बुधवार, 30 मई 2012

कल फैसले का दिनǃ


कल फैसले का दिनǃ
प्राइमरी टीचर भर्ती यह मोड़ कई बार आया की जब जब नियुक्ति की मांग की तो लाठी डण्डे मिले। यही युवा है जिन्होने मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन आज अपने हक की लड़ाई भी लोकतांत्रिक ढंग से लड़ने नहीं दिया जा रहा है। इधर सरकार टीईटी मेरिट से जल्द भर्ती का आश्वासन नहीं दे रही है। लेकिन यह बात साफ है कि चयन प्रक्रिया को बदल पाने में कानूनी अड़चने है। इधर फिर भी इन सब बारीकियों पर गौर करने के बाद भी कोई अधिकारिक बयान नहीं आया लेकिन विधानसभा सत्र में टीईटी से चयन की बात की गई है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि टीईटी मेरिट से भर्ती की जाएगी।
हाईकोर्ट में  सुनवाई में फैसला आ सकता है। जिसमें पूर्व विज्ञापन के आधार पर भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी।

रविवार, 27 मई 2012

टेट उतीर्ण और भर्ती प्रक्रिया में शामिल बेरोजगारों की सरकार अवेहलना कर रही


 खबरें आ रही हैं कि अगले सत्र में शिक्षा मित्रों की नियुक्‍ति होगी लेकिन ये तो पैराटीचर तो पहले से ही नियक्‍त हैं वो भी इण्‍टर पास  और सरकार इन्‍हें बीएड करा कर स्‍थाई नियुक्‍ति देगी। इधर आरटीई काबिल टीचर की बात करता है। तो हमारा संविधान सबकों एक समान  नजरिये से देखता है कि योग्‍यता के अनुसार नौकरी दी जाए। लेकिन  बीएड टेट उतीर्ण और भर्ती प्रक्रिया में शामिल बेरोजगारों की सरकार अवेहलना कर रही है। ६ लाख बीएड धारक और ३ लाख टीईटी पास  और लाखों लोग टीचर बनने के लिए बीएड करने की तैयारी अभी से कर रहे हैं इन्‍होंने वर्तमान सरकार को वोट दिया कि जल्‍द टीचर की भर्ती लोकतांत्रिक ढंग से शुरू होगी लेकिन वर्तमान सरकार चुनाव से पहले की परिस्‍थ्‍ितियों को भूल गया है। अब केवल एक ही दिशा में शिक्षा मित्रों की बात कर रहा है। इधर कंपटीशन से बीएड करने वाले और टीईटी मेरिट में से नियुक्‍ति का बात न करके इनको केवल टरकाया जा रहा है। संवैधानिक तरीके से हो रही भर्ती की प्रक्रिया को बदलने में ज्‍यादा रूचि दिखा रही है। बेरोजगारी भत्‍ते में भी सरकार का फैसला बिल्‍कुल अजीब है कैसे बेरोजगारी भत्‍ता के लिए सरकार बेरोजगारो से काम लेगी तो यह बेरोजगारी भत्‍ता कहां होगी ये तो रोजगार देना हुआ तो 

सरकार पहले ये तय करती की नहीं हम बेरोजगारी भत्‍ता नहीं इन बेरोजगारों को काम देंगे काम से जीने का सम्‍मान देंगे। लेकिन सरकार केवल  अपने वोट बैंक के बारे में ही सोचती है। चुनाव से पहले केवल बेरोजगारी भत्‍ते का लाली पाप दिखाया और जमीनी तौर पर उसे लागू करने पर उस पर कई नियन लगा दिये। बहरहाल
एक तरह से सरकार खुद मानने लगी हर बेरोजगारों को उनकीयोग्‍यता के अनुसार रोजगार दिलाना सरकार का दयित्‍व है। लेकिन मजेदारी बात है कि बीते कई महीने से टीईटी मेरटि से चयन मामले में सरकार काई पहल नहीं कर रही है जोकि आरटीई एक्‍ट के तहत योग्‍य टीचर बनने की योग्‍यता रखते
हैं लेकिन सरकार एक तरफ ट्रेनिंग देकार टीचर बनाने के लिएसाल भर इंतजार कर सकती है। लेकिन जिन टीईटी बेरोजगारो के वोट के बल पर सत्‍ता हासिल की उन्‍हें ही धोखे में रखा जा रहा है। केवल बदले की राजनीति का यह ज्‍वलंत उदाहारण  है

मंगलवार, 22 मई 2012

करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है


टीईटी मेरिट से चयन को लेकर इस समय सरकार कानूनी हल ढूढ रही है। एकेडमिक
मेरिट के लिए केबिनेट में मंजूरी लेनी होगी तभी नियमावली संशोधित होगी। लेकिन क्‍या
सरकार को इस तथ्‍य पर मंथन करना अधिक जरूरी है कि वर्तमान में शिक्षा के स्‍तर को बढाने के
लिए टीईटी की मेरिट या कंपटीशन के माध्‍यम से चयन लोकतांत्रिक है। अगर पिछली
सरकार ने आरटीई के महत्‍व को समझते हुए टीईटी मेरटि से चयन के प्राथमिक शिक्षकों
की भर्ती करने की पहल की तो इस सरकार को क्‍या परेशानी है क्‍या चुनी हुई सरकार इस
तरह के फैसले को सही कहा जाएगा जो केवल पिछली सरकार के टीईटी मेरिट वाले विज्ञापन
को राजनीतिक द्वेष के चलते विज्ञापन को निरस्‍त करने या चयन प्रक्रिया को बदलकर शैक्षिक
मेरटि किया जाना सही है। जब अलग अलग बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय में नंबर देने का मानक
अलग है तो साफ जाहिर है कि इसमें वे उम्‍मीद्वार पीछे रह जाएंगे जिन्‍होंने ऐसी संस्‍थाओं से
अपनी पढाई की जहां नंबर कम मिलता है।
यहां यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि बहुमत की सरकार जब भी नियमावली बनाती है या उसमें संशोधन करती है तो उसको न्‍याय के कसौटी पर खरा उतरना है परंतु यहां टीईटी मेरिट चयन प्रक्रिया जबकि इसका विज्ञापन के बाद केवल चयन होना शेष है लेकिन सरकार केवल चयन प्रक्रिया बदलने में रूचि दिखा रही है अगर ऐसा हुआ तो न्‍यायपालिका का विकल्‍प हमारे लिए खुला है और उसके उपर कोई सरकार नहीं है। वहीं जब प्राथमिक शिक्षक की भर्ती विज्ञापन के आधार पर बेरोजगारों ने आवेदन किया और टीर्इटी मेरिट से चयन होना तय हूआ तो बीच में सरकार
इसके चयन का आधार बदलने व चयन का आधार न बदल पाने पर विज्ञापन को निरस्‍त कराना चाहती है। जबकि मीडिया की खबरों के अनुसार बडी तत्‍पर्य है। यही राजनीति आज भारतीय शिक्षा को गर्त में ले गया है। अगर अब भी सरकार चेती नहीं तो आरटीई अपने लक्ष्‍य को पाने में भटक जाएगा और युवाओं को ठगा जा रहा है। बेरोजगारी भत्‍ते में कई नियम चुनाव जीतने के बाद बताएं गए चुनाव के समय अगर बताते तो युवा अपने विवेक का जरूर प्रयोग करते। बहरहाल हमारी राजनीति भी बडे बडे वादे और सपनों का सौदा करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है और उपभक्‍ताओं को खरीदने के बाद उस मानलुभावन वादें वाले विज्ञापन पर खींज होती हैं बिल्‍कुल इसी तरह आज बेरोजगार युवा अपनी गलती पर मध्‍यवती चुनाव की ओर देख रहा है कि अब सबक सीखाने की बारी हमारी है। अपनी टिप्‍पणी दें।

सोमवार, 21 मई 2012

मनरेगा में काम के लए मिल रहा केवल आश्वासन


मनरेगा में काम के लए मिल रहा केवल आश्वासन
      वाराणसी। मनरेगा यानी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी कानून के जरिए ग्रामीणों को सौ दिन का रोजगार दिलाकर उनको सम्मान से जीने का हक देती है। लेकिन इस कानून के तहत ग्रामीणों का हक अधिकारी और कर्मचारी खा रहे हैं। प्रधान से लेकर विकास खण्ड अधिकारी की जिम्मेदारी बनती है कि मनरेगा कानून के तहत काम के लिए आवेदन करने वाले को अगले १५ दिनों में रोजगार दें लेकिन हकीकत में ग्रामीणों को उनके इस हक से महरूम किया जा रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण वाराणसी के विकास खण्ड काशी विद्यापीठ में देखने को मिल रहा है। नारी संघ की महिला सदस्यों ने मनरेगा कानून के तहत काम के लिए आवेदन किया लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है। इन महिलाओं को प्रधान ग्राम सेवक और ब्लाक अधिाकरारी केवल अश्वासन दे रहे हैं।
जाब कार्ड के लिए भटकना पड रहा है
  काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत मुडादेव की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से १९ मार्च २०१२ को जाब कार्ड के लिए आवेदन किया था लेकिन  दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जाब कार्ड नहीं मिला। नारी संघ की महिला ने मुडादेव ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान व रोजगार सेवक से बात की तो उन्होंने महिलाओं को केवल आश्वासन दिया। इसी ग्राम पंचायत की नारी संघ की सदस्य महिला चंपा देवी का कहना है कि इस संबंध में ब्लाक अधिकारी को अर्जी दी तो भी कोई कार्यवाई नहीं हुई।
मनरेगा में मिला तीन दिन काम बाकी कागज पर हुआ काम
    इसी तरह का मामला वाराणसी के काशी विद्यापीठ ब्लाक के ग्राम पंचायत देल्हना की नारी संघ की महिला सदस्यों ने संयुक्त रूप से काम के लिए आवेदन १३ अप्रैल को दिया लेकिन काम एक महीने के बाद मिला वह भी तीन दिनों के लिए। जब महिलाओं ने प्रधान से पूछा तो उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत केवल दस हजार रूपये का बजट आया है इसीलिए तीन दिन ही काम हुआ है जब बजट आयेगा तब फिर काम होगा। इस पर महिलाओं का कहना है कि मनरेगा के तहत एक बार में बीस से पच्चीस दिन के काम के लिए बजट आता है लेकिन प्रधान ने कागज पर काम दिखाकर अधिकारियों व कर्मचारियों ने पैसे बनाये हैं। इस पर नारी संघ की सदस्य महिलाएं आरटीआई के तहत आय व्यय की जानकारी मांगी है।
मनरेगा योजना नहीं कानून लेकिन छ महीना बाद नहीं मिला काम
वहीं इसी ब्लाक के कुरहुआ ग्राम पंचायत में तो हद हो गई। छह महीने बीत जाने के बाद जाब कार्ड के लिए नारी संघ की महिला सदस्य मंजू देवी सुशीला देवी व शीला देवी सहित दस महिलाओं ने २३ जाब कार्ड के लिए नवंबर २०११ को  आवेदन किया लेकिन आज तक कार्ड नहीं बना। इस पर महिलाओं ने मनरेगा हेल्पलाइन में ११ जनवरी २०१२ को शिकायत दर्ज कराई कंपलेन नं० ३०३१ मिला लेकिन आज तक इनका जाब कार्ड नहीं मिला। मनरेगा में १०० दिन के काम देने की पोल खुल रही है। इन महिलाओं का कहना है कि जब मनरेगा हेल्प लाइन हमारी शिकायत सुनने के बाद काई कार्यवाई नहीं कर रहा है तो हमें काम कौन दिलाएगा। मनरेगा में इस कदर भ्रष्टाचार के चलते गरीब महिलाओं को काम नहीं मिल रही है। प्रधान और ग्राम सेवक के खिलाफ कई  बार शिकायत करने पर ब्लाक अधिाकरी नहीं सुन रहे हैं। ऐसे में इस कानून से हमें लाभ नहीं मिल रहा है केवल कागजों में ही ९० प्रतिशत काम हो रहा है। और हमारे साथ अन्याय हो रहा हमें हमारा हक नहीं मिल रहा है। इसीलिए नारी संघ की सभी ग्राम पंचायत की महिला सदस्य एकजुट होकर ब्लाक आफिस पर धरना प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी।

रविवार, 20 मई 2012

उत्तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर वन तब भी नहीं हो रही टीईटी मेरिट से चयन

उत्तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर वन तब भी नहीं हो रही टीईटी मेरिट से चयन

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्‍यालयों में पढाई नहीं होती है। प्राथमिक विद्‍यालय में मिड डे भोजन में पोषक तत्‍व गायबहैं। सरकारी प्राइमरी स्‍कूल में पढने में उच्‍च प्राथमिक विद्यालय के बच्‍चों को जोड घटाना नहीं आता है। हमारे सरकारी स्‍कूलोंकी स्‍थ्‍िति तब है जब आज छटा वेतन आयोग के अनुसार अच्‍छा वेतन सरकारी शिक्षक पा रहे हैं। अब सवाल उठता है कि अखिर यह स्‍थिति क्‍यों बनी हुई है। जाहिर है पिछले दशकों से शिक्षा के स्‍तर पर शिक्षकों के चयन में कोई अपेछ्‍ति सुधार नहीं हुआ है। आज जब मुफत शिक्षा अधिकार कानून की बात आती है तो भी इस कानून का पालन करने में राज्‍य सरकार सुस्‍त दिख रही है।उत्‍तर प्रदेश में यह स्‍थ्‍िाति और दयनीय है। और बात जब टीईटी यनी टीचर एजिबिलिटी टेस्‍ट के अनिवार्य करने के बाद आज भीमजाक बना हुआ है। जहां एक आज छात्र व शिक्षक अनुपात प्रथमिक स्‍तर पर एक शिक्षक पर ३० छात्र और उच्‍च प्राथमिक में ३५ छत्र होने चाहिए लेकिन आज जहां राज्‍य सरकारें टीचरों की भर्ती प्रक्रिया में उलझें और केवल नकल माफियों को फायदा पहुंचाने में लगी है। टीईटी मेरिट की बात अनसुना कर रही है। 

उत्‍तर प्रदेश बाल मजदूरी में नंबर एक है। बडी शर्म की बात है कि संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ विश्‍व के  बच्‍चों के उनके अधिकार दिलाने के लिए चल रही मुहिम में हिस्‍सा बनने के बाद भी भारत में बाल मजदूरी में जस तस की स्‍थिति बनी सरकारें आती हैं और चली जाती हैं।बुनियादी स्‍तर पर कोई सुधार नहीं कर रही है। बाल मजदूरों की संख्‍या बढ रही और विडंबना यह है कि इन बच्‍चों को स्‍कूलों में होना चाहिए ये बच्‍चें स्‍कूल के बाहर काम कर रहे हैं। एक रिपोर्ट की माने तो २२ प्रतिशत बच्‍चे स्‍कूल से  बाहर हैं और ६९ प्रतिशत बच्‍चे स्‍कूल छोड देते हैं। सरकार की जिम्‍मेदारी बढ जाती है। जबकि २२ प्रतिशत बच्‍चे बीच में स्‍कूल छोड देते हैं।


शनिवार, 19 मई 2012


जिस तरह से टेट मेरिट से चयन के प्रति सरकार की हीलाहवाली चर रही है तो 
उससे एक बात साफ है कि कोर्ट के हस्‍तक्षेप के बाद सरकार को जल्‍द ही चयन 
होगा। दीगर बात यह कि शिक्षा जैसे गंभीर मुददे में सरकार एक सही निर्णय नहीं 
ले पा रही है जबकि आज हम गांवों में प्राथमिक विद्‍यालय की हालत देख सकते
है। सर्वशिक्षा अभिया अशातित सफलता नहीं हासिल कर पा रहीं है। शायद इसका कारण
हमारे पास सर्वविदित है कि पढाई का स्‍तर आज गिरा है। जिस  तेजी से हमारी दुनिया
बदल रही है उस तेजी से प्राथमिक विद्‍यालय में गुणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा की बात 
नहीं हो रही है। अभी टीचरों की भरती के स्‍पष्‍ट मानक नहीं है। ऐकमेडिक के द्‍वारा चयन 
का मानक आज अपनी प्रासंगीकता पर स्‍वयं ही प्रश्‍न पूछ रहा है। नकल एक बडी समस्‍या है
और इसी नकल के वातावरण से अगर हम एकेडमिक मेरिट से टीचर चुन रहे हैं तो निश्‍चित 
ही हम बच्‍चों के भविष्‍य के साथ खिलवाड कर रहे है। यहा एक बात है कि कंपटीशन या टीईटी मेरिट
से चयन सर्वोत्‍तम है लेकिन सरकार यह विकासवादी निर्णय लेने में समय लगा रही है। 

मंगलवार, 8 मई 2012

बेसिक शिक्षा मंत्री के बयान ने


बेसिक शिक्षा मंत्री के बयान ने टीईटी उतीर्ण बेरोगारों के साथ धोखा किया जा रहा है।

जिस तरह अखबार में टीईटी भर्ती के मामले में भ्रमित करने वाली खबरें आ रही है।
अभी भी मीडिया टीईटी मेरिट के औचित्‍य पर कोई सार्थक लेख नहीं प्रकाशित कर रही है
बल्‍कि इन सब मामलों में अपने पाठकों को भटका रही है। टीईटी मेरिट के संबंध में सरकार
के साथ ही मीडिया भी अपने विचार खुल कर नहीं रख रही है शायद कारण साफ है कि इस 
परीक्षा में धांधली के आरोप के चलते इस प्रक्रिया पर कुछ लिखने में असहज है लेकिन इतना
बड़ा मुददा जोकि हमारी शिक्षा के बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए है। जहां आज नकल
सबसे बड़ा नासूड है ऐसे में अगर अब टीईटी मेरिट या कंपटीशन चयन में अनिवार्य नहीं हुआ तो
शिक्षा का स्‍तर नहीं सुधर सकता है।

बुधवार, 2 मई 2012

टीईटी अथ्यर्थियों को नौकरी की जगह मिलता है केवल आश्वासन


आज हाईकोर्ट प्राईमरी शिक्षको को चयन से संबंधित विज्ञापन की सुनवाई १५ मई को कर दी गई है।

आज जनता दरबार में टीईटी अभ्‍यर्थियों को मुख्‍यमंत्री को अश्‍वासन दिया कि जल्‍द ही फैसला लिया जाएगा
लेकिल प्रश्‍न यह उठता है कि अखिर सरकार इस पर निर्णय लेने पर इतना देर क्‍यों कर रही है।
इसके साथ ही जब टीईटी मेरिट से चयन की बातें विज्ञापन में स्‍पष्‍ट थी तो अदालत में मामला केवल अपनू
फायदे को भूनाने में किया जा रहा है तरीख बढ़ना और इस सब टिप्‍पणी तो नहीं की जा सकती है परंतु
अगर हम थोड़ा पीछे जाते हैं तो बातें स्‍पष्‍ट है कि आरटीई के तहत टीईटी परीक्षा पात्रता है और साथ ही
इसके वेटेज का भी महत्‍व है। यानी टीईटी चयन का आधार उचित है। लेकिन सरकार बदलने के बाद
अब इसमें राजनीति साफ झलक रही है। इस समय टीईटी पास तीन लाख की जगह आठ नौ लाख लोग 
इस प्रक्रिया को कैंसिल करने की इच्‍छा रखते हैं। इसी में एक व्‍यक्‍ति ने विज्ञापन को ही चैलेंज कर डाला
और महीनों प्रक्रिया को उलझाये रखा। टीईटी अभ्‍यर्थियों ने हजारों रूपये खर्च कर एक इस परीक्षा में टीईटी मेरिट की प्रक्रिया को जानकर उत्‍साह से आवेदन किया और मेहनत से परीक्षा उतर्ण की अगर इनके साथ प्रक्रिया बदलने की बात आती है या विज्ञापन निरस्‍तकरने की तो जाहीर है कि सीधे जीविका के आधार पर चोट किया जा रहा है यानी की मानवाअधिकार का उल्‍लंघन किया जा रहा है।

सरकार की जिम्‍म्‍ादारी

सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से इस पर विचार करना चाहिए की आज टीईटी मेरिट से या कंपटीशन से चयन का तरीका
उचित है क्‍योंकि इससे शिक्षा के क्षेत्र में अच्‍छी प्रतिभा आएगी। जनहित में देखा जाए तो यह प्रक्रिया अच्‍छी है।

जारी रहेनी चाहिए लड़ाई

टीईटी अभ्‍यर्थियों को अपने हक के लिए आंदोलन जारी रखना चाहिए क्‍योंकि मामला राजनीतिक हो रहा है।
जाहीर है कि इस समय इन्‍हें घूमाया जा रहा है ठीक लटटू की तरह। हमारी शिक्षागत निर्णय में राजनीतिक हित ज्‍यादा हावी होती जा रही है। यह परंपरा टीईटी अभ्‍यर्थियों को अपने आंदोलन के माध्‍यम से तोड़ना जरूरी है और टीईटी मेरिट की वकालत करना एक समझदारी है। क्‍योंकि समानता के नियम पर आधारित है।

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