के ए आवेदन १३ अप्रैल को दिया लेकिन काम एक महीने के बाद मिला वह भी तीन दिनों के लिए। जब महिलाओं ने प्रधान से पूछा तो उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत केवल दस हजार रूपये का बजट आया है इसीलिए तीन दिन ही काम हुआ है जब बजट आयेगा तब फिर काम होगा। इस पर महिलाओं का कहना है कि मनरेगा के तहत एक बार में बीस से पच्चीस दिन के काम के लिए बजट आता है लेकिन प्रधान ने कागज पर काम दिखाकर अधिकारियों व कर्मचारियों ने पैसे बनाये हैं। इस पर नारी संघ की सदस्य महिलाएं आरटीआई के तहत आय व्यय की जानकारी मांगी है।
मनरेगा योजना नहीं कानून लेकिन छ महीना बाद नहीं मिला काम
वहीं इसी ब्लाक के कुरहुआ ग्राम पंचायत में तो हद हो गई। छह महीने बीत जाने के बाद जाब कार्ड के लिए नारी संघ की महिला सदस्य मंजू देवी सुशीला देवी व शीला देवी सहित दस महिलाओं ने २३ जाब कार्ड के लिए नवंबर २०११ को  आवेदन किया लेकिन आज तक कार्ड नहीं बना। इस पर महिलाओं ने मनरेगा हेल्पलाइन में ११ जनवरी २०१२ को शिकायत दर्ज कराई कंपलेन नं० ३०३१ मिला लेकिन आज तक इनका जाब कार्ड नहीं मिला। मनरेगा में १०० दिन के काम देने की पोल खुल रही है। इन महिलाओं का कहना है कि जब मनरेगा हेल्प लाइन हमारी शिकायत सुनने के बाद काई कार्यवाई नहीं कर रहा है तो हमें काम कौन दिलाएगा। मनरेगा में इस कदर भ्रष्टाचार के चलते गरीब महिलाओं को काम नहीं मिल रही है। प्रधान और ग्राम सेवक के खिलाफ कई  बार शिकायत करने पर ब्लाक अधिाकरी नहीं सुन रहे हैं। ऐसे में इस कानून से हमें लाभ नहीं मिल रहा है केवल कागजों में ही ९० प्रतिशत काम हो रहा है। और हमारे साथ अन्याय हो रहा हमें हमारा हक नहीं मिल रहा है। इसीलिए नारी संघ की सभी ग्राम पंचायत की महिला सदस्य एकजुट होकर ब्लाक आफिस पर धरना प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी।

बुधवार, 6 जून 2012

और यूपी बोर्ड टापर को नहीं मिल पाएगा दिल्ली के टाप कालेज में प्रवेशॽ


उत्तर प्रदेश माध्यमिक बोर्ड का रिजल्ट आ गया है। अब स्नातक में प्रवेश के लिए छात्रों को विविश्विद्यालय के कट आफ मेरिट में अपना स्थान बनाना होगा। अगर बात करे तो दिल्ली विश्वविद्यालय ओर इसे संबधित मान्यता प्राप्त कालेज में प्रवेश के लिए यूपी बोर्ड का टापर अन्य बोर्ड सीबीसई व आइसीएससी बोर्ड के टापर से पिछड़ जाएगा। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि हर बोर्ड के टापर की सूची पर नजर डाले तो यहां यूपी बोर्ड के टापर का प्रतिशत ९६ प्रतिशत के लगभग है जबकि अन्य बोर्ड के टापर ९९ प्रतिशत अंक पाकर सबसे आगे हैं। जाहीर है कि दिल्ली के कालेजों में स्नातक में प्रवेश का आधार केवल इंटरमीडिएट के प्रतिशत को देखकर काट आफ बनाया जाएगा तो ऐसे में यूपी बोर्ड का छात्र जो औसत पच्चासी प्रतिशत अंक पाने वाला लाख मेंहनत के बाद सीबीएसई के नब्बे प्रतिशत वालों के आगे उनका एडमिशन नहीं हो पाएगा चाहे वह जितने भी योग्य हो।
यूपी बोर्ड लाख स्टेप मार्किंग का दावा कर ले लेकिन यहां से टाप करने वाला छा़त्र भी एकेडमिक मेरिट से प्रवेश व चयन में सीबीएसी आईसीएसइ बोर्ड के नब्बे प्रतिशत अंक पाए से पीछे रह जाएगा। वहीं सीबीएसई बोर्ड व आईसीएसई बोर्ड के टापर के मुकाबले यूपी बोर्ड के टापर के दस प्रतिशत अंक कम है तो आप सोचिए कैसे दिल्ली के टाप कालेज में स्नताक में यूपी बोर्ड से इंटर पास कैसे प्रवेश प्राप्त कर पाएगा।
ध्यान दे कि ९० से ९५ प्रतिशत अंक पाने वाले सीबीएसई व आर्इसीएसई बोर्ड में तादाद हजारों में है ऐसे  मे यूपी बोर्ड के टापर को मनचाहा अच्छा कालेज दिल्ली में नहीं मिल पाएगा। अब आपही बताइए कि यूपी बोर्ड में ८७ प्रतिशत अंक पाने वाला यूपी बोर्ड छात्र एकेडमिक से चयन में हमेशा सीबीएसई व आर्इसीएसई बोर्ड के ९० प्रतिशत औसत नंबर पाने वाले छात्र से पिछड़ जाएगा चाहे यूपी बोर्ड के ये छात्र कंपटीशन परीक्षा में आईएस व पीसीएस परीक्षा में प्रदर्शन कर अधिकारी बन जाएगा लेकिन यूपी में प्राइमरी शिक्षक नहीं बन पाएगा।
एकेडमिक के प्रतिशत को देखकर दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक मे प्रवेश देना सही नहीं है क्यों कि हर बोर्ड के अंक देने का आधार अलग–अलग है। यहां तो स्नातक में प्रवेश के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के माध्यम से प्रवेश होना  चाहिए । यही बात प्राइमरी टीचर के भर्ती में लागू होती है कि एकेडमिक से चयन का राग आलापने वाले विचारवानों को सोचना चाहिए कि जब हम एक समान परीक्षा प्रणाली नहीं अपना रहें हैं तो ऐस में एकेडमिक का नंबर देख टीचर बनाना सही नहीं है। इससे जाहिर होता है कि यूपी बोर्ड से उतीर्ण लोगों को यूपी में ही टीचर से नौकरी देने से बाहर रखने की नीति बनाई जा रही है। जिसका पुरजोर विराध किया जा रहा है। टीईटी मेरिट से चयन करना न्यायसंगत व संवैधानिक है। सरकार जल्द टीईटी मेरिट से शिक्षकों की भर्ती कर युवा हितैषी होने का प्रमाण दें।

बुधवार, 30 मई 2012

कल फैसले का दिनǃ


कल फैसले का दिनǃ
प्राइमरी टीचर भर्ती यह मोड़ कई बार आया की जब जब नियुक्ति की मांग की तो लाठी डण्डे मिले। यही युवा है जिन्होने मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन आज अपने हक की लड़ाई भी लोकतांत्रिक ढंग से लड़ने नहीं दिया जा रहा है। इधर सरकार टीईटी मेरिट से जल्द भर्ती का आश्वासन नहीं दे रही है। लेकिन यह बात साफ है कि चयन प्रक्रिया को बदल पाने में कानूनी अड़चने है। इधर फिर भी इन सब बारीकियों पर गौर करने के बाद भी कोई अधिकारिक बयान नहीं आया लेकिन विधानसभा सत्र में टीईटी से चयन की बात की गई है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि टीईटी मेरिट से भर्ती की जाएगी।
हाईकोर्ट में  सुनवाई में फैसला आ सकता है। जिसमें पूर्व विज्ञापन के आधार पर भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी।

रविवार, 27 मई 2012

टेट उतीर्ण और भर्ती प्रक्रिया में शामिल बेरोजगारों की सरकार अवेहलना कर रही


 खबरें आ रही हैं कि अगले सत्र में शिक्षा मित्रों की नियुक्‍ति होगी लेकिन ये तो पैराटीचर तो पहले से ही नियक्‍त हैं वो भी इण्‍टर पास  और सरकार इन्‍हें बीएड करा कर स्‍थाई नियुक्‍ति देगी। इधर आरटीई काबिल टीचर की बात करता है। तो हमारा संविधान सबकों एक समान  नजरिये से देखता है कि योग्‍यता के अनुसार नौकरी दी जाए। लेकिन  बीएड टेट उतीर्ण और भर्ती प्रक्रिया में शामिल बेरोजगारों की सरकार अवेहलना कर रही है। ६ लाख बीएड धारक और ३ लाख टीईटी पास  और लाखों लोग टीचर बनने के लिए बीएड करने की तैयारी अभी से कर रहे हैं इन्‍होंने वर्तमान सरकार को वोट दिया कि जल्‍द टीचर की भर्ती लोकतांत्रिक ढंग से शुरू होगी लेकिन वर्तमान सरकार चुनाव से पहले की परिस्‍थ्‍ितियों को भूल गया है। अब केवल एक ही दिशा में शिक्षा मित्रों की बात कर रहा है। इधर कंपटीशन से बीएड करने वाले और टीईटी मेरिट में से नियुक्‍ति का बात न करके इनको केवल टरकाया जा रहा है। संवैधानिक तरीके से हो रही भर्ती की प्रक्रिया को बदलने में ज्‍यादा रूचि दिखा रही है। बेरोजगारी भत्‍ते में भी सरकार का फैसला बिल्‍कुल अजीब है कैसे बेरोजगारी भत्‍ता के लिए सरकार बेरोजगारो से काम लेगी तो यह बेरोजगारी भत्‍ता कहां होगी ये तो रोजगार देना हुआ तो 

सरकार पहले ये तय करती की नहीं हम बेरोजगारी भत्‍ता नहीं इन बेरोजगारों को काम देंगे काम से जीने का सम्‍मान देंगे। लेकिन सरकार केवल  अपने वोट बैंक के बारे में ही सोचती है। चुनाव से पहले केवल बेरोजगारी भत्‍ते का लाली पाप दिखाया और जमीनी तौर पर उसे लागू करने पर उस पर कई नियन लगा दिये। बहरहाल
एक तरह से सरकार खुद मानने लगी हर बेरोजगारों को उनकीयोग्‍यता के अनुसार रोजगार दिलाना सरकार का दयित्‍व है। लेकिन मजेदारी बात है कि बीते कई महीने से टीईटी मेरटि से चयन मामले में सरकार काई पहल नहीं कर रही है जोकि आरटीई एक्‍ट के तहत योग्‍य टीचर बनने की योग्‍यता रखते
हैं लेकिन सरकार एक तरफ ट्रेनिंग देकार टीचर बनाने के लिएसाल भर इंतजार कर सकती है। लेकिन जिन टीईटी बेरोजगारो के वोट के बल पर सत्‍ता हासिल की उन्‍हें ही धोखे में रखा जा रहा है। केवल बदले की राजनीति का यह ज्‍वलंत उदाहारण  है

मंगलवार, 22 मई 2012

करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है


टीईटी मेरिट से चयन को लेकर इस समय सरकार कानूनी हल ढूढ रही है। एकेडमिक
मेरिट के लिए केबिनेट में मंजूरी लेनी होगी तभी नियमावली संशोधित होगी। लेकिन क्‍या
सरकार को इस तथ्‍य पर मंथन करना अधिक जरूरी है कि वर्तमान में शिक्षा के स्‍तर को बढाने के
लिए टीईटी की मेरिट या कंपटीशन के माध्‍यम से चयन लोकतांत्रिक है। अगर पिछली
सरकार ने आरटीई के महत्‍व को समझते हुए टीईटी मेरटि से चयन के प्राथमिक शिक्षकों
की भर्ती करने की पहल की तो इस सरकार को क्‍या परेशानी है क्‍या चुनी हुई सरकार इस
तरह के फैसले को सही कहा जाएगा जो केवल पिछली सरकार के टीईटी मेरिट वाले विज्ञापन
को राजनीतिक द्वेष के चलते विज्ञापन को निरस्‍त करने या चयन प्रक्रिया को बदलकर शैक्षिक
मेरटि किया जाना सही है। जब अलग अलग बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय में नंबर देने का मानक
अलग है तो साफ जाहिर है कि इसमें वे उम्‍मीद्वार पीछे रह जाएंगे जिन्‍होंने ऐसी संस्‍थाओं से
अपनी पढाई की जहां नंबर कम मिलता है।
यहां यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि बहुमत की सरकार जब भी नियमावली बनाती है या उसमें संशोधन करती है तो उसको न्‍याय के कसौटी पर खरा उतरना है परंतु यहां टीईटी मेरिट चयन प्रक्रिया जबकि इसका विज्ञापन के बाद केवल चयन होना शेष है लेकिन सरकार केवल चयन प्रक्रिया बदलने में रूचि दिखा रही है अगर ऐसा हुआ तो न्‍यायपालिका का विकल्‍प हमारे लिए खुला है और उसके उपर कोई सरकार नहीं है। वहीं जब प्राथमिक शिक्षक की भर्ती विज्ञापन के आधार पर बेरोजगारों ने आवेदन किया और टीर्इटी मेरिट से चयन होना तय हूआ तो बीच में सरकार
इसके चयन का आधार बदलने व चयन का आधार न बदल पाने पर विज्ञापन को निरस्‍त कराना चाहती है। जबकि मीडिया की खबरों के अनुसार बडी तत्‍पर्य है। यही राजनीति आज भारतीय शिक्षा को गर्त में ले गया है। अगर अब भी सरकार चेती नहीं तो आरटीई अपने लक्ष्‍य को पाने में भटक जाएगा और युवाओं को ठगा जा रहा है। बेरोजगारी भत्‍ते में कई नियम चुनाव जीतने के बाद बताएं गए चुनाव के समय अगर बताते तो युवा अपने विवेक का जरूर प्रयोग करते। बहरहाल हमारी राजनीति भी बडे बडे वादे और सपनों का सौदा करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है और उपभक्‍ताओं को खरीदने के बाद उस मानलुभावन वादें वाले विज्ञापन पर खींज होती हैं बिल्‍कुल इसी तरह आज बेरोजगार युवा अपनी गलती पर मध्‍यवती चुनाव की ओर देख रहा है कि अब सबक सीखाने की बारी हमारी है। अपनी टिप्‍पणी दें।

सोमवार, 21 मई 2012

मनरेगा में काम के लए मिल रहा केवल आश्वासन


मनरेगा में काम के लए मिल रहा केवल आश्वासन
      वाराणसी। मनरेगा यानी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी कानून के जरिए ग्रामीणों को सौ दिन का रोजगार दिलाकर उनको सम्मान से जीने का हक देती है। लेकिन इस कानून के तहत ग्रामीणों का हक अधिकारी और कर्मचारी खा रहे हैं। प्रधान से लेकर विकास खण्ड अधिकारी की जिम्मेदारी बनती है कि मनरेगा कानून के तहत काम के लिए आवेदन करने वाले को अगले १५ दिनों में रोजगार दें लेकिन हकीकत में ग्रामीणों को उनके इस हक से महरूम किया जा रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण वाराणसी के विकास खण्ड काशी विद्यापीठ में देखने को मिल रहा है। नारी संघ की महिला सदस्यों ने मनरेगा कानून के तहत काम के लिए आवेदन किया लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है। इन महिलाओं को प्रधान ग्राम सेवक और ब्लाक अधिाकरारी केवल अश्वासन दे रहे हैं।
जाब कार्ड के लिए भटकना पड रहा है
  काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत मुडादेव की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से १९ मार्च २०१२ को जाब कार्ड के लिए आवेदन किया था लेकिन  दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जाब कार्ड नहीं मिला। नारी संघ की महिला ने मुडादेव ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान व रोजगार सेवक से बात की तो उन्होंने महिलाओं को केवल आश्वासन दिया। इसी ग्राम पंचायत की नारी संघ की सदस्य महिला चंपा देवी का कहना है कि इस संबंध में ब्लाक अधिकारी को अर्जी दी तो भी कोई कार्यवाई नहीं हुई।
मनरेगा में मिला तीन दिन काम बाकी कागज पर हुआ काम
    इसी तरह का मामला वाराणसी के काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत देल्हना की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से काम के लिए आवेदन १३ अप्रैल को दिया लेकिन काम एक महीने के बाद मिला वह भी तीन दिनों के लिए। जब महिलाओं ने प्रधान से पूछा तो उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत केवल दस हजार रूपये का बजट आया है इसीलिए तीन दिन ही काम हुआ है जब बजट आयेगा तब फिर काम होगा। इस पर महिलाओं का कहना है कि मनरेगा के तहत एक बार में बीस से पच्चीस दिन के काम के लिए बजट आता है लेकिन प्रधान ने कागज पर काम दिखाकर अधिकारियों व कर्मचारियों ने पैसे बनाये हैं। इस पर नारी संघ की सदस्य महिलाएं आरटीआई के तहत आय व्यय की जानकारी मांगी है।
मनरेगा योजना नहीं कानून लेकिन छ महीना बाद नहीं मिला काम
वहीं इसी ब्लाक के कुरहुआ ग्राम पंचायत में तो हद हो गई। छह महीने बीत जाने के बाद जाब कार्ड के लिए नारी संघ की महिला सदस्य मंजू देवी सुशीला देवी व शीला देवी सहित दस महिलाओं ने २३ जाब कार्ड के लिए नवंबर २०११ को  आवेदन किया लेकिन आज तक कार्ड नहीं बना। इस पर महिलाओं ने मनरेगा हेल्पलाइन में ११ जनवरी २०१२ को शिकायत दर्ज कराई कंपलेन नं० ३०३१ मिला लेकिन आज तक इनका जाब कार्ड नहीं मिला। मनरेगा में १०० दिन के काम देने की पोल खुल रही है। इन महिलाओं का कहना है कि जब मनरेगा हेल्प लाइन हमारी शिकायत सुनने के बाद काई कार्यवाई नहीं कर रहा है तो हमें काम कौन दिलाएगा। मनरेगा में इस कदर भ्रष्टाचार के चलते गरीब महिलाओं को काम नहीं मिल रही है। प्रधान और ग्राम सेवक के खिलाफ कई  बार शिकायत करने पर ब्लाक अधिाकरी नहीं सुन रहे हैं। ऐसे में इस कानून से हमें लाभ नहीं मिल रहा है केवल कागजों में ही ९० प्रतिशत काम हो रहा है। और हमारे साथ अन्याय हो रहा हमें हमारा हक नहीं मिल रहा है। इसीलिए नारी संघ की सभी ग्राम पंचायत की महिला सदस्य एकजुट होकर ब्लाक आफिस पर धरना प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी।

रविवार, 20 मई 2012

उत्तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर वन तब भी नहीं हो रही टीईटी मेरिट से चयन

उत्तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर वन तब भी नहीं हो रही टीईटी मेरिट से चयन

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्‍यालयों में पढाई नहीं होती है। प्राथमिक विद्‍यालय में मिड डे भोजन में पोषक तत्‍व गायबहैं। सरकारी प्राइमरी स्‍कूल में पढने में उच्‍च प्राथमिक विद्यालय के बच्‍चों को जोड घटाना नहीं आता है। हमारे सरकारी स्‍कूलोंकी स्‍थ्‍िति तब है जब आज छटा वेतन आयोग के अनुसार अच्‍छा वेतन सरकारी शिक्षक पा रहे हैं। अब सवाल उठता है कि अखिर यह स्‍थिति क्‍यों बनी हुई है। जाहिर है पिछले दशकों से शिक्षा के स्‍तर पर शिक्षकों के चयन में कोई अपेछ्‍ति सुधार नहीं हुआ है। आज जब मुफत शिक्षा अधिकार कानून की बात आती है तो भी इस कानून का पालन करने में राज्‍य सरकार सुस्‍त दिख रही है।उत्‍तर प्रदेश में यह स्‍थ्‍िाति और दयनीय है। और बात जब टीईटी यनी टीचर एजिबिलिटी टेस्‍ट के अनिवार्य करने के बाद आज भीमजाक बना हुआ है। जहां एक आज छात्र व शिक्षक अनुपात प्रथमिक स्‍तर पर एक शिक्षक पर ३० छात्र और उच्‍च प्राथमिक में ३५ छत्र होने चाहिए लेकिन आज जहां राज्‍य सरकारें टीचरों की भर्ती प्रक्रिया में उलझें और केवल नकल माफियों को फायदा पहुंचाने में लगी है। टीईटी मेरिट की बात अनसुना कर रही है। 

उत्‍तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर एक है। बडी शर्म की बात है कि संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ विश्‍व के  बच्‍चों के उनके अधिकार दिलाने के लिए चल रही मुहिम में हिस्‍सा बनने के बाद भी भारत में बाल मजदूरी में जस तस की स्‍थिति बनी सरकारें आती हैं और चली जाती हैं।बुनियादी स्‍तर पर कोई सुधार नहीं कर रही है। बाल मजदूरों की संख्‍या बढ रही और विडंबना यह है कि इन बच्‍चों को स्‍कूलों में होना चाहिए ये बच्‍चें स्‍कूल के बाहर काम कर रहे हैं। एक रिपोर्ट की माने तो २२ प्रतिशत बच्‍चे स्‍कूल से  बाहर हैं और ६९ प्रतिशत बच्‍चे स्‍कूल छोड देते हैं। सरकार की जिम्‍मेदारी बढ जाती है। जबकि २२ प्रतिशत बच्‍चे बीच में स्‍कूल छोड देते हैं।


शनिवार, 19 मई 2012


जिस तरह से टेट मेरिट से चयन के प्रति सरकार की हीलाहवाली चर रही है तो 
उससे एक बात साफ है कि कोर्ट के हस्‍तक्षेप के बाद सरकार को जल्‍द ही चयन 
होगा। दीगर बात यह कि शिक्षा जैसे गंभीर मुददे में सरकार एक सही निर्णय नहीं 
ले पा रही है जबकि आज हम गांवों में प्राथमिक विद्‍यालय की हालत देख सकते
है। सर्वशिक्षा अभिया अशातित सफलता नहीं हासिल कर पा रहीं है। शायद इसका कारण
हमारे पास सर्वविदित है कि पढाई का स्‍तर आज गिरा है। जिस  तेजी से हमारी दुनिया
बदल रही है उस तेजी से प्राथमिक विद्‍यालय में गुणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा की बात 
नहीं हो रही है। अभी टीचरों की भरती के स्‍पष्‍ट मानक नहीं है। ऐकमेडिक के द्‍वारा चयन 
का मानक आज अपनी प्रासंगीकता पर स्‍वयं ही प्रश्‍न पूछ रहा है। नकल एक बडी समस्‍या है
और इसी नकल के वातावरण से अगर हम एकेडमिक मेरिट से टीचर चुन रहे हैं तो निश्‍चित 
ही हम बच्‍चों के भविष्‍य के साथ खिलवाड कर रहे है। यहा एक बात है कि कंपटीशन या टीईटी मेरिट
से चयन सर्वोत्‍तम है लेकिन सरकार यह विकासवादी निर्णय लेने में समय लगा रही है। 

मंगलवार, 8 मई 2012

बेसिक शिक्षा मंत्री के बयान ने


बेसिक शिक्षा मंत्री के बयान ने टीईटी उतीर्ण बेरोगारों के साथ धोखा किया जा रहा है।

जिस तरह अखबार में टीईटी भर्ती के मामले में भ्रमित करने वाली खबरें आ रही है।
अभी भी मीडिया टीईटी मेरिट के औचित्‍य पर कोई सार्थक लेख नहीं प्रकाशित कर रही है
बल्‍कि इन सब मामलों में अपने पाठकों को भटका रही है। टीईटी मेरिट के संबंध में सरकार
के साथ ही मीडिया भी अपने विचार खुल कर नहीं रख रही है शायद कारण साफ है कि इस 
परीक्षा में धांधली के आरोप के चलते इस प्रक्रिया पर कुछ लिखने में असहज है लेकिन इतना
बड़ा मुददा जोकि हमारी शिक्षा के बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए है। जहां आज नकल
सबसे बड़ा नासूड है ऐसे में अगर अब टीईटी मेरिट या कंपटीशन चयन में अनिवार्य नहीं हुआ तो
शिक्षा का स्‍तर नहीं सुधर सकता है।

बुधवार, 2 मई 2012

टीईटी अथ्यर्थियों को नौकरी की जगह मिलता है केवल आश्वासन


आज हाईकोर्ट प्राईमरी शिक्षको को चयन से संबंधित विज्ञापन की सुनवाई १५ मई को कर दी गई है।

आज जनता दरबार में टीईटी अभ्‍यर्थियों को मुख्‍यमंत्री को अश्‍वासन दिया कि जल्‍द ही फैसला लिया जाएगा
लेकिल प्रश्‍न यह उठता है कि अखिर सरकार इस पर निर्णय लेने पर इतना देर क्‍यों कर रही है।
इसके साथ ही जब टीईटी मेरिट से चयन की बातें विज्ञापन में स्‍पष्‍ट थी तो अदालत में मामला केवल अपनू
फायदे को भूनाने में किया जा रहा है तरीख बढ़ना और इस सब टिप्‍पणी तो नहीं की जा सकती है परंतु
अगर हम थोड़ा पीछे जाते हैं तो बातें स्‍पष्‍ट है कि आरटीई के तहत टीईटी परीक्षा पात्रता है और साथ ही
इसके वेटेज का भी महत्‍व है। यानी टीईटी चयन का आधार उचित है। लेकिन सरकार बदलने के बाद
अब इसमें राजनीति साफ झलक रही है। इस समय टीईटी पास तीन लाख की जगह आठ नौ लाख लोग 
इस प्रक्रिया को कैंसिल करने की इच्‍छा रखते हैं। इसी में एक व्‍यक्‍ति ने विज्ञापन को ही चैलेंज कर डाला
और महीनों प्रक्रिया को उलझाये रखा। टीईटी अभ्‍यर्थियों ने हजारों रूपये खर्च कर एक इस परीक्षा में टीईटी मेरिट की प्रक्रिया को जानकर उत्‍साह से आवेदन किया और मेहनत से परीक्षा उतर्ण की अगर इनके साथ प्रक्रिया बदलने की बात आती है या विज्ञापन निरस्‍तकरने की तो जाहीर है कि सीधे जीविका के आधार पर चोट किया जा रहा है यानी की मानवाअधिकार का उल्‍लंघन किया जा रहा है।

सरकार की जिम्‍म्‍ादारी

सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से इस पर विचार करना चाहिए की आज टीईटी मेरिट से या कंपटीशन से चयन का तरीका
उचित है क्‍योंकि इससे शिक्षा के क्षेत्र में अच्‍छी प्रतिभा आएगी। जनहित में देखा जाए तो यह प्रक्रिया अच्‍छी है।

जारी रहेनी चाहिए लड़ाई

टीईटी अभ्‍यर्थियों को अपने हक के लिए आंदोलन जारी रखना चाहिए क्‍योंकि मामला राजनीतिक हो रहा है।
जाहीर है कि इस समय इन्‍हें घूमाया जा रहा है ठीक लटटू की तरह। हमारी शिक्षागत निर्णय में राजनीतिक हित ज्‍यादा हावी होती जा रही है। यह परंपरा टीईटी अभ्‍यर्थियों को अपने आंदोलन के माध्‍यम से तोड़ना जरूरी है और टीईटी मेरिट की वकालत करना एक समझदारी है। क्‍योंकि समानता के नियम पर आधारित है।

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

टीईटी मेरिट से चयन प्रकिया को वे लोग ही बदलना चाहते है

आज बहस के दौरान जब याची के अधिवक्‍ता आलोक यादव से जज ने पूछा तो इस प्रक्रिया में आपको क्‍या फायदा है तो दोस्‍तों आज केबहस में जज का यह प्रश्‍न करना हमारे लिए पक्ष में है क्‍योकि हमारे आंदोलन ने इस सच्‍चाई को सामने लाय कि टीईटी मेरिट से चयन प्रकिया को वे लोग ही बदलना चाहते है जो टीईटी में कम नंबर पाये हैं या जिनका एकेडमिक में नंबर ज्‍यादा है जैसा कि हम जानते है कि विज्ञापन की छोटी कमियों का फायदाउठाने के लिए कोर्ट गये है और इतने दिनों तक भर्ती प्रक्रिया को लटकायाने का प्रयास किया ताकी अगली सरकार आकर भर्ती में धांधली का आरोपलगाकर चयन प्रक्रिया को बदल दे या विज्ञापन को निरस्‍त करने के लिए सारा दिमाग का खेल खेला जा रहा है। अब याची इसे टीईटी बनाम एकेडमिक मेरिट बनाया जा रहा है। अब प्रश्‍न उठता है कि जब पिछली सरकार ने केबिनट में टीईटी मेरिट चयन का आधार बदल कर दिया तो यह बहुमत की ही सरकारने किया दूसरी बात हाईकोर्ट में यह मामला गया जहां कोर्ट ने टीईटी मेरिट को सही कहा और इसके खिलाफ रिट को खरिज कर दिया। यानी अब बहस
उसी ओर जा रही है। आशा है कि हमारी ही अब जीत होगी विज्ञापन यथावत रहेगा और चयन इस विज्ञापन के अनुरूप होगा।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

अच्‍छे शिक्षक ही देश के भाग्‍य निर्माता बनाते हैं।

आज हम इस मुकाम पर है जहां संघर्ष हमारे जीवन को बदल देगा। जाहीर है कि प्राइमरी शिक्षा के इतिहास में अनिवार्य निश्‍शुल्‍क शिक्षा के बाद टीईटी और इसके बाद इसकी मेरिट से चयन हम एक नए बदलाव की और बढ़ रहे हैं। निश्‍चित अब योग्‍य और कर्मठ शिक्षकों की चुनाव करना आसान होगा। और हर प्राथमिक स्‍कूल में गूणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा मिलेगी। प्राथमिक शिक्षा का नजरिया बदलेगा लोग कहेंगे कि ये है टीईटी मेरिट वाले टीचर काश सरकार ने पहले ही इनकों नियुक्‍त किया हाता तो हम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे होते है। हमारे गांव की कायाकल्‍प हो जाती। लेकिन देर आये दुरूस्‍त वाली कहावत सही है। टीईटी मेरिट से चयनित टीचर शिक्षा के स्‍तर में अमूलचूल बदलाव लाने के लिए तैयार है और इस सपथ के साथ कि हमें न्‍याय मिला है तो हम बच्चों को भी गुणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा देंगे। देश के विकास में भागीदारी बने और हमारे देश को निर्माण करेंगे। अच्‍छे शिक्षक ही देश के भाग्‍य निर्माता बनाते हैं।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

उत्तर प्रदेश सरकार टीईटी अभ्यथियों से खेल खेल रही है।

Uptet government playing game with TET”s candidate
उत्तर प्रदेश सरकार टीईटी अभ्यथियों से खेल खेल रही है।
यूपी में टेट को लेकर जिस तरह से सरकार पिछले तीन–चार महीने से लुका छिपी खेल रही है और विज्ञापन के अनुसार भर्ती करने के अपने कर्तव्य से पीछे हट रही है। ऐसे में नौकरी की आस लगाये बैठे टीईटी उतीर्ण बेरोजगारों में जबरदस्त आक्रोश है। इलाहाबाद में उतीर्ण टीईटी बेरोजगार आशीष हताश हैं। उनका कहना है कि पिछली सरकार ने उनके साथ भदृदा मजाक किया है। वे दुखी होकर बताते हैं कि टीईटी मेरिट से चयन प्रक्रिया के लिए हमने मेंहनत से तैयारी की और जब नौकरी देने की बात आई तो विज्ञापन पर रोक लगाया गया जिसके लिए परिक्षार्थी कैसे जिम्मेदार हैं। वहीं वे कहते हैं कि नई सरकार से हमें बहुत उम्मीदें थीं कि जल्द से जल्द टीईटी मेरिट से चयन प्रक्रिया शुरू करेगी लेकिन सरकार भी उनके साथ ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे एक जिद्दी छोटा बच्चा खेल जीतने के लिए बीच में नियम बदलने और बईमानी की बात कहता है। वहीं राजपूत मानते है कि देर से सही पर वर्तमान सरकार को यह बात समझ में आएगी कि हमारे साथ धोखा हुआ है वे हमारी पीड़ा समेझेंगे और जल्द ही चयन प्रक्रिया टीईटी मेरिट से शुरू करेंगें। 25 April, 2012

हरियाणा में टीचर बनने का सपना हकीकत बनते नजर नहीं आ रही है

Hariyana me teacher banne ka spna hkikut bnate najar nahee a rhaee hai srkar tender par teacher rakhkar RTE ke uddeshya ko bhool rahee hai. Iska verodha karna jaroori hai.
हरियाणा में टीचर बनने का सपना हकीकत बनते नजर नहीं आ रही है। यहां सरकार अब अनुंबध के आधार पर प्राथमिक टीचर की भर्ती करने का मन बना लिया है। वहीं हरियाणा राजकीय विद्यालय संघ ने इस व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया है। शिक्षा की गुणवत्ता की बात की जाती है तो वहीं राज्य सरकार ऐसे निर्णय ले रहीं है जिससे निश्शुल्क अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत अच्छी शिक्षा देने के उदृदेश्य से इतर कार्य कर रहीं है। अनुबंध आधार पर शिक्षकों की नियुक्‍ति कर सरकार शिक्षा की गुणवत्ता के साथ खिलावाड़ कर रही है। जब शिक्षक की नौकरी ही अस्थाई और कम वेतन पर रखे जाएंगे तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि प्रतिभावान शिक्षक मिलेंगे। जबकि अन्य सूचना प्रंबधन आदि में उच्च प्रतिभा पलायन करती है कारण साफ वहां पर अच्छा वेतन और सेवा शर्तें हैं। अगर राज्य सरकारे शिक्षा अधिकार कानून के महत्व नहीं समझेंगी और ऐसे निर्णय लेगी तो निश्चित यह कानून अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेगी।
25 April, 2012

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

क्या मीडिया टीईटी मेरिट के मुद्दे पर विमर्श से बच रही है ॽ


क्या मीडिया टीईटी मेरिट के मुद्दे पर विमर्श से बच रही है ॽ
       पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। सवाल उठता है कि मीडिया समाजिक मुददों पर आज क्यों इतना मौन है। शिक्षा एक ऐसा मुद्दा है जिस पर मीडिया की भूमिका स्पष्ट  होनी चाहिए।
       शिक्षा अधिकार कानून आने के बाद राज्य सरकारें टीईटी और नियुक्‍ति जैसे मामले में कोई सार्थक फैसला नहीं ले रही है और ना ही एनसीटीई की गाईड लाइन को ठीक ढंग से लागू कर पा रही है। प्राथमिक टीचर भर्ती पर विवाद बना है लेकिन मीडिय तनिक भी रूचि नहीं ले रही है। क्या टीईटी मेरिट सही हैॽ एकेडमिक मेरिट से अंतिम चयन कहां तक जायज हैॽ इसके प्रभाव क्या हैॽ क्यों नियमों में परिवर्तन किया जा रहा हैॽ इसके पीछे क्या मंशा है। जैसे मुद्दों पर मीडिया भी सही पत्रकरिता नहीं कर रही हैॽ कहीं कहीं तो अपनी रिपोर्ट में आरटीई एक्ट और एनसीटीई आदि के गाईड लाइन को बिना समझें खबरें बनाई जा रही है। मीडिया एक तरफ स्कूलों में नकल की खबरें छापती है तो दूसरी तरफ एकेडमिक मेरिट की आलोचना से दूर रहती है। मीडिया में विमर्श नहीं हो रहा हैॽ नकल माफियों के मन मुताबिका सब हो रहा है। अनिवार्य निशुल्क शिक्षा एक कानून है जिसके अंतर्गत गुणवत्तायुक्त शिक्षा की बात करता है। परिषदीय विद्यालयों की हालत किसी से छिपी नहीं है। पढ़ाई के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। टीचर सही से पढा नहीं रहे हैं। मीडिया में इस तरह की खबरें आती रही हैं। आखिर टीईटी मेरिट या प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से प्राइमरी टीचर की भर्ती होना कितना सही हैॽ इस पर कोई बहस नहीं छपती है। बस सूत्रों के मुताबिक हर दिन वहीं खबर को चटकारेदार बनाकर तोड़ मड़ोरकर छपती रहती हैं। यहां अखबारों में भी टीआरपी का खेल जारी है। एकेडिमिक मेरिट की बात करें तो ज्यादा लोग अखबार पढ़ेंगे। और अगर टीईटी मेरिट की बात करेंगे तो टीआरपी कम होगी और टीईटी निरस्त की खबर में टीईटी फेल वाले रूचि लेंगे जिनकी संख्या अधिक है वे पढ़ेंगे और सरकुलेशन अखबार का बढ़ेगा। ऐसी मानसिकता के साथ पत्रकारिता की जा रही है।
जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर अखबार कभी कभी उचित स्थान नहीं देती है तो इन मुद्दों को विज्ञापन के माध्यम से प्रकाशित करना आज की जरूरत हैॽ
इस तरह अब मीडिया में जनसरोकार और समाजिक मुद्दों पर रूचि अखबार के प्रंबधन समिति  अपने फायदें को देख कर लेती है। जिससे इन मुददों को अखबार में स्थान नहीं मिलता है। तब जनसरोकार के  मुद्दों पर अखबारों में बकायदा पैसे देकर विज्ञापन द्वारा अपनी बात कहना ज्यादा प्रभावशाली है। इससे लोगों के हित की बात पहुंचेगी और सरकार चेतेगी। वहीं किसी अखबार को इन मुद्दों पर किसी कारणवश रूचि न होने पर वह कम से कम विज्ञापन के तौर पर तो छापने से इंकार तो नहीं कर सकता है। और लोगों में यह स्पष्ट रहेगा की यह समाजिक मुदृदा विज्ञापन है अगर आपाकों उचित लगता है तो इस मुददे  का समर्थन कीजिए लेकिन हम जानते है कि सच्चाई की समर्थन सभी करते हैं।
सूत्रों के मुताबिक खबरें बाद में पलट जाती है लेकिन उस समय अपना प्रभाव छोड़ जाती हैॽ
जबकि ऐसी भ्रामक खबरें टीईटी को लेकर आती है। जहां पत्रकारिता पर सवाल उठना लाजिमी है। आरटीई एक्ट संसद में पारित हुआ है और इसे संसद ही संशोधित कर सकती है। लेकिन मीडिया में तथ्यों को बिना समझे खबरें लिखी जाती है। एकपक्षीय खबरें होती है कि दूसरें पक्ष की बातें नहीं कही जाती है। और एक पक्ष का विश्लेषण होता है जबकि उसी मुद्दे के दूसरे पक्ष का विश्लषण निश्पक्ष नहीं किया जाता है। वहीं यह बात टीईटी एकेडमिक मेरिट वर्सेज एकेडमिक मेरिट में क्या सही हैॽ आज के इस प्रतियोगिता के इस दौर में इस पर मीडिया बहस करने से बचती है और केवल सरकार की बातों को उठाती हैं। और एक तरह से समर्थन करती है। और यहां कितने ऐसे छात्र है जो टीईटी मेरिट के चयन के लिए मेंहनत की। और सरकार बदलने के बाद चल रही प्रक्रिया को निरस्त करने की खबरों को ही ज्यादा प्रमुखता दी जा रही है। वहीं दूसरा पक्ष यानी टीईटी मेरिट या प्रतियोगी परीक्षा यानी इस लोकतंत्रिक तरीके बारे में कोई बहस नहीं हाती है। टीईटी भर्ती पर अभी कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। लेकिन जो खबरें दी जा रही है वह सूत्रों के मुताबिक है। लेकिन निश्पक्ष विश्लेषण की संभावना तो बनती है। वर्तमान में मामला हाई  कोर्ट की लार्जर बेंच में है और ओल्ड विज्ञापन से भरती  बहल होगी और इसका श्रेय हमारी न्यायपालिका और टेट पास बेरोजगारों को मिलेगा जो  के डंडे खाने के बाद अपनी हक़ के आवाज़ के लिए सरकर को भी बता दिया की फहर फैसले चुनाव को देखर नहीं बलकी सही और गलत को देखकर लेने चैये तभी वह सर्कार र लोकप्रिय होती है लोलीपोप और लैपटॉप से नहीं बेरोजगारों को उनकी योग्यता के  अनुसार नौकरी प्रतियोगी परीक्षा से।
अभिषेक कांत पाण्डेय

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

शिक्षा अधिकार कानून के दो साल बाद भी नहीं चेती राज्य सरकारें


शिक्षा अधिकार कानून के दो साल बाद भी नहीं चेती राज्य सरकारें
     हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था हाशिए पर है। शिक्षा अधिकार कानून के लागू होने के दो साल बाद भी हमारी सरकारें सो रही हैं। शिक्षा की गुणवत्ता के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन करने का प्रावधान है। लेकिन अभी तक शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी के बाद शिक्षकों का चयन नहीं हो पाया है। इससे पता चलता है कि राज्य सरकारें शिक्षा जैसे जरूरी मुद्दे पर सरकार मौन है। उत्तर प्रदेश में टीईटी परीक्षा और प्राईमरी शिक्षक भर्ती के विज्ञापन पर पेच उलझा हआ है। वहीं राजस्थान टीईटी और शिक्षक चयन में भी वहां की सरकार कोई ठोस पहल नहीं कर रही है। हरियाणा टीईटी और चयन प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार और छात्रों के बीच मतभेद है। राज्यों का हाल ये तब है जब एनसीटीई के गाइड लाइन के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षकों की योग्यता स्पष्ट है। लेकिन राज्य सरकार की इच्छा शक्‍ति की कमी के चलते भर्ती प्रक्रिया बाधित है। भर्ती प्रक्रिया और चयन के मामलों का निपटारा अब कोर्ट के हाथों में है। शिक्षकों के चयन संबधित सरकार के उचित फैसला न लेने से मामला कोर्ट में चला जाता है। जिससे नौकरी की आस लगाये हजारों बेरोजगार केवल इंतिजार करना पड़ता है। और वहीं प्राथमिक सरकारी स्कूलों में टीचरों का अकाल है। ऐसे में शिक्षा के अधिकार कानून का पालन नहीं हो रहा है। राज्य सरकार जल्द टीचरों की नियुक्‍ति नहीं की तो प्राथमिक स्कूलों की पढाई की स्थिति और भी बत्तर हो जाएगी। इसके लिए कौन जिम्मेदार होगाॽ
उत्तर प्रदेश में उलझी है– टीईटी और शिक्षकों की नियुक्‍ति प्रक्रिया
इन दिनों उत्तर प्रदेश में नवगठित सरकार को टीईटी और पिछली सरकार के प्राथमिक शिक्षक की नियुक्‍ति के प्रक्रिया को पूरा करने का दायित्व है। बता दें कि सबके लिए अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून के लिये सरकार को इस लटकी हुई प्रक्रिया को सुचारू रूप से जल्द से जल्द शिक्षकों की नियुक्‍ति करनी है। लेकिन पिछली सरकार ने टीईटी के नंबरों से चयन करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया और अध्यापक नियमावली में परिवर्तन कर दिया जो एक सरहानीय कदम था क्योंकि पहली बार विशिष्ट बीटीसी चयन किसी परीक्षा के माध्यम से हो रहा है लेकिन टीईटी मेरिट के आधार को चुनौती हाईकोर्ट में दी गई। जहां इसके खिलाफ याचिका खारिज कर दी गई और हाईकोर्ट इलाहाबाद ने टीईटी मेरिट की तारीफ भी की। वहीं अभी कुछ कहना जल्द बाजी होगी। टीईटी उतीर्ण छात्रों ने मुख्यमंत्री से इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द टीईटी मेरिट से कराने के लिए कहा। लेकिन अभी मुख्यमंत्री सचिव के रिपोर्ट के बाद ही कोई निर्णय लेंगे। देखना है कि यह निर्णय टीईटी के मेरिट से चयन प्रक्रिया के पक्ष में आती है या पिछली सरकार के नियमों को पलट कर अधिक वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होती है। जाहिर है अगर पिछली सरकार के समय निकाले गए विज्ञापन के अनुसार चयन प्रक्रिया टीईटी मेरिट से कराकर अब तक के सबसे बड़े विवाद का हल इंमानदारी से निकालती है या फिर एक बार नकल माफियाओं के हाथ में नंबरों से पैसा बनाने का गोरखधंधा के खेल खेलने के लिए सरकार मौका दे देगी। ये तो कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

Sarkari Naukri Recruitment Result - UPTET, BETET Merit/Counselling/Appointment: RTE : कितना मुफ्त कितना अनिवार्य

Sarkari Naukri Recruitment Result - UPTET, BETET Merit/Counselling/Appointment: RTE : कितना मुफ्त कितना अनिवार्य

अखिर कब होगा टीईटी मेरिट से चयनǃ


अखिर कब होगा टीईटी मेरिट से चयनǃ

धोखाǃ धोखाǃ टीईटी पास करने वालों बेरोजगारों से। टीईटी से मेरिट को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी जहां हाईकोर्ट ने टीईटी मेरिट को अच्‍छी प्रक्रिया माना। टीईटी मेरिट से चयन के लिए धरना प्रदर्शन आंदोलन डण्‍डे बेरोजगारों को खाना पड़ा। मुख्‍यमंत्री का आश्‍वासन पाकर छात्र रूक गये लेकिन थके नहीं। आज जब यह रिपोर्ट आ रही है कि टीईटी को रद् कर दिया जाये और चयन का आधार हाईस्‍कूल इण्‍टरमीडिएट बीए के अंक से चयन होगा इसके लिए नियमों में परिवर्तन होगा। क्‍या टीईटी उतीर्ण करने वाले छात्र के साथ अन्‍याय नहीं हो रहा हैॽ आखिर ऐसी व्‍यवस्‍था पर मुहर क्‍यों लगाई जाएगी। जिससे केवल नकल माफियों को और नकल की प्रवृत्‍ति को बढ़ावा ही मिलेगा। 
क्‍या सभी पहलुओं पर गौर हुआ हैॽ
इस रिपोर्ट को तैयार करने में सभी पहलुओं पर ध्‍यान दिया गया हैॽ यह सवाल हर एक के मन में गूंज रहा है। क्‍या यह नहीं दिखता कि किस तरह से यूपी बोर्ड में धुंआधार नकल होती है। बीएड डिग्री कालेज भी चाहते है कि उनके कालेज में नंबर पाने के लिए हजारों रूपये देने वाले छात्र मिले। क्‍या सभी बोर्ड और यूनिवर्सिटी में एक ही परीक्षा होती है एक ही सेलेबस है एक ही पैटर्न पर मार्किंग होती हैॽ नहीं तो कैसे हाईस्‍कूल इण्‍टरमीडिएट बीए के अंकपत्र देखर आप अन्‍तिम रूप से उसे अन्‍य के मुकाबले सर्वश्रेष्‍ठ मानकर शिक्षक बना देंगे। क्‍या एकेडमिक की मेरिट से चयन लोकतंत्रिक तरीका हैॽ नहीं। क्‍यों आज शिक्षा में इस कदर भ्रष्‍टाचार से भरा पड़ा है कि चयन से लेकर ट्रांसफर तक में नोट खिलाना पड़ता है। अरबों रूपये काली कमाई नकल कराने के नाम पर वसूल किया जाता है। पिछले समय की खबरों को देखे तो इसे नकारा नही जा सकता है कि इसमें शिक्षा विभाग के कुछ भ्रष्‍ट लोग भी जुड़े हैं। क्‍या रिपोर्ट में इस पहलुओं पर गौर किया गया है।
ऐकेडमिक अंक कैसे है एक समान यचन की प्रणाली हैॽ
जब मार्किंग की एक समान प्रणाली नहीं है तो चयन का आधार अलग–अलग बोर्ड और यूनिवर्सिटी के नंबरों को एक तराजू में तौलकर किसी को आप टीचर कैसे बना सकते हैं। सोचिये इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से 50 प्रतिशत स्‍नातक की काबलियत ओपेन यूनिवर्सिटी के 75 प्रतिशत के बराबर होगीॽ यहां इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय छात्र तो 25 अंकों से ओपेन यूनिवर्सिटी के छात्र से पिछड जाएगा और चाहे इलाहाबाद यूनविर्सिटी से पास यह छात्र अपनी मेंहनत से टीईटी में 85 प्रतिशत अंक ही क्‍यों न लाया हों वह प्राइमरी टीचर नहीं बन सकता है भले वह केंद्रीय विद्‍यालय संगठन में उसका चयन हो जाएगा क्‍योंकि वहां चयन का अन्‍तिम आधार एकेडमिक नहीं है यानी वह वहां टीचर बन सकता है लेकिन उत्‍तर प्रदेश में इलाहाबाद विश्‍वविद्‍याल का उतीर्ण स्‍नातक और वहीं से बीएड करने वाला छात्र यहां प्राइमरी टीचर की दौड़ में पीछे हो जएगा। जब एनसीटीई यह कहती है शिक्षक पात्रता परीक्षा 60 प्रतिशत से उतीर्ण करने वाले शिक्षक बन सकते हैं और यह भी कहता है कि चाहे तो अपना स्‍कोर बढ़ाने के लिए वह हर बार परीक्षा में बैठ सकता है तो साफ है कि यह पात्रता परीक्षा के अंक का महत्‍व है। यानी टीईटी मेरिट से चयन का आधार भी सही है।

प्राइमरी टीचर की भर्ती कंपटीशन से क्‍यों नही होतीॽ
हम सब जानते है कि किसी भी पद के लिए काम्‍पीटीशन सही होता है उसी के अंक के आधार पर चयन होता है। लेकिन जब टीईटी अनिवार्य है और सरकार प्राइमरी टीचर की भर्ती हेतु कोई कंपटीशन कराके प्राइमरी टीचर की भर्ती करने से बचती रही है लेकिन जब आज शिक्षा अधिकार कानून के अंतर्गत टीईटी परीक्षा अनिवार्य कर दिया गया तो इसके अंकों की मेरिट से चयन क्‍यों नहीं हो सकता है हम सब जानते है कि सरकार कंपटीशन कराने की प्रक्रिया से बचती रही है। अब सरकार अपनी जिम्‍मदारियों से पल्‍ला नहीं झाड़ सकती है। क्‍योंकि टीईटी अनिवार्य है और प्राइमरी टीचरों का चयन प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर होना चाहिए। फिलहाल टीईटी के नंबरों के आधार पर चयन उचित है। मुख्‍यमंत्री को भेजे जाने वाले इस रिपोर्ट में जिसमें केवल चयन का आधार एकेडमिक मेरिट से हो कि सिफारिश को नहीं मानना चाहिए क्‍यों की इससे सभी मेधावी छात्रों के साथ न्‍याय नहीं होगा। समझना चाहिए कि इस रिपोर्ट से केवल नकल करने वाले छात्र और शिक्षा माफियों की दुकान चल पड़ेगी। और यह भी ध्‍यान रखना चाहिए की एकेडमिक मेरिट चयन सही नहीं है क्‍योंकि सभी बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय की नंबर देने और परीक्षा कराने में जमीन आसमान अंतर है ऐसे में लोग पिछले चार पांच सालों में ऐसे संस्‍थानों से हाईस्‍कूल इण्‍टर बीए और बीएड कर जिन पर हमेशा संदेह रहा है और वहां पैसे के बल पर रेवड़ी की तरह अंक बांटे जाते हैं। यहां 70 से 80 प्रतिशत अंक छात्रों को आसानी से मिलता है जबकि कई ऐसे यूनिवर्सिटी हैं जहां टापर मुश्‍किल से 70 प्रतिशत अंक पाते है। ऐसे में प्राइमरी टीचर की भर्ती के चयन का आधार केवल कंपटीशन या टीईटी मेरिट होना चाहिए।मिलता है।

 ·  ·  · about a minute ago

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012


शिक्षकों की भर्ती में टीईटी मेरिट है तर्कसंगतǃ
शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 14 साल तक के बच्‍चों को निश्‍शुल्‍क शिक्षा देना अब राज्‍य की जिम्‍मेदारी है। इस कानून को बने 2 साल हो गये लेकिन अभी उत्‍तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। जबकि पिछली सरकार की भर्ती प्रक्रिया में पेच उलझ गया है। चयन प्रक्रिया टीईटी के मेरिट से होना तय था। लाखों अभ्‍यर्थियों ने इस परीक्षा को उतीर्ण किया और सहायक प्रशिक्षु शिक्षकों के पद के लए अलग अलग 75 जिलों में आवेदन किया। लेकिन वर्तमान में उत्‍तर प्रदेश सरकार इस संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। वहीं टीईटी उतीर्ण सरकार की इस बेरूखी से विधान सभा के पास अनशन पर बैठ गए हैं। 30 मार्च से चल रहे इस अनशन का आज 2 अप्रैल को चौथा दिन है लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से कोई लिखित आश्‍वासन नहीं मिला। वहीं दूसरे दिन से कई छात्रों की अनशन के दौरान तबीयत बिगड़ गई। अनशनकारियों की मांगे साफ है कि हमने आवेदन किया और उसके मुताबिक परीक्षा उतीर्ण की इसलिए चयन के अधिकार से हमें वंचित नहीं किया जा सकता है। अगर कहीं कुछ लोगों ने गड़बड़ी की है तो उसकी जांच कर ऐसे अभ्‍यर्थियों और दोषी व्‍यक्‍तियों के खिलाफ कड़ी करवाई की जाए।
विज्ञापन के आधार पर ही हो चयन
लगभग हर जिले से अभ्‍यिर्थियों विधान सभा पहुंच रहे हैं और अनशन पर बैठे लोगों को मनोबल बढ़ा रहे हैं। अनशन पर बैठे एक अभ्‍यर्थी से पूछा गया तो उसने बताया कि जब चयन प्रक्रिया के सारे नियम कायदे विज्ञान में छपा था और उसी के आधार पर हम लोगों ने टीईटी परीक्षा उतीर्ण की तो चयन भी विज्ञापन के अनुसार होना चाहिए बल्‍कि ऐसा न करने पर हमारे भविष्‍य से साथ खिलवाड़ होगा। जिसे हम कभी नहीं बर्दाश्‍त कर सकते हैं।

टीईटी अभ्‍यर्थियों का भविष्‍य दांव पर
वहीं यूपी में चयन प्रक्रिया से संबंधित कई परीक्षाएं हमेशा सरकार बनाम उम्‍मीद्‍वार बन जाता है।  जिससे लाखों नौकरी की चाहत रखने वाले ईंमानदार नौजवानों को मायूसी ही मिलती है। सूबे में प्रतियोगी परीक्षाएं और पूर्व की चयन प्रक्रिया को कोई भी नई सरकार आती है तो उसे बदल देती है लेकिन सरकारें यह नहीं सोचती हैं कि इस पर राजनीति करने और विज्ञापन निरस्‍त करने से सरकारी नौकरी के लिए मेंहनत करने वाले बेरोजगारों के जीवन के साथ खिलवाड़ होता है। मामला आखिरकार न्‍यायालय में चला जाता है और न्‍यायलय को निर्णय लेना पड़ता है। जबकि ऐसे मामलों में न्‍यायलय हमेशा बेरोजगारों के हित में फैसला लेती है लेकिन इसके बावजूद मौजूदा समय में सरकार को पहल कर टीईटी परीक्षा की उच्‍च स्‍तरी जांच कराकर शीघ्र ही भर्ती प्रक्रिया शुरू करवानी चाहिए।
आरटीई कानून में टीर्इटी परीक्षा है गणवत्‍ता की कसौटी
इधर आरटीई के तहत जिस तरह उच्‍च गुणवत्‍ता वाली शिक्षा की कवायद शुरू हई है ऐसे में चयन प्रक्रिया को एकेडमिक आधार रखने का कोई उचित उचित तर्क नहीं बनता है। देखा जाये तो अब वह समय आ गया जब चयन के आधार को बदला जाये और टीईटी के मेरिट से शिक्षकों की नियुक्‍ति होने से अलग–अलग बोर्ड और यूनिवर्सिटी के मार्किंग प्रथा से होने वाले नुकसान की बहस पर हमेशा के विराम लग जाएगा। जबकि जानकारों का भी यही मानना है कि आरटीई कानून के तहत टीईटी के मेरिट के आधार पर चयन प्रक्रिया तर्कसंगत है इससे बेहतर शिक्षक मिलेंगे।

रविवार, 1 अप्रैल 2012

टीईटी मेरिट से ही मिलेंगे अच्‍छे शिक्षक

टीईटी मेरिट से ही मिलेंगे अच्‍छे शिक्षक

उत्‍तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी को रदृ करने की खबरों से टीईटी उतीर्ण छात्रों में रोष है। पिछली सरकार ने प्राथमिक शिक्षक के लिए 72825 पद के विज्ञापन निकाला था। लेकिन सरकार बदलते ही निर्णय बदलने की संभावना के चलते टीईटी उतीर्ण अभ्‍यर्थियों का भविष्‍य दांव पर लग गया है।

    विज्ञापन में टीईटी मेरिट के आधार पर चयन की बात की गई है। जबकि इसके पूर्व प्राथमिक विद्‍यालयों में चयन का आधार एकेडमिक मेरिट था। जबकि नई सरकार टीईटी मेरिट से होने वाली चयन प्रक्रिया को बदलने की तैयारी में है। बता दें की इससे पहले भी एकेडमिक मेरिट के चयन के आधार पर प्राथमिक टीचरों की भर्ती हो चुकी है। जिसमें यूपी बोर्ड से हाईस्‍कूल इण्‍टर करने वाले छात्र सीबीएससी  बोर्ड की तुलना में एकेडमिक मेरिट मे काफी पीछे रह गये। ऐसे बीएड उतीर्ण उम्‍मीद्‍वार जिनका किसी कारण से एकेडमिक मेरिट कम है। उन्‍होंने अपनी एकेडमिक मेरिट से नौकरी मिलने की संभावना छोड़ चुके थे। लेकिन शिक्षा अनिवार्य कानून के तहत शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य होने से और टीईटी के मेरिट या फिर किसी प्रतियोगी परीक्षा के प्रदर्शन पर सरकारी टीचर बनने के लिए इन्‍होंने आवेदन किया विज्ञापन के शर्तों के मुताबिक टीईटी परीक्षा की तैयारी की और उतीर्ण हुए लेकिन जब नौकरी की बारी आई तो टीईटी में धांधली के आरोप लगने लगे। विज्ञापन को चुनौती दी गई और विज्ञापन पर रोक लग गई। इस धांधली में माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड के कई अधिकारी घेरे में आ गये। जबकि इस परीक्षा में धांधली परिणाम निकालते समय हुई जिससे जांच द्वारा पकड़ा जा सकता है। वहीं बेसिक शिक्षा विभाग से इस परीक्षा को रदृद करने और नियम बदलने की खबरें आ रही हैं जिस पर कितनी सच्‍चाई है वह कुछ दिनों में पता चल जाएगा। लेकिन इन सब से टीईटी छात्र आहत हैं। मानसिक और शारीरिक और आर्थिक रूप से ठगे महसूस कर रहे हैं।
   
टीईटी को रद्द करने की सजा बेरोजगारों को क्‍योंॽ
    बार–बार यही सवाल उठता है कि आखिर सरकार की नकामी की सजा बेरोजगारों की कब तक मिलती रहेगी। नौकरी के लिए आयोजित शिक्षा विभाग में परीक्षाएं क्‍यों भ्रष्‍टाचार के भेट चढ़ जाती हैं। इसके बाद बड़ी आसानी से परीक्षा रदृ करे अपनी जिम्‍मेदारियों से पल्‍ला झाड़ लिया जाता है। जिनको साफ सुथरी परीक्षा कराने की जिम्‍मदारी सौंपी गई वही लोगों ने टीईटी परीक्षा में धन उगाही की तो उन लोगों का नाम सामने आना चाहिए। साथ ही इस परीक्षा की निश्‍पक्ष जांच सीबीआई से करानी चाहिए ताकी इनके पीछे के लोगों का पर्दाफाश किया जा सके। लेकिन बिना ठोस जांच के परीक्षा निरस्‍त करने से और चयन प्रक्रिया को बदलने से कुछ नहीं होने वाला बल्‍कि इन परीक्षाओं में धांधली करने वालों का मनोबल बढ़ेगा और अगली परीक्षाओं को भी प्रभावित करेंगे।
प्राथमिक शिक्षक चयन के सही नियम के लिए कमेटी बनाई जाये
    अगर सरकार में थोड़ी भी इच्‍छा शक्‍ति है तो टीईटी और इसके चयन पर गंभीर विचार करना चाहिए। इसके लिए रिटायर्ड जज और शिक्षाविद्‍वानों की एक कमेटी बनाई जाए और अपनी रिपोर्ट दें जिनमें निम्‍न बिंदुओं पर गौर हो कि चयन में एकेडमिक आधार से क्‍या मेधावी शिक्षक मिल पायेंगेॽ जिस तरह से सभी विवि की अलग अलग मार्किंग प्रणाली है। तो कम अंक वाला छात्र तो पीछे रह जाएगा जबकि उसने टीईटी में टाप ही किया होǃ
    दूसरी बात की यूपी बोर्ड और बीएड में जिस तरह से नकल हाने की खबरे अखबारों में और चैनलों में साक्षात् दिखती है। यह बातें किसी से छ्‍पिी नहीं की नकल पर रोक पाने में बोर्ड किस तरह से असमर्थ है।
    तीसरी बात की जब सभी आयोग चयन के लिए एक प्रतियोगी परीक्षा के मेरिट को चयन का आधार बनाते हैं तो प्राथमिक शिक्षक की भर्ती में ऐसा क्‍यों नहीं हो सकता है।         चौथी बात शिक्षा की गुणवत्‍ता कैसे बढ़ाना है। हम अच्‍छी तरह से जानते है कि वर्तमान में माध्‍यमिक और उच्‍च शिक्षा में नकल माफिया का वर्चस्‍व और वास्‍तविक पढ़ाई का माहौल भी नहीं है केवल छात्रों को ज्‍यादा से ज्‍यादा अंक बटोरने की तरकीब ही सीखाई जाती है। ऐसे में केवल एकेडमिक मेरिट से हम अच्‍छे शिक्षक का चयन कर पायेंगे। हमें एक ऐसे पैमाने की जरूरत है। जो सर्वगुण संपन्‍न शिक्षकों को विद्‍यालयों में दे पायें न कि केवल दोयम दर्जे के टीचर इसीलिए चयन के आधार को आज बदलना है यानी साफ है कि सबके लिए एक ही चयन का आधार हो और वह टीईटी के मेरिट से संभव है या काई प्रतियोगी परीक्षा। बस सरकार को चाहिए की इसमें पारदर्शिता रखें और इस तरह मेधावियों का चयन होगा। जिसके परीणाम यह होगा की हमारे प्राथमिक विद्‍यालय में सर्वगुणसंपन्‍न शिक्षक मिलेंगे।

शनिवार, 31 मार्च 2012

लाखों टीईटी अभ्यर्थियों के साथ धोखा ǃ

लाखों टीईटी अभ्यर्थियों के साथ धोखा ǃ


टीईटी निरस्त करने और अध्यापक चयन नियमावली बदलने की तैयारी चल रही है। पिछली सरकार के समय में प्राथमिक विद्यालय में 72825 शिक्षाकों की भर्ती विज्ञापन को निरस्त कर अभ्यर्थीयों का 500 रूपये वापस कर दिया जायेगा। यानि यह सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगी। लेकिन लाखों बेरोजगारों का क्या दोष जिन्होंने मेंहनत और ईंमानदारी से टीईटी परीक्षा उतीर्ण की और हजारों रूपये खर्च किया। और यह आशा रखी की भारत का लोकतांत्रिक ढांचा के तहत नौकरी मिल जाएगी। लेकिन सरकार के बदलते ही निर्णय भी बदल दिया गया। पिछली सरकार के समय में निकली विज्ञप्‍ति को निरस्त करने की मंशा के चलते लाखों लोगों का भविष्य दांव में लग गया है। 
क्या टीईटी को निरस्त करना उचित हैॽ 
क्या यह सही है कि जिस टीईटी परीक्षा में इतने सवाल उठ रहे हैं तो ऐसे में सरकार को निश्पक्ष जांच कराकर दोषियों को सजा दिया जाना चाहिए। ऐसे लोगों को बाहर कर टीईटी से चयन करना चहिए जबकि किसी परीक्षा को निरस्त करना कहां की समझदारी है। वहीं टीईटी की मेरिट की हाईकोर्ट इलाहाबाद ने भी तारीफ की कहा जिस तरह से एकेडमिक प्रक्रिया से यह उचित है क्योंकि यहां सभी उम्मीद्वारों को सामान अवसर देता है। जिस तरह से बीटीसी 2011 में दर्जनों ऐसे फर्जी अभ्यर्थियों ने प्रवेश लिया और प्रशिक्षण भी कर रहे थे लेकिन जब इनकी मार्कशीट की जांच उप सचिव स्तर के अधिकारयों ने किया तो पता चला कि इनमें से कितने ऐसे प्रशिक्षु मिले जिन्होंने अपनी हाईस्कूल और इण्टर दूसरें दर्जे मे पास लेकिन इसी  रोलनंबर में 70 प्रतिशत तक नंबर बढ़ाकर फर्जी मार्कशीट तैयार की है। ऐस फेर्जी प्रशिक्षुओं के परिजन शिक्षा विभाग में कार्यरत है और अपने पद का दुरपयोग इनका नंबर बढ़या है। यहां पर पूरी प्रक्रिया निरस्त नहीं की तो टीईटी की जांच ऐसे लोगों का पर्दापाश किया जाना चाहिए न की इस परीक्षा को निरस्त करना चहिए। संभव है कि इस परीक्षा को निरस्त करने वालों की मंशा अपने आपकों बचाना है। 
एनसीटीई के द्वारा अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत टीईटी परीक्षा अनिवार्य होने से उत्तर प्रदेश की प्राइमरी स्‍कूलों में आध्यापक नियुक्‍ति प्रक्रिया में केवल एकेडमिक के अंक से चयन की नीति उचित नहीं है। जिस तरह से नकल एक बड़ी समस्‍या है और सभी बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय में सामान मार्किंग न होने से यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इण्टर उतीर्ण छात्र को बमुश्किल से 60 प्रतिशत अंक मिलता है जबकि सीबीएसई और आइएससी बोर्ड में औसत छात्र 70 से 80 प्रतिशत अंक आसानी से पा जाते हैं। वहीं इग्‍नू राजर्षिटण्‍डन ओपन विवि के अलावा प्रोफेशनल कोर्स जैसे बीबीए बीसीए बीएमस बीमास आदि में 70  प्रतिशत से अधिक अंक आसानी से मिलते है। ऐसे में शिक्षक चयन में एकेडमिक रिकार्ड से नौकरी देने पर यूपी बोर्ड और जिन्‍होंने इलाहाबाद बीएचयू जैसे विश्‍विविद्‍यालय से स्‍नातक किया है वहां टापर को भी 75 प्रतिशत नंबर नहीं मिलता है तो ऐसे में इन छात्रों के साथ अन्याय होगा। वहीं संपूर्णानंद विवि में 80 प्रतिशत नंबर आसानी से मिलता है और इस मामले में कई बार कोर्ट ने फर्जी मार्कशीट भी पकड़ा और संस्‍था को भी चेतावनी दी की सभी का डाटा बना कर रखे ताकी पता चले कि किताना नंबर किसने प्राप्‍त किया है। इन सबको देखते हुए टीईटी को चयन का आधार ज्यादा तर्क संगत है। जिसे एकेडमिक चयन के आधार चाहने वालों ने चुनौती दी लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि टीईटी मेरिट से चयन सही है।

गुरुवार, 29 मार्च 2012

टीईटी और विज्ञापन को निरस्त करने की तैयारी में बेसिक शिक्षा विभाग ǃ टीईटी में अच्छा अंक पाने वाले लाखों छात्रों के साथ होगा धोखा ǃ फसेगा कानूनी पेच ǃ नियमावली में संशोधन कर एकेडमिक होगा अन्‍तिम चयन का आधार ॽ टीईटी के महत्व को कम करने की कोशिश ǃ

टीईटी और विज्ञापन को निरस्त करने की तैयारी में बेसिक शिक्षा विभाग ǃ
टीईटी में अच्छा अंक पाने वाले लाखों छात्रों के साथ होगा धोखा ǃ
फसेगा कानूनी पेच ǃ
नियमावली में संशोधन कर एकेडमिक होगा अन्‍तिम चयन का आधार ॽ

टीईटी के महत्व को कम करने की कोशिश ǃ

गलती को सुधारने के बजाये परीक्षा निरस्त करने की तैयारी ǃ

आखिकार उत्‍तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को निरस्‍त करने के लिए तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही अध्‍यापक भर्ती नियमावली के नियम को भी नई प्रक्रिया के लिए बदला जायेगा। वर्तमान में टीईटी के मेरिट से प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती का प्रावधान है जिसे मायावती सरकार ने संशोधित किया था। तब एनसीटीई के आरटीई एक्ट के मुताबिक शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य हो गया जिससे मायावती सरकार ने ही चयन का आधार बना दिया था और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन याचिका खारिज कर दी गई वहीं चयन का आधार टीईटी मेरिट को सही कहा गया। वहीं 72 हजार प्राईमरी टीचर का विज्ञापन निकाला गया लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दिया जिसकी सुनवाई चल रही है। जिसमें हर जिले के डायट की जगह संयुक्त रूप से नियुक्‍ति के लिए निकाली गई इस विज्ञापन को चुनौती दी गई है।
बेसिक शिक्षा विभाग टीईटी में हुई धांधली को सुधारने और जांच करने के बजाए खुद को बचाने के लिए टीईटी और विज्ञापन दोनों को निरस्‍त करने का फैसला ले सकती है। साफ है कि विभाग खुद को बचाने और अपनी जिम्‍मेदारियों से पल्‍ला झाड़ने के लिए लाखों लोगों की मेंहनत और पैसे की परवाह नहीं है। बस जैसे तैसे टीईटी के मेरिट से चयन प्रक्रिया से बचने के लिए अध्‍यापक नियुक्‍ति नियमावली में शैक्षिक रिकार्ड देखकर भर्ती करने के संशोधन पर विचार कर रही है। जिससे बेसिक शिक्षा विभाग सारी परेशानियों से बच सके।
टीईटी मेरिट से चयन का आधार क्यों बदला जा रहा हैॽ
लेकिन पिछली सरकार के टीईटी मेरिट के फैसले को बदलना और विज्ञापन को निरस्‍त कर नये सिरे से भर्ती प्रक्रिया करना क्‍या न्‍यायोचित हैॽ क्‍या इसे हाईकोर्ट में इसलिए चुनौती दी जा सकती की यह बदले की भावना से किया गया है और लाखों ईंमानदार और मेंहनती छात्रों के साथ शरीरिक मानसिकर एवं आर्थिक शोषण किया गया है। जबकि कायदे से यहां टीईटी की निश्पक्ष जांच करना चाहिए। अगर गड़बडी़ को पकड़ा जाए तो ठीक नहीं तो दूबारा टीईटी की पारदर्शी परीक्षा लोक सेवा आयोग या कर्मचारी चयन आयोग द्वारा कराया जा सकता है और इसी विज्ञापन से टीईटी मेरिट से चयन किया जा सकता है। विज्ञापन निरस्‍त करने की आवश्‍यकता नहीं है। लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग बेरोजगारों के हित में न्यायोचित फैसला नहीं लेता है तो लाखों मेंहनती बेरोजगारों के साथ धोखा होगा। लोकतांत्रिक ढंग यही है। हर बार की तरह यह नहीं सरकार बदले तो पिछली सरकार के कार्यकाल की परीक्षा और विज्ञापन को बदले की भावना में आकर निरस्त दिया जाए। इससे युवाओं का नुकसान होगा और नई सरकार को युवाओं ने चुना है ताकी मेंहनती बेरोजगारों के हक में कोई फैसला लेना चाहिए।
टीईटी पत्रता है लेकिन इसे आंध्रपदेश टीईटी ने भी चयन का आधार बनया है
एक तो शिक्षा अनवार्य कानून के तहत टीईटी अनिवार्य है। और इसको एनसीटीई ने पात्रता परीक्षा कहा है लेकिन यह नहीं कहा की आप इसकी मेरिट को नजर अंदाज कर दे। जब विशिष्‍ट बीटीसी के लिए बीएड उतीर्ण अर्हकारी परीक्षा है जिसे स्‍नातक या परास्‍नातक में पचास प्रतिशत अंक वाले कर सकते है। तो ऐसे में इनका मेरिट देखा जाना कहा तक सही है अगर सही है तो बताएं टीईटी की मेरिट से क्‍यों चयन नहीं हो सकता है। भले यह पात्रता परीक्षा है और इसका भी महत्‍व है जो कि सबसे आधिक है। आन्‍ध्र प्रदेश टीईटी में प्राप्‍त अंक के प्रतिशत को पचास प्रतिशत के अंकों में बदलकर और शैक्षिक रिकार्ड में अर्हकारी परीक्षा बीए या जिन्‍होंने परास्‍नातक के आधार पर बीएड किया है उनके परस्नातक के प्रतिशत में बीस–बीस प्रतिशत तथा 10 प्रतिशत उच्‍च योग्‍यता के अंक को कुल 100 के अंकों में बांटा गया है। इन 100 अंकों में जितना अंक काई पाएगा उसी मेरिट बनेगी और उसे सरकारी विद्यालय में टीचर के पद नियुक्त कर लिया जायेगा।
टीईटी की हो निश्पक्ष जांच
कायदे से टीईटी की जांच कराई जानी चाहिए और इसी विज्ञापन के नियमानुसार भर्ती होनी चाहिए। अगर विज्ञापन और टीईटी रद्द किया गया तो छात्र हाईकोर्ट में खिलाफ रिट दाखिल करेंगे और फिर न्‍याय कोर्ट करेगा। लेकिन अगर कोर्ट ने विज्ञापन में संशोधन के साथ टीईटी के जांच के आदेश दे दिया और उसके बाद कोई सार्थक फैसला लिया तो सरकार की बड़ी किरकीरी हो सकती है।
हाईकोर्ट पटना के एक आदेश में पहले पुरानी विज्ञापन से हो भर्ती
ऐसे हाईकोर्ट से बेसिक शिक्षा विभाग को आदेश मिल सकता है कि इस विज्ञापन की भर्ती टीईटी मेरिट से किया जाये। हाईकार्ट पटना ने भी नई सरकार उस फैसले को गलत ठहराया जिसमें नीतीश कुमार पूर्वती सरकार के शिक्षक भर्ती के विज्ञापन को निरस्‍त कर नया विज्ञापन जारी किया था और हाईकोर्ट पटना ने कहा कि पहले वाली विज्ञापन के शर्त पर भर्ती की जाये और दूसरी विज्ञापन की भर्ती पहली विज्ञापन की भर्ती के बाद में निकाली जा सकती है।
टीईटी निरस्त हुई तो मिले हर छात्र को 5 लाख हर्जाना
लेकिन बेसिक विभाग से आखिर कोई पूछे की टीईटी परीक्षा फिर कौन आयोजित करेगा। क्‍या फिर यूपी बोर्ड जहां संशोधन के बाद धांधली की गई है। जिसे जांच द्वारा पकड़ा जा सकता है। लेकिन अगला टीईटी निश्पक्ष कराने गारंटी कौन लेगा । अगर धांधली के कारण से परीक्षा निरस्‍त हुई तो क्या हर छात्र को जिसने परीक्षा ईंमानदार से उतीर्ण किया उसे पांच–पांच लाख रूपये हर्जाना दिया जाएगा ॽ ये सब तय कर ले तो अच्‍छा है।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

आखिर टीचर की नियुक्‍ति ही क्‍यों टीईटी मेरिट से

प्राथमिक टीचर की भर्ती टीईटी मेरिट से ही सही
सरकारी स्‍कूलों की हालत क्‍यो खराबॽ

इस समय उत्‍तर प्रदेश में प्राथमिक विद्‍यालय की हालत खस्‍ता है। कारण साफ है यहां बुनियादी सुविधा का अभाव है। भवन बेंच टायलेट आदि नहीं है। वहीं 50 छात्रों पर एक शिक्षक तैनात है। ऐसे में बताये कोई शिक्षक अपना बेस्‍ट परफारमेंस कैसे दे पायेगा। पढ़ाई का स्‍तर जाहिर है गिरेगा ऐसे में अंग्रेजी मीडियम तमगा लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे प्राइवेट स्‍कूल की बाढ़ आ गई है। प्राइवेट कान्‍वेंट स्‍कूल के दावे पर गौर करें तो यहां पर अच्‍छी फैकल्‍टी ट्रेंड टीचिंग स्‍टाफ और आधुनिक तकनीक से शिक्षा देने की बातें कहकर लोगों को आकर्षित किया जाता है जबकि इनके दावे कहां तक सच है। यह तो अपने बच्‍चों दाखिला दिलाने के बाद उनके अभिभावक अच्‍छी तरह से जानते है।
टीईटी ने दिखाया सच
मजेदार बात यह है कि इस समय देश में अनिवार्य शिक्षा कानून चौदह साल तक के बालकों के लिये मुफ्त में शिक्षा और गूणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा की बात कहता है। जिसके तहत प्राइमरी और उच्‍च प्राइमरी में टीचरों की योग्‍यता के लिए एक पैमाना बनाया है। यहां प्रशिक्षित शिक्षक को केन्‍द्र व राज्‍य सरकार की और से आयोजित होने वाली टीचर एबिलिटी टेस्‍ट उतीर्ण करना जरूरी है। इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक लाने वाला अभ्‍यर्थी ही शिक्षक की नियुक्‍ति के लिए पात्र हैं। आपको सुनकार आश्‍चर्य होगा की केंद्र द्‍वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा अभी तक दो बार आयोजित हो चुकी है। जिसमें केवल लगभग सात प्रतिशत ही ट्रेंड टीचर उतीर्ण हुए हैं। वहीं यूपीटीईटी में जबकि पहली बार यह परीक्षा आयोजित हुई और इसमें लगभग पचास प्रतिशत ही पास हुए। वहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि यह पात्रता परीक्षा कुछ मायनों में सरल भी था। यानी कि सीटेट की तरह नहीं। फिर भी आधे ज्‍यादा छात्र मानक पर खरे नहीं उतर सके और टीईटी ने दिखा दिया सचǃ
टीईटी मेरिट से मिलेंगे सुयोग्‍य टीचर
अब तो प्रश्‍न यह उठता है कि आखिर हमारी शिक्षा प्रणाली कितनी दूषित है कि हम बीएड कालेजों से अच्‍छे टीचर नहीं बना पा रहे है। आखिर हम केवल कालेजों में डिग्रियां ही बांट रहे हैं। जो प्रशिक्षुओं इतना काबिल नहीं बना पाते है कि वे तुरंत पढ़ाने लायक हो। अधिकत्‍तर शिक्षण संस्‍थान में नंबर की होड़ लगी है। छात्रों में गुणवत्‍ता का विकास करने की बजाये उन्‍हे अच्‍छे अंक लाने के लिए नकल और रटने की प्रवृत्‍ति को बढ़ावा मिल रहा है। और इनमें से जो कुछ छात्र मेंहनत से पढ़ते है अंको के पीछे नहीं भागते बल्‍की सच्‍चे ज्ञान को सीखते है और व्‍यवहारिक जीवन में उसे उतारते है। ऐसे छात्र आज केवल अंको के कम होने से शिक्षण के क्षेत्र में अपना करियर बना नहीं पाते क्‍योंकि यहां एकेडमिक रिकार्ड को ही अधिक महत्‍व दिया जाता है। जबकि सच्‍चाई यह इनमें प्रतिभाशाली छात्र अन्‍य क्षेत्रों मे पलायन कर जाते इस तरह स्‍कूलों में अच्‍छे शिक्षकों का हमेशा अभाव रहता है।
टीईटी मेरिट नकेल कसेगा नकल पर
अब सवाल उठता है कि जिस तरह से हमारी अव्‍यवस्‍था है तो हमारे विद्‍यालय को सुयोग्‍य टीचर कैसे मिल पायेंगे। जहां आज केवल प्रतिशत और अंको के लिए पढ़ाई होती है जहां एकेडमिक रिकार्ड को देखकर टीचर बना दिया जाता है। ऐसे में तो नकल माफिया पास कराने और नम्‍बर के गणित को सुधारने के लिए अपना फायदा उठाते हैं । और शिक्षा के मन्‍दिर को बदनाम करते हैं। यह हालात यूपी टेईटी परीक्षा में देखने को मिलता है कि आधे से ज्‍यादा लोग आयोग्‍य है प्राइमरी टीचर बनने के लिए। जाहिर सी बात है टीईटी में जो जितना अधिक नंबर लाया है वह उतना अधिक योग्‍य है टीचर बनने के लिए इसीलिए टीईटी की मेरिट से ही हो टीचर की भर्ती।

सोमवार, 26 मार्च 2012

प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना संजोय लाखों लोग

प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना संजोय लाखों लोग में बस यही बहस चल रहा है कि प्राथमिक टीचर की भर्ती की चयन प्रक्रिया क्‍या होनी चाहिए। इस पर कई लोगों के अपने अपने विचार हो सकते हैं लेकिन हम आज मौजूदा सरकारी स्‍कूलों की स्‍थिति पर ध्‍यान दें तो यह बात साफ हो कि इन स्‍कूलों में भौतिक सुविधाओं के अलावा गुणवत्‍ता युक्‍त शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती है। अब फिर वह प्रश्‍न पूछता हूं कि प्राथमिक टीचर के चयन की प्रक्रिया क्‍या होनी चाहिएॽ जाहिर सी बात है किसी विद्‍यालय में एक अच्‍छा शिक्षक होना सबसे पहली शर्त है। अब प्रश्‍न उठता है कि अच्‍छा टीचर आएगा कैसे जब आज हमारी शिक्षा प्रणाली इतना जर्जर हो चुकी है कि आज बीएड कालेजों में नंबर की होड़ लगी है। कारण साफ है कि प्राथमिक विद्‍यालय में अभी तक अन्‍तिम चयन का आधार एकेडमिक मेरिट है। यह सुनने में अच्‍छा जरूर लगता है लेकिन ध्‍यान दें इस समय यूपी बोर्ड परीक्षा चल रही है और अखबारों में खबर रिकार्ड तोड़ हो रहा नकल। वहीं कई ऐसे बोर्ड है जहां ऐसे औसत छात्रों को भी 70 से 80 प्रतिशत नंबर आसानी से मिल जाता है जबकि यूपी बोर्ड में मेधावी छात्र भी इतना नंबर बड़ी मेंहनत से पाते है। वहीं कुछ यूनिवर्सिटी में बीए बीएसी आदि में 50 प्रतिशत नंबर लाना चुनौतीपूर्ण है जबकि कुछ ओपन यूनिवर्सिटी में 60 प्रतिशत अंक आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में अगर एकेडमिक मेरिट से चयन किया जाये तो ऐसी संस्‍था में पढ़े छात्र एकेडमिक मेरिट में पीछे रह जायेंगे क्‍योंकि वे उन संस्‍थानों से पढ़ाई कि जहां पर साठ प्रतिशत नंबर लाना मुशकिल है। इन छात्रों का क्‍या दोष जिन्‍होंने अपनी डिग्री इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से किया हो या बीएचयू से बाजी तो मारेंगे दूसरे प्रदेशों से बीएड में हचक के नंबर के जुगाड़ू छात्र और सीबीएई बोर्ड के औसत छात्र जिनको 70 प्रतिशत नंबर आसानी से मिल जाता है। अब बताएं अगर इस तरह अन्‍तिम चयन का आधार एकेडमिक मेरिट ही होगी तो नंबर की होड़ में नकल माफिया नंबर के खेल को खेलते रहेंगे और वास्‍तविक शिक्षा का लक्ष्‍य सरकार का धरा का धरा रह जाएगा। आखिर कब आएगा बदलावǃ आज बदलाव जरूरी है क्‍योंकि एक तरफ हम देखते हैं कि बोर्ड के रिजल्‍ट में कम नंबर आने से छात्र हताशा में अपनी जिंदगी को खत्‍म समझ आत्‍महत्‍या करने का फैसाला ले लेता है और ऐसी खबरों अखबार की सुर्खियां बटोरती है और फिर बहस शुरू हो जाती है। हमारी शिक्षा प्रणाली की खामियों की जहां अच्‍छे नंबर से उतीर्ण होने पर ही सम्‍मान मिलता है। पचास प्रतिशत अंक आने पर भविष्‍य अंधकारमय लगता है। क्‍योंकि आगे तो नौकरी इन नंबर के आधार पर ही मिलेगी यह प्रवृत्‍ति और एकेडमिक बेस चयन ने केवल नकल और आत्‍महत्‍या को ही बढ़ावा दे रही है। जो हमारी शिक्षा के लिए कतई ठीक नहीं है।
अब तो यह साफ है कि किसी भी पद के लिए चाहे वह शिक्षक का ही चयन क्‍यों न हो उसमें एकेडमिक मेरिट चयन का आधार उचित नहीं है। क्‍योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय अभी हाल में सभी बोर्डो में ग्रेडिंग प्रथा लागू कर दी जिससे कि नंबर की होड़ पर लगाम लग सके। लेकिन खुद यूपी बेसिक शिक्षा विभाग इतने साल से प्राथमिक विद्‍यालय में चयन के लिए एकेडमिक मेरिट आधार बनाकर अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ लिया। और मानव संसाधन विकास मंत्रालयों और शिक्षाविद्वानों की ध्‍येय को नजर अंदाज करती रही।
भला हो अनिवार्य एवं निशुल्‍क शिक्षा कानून का जिसने शिक्षक पात्रता परीक्षा लागू कर दिया और इस तरह चयन का अन्‍तिम आधार एकेडमिक मेरिट पर अब सवालिया निशान खड़े होने

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