क्या मीडिया टीईटी मेरिट के मुद्दे पर विमर्श से बच रही है ॽ


क्या मीडिया टीईटी मेरिट के मुद्दे पर विमर्श से बच रही है ॽ
       पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। सवाल उठता है कि मीडिया समाजिक मुददों पर आज क्यों इतना मौन है। शिक्षा एक ऐसा मुद्दा है जिस पर मीडिया की भूमिका स्पष्ट  होनी चाहिए।
       शिक्षा अधिकार कानून आने के बाद राज्य सरकारें टीईटी और नियुक्‍ति जैसे मामले में कोई सार्थक फैसला नहीं ले रही है और ना ही एनसीटीई की गाईड लाइन को ठीक ढंग से लागू कर पा रही है। प्राथमिक टीचर भर्ती पर विवाद बना है लेकिन मीडिय तनिक भी रूचि नहीं ले रही है। क्या टीईटी मेरिट सही हैॽ एकेडमिक मेरिट से अंतिम चयन कहां तक जायज हैॽ इसके प्रभाव क्या हैॽ क्यों नियमों में परिवर्तन किया जा रहा हैॽ इसके पीछे क्या मंशा है। जैसे मुद्दों पर मीडिया भी सही पत्रकरिता नहीं कर रही हैॽ कहीं कहीं तो अपनी रिपोर्ट में आरटीई एक्ट और एनसीटीई आदि के गाईड लाइन को बिना समझें खबरें बनाई जा रही है। मीडिया एक तरफ स्कूलों में नकल की खबरें छापती है तो दूसरी तरफ एकेडमिक मेरिट की आलोचना से दूर रहती है। मीडिया में विमर्श नहीं हो रहा हैॽ नकल माफियों के मन मुताबिका सब हो रहा है। अनिवार्य निशुल्क शिक्षा एक कानून है जिसके अंतर्गत गुणवत्तायुक्त शिक्षा की बात करता है। परिषदीय विद्यालयों की हालत किसी से छिपी नहीं है। पढ़ाई के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। टीचर सही से पढा नहीं रहे हैं। मीडिया में इस तरह की खबरें आती रही हैं। आखिर टीईटी मेरिट या प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से प्राइमरी टीचर की भर्ती होना कितना सही हैॽ इस पर कोई बहस नहीं छपती है। बस सूत्रों के मुताबिक हर दिन वहीं खबर को चटकारेदार बनाकर तोड़ मड़ोरकर छपती रहती हैं। यहां अखबारों में भी टीआरपी का खेल जारी है। एकेडिमिक मेरिट की बात करें तो ज्यादा लोग अखबार पढ़ेंगे। और अगर टीईटी मेरिट की बात करेंगे तो टीआरपी कम होगी और टीईटी निरस्त की खबर में टीईटी फेल वाले रूचि लेंगे जिनकी संख्या अधिक है वे पढ़ेंगे और सरकुलेशन अखबार का बढ़ेगा। ऐसी मानसिकता के साथ पत्रकारिता की जा रही है।
जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर अखबार कभी कभी उचित स्थान नहीं देती है तो इन मुद्दों को विज्ञापन के माध्यम से प्रकाशित करना आज की जरूरत हैॽ
इस तरह अब मीडिया में जनसरोकार और समाजिक मुद्दों पर रूचि अखबार के प्रंबधन समिति  अपने फायदें को देख कर लेती है। जिससे इन मुददों को अखबार में स्थान नहीं मिलता है। तब जनसरोकार के  मुद्दों पर अखबारों में बकायदा पैसे देकर विज्ञापन द्वारा अपनी बात कहना ज्यादा प्रभावशाली है। इससे लोगों के हित की बात पहुंचेगी और सरकार चेतेगी। वहीं किसी अखबार को इन मुद्दों पर किसी कारणवश रूचि न होने पर वह कम से कम विज्ञापन के तौर पर तो छापने से इंकार तो नहीं कर सकता है। और लोगों में यह स्पष्ट रहेगा की यह समाजिक मुदृदा विज्ञापन है अगर आपाकों उचित लगता है तो इस मुददे  का समर्थन कीजिए लेकिन हम जानते है कि सच्चाई की समर्थन सभी करते हैं।
सूत्रों के मुताबिक खबरें बाद में पलट जाती है लेकिन उस समय अपना प्रभाव छोड़ जाती हैॽ
जबकि ऐसी भ्रामक खबरें टीईटी को लेकर आती है। जहां पत्रकारिता पर सवाल उठना लाजिमी है। आरटीई एक्ट संसद में पारित हुआ है और इसे संसद ही संशोधित कर सकती है। लेकिन मीडिया में तथ्यों को बिना समझे खबरें लिखी जाती है। एकपक्षीय खबरें होती है कि दूसरें पक्ष की बातें नहीं कही जाती है। और एक पक्ष का विश्लेषण होता है जबकि उसी मुद्दे के दूसरे पक्ष का विश्लषण निश्पक्ष नहीं किया जाता है। वहीं यह बात टीईटी एकेडमिक मेरिट वर्सेज एकेडमिक मेरिट में क्या सही हैॽ आज के इस प्रतियोगिता के इस दौर में इस पर मीडिया बहस करने से बचती है और केवल सरकार की बातों को उठाती हैं। और एक तरह से समर्थन करती है। और यहां कितने ऐसे छात्र है जो टीईटी मेरिट के चयन के लिए मेंहनत की। और सरकार बदलने के बाद चल रही प्रक्रिया को निरस्त करने की खबरों को ही ज्यादा प्रमुखता दी जा रही है। वहीं दूसरा पक्ष यानी टीईटी मेरिट या प्रतियोगी परीक्षा यानी इस लोकतंत्रिक तरीके बारे में कोई बहस नहीं हाती है। टीईटी भर्ती पर अभी कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। लेकिन जो खबरें दी जा रही है वह सूत्रों के मुताबिक है। लेकिन निश्पक्ष विश्लेषण की संभावना तो बनती है। वर्तमान में मामला हाई  कोर्ट की लार्जर बेंच में है और ओल्ड विज्ञापन से भरती  बहल होगी और इसका श्रेय हमारी न्यायपालिका और टेट पास बेरोजगारों को मिलेगा जो  के डंडे खाने के बाद अपनी हक़ के आवाज़ के लिए सरकर को भी बता दिया की फहर फैसले चुनाव को देखर नहीं बलकी सही और गलत को देखकर लेने चैये तभी वह सर्कार र लोकप्रिय होती है लोलीपोप और लैपटॉप से नहीं बेरोजगारों को उनकी योग्यता के  अनुसार नौकरी प्रतियोगी परीक्षा से।
अभिषेक कांत पाण्डेय

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