मंगलवार, 22 मई 2012

करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है


टीईटी मेरिट से चयन को लेकर इस समय सरकार कानूनी हल ढूढ रही है। एकेडमिक
मेरिट के लिए केबिनेट में मंजूरी लेनी होगी तभी नियमावली संशोधित होगी। लेकिन क्‍या
सरकार को इस तथ्‍य पर मंथन करना अधिक जरूरी है कि वर्तमान में शिक्षा के स्‍तर को बढाने के
लिए टीईटी की मेरिट या कंपटीशन के माध्‍यम से चयन लोकतांत्रिक है। अगर पिछली
सरकार ने आरटीई के महत्‍व को समझते हुए टीईटी मेरटि से चयन के प्राथमिक शिक्षकों
की भर्ती करने की पहल की तो इस सरकार को क्‍या परेशानी है क्‍या चुनी हुई सरकार इस
तरह के फैसले को सही कहा जाएगा जो केवल पिछली सरकार के टीईटी मेरिट वाले विज्ञापन
को राजनीतिक द्वेष के चलते विज्ञापन को निरस्‍त करने या चयन प्रक्रिया को बदलकर शैक्षिक
मेरटि किया जाना सही है। जब अलग अलग बोर्ड और विश्‍वविद्‍यालय में नंबर देने का मानक
अलग है तो साफ जाहिर है कि इसमें वे उम्‍मीद्वार पीछे रह जाएंगे जिन्‍होंने ऐसी संस्‍थाओं से
अपनी पढाई की जहां नंबर कम मिलता है।
यहां यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि बहुमत की सरकार जब भी नियमावली बनाती है या उसमें संशोधन करती है तो उसको न्‍याय के कसौटी पर खरा उतरना है परंतु यहां टीईटी मेरिट चयन प्रक्रिया जबकि इसका विज्ञापन के बाद केवल चयन होना शेष है लेकिन सरकार केवल चयन प्रक्रिया बदलने में रूचि दिखा रही है अगर ऐसा हुआ तो न्‍यायपालिका का विकल्‍प हमारे लिए खुला है और उसके उपर कोई सरकार नहीं है। वहीं जब प्राथमिक शिक्षक की भर्ती विज्ञापन के आधार पर बेरोजगारों ने आवेदन किया और टीर्इटी मेरिट से चयन होना तय हूआ तो बीच में सरकार
इसके चयन का आधार बदलने व चयन का आधार न बदल पाने पर विज्ञापन को निरस्‍त कराना चाहती है। जबकि मीडिया की खबरों के अनुसार बडी तत्‍पर्य है। यही राजनीति आज भारतीय शिक्षा को गर्त में ले गया है। अगर अब भी सरकार चेती नहीं तो आरटीई अपने लक्ष्‍य को पाने में भटक जाएगा और युवाओं को ठगा जा रहा है। बेरोजगारी भत्‍ते में कई नियम चुनाव जीतने के बाद बताएं गए चुनाव के समय अगर बताते तो युवा अपने विवेक का जरूर प्रयोग करते। बहरहाल हमारी राजनीति भी बडे बडे वादे और सपनों का सौदा करने लगी और हमारा वोट मांगने के लिए मल्‍टीनेशनल कंपनी की तरह अपने उत्‍पाद को बढा चढाकर बेचते है और उपभक्‍ताओं को खरीदने के बाद उस मानलुभावन वादें वाले विज्ञापन पर खींज होती हैं बिल्‍कुल इसी तरह आज बेरोजगार युवा अपनी गलती पर मध्‍यवती चुनाव की ओर देख रहा है कि अब सबक सीखाने की बारी हमारी है। अपनी टिप्‍पणी दें।