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सपनों का सच करने का शहर इलाहाबाद

सपनों का सच करने का शहर इलाहाबाद

अपनी संस्‍कृति की पहचान के साथ आज इलाहाबाद

इलाहाबाद एक ऐसा जीता जागता शहर है जहां पर जिंदगियां हंसती और खेलती हैं। यहां पर साहित्‍य कला और संस्‍कृति का अद्भुत संगम है। प्रयाग नाम और फिर इलाहाबाद ये दोनों नाम गंगा जमुनी संस्‍कुति की पहचान बनाये हुए सांस्‍कृतिक एकता की अलख जगाये हुए हैं। संगम तट पर मध्‍यकाल में बना अकबर का किला और प्राचीनकाल से संगम में आस्‍था का सैलाब देखने को मिलता है। यह एक ऐसा शहर है जो प्राचीनकाल और फिर मध्‍यकाल और इसके बाद आधुनिक काल में अपनी संस्‍कृति को सुरक्षित रखा और हर काल में महत्‍वपूर्ण बना रहा। यही इलाहाबाद कि फिजा की खासीयत है। हिन्‍दी और उर्दू की संगम स्‍थली है। साहित्‍य का गढ़ है। शेरों सायरी के शौकीनों के साथ कविता पाठ की लम्‍बी परंपरा रही है।


देश की आजादी की स्‍थली इलाहाबाद

इलाहाबाद संगम स्‍थली के रूप में प्राचीनकाल से ही प्रख्‍यात है। पर आज कि आधुनिकता ने इसे नए ढंग से जीने के लिए प्रेरित कर रहा है। शिक्षा की यह स्‍थल पूर्व के आक्‍सफोर्ड के नाम से जाना जाने वाला इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय ने कई विश्‍वविख्‍यात सख्‍सीयतें दी हैं। जवाहार लाल नेहरू इंदिरा गांधी और निराला महादेवी वर्मा और इसके साथ ही चंद्रशेखर आजाद का लोहा तो अंग्रेज भी मानते थे। आजादी के समय आनन्‍द भवन भारत की आजादी में एक सक्रिय भूमिका निभाने वाला स्‍थल रहा। जहां जंगे आजादी की रणनीतियां तैयार होती थी। और शिरकत करते थे जाने माने आजादी के दीवाने यहां तक की कई बार महात्‍मा गांधी ने जवाहर लाल नेहरू के साथ अंग्रजों के विरूद्ध रणनीति पर विचार विमर्श करते थे। आनंद भवन में आज भी आजादी की यह स्‍मृति फोटोग्राफ्स और कई दस्‍तावेजों के रूप में संगृहित है और आने वाली पीढियों के लिए सुरक्षित है।

साहित्‍य की स्‍थली इलाहाबाद

इलाहाबाद अतीत से वर्तमान तक अपनी धरोहर को अपने में समेटे हुआ है। साहित्‍य सृजन में महाप्राण निराला की नई कविता ने तुक के बंधन से आजादी ले ली तो साहित्‍य जगत में खलबली मच गई कि बिना तुक छंद के कोई कविता कितनी सार्थक हो सकती है। इस पर विचार विमर्श चल पड़ा पर निराला थकने व हार मानने वाले नहीं थे। और मील का पत्‍थर साबित हो गई उनकी कालजयी कविता ʺवह ताड़ती पत्‍थर देखा मैंने इलाहाबाद के पथ परʺ अखिरकार यह कविता अंतुकांत होते हुए भी अपनी वेदना के उच्‍चतम स्‍तर को छूती थी जिससे अतुकांत कविता पर लगा प्रश्‍न चिन्‍ह हमेशा के लिए हट गया। वहीं प्रेमचंद्र के धारा के कहानीकार और ʺइन्‍ही हथियारों नेʺ उपन्‍यास के लिए अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया।

पढ़ने वालों का शहर इलाहाबाद

वहीं इलाहाबाद आज इंजीनियरिंग और सूचना प्रणाली में देश के साथ है। यहां ट्रिपल आईटी उच्‍चस्‍तर के प्रोफेशनल पैदा करते हैं। कहते हैं पढ़ने वालों से यह शहर से यूनिवर्सिटी रोड गुलजार है। यहां लगभग हर जगह से आये प्रतियोगी छात्र अपने सपनों को आईएस पीसीएस बनकर पूरा करते हैं। इस तरह यह शहर आधुनिकता के साथ अपनी परंपरा को लेकर और उसमें सामंजस्‍य कर। देश को एक उदाहरण पैदा करता है। यहां अपनापन है। माटी की खुशबू है और मेरा यह शहर संस्‍कारों और संस्‍कृति के ज्ञान विज्ञान के साथ भविष्‍य की चलती जाती है इलाहाबाद।

अभिषेक कांत पाण्‍डेय



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ओले क्यों गिरते हैं?

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रिंकी पाण्डेय
ओले क्यों गिरते हैं?

बच्चो, कई बार बारिश के दौरान अचानक पानी की बूंदों के साथ बर्फ के छोटे-छोटे गोले भी गिरते हैं। इन्हें हम ओले कहते हैं। ये ओले आसमान में कैसे बनते हैं और ओले क्यों गिरते हैं? तो आओ ओले के बारे में पूरी बात जानें।

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बच्चों, तुम जानते हो कि बर्फ पानी के जमने से बनता है। अब तुम्हारे मन में ये प्रश्न उठ रहा होगा कि आसमान में ये पानी कैसे बर्फ बन जाता है और फिर गोल-गोले बर्फ के टुकड़ों के रूप में ये धरती पर क्यों गिरते हैं? तुमने जैसा कि पढ़ा होगा कि पानी को जमने के लिए शून्य डिग्री सेल्सियत तापमान होना चाहिए, तुमने फ्रीजर में देखा होगा कि पानी के छोटे-छोटे बूंदें बर्फ के गोले के रूप में जम जाता है, ऐसा ही प्रकृति में होता है। हम जैसे-जैसे समुद्र के किनारे से ऊपर यानी ऊंचाई की ओर बढ़ते हैं, तब जगह के साथ ही तापमान धीरे-धीरे कम होता जाता है। तुम इसे ऐसे समझ सकते हो, लोग गर्मी के मौसम में पहाड़ों पर जाना पसंद करते हैं, क्यों? इसलिए कि पहाड़ पर तापमान कम होता है, यानी मैदान…

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