शनिवार, 31 मार्च 2012

लाखों टीईटी अभ्यर्थियों के साथ धोखा ǃ

लाखों टीईटी अभ्यर्थियों के साथ धोखा ǃ


टीईटी निरस्त करने और अध्यापक चयन नियमावली बदलने की तैयारी चल रही है। पिछली सरकार के समय में प्राथमिक विद्यालय में 72825 शिक्षाकों की भर्ती विज्ञापन को निरस्त कर अभ्यर्थीयों का 500 रूपये वापस कर दिया जायेगा। यानि यह सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगी। लेकिन लाखों बेरोजगारों का क्या दोष जिन्होंने मेंहनत और ईंमानदारी से टीईटी परीक्षा उतीर्ण की और हजारों रूपये खर्च किया। और यह आशा रखी की भारत का लोकतांत्रिक ढांचा के तहत नौकरी मिल जाएगी। लेकिन सरकार के बदलते ही निर्णय भी बदल दिया गया। पिछली सरकार के समय में निकली विज्ञप्‍ति को निरस्त करने की मंशा के चलते लाखों लोगों का भविष्य दांव में लग गया है। 
क्या टीईटी को निरस्त करना उचित हैॽ 
क्या यह सही है कि जिस टीईटी परीक्षा में इतने सवाल उठ रहे हैं तो ऐसे में सरकार को निश्पक्ष जांच कराकर दोषियों को सजा दिया जाना चाहिए। ऐसे लोगों को बाहर कर टीईटी से चयन करना चहिए जबकि किसी परीक्षा को निरस्त करना कहां की समझदारी है। वहीं टीईटी की मेरिट की हाईकोर्ट इलाहाबाद ने भी तारीफ की कहा जिस तरह से एकेडमिक प्रक्रिया से यह उचित है क्योंकि यहां सभी उम्मीद्वारों को सामान अवसर देता है। जिस तरह से बीटीसी 2011 में दर्जनों ऐसे फर्जी अभ्यर्थियों ने प्रवेश लिया और प्रशिक्षण भी कर रहे थे लेकिन जब इनकी मार्कशीट की जांच उप सचिव स्तर के अधिकारयों ने किया तो पता चला कि इनमें से कितने ऐसे प्रशिक्षु मिले जिन्होंने अपनी हाईस्कूल और इण्टर दूसरें दर्जे मे पास लेकिन इसी  रोलनंबर में 70 प्रतिशत तक नंबर बढ़ाकर फर्जी मार्कशीट तैयार की है। ऐस फेर्जी प्रशिक्षुओं के परिजन शिक्षा विभाग में कार्यरत है और अपने पद का दुरपयोग इनका नंबर बढ़या है। यहां पर पूरी प्रक्रिया निरस्त नहीं की तो टीईटी की जांच ऐसे लोगों का पर्दापाश किया जाना चाहिए न की इस परीक्षा को निरस्त करना चहिए। संभव है कि इस परीक्षा को निरस्त करने वालों की मंशा अपने आपकों बचाना है। 
एनसीटीई के द्वारा अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत टीईटी परीक्षा अनिवार्य होने से उत्तर प्रदेश की प्राइमरी स्‍कूलों में आध्यापक नियुक्‍ति प्रक्रिया में केवल एकेडमिक के अंक से चयन की नीति उचित नहीं है। जिस तरह से नकल एक बड़ी समस्‍या है और सभी बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय में सामान मार्किंग न होने से यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इण्टर उतीर्ण छात्र को बमुश्किल से 60 प्रतिशत अंक मिलता है जबकि सीबीएसई और आइएससी बोर्ड में औसत छात्र 70 से 80 प्रतिशत अंक आसानी से पा जाते हैं। वहीं इग्‍नू राजर्षिटण्‍डन ओपन विवि के अलावा प्रोफेशनल कोर्स जैसे बीबीए बीसीए बीएमस बीमास आदि में 70  प्रतिशत से अधिक अंक आसानी से मिलते है। ऐसे में शिक्षक चयन में एकेडमिक रिकार्ड से नौकरी देने पर यूपी बोर्ड और जिन्‍होंने इलाहाबाद बीएचयू जैसे विश्‍विविद्‍यालय से स्‍नातक किया है वहां टापर को भी 75 प्रतिशत नंबर नहीं मिलता है तो ऐसे में इन छात्रों के साथ अन्याय होगा। वहीं संपूर्णानंद विवि में 80 प्रतिशत नंबर आसानी से मिलता है और इस मामले में कई बार कोर्ट ने फर्जी मार्कशीट भी पकड़ा और संस्‍था को भी चेतावनी दी की सभी का डाटा बना कर रखे ताकी पता चले कि किताना नंबर किसने प्राप्‍त किया है। इन सबको देखते हुए टीईटी को चयन का आधार ज्यादा तर्क संगत है। जिसे एकेडमिक चयन के आधार चाहने वालों ने चुनौती दी लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि टीईटी मेरिट से चयन सही है।

गुरुवार, 29 मार्च 2012

टीईटी और विज्ञापन को निरस्त करने की तैयारी में बेसिक शिक्षा विभाग ǃ टीईटी में अच्छा अंक पाने वाले लाखों छात्रों के साथ होगा धोखा ǃ फसेगा कानूनी पेच ǃ नियमावली में संशोधन कर एकेडमिक होगा अन्‍तिम चयन का आधार ॽ टीईटी के महत्व को कम करने की कोशिश ǃ

टीईटी और विज्ञापन को निरस्त करने की तैयारी में बेसिक शिक्षा विभाग ǃ
टीईटी में अच्छा अंक पाने वाले लाखों छात्रों के साथ होगा धोखा ǃ
फसेगा कानूनी पेच ǃ
नियमावली में संशोधन कर एकेडमिक होगा अन्‍तिम चयन का आधार ॽ

टीईटी के महत्व को कम करने की कोशिश ǃ

गलती को सुधारने के बजाये परीक्षा निरस्त करने की तैयारी ǃ

आखिकार उत्‍तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को निरस्‍त करने के लिए तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही अध्‍यापक भर्ती नियमावली के नियम को भी नई प्रक्रिया के लिए बदला जायेगा। वर्तमान में टीईटी के मेरिट से प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती का प्रावधान है जिसे मायावती सरकार ने संशोधित किया था। तब एनसीटीई के आरटीई एक्ट के मुताबिक शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य हो गया जिससे मायावती सरकार ने ही चयन का आधार बना दिया था और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन याचिका खारिज कर दी गई वहीं चयन का आधार टीईटी मेरिट को सही कहा गया। वहीं 72 हजार प्राईमरी टीचर का विज्ञापन निकाला गया लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दिया जिसकी सुनवाई चल रही है। जिसमें हर जिले के डायट की जगह संयुक्त रूप से नियुक्‍ति के लिए निकाली गई इस विज्ञापन को चुनौती दी गई है।
बेसिक शिक्षा विभाग टीईटी में हुई धांधली को सुधारने और जांच करने के बजाए खुद को बचाने के लिए टीईटी और विज्ञापन दोनों को निरस्‍त करने का फैसला ले सकती है। साफ है कि विभाग खुद को बचाने और अपनी जिम्‍मेदारियों से पल्‍ला झाड़ने के लिए लाखों लोगों की मेंहनत और पैसे की परवाह नहीं है। बस जैसे तैसे टीईटी के मेरिट से चयन प्रक्रिया से बचने के लिए अध्‍यापक नियुक्‍ति नियमावली में शैक्षिक रिकार्ड देखकर भर्ती करने के संशोधन पर विचार कर रही है। जिससे बेसिक शिक्षा विभाग सारी परेशानियों से बच सके।
टीईटी मेरिट से चयन का आधार क्यों बदला जा रहा हैॽ
लेकिन पिछली सरकार के टीईटी मेरिट के फैसले को बदलना और विज्ञापन को निरस्‍त कर नये सिरे से भर्ती प्रक्रिया करना क्‍या न्‍यायोचित हैॽ क्‍या इसे हाईकोर्ट में इसलिए चुनौती दी जा सकती की यह बदले की भावना से किया गया है और लाखों ईंमानदार और मेंहनती छात्रों के साथ शरीरिक मानसिकर एवं आर्थिक शोषण किया गया है। जबकि कायदे से यहां टीईटी की निश्पक्ष जांच करना चाहिए। अगर गड़बडी़ को पकड़ा जाए तो ठीक नहीं तो दूबारा टीईटी की पारदर्शी परीक्षा लोक सेवा आयोग या कर्मचारी चयन आयोग द्वारा कराया जा सकता है और इसी विज्ञापन से टीईटी मेरिट से चयन किया जा सकता है। विज्ञापन निरस्‍त करने की आवश्‍यकता नहीं है। लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग बेरोजगारों के हित में न्यायोचित फैसला नहीं लेता है तो लाखों मेंहनती बेरोजगारों के साथ धोखा होगा। लोकतांत्रिक ढंग यही है। हर बार की तरह यह नहीं सरकार बदले तो पिछली सरकार के कार्यकाल की परीक्षा और विज्ञापन को बदले की भावना में आकर निरस्त दिया जाए। इससे युवाओं का नुकसान होगा और नई सरकार को युवाओं ने चुना है ताकी मेंहनती बेरोजगारों के हक में कोई फैसला लेना चाहिए।
टीईटी पत्रता है लेकिन इसे आंध्रपदेश टीईटी ने भी चयन का आधार बनया है
एक तो शिक्षा अनवार्य कानून के तहत टीईटी अनिवार्य है। और इसको एनसीटीई ने पात्रता परीक्षा कहा है लेकिन यह नहीं कहा की आप इसकी मेरिट को नजर अंदाज कर दे। जब विशिष्‍ट बीटीसी के लिए बीएड उतीर्ण अर्हकारी परीक्षा है जिसे स्‍नातक या परास्‍नातक में पचास प्रतिशत अंक वाले कर सकते है। तो ऐसे में इनका मेरिट देखा जाना कहा तक सही है अगर सही है तो बताएं टीईटी की मेरिट से क्‍यों चयन नहीं हो सकता है। भले यह पात्रता परीक्षा है और इसका भी महत्‍व है जो कि सबसे आधिक है। आन्‍ध्र प्रदेश टीईटी में प्राप्‍त अंक के प्रतिशत को पचास प्रतिशत के अंकों में बदलकर और शैक्षिक रिकार्ड में अर्हकारी परीक्षा बीए या जिन्‍होंने परास्‍नातक के आधार पर बीएड किया है उनके परस्नातक के प्रतिशत में बीस–बीस प्रतिशत तथा 10 प्रतिशत उच्‍च योग्‍यता के अंक को कुल 100 के अंकों में बांटा गया है। इन 100 अंकों में जितना अंक काई पाएगा उसी मेरिट बनेगी और उसे सरकारी विद्यालय में टीचर के पद नियुक्त कर लिया जायेगा।
टीईटी की हो निश्पक्ष जांच
कायदे से टीईटी की जांच कराई जानी चाहिए और इसी विज्ञापन के नियमानुसार भर्ती होनी चाहिए। अगर विज्ञापन और टीईटी रद्द किया गया तो छात्र हाईकोर्ट में खिलाफ रिट दाखिल करेंगे और फिर न्‍याय कोर्ट करेगा। लेकिन अगर कोर्ट ने विज्ञापन में संशोधन के साथ टीईटी के जांच के आदेश दे दिया और उसके बाद कोई सार्थक फैसला लिया तो सरकार की बड़ी किरकीरी हो सकती है।
हाईकोर्ट पटना के एक आदेश में पहले पुरानी विज्ञापन से हो भर्ती
ऐसे हाईकोर्ट से बेसिक शिक्षा विभाग को आदेश मिल सकता है कि इस विज्ञापन की भर्ती टीईटी मेरिट से किया जाये। हाईकार्ट पटना ने भी नई सरकार उस फैसले को गलत ठहराया जिसमें नीतीश कुमार पूर्वती सरकार के शिक्षक भर्ती के विज्ञापन को निरस्‍त कर नया विज्ञापन जारी किया था और हाईकोर्ट पटना ने कहा कि पहले वाली विज्ञापन के शर्त पर भर्ती की जाये और दूसरी विज्ञापन की भर्ती पहली विज्ञापन की भर्ती के बाद में निकाली जा सकती है।
टीईटी निरस्त हुई तो मिले हर छात्र को 5 लाख हर्जाना
लेकिन बेसिक विभाग से आखिर कोई पूछे की टीईटी परीक्षा फिर कौन आयोजित करेगा। क्‍या फिर यूपी बोर्ड जहां संशोधन के बाद धांधली की गई है। जिसे जांच द्वारा पकड़ा जा सकता है। लेकिन अगला टीईटी निश्पक्ष कराने गारंटी कौन लेगा । अगर धांधली के कारण से परीक्षा निरस्‍त हुई तो क्या हर छात्र को जिसने परीक्षा ईंमानदार से उतीर्ण किया उसे पांच–पांच लाख रूपये हर्जाना दिया जाएगा ॽ ये सब तय कर ले तो अच्‍छा है।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

आखिर टीचर की नियुक्‍ति ही क्‍यों टीईटी मेरिट से

प्राथमिक टीचर की भर्ती टीईटी मेरिट से ही सही
सरकारी स्‍कूलों की हालत क्‍यो खराबॽ

इस समय उत्‍तर प्रदेश में प्राथमिक विद्‍यालय की हालत खस्‍ता है। कारण साफ है यहां बुनियादी सुविधा का अभाव है। भवन बेंच टायलेट आदि नहीं है। वहीं 50 छात्रों पर एक शिक्षक तैनात है। ऐसे में बताये कोई शिक्षक अपना बेस्‍ट परफारमेंस कैसे दे पायेगा। पढ़ाई का स्‍तर जाहिर है गिरेगा ऐसे में अंग्रेजी मीडियम तमगा लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे प्राइवेट स्‍कूल की बाढ़ आ गई है। प्राइवेट कान्‍वेंट स्‍कूल के दावे पर गौर करें तो यहां पर अच्‍छी फैकल्‍टी ट्रेंड टीचिंग स्‍टाफ और आधुनिक तकनीक से शिक्षा देने की बातें कहकर लोगों को आकर्षित किया जाता है जबकि इनके दावे कहां तक सच है। यह तो अपने बच्‍चों दाखिला दिलाने के बाद उनके अभिभावक अच्‍छी तरह से जानते है।
टीईटी ने दिखाया सच
मजेदार बात यह है कि इस समय देश में अनिवार्य शिक्षा कानून चौदह साल तक के बालकों के लिये मुफ्त में शिक्षा और गूणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा की बात कहता है। जिसके तहत प्राइमरी और उच्‍च प्राइमरी में टीचरों की योग्‍यता के लिए एक पैमाना बनाया है। यहां प्रशिक्षित शिक्षक को केन्‍द्र व राज्‍य सरकार की और से आयोजित होने वाली टीचर एबिलिटी टेस्‍ट उतीर्ण करना जरूरी है। इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक लाने वाला अभ्‍यर्थी ही शिक्षक की नियुक्‍ति के लिए पात्र हैं। आपको सुनकार आश्‍चर्य होगा की केंद्र द्‍वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा अभी तक दो बार आयोजित हो चुकी है। जिसमें केवल लगभग सात प्रतिशत ही ट्रेंड टीचर उतीर्ण हुए हैं। वहीं यूपीटीईटी में जबकि पहली बार यह परीक्षा आयोजित हुई और इसमें लगभग पचास प्रतिशत ही पास हुए। वहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि यह पात्रता परीक्षा कुछ मायनों में सरल भी था। यानी कि सीटेट की तरह नहीं। फिर भी आधे ज्‍यादा छात्र मानक पर खरे नहीं उतर सके और टीईटी ने दिखा दिया सचǃ
टीईटी मेरिट से मिलेंगे सुयोग्‍य टीचर
अब तो प्रश्‍न यह उठता है कि आखिर हमारी शिक्षा प्रणाली कितनी दूषित है कि हम बीएड कालेजों से अच्‍छे टीचर नहीं बना पा रहे है। आखिर हम केवल कालेजों में डिग्रियां ही बांट रहे हैं। जो प्रशिक्षुओं इतना काबिल नहीं बना पाते है कि वे तुरंत पढ़ाने लायक हो। अधिकत्‍तर शिक्षण संस्‍थान में नंबर की होड़ लगी है। छात्रों में गुणवत्‍ता का विकास करने की बजाये उन्‍हे अच्‍छे अंक लाने के लिए नकल और रटने की प्रवृत्‍ति को बढ़ावा मिल रहा है। और इनमें से जो कुछ छात्र मेंहनत से पढ़ते है अंको के पीछे नहीं भागते बल्‍की सच्‍चे ज्ञान को सीखते है और व्‍यवहारिक जीवन में उसे उतारते है। ऐसे छात्र आज केवल अंको के कम होने से शिक्षण के क्षेत्र में अपना करियर बना नहीं पाते क्‍योंकि यहां एकेडमिक रिकार्ड को ही अधिक महत्‍व दिया जाता है। जबकि सच्‍चाई यह इनमें प्रतिभाशाली छात्र अन्‍य क्षेत्रों मे पलायन कर जाते इस तरह स्‍कूलों में अच्‍छे शिक्षकों का हमेशा अभाव रहता है।
टीईटी मेरिट नकेल कसेगा नकल पर
अब सवाल उठता है कि जिस तरह से हमारी अव्‍यवस्‍था है तो हमारे विद्‍यालय को सुयोग्‍य टीचर कैसे मिल पायेंगे। जहां आज केवल प्रतिशत और अंको के लिए पढ़ाई होती है जहां एकेडमिक रिकार्ड को देखकर टीचर बना दिया जाता है। ऐसे में तो नकल माफिया पास कराने और नम्‍बर के गणित को सुधारने के लिए अपना फायदा उठाते हैं । और शिक्षा के मन्‍दिर को बदनाम करते हैं। यह हालात यूपी टेईटी परीक्षा में देखने को मिलता है कि आधे से ज्‍यादा लोग आयोग्‍य है प्राइमरी टीचर बनने के लिए। जाहिर सी बात है टीईटी में जो जितना अधिक नंबर लाया है वह उतना अधिक योग्‍य है टीचर बनने के लिए इसीलिए टीईटी की मेरिट से ही हो टीचर की भर्ती।

सोमवार, 26 मार्च 2012

प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना संजोय लाखों लोग

प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना संजोय लाखों लोग में बस यही बहस चल रहा है कि प्राथमिक टीचर की भर्ती की चयन प्रक्रिया क्‍या होनी चाहिए। इस पर कई लोगों के अपने अपने विचार हो सकते हैं लेकिन हम आज मौजूदा सरकारी स्‍कूलों की स्‍थिति पर ध्‍यान दें तो यह बात साफ हो कि इन स्‍कूलों में भौतिक सुविधाओं के अलावा गुणवत्‍ता युक्‍त शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती है। अब फिर वह प्रश्‍न पूछता हूं कि प्राथमिक टीचर के चयन की प्रक्रिया क्‍या होनी चाहिएॽ जाहिर सी बात है किसी विद्‍यालय में एक अच्‍छा शिक्षक होना सबसे पहली शर्त है। अब प्रश्‍न उठता है कि अच्‍छा टीचर आएगा कैसे जब आज हमारी शिक्षा प्रणाली इतना जर्जर हो चुकी है कि आज बीएड कालेजों में नंबर की होड़ लगी है। कारण साफ है कि प्राथमिक विद्‍यालय में अभी तक अन्‍तिम चयन का आधार एकेडमिक मेरिट है। यह सुनने में अच्‍छा जरूर लगता है लेकिन ध्‍यान दें इस समय यूपी बोर्ड परीक्षा चल रही है और अखबारों में खबर रिकार्ड तोड़ हो रहा नकल। वहीं कई ऐसे बोर्ड है जहां ऐसे औसत छात्रों को भी 70 से 80 प्रतिशत नंबर आसानी से मिल जाता है जबकि यूपी बोर्ड में मेधावी छात्र भी इतना नंबर बड़ी मेंहनत से पाते है। वहीं कुछ यूनिवर्सिटी में बीए बीएसी आदि में 50 प्रतिशत नंबर लाना चुनौतीपूर्ण है जबकि कुछ ओपन यूनिवर्सिटी में 60 प्रतिशत अंक आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में अगर एकेडमिक मेरिट से चयन किया जाये तो ऐसी संस्‍था में पढ़े छात्र एकेडमिक मेरिट में पीछे रह जायेंगे क्‍योंकि वे उन संस्‍थानों से पढ़ाई कि जहां पर साठ प्रतिशत नंबर लाना मुशकिल है। इन छात्रों का क्‍या दोष जिन्‍होंने अपनी डिग्री इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से किया हो या बीएचयू से बाजी तो मारेंगे दूसरे प्रदेशों से बीएड में हचक के नंबर के जुगाड़ू छात्र और सीबीएई बोर्ड के औसत छात्र जिनको 70 प्रतिशत नंबर आसानी से मिल जाता है। अब बताएं अगर इस तरह अन्‍तिम चयन का आधार एकेडमिक मेरिट ही होगी तो नंबर की होड़ में नकल माफिया नंबर के खेल को खेलते रहेंगे और वास्‍तविक शिक्षा का लक्ष्‍य सरकार का धरा का धरा रह जाएगा। आखिर कब आएगा बदलावǃ आज बदलाव जरूरी है क्‍योंकि एक तरफ हम देखते हैं कि बोर्ड के रिजल्‍ट में कम नंबर आने से छात्र हताशा में अपनी जिंदगी को खत्‍म समझ आत्‍महत्‍या करने का फैसाला ले लेता है और ऐसी खबरों अखबार की सुर्खियां बटोरती है और फिर बहस शुरू हो जाती है। हमारी शिक्षा प्रणाली की खामियों की जहां अच्‍छे नंबर से उतीर्ण होने पर ही सम्‍मान मिलता है। पचास प्रतिशत अंक आने पर भविष्‍य अंधकारमय लगता है। क्‍योंकि आगे तो नौकरी इन नंबर के आधार पर ही मिलेगी यह प्रवृत्‍ति और एकेडमिक बेस चयन ने केवल नकल और आत्‍महत्‍या को ही बढ़ावा दे रही है। जो हमारी शिक्षा के लिए कतई ठीक नहीं है।
अब तो यह साफ है कि किसी भी पद के लिए चाहे वह शिक्षक का ही चयन क्‍यों न हो उसमें एकेडमिक मेरिट चयन का आधार उचित नहीं है। क्‍योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय अभी हाल में सभी बोर्डो में ग्रेडिंग प्रथा लागू कर दी जिससे कि नंबर की होड़ पर लगाम लग सके। लेकिन खुद यूपी बेसिक शिक्षा विभाग इतने साल से प्राथमिक विद्‍यालय में चयन के लिए एकेडमिक मेरिट आधार बनाकर अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ लिया। और मानव संसाधन विकास मंत्रालयों और शिक्षाविद्वानों की ध्‍येय को नजर अंदाज करती रही।
भला हो अनिवार्य एवं निशुल्‍क शिक्षा कानून का जिसने शिक्षक पात्रता परीक्षा लागू कर दिया और इस तरह चयन का अन्‍तिम आधार एकेडमिक मेरिट पर अब सवालिया निशान खड़े होने

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्‍ना की मुहिम जारी

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्‍ना की मुहिम जारी
अभिषेक कांत पाण्डेय


भ्रष्‍टाचार की मुहिम जारी है। अन्‍ना का आन्‍दोलन इस बार सख्त तेवर में सामने आ रहा है। 25 तारीख को जंतर मंतर दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ शहीद हुए परिजन के साथ यहां एक दिन का सांकेतिक अनशन किया गया। जिसका मकसद साफ था कि मजबूत जनलोकपाल को संसद में पारित करवाना। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई हर हिन्‍दुस्‍तानी की है। आज हम जिस तरह से भ्रष्‍टाचार से दो–चार अपनी रोजाना कि जिंदगी में होते हैं लेकिन अन्‍ना के भ्रष्‍टाचार के खिलाफ मुहिम ने हमारी सोच को बदल दिया है। और हम भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आज एक साथ खड़े हैं।

मीडिया ने निभाई जिम्‍मेदारी
एक आम भारतीय को दो वक्त की रोजी रोटी के लिए ही पूरी जिंदगी मेंहनत करने में लगा देता है। लेकिन सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्ट ब्‍यूरोकेट्स और नेता आसानी से लाखों करोड़ों बना लेते है। हमें तो अब अश्‍चर्य करने की जरूरत भी नहीं कि देश में इतने घोटाले होते है। आश्चर्य तो यह है कि वास्तव में यह सिलसिला कब से चल आ रहा है। आखिर अब तक पता कैसे नहीं चला जाहिर हमारी मीडिया और जनता ने इस तरह के घोटालों को सामने लाकर रखा है। अन्‍ना हजारे का मुहिम भ्रष्‍टाचार के खिलाफ हमारी आंखें खोल दी हैं। मीडिया की भूमिका प्रशंसनीय है जोकि भारत को खोखला कर देने वाले इन घोटालों को समाज के सामने बड़ी बेबाकी से रखा। कहीं कहीं तो जांच एजेंसी की तरह जांच पड़ताल की और तथ्‍यों को जुटाया लेकिन फिर भी हमारी सरकार ने कोई ठोस कदम उठाने की अभी तक सूझी नहीं।

आखिर क्यों नहीं उठया जाता कोई ठोस कदम
देखा जाए तो इस तरह एक के बाद घोटालों का सामने आना सरकार के मंत्रियों का जेल जाना। वास्तव में सरकार पारदर्शी होने के दावों को खोखला करती है। आखिर हम लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाते हैं पर उस पर कोई नोटिस क्‍यों नहीं होती हैॽ यह सवाल हमारे लिए सबसे बड़ा है। जब आखिर हमारे देश की बुनियादी जरूरतों जैसे शिक्षा जल सड़क बिजली आदि के संसाधन की जरूरत है लेकिन हजारों करोड़ों रूपये के इन घोटालों के कारण हम उन लोगों तक उचित सुविधाएं नहीं पहुंचा पाते है जिन्‍हें जल भोजन शिक्षा रोजगार की आवश्‍यकता है। अवैध खनन में आखिर सरकारें चुप क्‍यों रहती है। देश के संसाधन से खनन माफिया के हौसले बुलन्द है। ऐसे में इन्‍हें रोकने वाले ईंमानदार आफिसर इनकी नाराजगी का शिकार होते है जिन्‍हें इनकी ईंमानदारी की कीमत इन्‍हें अपनी जान चुकाकर देनी पड़ती है। और हम तो केवल घर में बैठे सोच में पड़ जाते हैं कि हमारा देश आज माफियाओं के हाथ में है। कहां गई सरकार क्‍यों नहीं रोकती इन संसाधनों की चोरी कोॽ क्‍या ट्रक भर भरकर ले जाते हुए गिट्टी बालु कोयला दिखता नहीं है। या दीखता है तो बस आखें मूंद लिया जाता है। अगर ऐसा है तो साफ है इन माफियों से समझौता करके लाखों रूपये सरकारी नुमाइंदें और नेता मंत्री कमाई करते हैं।

जिम्मेदारी किसकीॽ
जब देश में भ्रष्‍टाचार इस कदर तक फैला हुआ है कि इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों के खिलाफ भ्रष्‍टाचारी इनके जान के दुशमन बन जाते है। और हमारा नकारा तंत्र बस देखता रहता है। जब जिन पर देश की जिम्मेदारी है वही अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझते हैं तो इस तरह भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे बाबा रामदेव और भारत की जनता को समाने आना होगा नहीं तो यह भ्रष्‍टाचार का यह नासूर हमारे देशा को खोखला कर देगा। अगर हम नहीं चेते तो इस भ्रष्‍टाचार के तंत्र में उस गरीब मतदाता ठगा सा रह जाएगा जिसने उस सरकार ने चुनाव मे बड़े बड़े वादे कर देश के विकास के सपने दिखाए लेकिन भ्रष्‍टाचारियों ने उसके सपने चूर चूर कर दिया।

रविवार, 25 मार्च 2012

सपनों का सच करने का शहर इलाहाबाद

सपनों का सच करने का शहर इलाहाबाद

अपनी संस्‍कृति की पहचान के साथ आज इलाहाबाद

इलाहाबाद एक ऐसा जीता जागता शहर है जहां पर जिंदगियां हंसती और खेलती हैं। यहां पर साहित्‍य कला और संस्‍कृति का अद्भुत संगम है। प्रयाग नाम और फिर इलाहाबाद ये दोनों नाम गंगा जमुनी संस्‍कुति की पहचान बनाये हुए सांस्‍कृतिक एकता की अलख जगाये हुए हैं। संगम तट पर मध्‍यकाल में बना अकबर का किला और प्राचीनकाल से संगम में आस्‍था का सैलाब देखने को मिलता है। यह एक ऐसा शहर है जो प्राचीनकाल और फिर मध्‍यकाल और इसके बाद आधुनिक काल में अपनी संस्‍कृति को सुरक्षित रखा और हर काल में महत्‍वपूर्ण बना रहा। यही इलाहाबाद कि फिजा की खासीयत है। हिन्‍दी और उर्दू की संगम स्‍थली है। साहित्‍य का गढ़ है। शेरों सायरी के शौकीनों के साथ कविता पाठ की लम्‍बी परंपरा रही है।


देश की आजादी की स्‍थली इलाहाबाद

इलाहाबाद संगम स्‍थली के रूप में प्राचीनकाल से ही प्रख्‍यात है। पर आज कि आधुनिकता ने इसे नए ढंग से जीने के लिए प्रेरित कर रहा है। शिक्षा की यह स्‍थल पूर्व के आक्‍सफोर्ड के नाम से जाना जाने वाला इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय ने कई विश्‍वविख्‍यात सख्‍सीयतें दी हैं। जवाहार लाल नेहरू इंदिरा गांधी और निराला महादेवी वर्मा और इसके साथ ही चंद्रशेखर आजाद का लोहा तो अंग्रेज भी मानते थे। आजादी के समय आनन्‍द भवन भारत की आजादी में एक सक्रिय भूमिका निभाने वाला स्‍थल रहा। जहां जंगे आजादी की रणनीतियां तैयार होती थी। और शिरकत करते थे जाने माने आजादी के दीवाने यहां तक की कई बार महात्‍मा गांधी ने जवाहर लाल नेहरू के साथ अंग्रजों के विरूद्ध रणनीति पर विचार विमर्श करते थे। आनंद भवन में आज भी आजादी की यह स्‍मृति फोटोग्राफ्स और कई दस्‍तावेजों के रूप में संगृहित है और आने वाली पीढियों के लिए सुरक्षित है।

साहित्‍य की स्‍थली इलाहाबाद

इलाहाबाद अतीत से वर्तमान तक अपनी धरोहर को अपने में समेटे हुआ है। साहित्‍य सृजन में महाप्राण निराला की नई कविता ने तुक के बंधन से आजादी ले ली तो साहित्‍य जगत में खलबली मच गई कि बिना तुक छंद के कोई कविता कितनी सार्थक हो सकती है। इस पर विचार विमर्श चल पड़ा पर निराला थकने व हार मानने वाले नहीं थे। और मील का पत्‍थर साबित हो गई उनकी कालजयी कविता ʺवह ताड़ती पत्‍थर देखा मैंने इलाहाबाद के पथ परʺ अखिरकार यह कविता अंतुकांत होते हुए भी अपनी वेदना के उच्‍चतम स्‍तर को छूती थी जिससे अतुकांत कविता पर लगा प्रश्‍न चिन्‍ह हमेशा के लिए हट गया। वहीं प्रेमचंद्र के धारा के कहानीकार और ʺइन्‍ही हथियारों नेʺ उपन्‍यास के लिए अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया।

पढ़ने वालों का शहर इलाहाबाद

वहीं इलाहाबाद आज इंजीनियरिंग और सूचना प्रणाली में देश के साथ है। यहां ट्रिपल आईटी उच्‍चस्‍तर के प्रोफेशनल पैदा करते हैं। कहते हैं पढ़ने वालों से यह शहर से यूनिवर्सिटी रोड गुलजार है। यहां लगभग हर जगह से आये प्रतियोगी छात्र अपने सपनों को आईएस पीसीएस बनकर पूरा करते हैं। इस तरह यह शहर आधुनिकता के साथ अपनी परंपरा को लेकर और उसमें सामंजस्‍य कर। देश को एक उदाहरण पैदा करता है। यहां अपनापन है। माटी की खुशबू है और मेरा यह शहर संस्‍कारों और संस्‍कृति के ज्ञान विज्ञान के साथ भविष्‍य की चलती जाती है इलाहाबाद।

अभिषेक कांत पाण्‍डेय



शनिवार, 24 मार्च 2012

टेट ऐसी छन्‍नी है जो नकलचियों को छानेगा और इसकी मेरिट मेधावियों का चयन करेगा।

टेट ऐसी छन्‍नी है जो नकलचियों को छानेगा और इसकी मेरिट मेधावियों का चयन करेगा।
टीईटी की मेरिट ही केवल हो चयन का आधार। बाकी एकेडमी प्‍लस टेट आदि फार्मूला न्‍यायोचित नहीं। इसे हम अच्‍छी तरह से जानते है कि बीएड में किस तरह से खुले आम नकल होती है। और यहां पर एकडमिक मेरिट मजबूत करने का खेल हर साल चल रहा है। इसके साथ ऐसे विश्‍वविद्‍धालय जहां नकल नहीं होती और मार्किंग टाइट होती है वे नकलचियों के बीच छट जाएंगे और फिर हमारे आरटीई एक्‍ट कानून का कोई मतलब नहीं रहेगा। अतः नकलचियों और नकल माफियों पर बैन लगा सकता है टीईटी मेरिट यह सबके समझ में आनी चाहिए।
दूसरी बात टीईटी के मेरिट होने से छात्र अपनी एकडमिक मेरिट में अंको के जुगाड में कोई गलत कदम नहीं उठायेंगे और उन्‍हे मालूम होगा कि टेट पास करने के लिए अभी से पढाई करों और पढार्इ से वास्‍तविक ज्ञान मिलेगा जो बच्‍चों को पढाने में काम आयेगा। इसलिए टेट आखिरी छन्‍नी है जो छानकर नकलचियों और नकल माफियों को सही रास्‍ते पर लाएगा ओर इनका धंधा बन्‍द हो जएगा।

आखिर टीचर की नियुक्‍ति ही क्‍यों टीईटी मेरिट से

आखिर टीचर की नियुक्‍ति ही क्‍यों टीईटी मेरिट से

सरकारी स्‍कुलों की हालत क्‍यो खराबॽ
सरकारी प्राइमरी स्‍कूलों का गिरता स्‍तर प्राइवेट इंग्‍लिस मीडियम स्‍कूलों को कुकुरमुत्‍तों की तरह उगने का मौका दे रही हैं। इस समय उत्‍तर प्रदेश में प्राथमिक विद्‍यालय की हालत खस्‍ता है। कारण साफ है यहां बुनियादी सुविधा का अभाव है। भवन बेंच टायलेट आदि नहीं है। वहीं 50 छात्रों पर एक शिक्षक तैनात है। ऐसे में बताये कोई शिक्षक अपना बेस्‍ट परफारमेंस कैसे दे पायेगा। पढ़ाई का स्‍तर जाहिर है गिरेगा ऐसे में अंग्रेजी मीडियम तमगा लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे प्राइवेट स्‍कूल की बाढ़ आ गई है। प्राइवेट कान्‍वेंट स्‍कूल के दावे पर गौर करें तो यहां पर अच्‍छी फैकल्‍टी ट्रेंड टीचिंग स्‍टाफ और आधुनिक तकनीक से शिक्षा देने की बातें कहकर लोगों को आकर्षित किया जाता है जबकि इनके दावे कहां तक सच है। यह तो अपने बच्‍चों दाखिला दिलाने के बाद उनके अभिभावक अच्‍छी तरह से जानते है।

टीईटी ने दिखाया सच
मजेदार बात यह है कि इस समय देश में अनिवार्य शिक्षा कानून चौदह साल तक के बालकों के लिये मुफ्त में शिक्षा और गूणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा की बात कहता है। जिसके तहत प्राइमरी और उच्‍च प्राइमरी में टीचरों की योग्‍यता के लिए एक पैमाना बनाया है। यहां प्रशिक्षित शिक्षक को केन्‍द्र व राज्‍य सरकार की और से आयोजित होने वाली टीचर एबिलिटी टेस्‍ट उतीर्ण करना जरूरी है। इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक लाने वाला अभ्‍यर्थी ही शिक्षक की नियुक्‍ति के लिए पात्र हैं। आपको सुनकार आश्‍चर्य होगा की केंद्र द्‍वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा अभी तक दो बार आयोजित हो चुकी है। जिसमें केवल लगभग सात प्रतिशत ही ट्रेंड टीचर उतीर्ण हुए हैं। वहीं यूपीटीईटी में जबकि पहली बार यह परीक्षा आयोजित हुई और इसमें लगभग पचास प्रतिशत ही पास हुए। वहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि यह पात्रता परीक्षा कुछ मायनों में सरल भी था। यानी कि सीटेट की तरह नहीं। फिर भी आधे ज्‍यादा छात्र मानक पर खरे नहीं उतर सके और टीईटी ने दिखा दिया सच ǃ

टईटी मेरिट से मिलेंगे सुयोग्‍य टीचर
अब तो प्रश्‍न यह उठता है कि आखिर हमारी शिक्षा प्रणाली कितनी दूषित है कि हम बीएड कालेजों से अच्‍छे टीचर नहीं बना पा रहे है। आखिर हम केवल कालेजों में डिग्रियां ही बांट रहे हैं। जो प्रशिक्षुओं इतना काबिल नहीं बना पाते है कि वे तुरंत पढ़ाने लायक हो। अधिकत्‍तर शिक्षण संस्‍थान में अधिक नंबर की होड़ लगी है। छात्रों में गुणवत्‍ता का विकास करने की बजाये उन्‍हे अच्‍छे अंक लाने के लिए नकल और रटने की प्रवृत्‍ति को बढ़ावा ही मिल रहा है। और इनमें से जो कुछ छात्र मेंहनत और लगन से पढ़ते है अंको के पीछे नहीं भागते बल्‍की सच्‍चे ज्ञान को सीखते है और व्‍यवहारिक जीवन में उसे उतारते है। ऐसे छात्र आज केवल अंको के कम होने से शिक्षण के क्षेत्र में अपना करियर बना नहीं पाते क्‍योंकि यहां एकेडमिक रिकार्ड को ही अधिक महत्‍व दिया जाता है। जबकि सच्‍चाई यह इनमें प्रतिभाशाली छात्र अन्‍य क्षेत्रों मे पलायन कर जाते इस तरह स्‍कूलों में अच्‍छे शिक्षकों का हमेशा अभाव रहता है।

टीईटी मेरिट नकेल कसेगा नकल पर
अब सवाल उठता है कि जिस तरह से हमारी अव्‍यवस्‍था है तो हमारे विद्‍यालय को सुयोग्‍य टीचर कैसे मिल पायेंगे। जहां आज केवल प्रतिशत और अंको के लिए पढ़ाई होती है जहां एकेडमिक रिकार्ड को देखकर टीचर बना दिया जाता है। ऐसे में तो नकल माफिया पास कराने और नम्‍बर के गणित को सुधारने के लिए अपना फायदा उठाते हैं । और शिक्षा के मन्‍दिर को बदनाम करते हैं। यह हालात यूपी टेईटी परीक्षा में देखने को मिलता है कि आधे से ज्‍यादा लोग आयोग्‍य है प्राइमरी टीचर बनने के लिए। जाहिर सी बात है टीईटी में जो जितना अधिक नंबर लाया है वह उतना अधिक योग्‍य है टीचर बनने के लिए इसीलिए टीईटी की मेरिट से ही हो टीचर की भर्ती।
अभिषेक कांत पाण्डेय

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