शनिवार, 16 नवंबर 2013

हुकूमत की धूप


किताबों में कैद गुजरा वक्त
बेइंतहा ले रहा है।
कुछ कतरन यूं
हवा से बातें कर रहें
बीतने से पहले पढ़ा देना चाहते हैं
हवा को भी मेरे खिलाफ बहका देना चाहते
इस मिट्टी की मिठास
पानी के साथ
मेरी खुशबू बता देना चाहती है।
बे परवाह है इस हुकूमत की धूप
अमीरों के घर पनाह लेती है।
झोपड़ी का चिराग
खेतों तक रौशनी फैला देती है
भटके भ्रमजाल में राहगीर
रास्तें में संभाल लेती है।
रौशनी अंधेरे को चीरती
बगावत की लौ जला देती है।

अभिषेक कांत पाण्डेय

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

झोपड़ी

झोपड़ी

कहां है घर
किस नगर में है
यह घर कहां
महल की रोशनी
आबाद है।
घर
यहां है
घर नहीं
महलों में सने
खून की बूंदें।
हर ईंट में
झोपड़ी की मेंहनत।
बीमार झोपड़ी
बीमार सरकारी अस्पताल
बीमार है तंत्र
झोपड़ी में खाना
झोपड़ी की आवाज
नहीं सुनी
सुनसान झोपड़ी पड़ी
अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।

झोपड़ी

झोपड़ी

कहां है घर
किस नगर में है
यह घर कहां
महल की रोशनी
आबाद है।
घर
यहां है
घर नहीं
महलों में सने
खून की बूंदें।
हर ईंट में
झोपड़ी की मेंहनत।
बीमार झोपड़ी
बीमार सरकारी अस्पताल
बीमार है तंत्र
झोपड़ी में खाना
झोपड़ी की आवाज
नहीं सुनी
सुनसान झोपड़ी पड़ी
अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

तू दीप बन




तिमिर घना 
बन दीप 


ज्ज्वल सा मन
मन का दीप।
सोच नया
सच नया
माटी के दीप।
चहू प्रकाश बन
धन से मन से
तू देश बन
चमक मन
धरा का कर्ज
तू दीप बन
प्रकाश बन
बिन सूरज के चमक
चांद से भी धवल 
तू बन 
बन तू शिक्षा का दीप
फैला उजाला 
ज्ञान बन तू
दीप बन 
भविष्य बन हर जीवन का।

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

सपनों से सोना खोजा जा रहा है। सरकार के नुमाईंदे भी सपने के आधार पर खजाना पाने की सोच रहे वाकय यह सब इंडिया में ही हो सकता है। साधू के सपने के आधार पर पुरातत्व विभाग ने जांच की तो पाया की वहां अचुम्बकीय को धातु है शायद सोना ही हो, ऐसी पुरातत्विक खनन कई बार पुरातत्व विभाग ने की है लेकिन इतनी पब्लिसिटी शायद ही मिली है। मीडिया कहती है कि सपने के आधार पर मंत्री का बयान के कारण ही अचंभे वाली बात को कवरेज दिया जा रहा है तो पुरातत्व विभाग जांच के बाद किसी तरह की धातु होने के कारण खुदाई कर रही है सपने के कारण नहीं। बात तो हम लोगों को समझ में आ रही है कि किस तरह अंधविश्वास को दूर करने के लिए सरकार करोड़ों रूपये की योजना चलाती हैं और शिक्षा विज्ञान की जागरूकता का कार्यक्रम चलाती है जबकि सरकार यहां पर स्वयं अंधविश्वास फैला रही है। सब कहीं धर्म की तरफ ध्यान हटाकर वोट बैंक की राजनीति तो उत्तर प्रदेश में तो नहीं हो रही है। हमारे आस्था और धर्म के साथ कई कथित संत वैसे भी खेल चुके हैं और सभी पार्टियां धर्म के नाम पर फिर हमें गुमराह कर रहे है। पश्चिम हम पर हंस रहा है और हमारा विज्ञान,अध्यात्म और संस्कृति का मजाक बन रहा है। ये इंडिया है। यहां कुछ भी अचंभा हो सकता है।

मेरी नींद और मेरा सपना किसने छीना

मेरी नींद और मेरा सपना किसने छीना
दो साल से लंबित टीईटी के अंक से भर्ती प्रक्रिया को लेकर नाटक ही नाटक हो रहा है। मामला कोर्ट में लेकिन सुनवाई अभी तक अंजाम में नहीं पहुंची है। लगता है जब तक फैसला आएगा तब तक एक पीढ़ी बीत चुकी होगी और देर से मिला न्याय यह होगा कि इन्हें पेंशन दे दी जाए क्योंकि इनकी तो अब रिटायरमेंट की उम्र हो गई है। 50 साल तक में तो न्याय मिल ही जाएगा क्यों भाई मैंने सही कहा ना,,,,कल मैंने सपने में देखा था जांच करा लिजिए बात बिल्कुल सही होगी सपने में एक संत ने भी यही देखा और मुझसे बताया था। यह इंडिया है यहां हकीकत रूपी गरीबी बेरोजगारी और स्विस बैंक में दबा हमारा सोना लाने की बात कोई मंत्री सरकार नहीं कहती है। सपने के बात पर सब कुछ हो जाता है। वाह भाई क्या बात है अब मैं उन लोगों को क्या बताउं जो मम्मी कहने पर इंडिया के भूख का एहसास होता है। आधे पेट खाकर ​जीने वाले करोड़ो भूखे भारतियों को रात में नींद नहीं आता है कितने बरोजगारो को सरकार की गलत नीतियों से बेरोजगारी का दंश झेल रहे लोगों को नींद कहां से आएगा नहीं तो हमभी सोते होते तो बता देते इस सरकार को की मेरे सपने में इस हिंदुस्तान में अरबों करोड़ों रूपये को महाखजाना है। हम युवा  है हमारा हक हमें कब मिलेगा यह वाक्य आज भारतीय युवा 63 साल से सरकार चाला रही सभी पार्टियों से पूछा रही है जो हमें हमेशा जाति धर्म,कौम समुदाय, में बाटं कर राजनीति कर रही है। मेरी नींद और मेरा सपना किसने छीना

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिंदी दिवस की याद में व्यंग्य लेख अभिषेक कांत पाण्डेय

हिंदी दिवस की याद में                                व्यंग्य लेख  
अभिषेक कांत पाण्डेय 

हिंदी दिवस 14 सितंबर आने वाला है। कुछ पहले ही लिखने का मन कर रहा सो लिख रहा हूं। अच्छी लगे तो क्लैपिंग कर लीजिएगा। खैर बात शुरू की जाए कहां से यहीं से की भारत की राष्ट्रभाषा क्या है? सीधा जवाब हिंदी। लेकिन कैसे क्या वास्तव में हम अंग्रेजी के आगे हिंदी को संपर्क भाषा मानते हैं? क्या हिंदी सरकारी कार्यालय में खासतौर पर केंद्रीय कार्यालय में राजकाज की भाषा का दर्जा या अनिवार्यता है, नहीं क्योंकि अंग्रेजी प्रेम और हिंदी न सीखने का एक खास वर्ग द्वारा हिंदी हाशिये पर रखी जा रही है।
क्या हिंदी सचमुच में पूरे इंडिया में व्यावहारिक रूप से अपनाई जा रही है। बात फिर घूम रही है क्या हिंदी बोलकर, लिखकर, पढ़कर कम अंग्रेजी जानने वालों के बराबर पैसा कमाया जा सकता है? आप जानते हैं कि हिंदी में सिनेमा उद्योग अरबों कमा रहा है क्या वहां हिंदी की लिपी का लोप नहीं हो रहा देवनागरी गायब नहीं हो रहीं है। रोमन में स्क्रिप्ट को हिंदी बोली में बोलकर एक्टिंग करने वाले करोड़ों कमा रहे हैं जबकि हिंदी साहित्यकर्मी व लेखक अदद पुरस्कार पर ही संतोष कर रहे हैं। हिंदी का अस्तित्व इंडिया में या भारत में यह आप बताएं। फिर भी हिंदी के लिए क्या हो रहा है केवल हिंदी सप्ताह का  सरकारी कार्यालयों के मेन गेट पर बैनर टंगा देख हिंदी का एहसास हो रहा है। हिंदी प्रेमी वही है जो हिंदी में लिखते है या कहे वे केवल हिंदी में ही लिख सकते हैं और अंग्रेजी में नहीं, इसीलिए वे फटेहाल में है। हिंदी कवियों की स्थिति तो थोक में कविता लिखने की कमजोरी है शायद जिनेटिक्स हो यानी बर्बाद होने की पूरी गांरटी है।
गरीब हिंदी मीडियम में पढ़ता है जाहीर है मंहगी अंग्रेजी उसके बस की बात नहीं है तब वह गरीब ही रहेगा। क्या करेगा हिंदी, हिंदी चिल्लाएगा, कुछ हिंदी में लिखेगा सर खपाएगा और पायेगा एक ढेला भी नहीं। हां शाल मिल जाएगी जिससे वे ओढ़ भी नहीं पायेगा चाहे जितनी ठण्डी होगी। पुरस्कार में मिली है तो अलमीरा में रखी जाएगी। खिसियएगा तब जब इंटरनेट पर हिंदी में सामग्री खोजेगा,हिंदी में मानक चीजे मिलेंगी ही नहीं सर खुजलाएगा।

हिंदी केवल जानने वाले नेता हिंदी की जय में वोट बैंक ढूंढते हैं, हिंदी नहीं जानने वाले हिंदी के खिलाफ बोलते हैं। गरीब हिंदी को मजबूरी में ढोह रहा अंग्रेजी महंगी है जैसे वे चिकन बिरयानी नहीं खा सकता सो दाल चावल से काम चला रहा है। आई टाक इंगिलश आई वाक इंगलिश भाई इन सब लिखने के बाद भी मैं अब दूबारा ये गलती नहीं करूंगा, अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में ही पढ़ाउंगा, नहीं तो केवल हिंदी जानने से उनका करियर डवाडोल हो जाएगा।
हां अब तो मेरा हिंदी प्रेम भी कम होने लगा है चलों इंग्लिश वाली मैम से प्यार ही कर लूं, शायद कुछ इंग्लिश का ज्ञान इस प्रौढ़ावस्था में मिल जाए।
अब तो जबान भी लड़खडाने लगी है कहीं सर जी सारे कंट्री में इंग्लिश ही न बोली जाए। अंग्रेज भी बड़े ही चलाक चालक रहें हमारे देश में राज्य करने के लिए हिंदी सीखी लेकिन इंग्लिश में ही सारा राजकाज किया और अंग्रेजी में अंग्रेजों ने प्रापर नाऊन को हिंदी में लखनऊ को अंग्रेजी में लकनऊ कर दिया। सीधा शहर पर अंग्रेजी ने असर किया, इस तरह हमें इंग्लिश विरासत में मिली।

मानाओं साल में बावन हफ्ता हिंदी दिवस, हिंदी का कुछ नहीं होने वाला है। चिल्लाते रहो, लड़ते रहो और बोते रहो हिंदी के लिए कांटे, हमसे अच्छा चाइना है जो अपनी राष्ट्रभाषा को फेविकोल की तरह जोड़कर अपनी संस्कृति दे रहे चाइनिज समान के माध्यम से और हम उनकी अर्थव्यवस्था बढा, माफ कीजिए पता कैसे मैं अर्थव्यवस्थ टापिका पर पहुंच गया गलत है ना फिर मैंने हिंदी के साथ अन्याय कर दिया, काई बात नहीं एक सप्ताह और माना लेंगे। लम्बा चौड़ा भाषण देने के मूड में था हिंदी दिवस पर लेकिन यह हिस्सा मैं किसी नेता को देने जा रहा हूं जो अगामी हिंदी दिवस पर बोलेगा और हम मन ही मन प्रफुल्लित हो होंगे कि चलों एक हिंदी दिवस और बीत गया, हमारी हिंदी बढ़ रही है। न समझ आवा तो हिंदी में समझाई।

हमारी शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत

अभिषेक कांत पाण्डेय
हमारी शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत                     


जकल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इधर कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर तेजी से प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं जहीर है कि हिंदी मीडियम स्कूल में शिक्षा का गिरता स्तर इसके लिए जिम्मेदार है वहीं सरकार की ढुलमुल नीति इसके लिए सबसे अधिक दोषी है।

हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बाढ़ है। कुछ गिनती के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी सभी स्कूल में आंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले ऐसे छात्र कक्षा आठ तक उनका ज्ञान सीमित ही रह जाता है कारण, अंग्रेजी माध्यम की किताबें स्व:अध्ययन में बाधा उत्पन्न करती है। रिसर्च भी बताते हैं कि प्राईमरी स्तर में अपनी मातृभाषा में पढ़ने से बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं। यही कारण है कि हिंदी भाषा या जिनकी मातृभाषा है वह अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले में तेजी से अपने वातारण से सीखते हैं इसमें सहायक उनकी मातृभाषा के शब्द होते हैं जो उनके शुरूआती दौर में सीखने की क्षमता में तेजी से विकास करता है। यहां इस बात का  अफसोस है कि भारत में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण प्राईमरी स्तर में बच्चों को आंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दी जाने का चलन जोरों पर है जिस कारण से बच्चे ट्रासंलेशन पद्धति में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

त्तर के दशक में मातृभाषा में शिक्षा देने वाले शुदृध देशी स्कूलों ने होनहार प्रतिभाएं दी। आजकल तो पब्लिक स्कूल की अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा की तकनीक हिंदी—अंग्रेजी खिचड़ी ज्ञान से की जा सकती है। इस तरह प्राईमरी से जूनियर स्तर तक बच्चा कन्फूजिया ज्ञान ही हासिल कर पाता है। आलम यह है कि अंग्रजी माध्यम में विज्ञान, भूगोल, इतिहास आदि के प्रश्नोत्तर को अंग्रेजी भाषा में रटने की प्रवृति ही बढ़ती है जिससे बच्चों में मैलिकता और रचनात्मकता का अभाव हो जाता है जबकि 6 से 14 साल की उम्र में ही बच्चों में रचनात्मकता का विकास होता है, यहां इनकी रचनात्मकता अंग्रेजी माध्यम की वजह से प्रश्नों के उत्तर देते समय अभिव्यक्ति सार्थक नहीं हो पाती है।

      भारतीय परिवेश में हिंदी भाषा या मातृभषा में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र ज्ञान के स्तर से अच्छे होते कारण स्पष्ट हैं कि कक्षा में रूचि पूरे मनयोग से लेते हैं और इसके बाद घर पर स्वअध्ययन में समय देते हैं। लेकिन मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों के साथ समस्या अंग्रेजी भाषा की शिक्षा में होती है जिस पर अगर ध्यान दिया जाए तो हिंदी माध्यम के छात्र अंग्रेजी के मौलिक ज्ञान को भी प्राप्त कर सकते हैं। इस दिशा पर सरकार कार्य नहीं कर रही है। अंग्रेजी स्पोकेन और उच्चारण संबधित ज्ञान के लिए विषय के रूप में अलग से अ​ब अतिरिक्त कक्षाएं नियमित चलायी जा सकती है।

भारतीय शिक्षा पद्धति संक्रमणकाल से गुजर रही है। वह दिन दूर नहीं की आने वाले समय में हम हिंगिलिश ज्ञान वाले युवा की एक नई पीढ़ी सामने आएगी जो अपनी मातृभाषा को हेय दृष्टि से देखेगी और जो समाज या देश अपनी भाषा व संस्कृति खो देगी तो इसमें काई शक नहीं है कि हम अपनी पहचान और एकता को खो बैठेंगे जो हमारे हजारों सालों की संस्कृति की देन है। भारत क्या अपनी पहचान अपनी तरह से इस विश्वपटल पर नहीं बना सकता है। निसंदेह हम युग निर्माता देश है इसके लिए हमारी सही शिक्षा नीति होनी चाहिए।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

अभिषेक कांत पाण्डेय  5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष सामग्री

                गुरू के बिन ज्ञान कहां
कोई भी व्यक्ति बिना गुरू के अधूरा है। महाभारत के युद्ध में विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया जिसके बाद अर्जुन ने सत्य का साथ दिया। इस तरह अर्जून के जीवन का अंधेरा गुरू के ज्ञान के प्रकाश से दूर हो गया और अर्जुन ने श्रीकृष्ण को गुरू के रूप में स्वीकार किया। हमारे देश की संस्कृति में गुरू और शिष्य परंपरा प्राचीनकाल से ही देखने को मिलती है।
मनुष्य को सही राह गुरू ही दिखा सकता है, बिना गुरू के ज्ञान नहीं मिलता है। आज की स्कूली पद्धति में गुरू और शिष्य परंपरा लोप होती जा रही है। विद्या अर्जन जबसे व्यावसायिक हो गई है तब से हमने अपनी संस्कृति व परंपरा को पीछे छोड़ दिया है। पश्चिमी देशों में जिस तरह से स्कूल में छात्रों के द्वारा हिंसक घटनाएं देखने को मिलती हैं और वहीं हमारे देश में भी छात्रों और गुरूओं के कथित व्यवहार हमारे समाज में स्वीकृत नहीं है। भारतीय संस्कृति और परंपरा के विरूद्ध है।
यह माना जाता है कि किसी देश का विकास उसके स्कूलों में होता है जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ सही इंसान बनने की सीख लेते हैं, लेकिन जब गुरू ही विचलित हो तो अर्जुन को ज्ञान कहा से दे सकता है। गुरू व शिष्य परंपरा में हमें ज्ञान के साथ नैतिकता, सदाचार की शिक्षा भी मिलती है। अफसोस कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में नैतिक मूल्यों का महत्व कम होता जा रहा है।

सर्वपल्ली राधाकृष्णनन जो भारतीय संस्कृति के मनीषी और  शिक्षाविद्व थे उनके जन्मदिन पर प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मानाया जाता है। हमारी वैदिक संस्कृति में शिक्षा गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार आश्रम में दी जाती थी। गुरू शिष्य को पुत्र की तरह मानता था और शिष्य अपने गुरू के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होता था। आज शिक्षक दिवस पर गुरू के सम्मान में औपचारिकताएं होती हैं।
सही मायने अगर छात्र को सही और उचित मूल्यों वाली शिक्षा बिना व्यावसायिक भाव के एक समान नजरिये से दिया जाए तो वह दिन दूर नहीं है कि हम विज्ञान और सूचना क्षेत्र प्रोफेश्नल के साथ ही एक सच्चा नागरिक और सही मायनों में सही इंसान बना सकते हैं।
हम गुरूओं की पूजा करने वाले देश के नागरिक है जो इस श्लोक से सार्थक हाता है—गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

माटी के लाल की बातें

माटी के लाल की बातें
कहां जाएं हम इस डगर में, इस शहर में सड़कें नहीं।
मंजिल है मुसाफिर भी है, वो मुस्कान नहीं।
वो यादें नहीं, वे तन्हाई नहीं,बिक गई वह मुस्कान यहीं।
न जाने मेरी वो तन्हाईयां कहां,
न जाने मेरी वो यादें कहां।
ढूंढता हूं मैं उस उजड़े रास्तों में,
धूमिल हो रही जिंदगी से पूछता हूं।
कब तू तन्हाईयों को, मेरी यादों को ढूढ़ लाएगी।
इस शहर में नहीं, इस सड़क में नहीं।
जगमाती शहर की रोशनी
मेरे इस गांव में ​कब आएगी।
गांव की सड़क से कब हम शहर की सड़कों पर जाएंगे।
हम हैं हमारे हिस्से जिंदगी, कब तक अपने स्वार्थ के लिए  कोई जिएगा।
मंजिल है मुसाफिर भी है, वो दिन हम यूं ही गुजार देंगे।
मेरा भारत है मेरा, कब हमें मिलेगा हमारे हिस्से की रोटी
कब तक कोई कागज़ के पैसों से कमाएगा रकम मोटी।
कब तक हम यूं हलों से हम जमीन पर बोते रहेंगे।
कोई और कब तक हमारी जिंदगी के हिस्से बांटते रहेंगे।
सूनी कालाई, जिसने गंवाई सीमा के पार अपने माटी के लाल।
और कब होगी दिल्ली में इस गांव की कदर।
कब तक कोयले में जलेगा हिंदुस्तान।
                                                              अभिषेक कांत पाण्डेय

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

श्री कृष्ण होने के मायने

                                                             श्री कृष्ण होने के मायने

श्री कृष्ण शब्द हमारे जन चेतना का हिस्सा है। जन्माष्टमी का त्योहार हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती है जिसमें श्रीकृष्ण ने हमारे लिए जीवन का मार्ग दिखाया।  माखन चोर श्रीकृष्ण का बाल रूप उनका नटखटपन, यशोदा माता के सामने भोलेपन से कहना-मइया मोरी मय माखन नहीं खायो। वहीं गोपियों के संग श्रीकृष्ण की रासलीला हमारे जीवन में जीवंतता का रस घोलती है। 
एक बार श्रीकृष्ण मथुरा में महल के प्रांगण में टहल रहे थे तभी उनका मित्र उद्धव उनके पास आया और बृजधाम का हाल चाल जानने के लिए श्रीकृष्ण ने पूछा। हे उद्धव! मुझे बृज के बारे में बताओं कैसा है मेरा गोकुल तुम तो वहां से लौटे हो।  यमुना के सुंदर तट के वृक्षों की ठण्डी छाया, गोपियों की कोलाहाल, सखी-बंधु कैसे है सब, उनका हाल बताओ।
उद्धव -  हे! श्रीकृष्ण जैसे ही मैंने वहां आपका संदेशा सुनाया। गोपियां बेसुध हो गईं। बृज के सभी पशु-पक्षी पेड़, खेत बस तुम्हारी ही राह तक रहे हैं। जल्दी वहां जाओ यमुना के तीर, बाल- गोपाल, सखी गोपियां सभी तुम्हारी राह तक रहे हैं। इस मथुरा में क्या रखा है। यदि तुम शीघ्र नहीं गए तो पूरा गोकुल - बृज तुम्हारे लिए अन्न- जल त्याग देगा। गोपियां तुम्हारे बिन अधूरी हैं- हे! कृष्ण सारा बृज तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा है। 
हे! श्रीकृष्ण गोपियों ने  ये लिखित संदेश तुम्हे भेजा है-(उद्धव संदेश यथा पढ़ते हैं।) प्रिय, कृष्णा, आपको कंस का संहार किये कितने दिन बीत गए, अपने देश क्यों नहीं आ रहे हो, अब कौन-सा कार्य शेष रह गया है। मुरलीधर आप तो हमारे प्राण हैं। बृज में तुम्हारे बिना हमारा शरीर बिना जीवन के नीरस है। आप अतिशीघ्र अपने बृजधाम पधारे और हमारे प्राण लौटा दें। यदि आप बृज वापस नहीं लौटे तो हम अपना प्राण त्याग देंगे।
श्रीकृष्ण- (विचलित होकर) हे! उद्धव तुम शीघ्र वापस जाओ और गोकुल - बृज की गोपियों को समझाओं की मेरी आवश्यकता इस संसार को है अभी मुझे एक बड़ा कार्य करना, सत्य की स्थापना करनी है मेरे जीवन का उद्देश्य इस धरती की रक्षा करना है। उन्हें बताओं की कृष्ण उनके मन में सच्चे प्रेम की मोती की तरह है, गोकुल व बृज के कण कण में मैं समाया हूं। कहना मैं उनमें शाशवत समाया हंू। अभी मुझे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करना है, न्याय के लिए किए जाने वाले युद्ध में मुझे मार्गदर्शक के रूप में सारथी बनना है। 
श्रीकृष्ण ने अपने लक्ष्य की पहचान पहले ही कर लिया था। गोपियों के साथ उनका जीवन बृज की भूमि में रासलीला में डूबा रहा लेकिन सत्य के लिए उन्होंने कंस के अत्याचार से मुक्ति प्रदान करने के लिए, श्रीकृष्ण ने मथुरा को अपना लक्ष्य बनाया। 
श्रीकृष्ण के जीवन को उद्देश्य सही मायने में महाभारत के युद्ध में उनकी भूमिका और बिना शस्त्र के युदध में सारथी बन भाग लिया। गीता रहस्य में जीवन सार छिपा है विचलित अर्जुन को सत्य की स्थापना के लिए युद्ध करने की प्रेरण दिया। विचलित अर्जुन ने कहा हे! कृष्ण मैं कैसे यद्ध करू, मेरे सामने मुझे शिक्षा देेने वाले गुरू द्रोणाचार्य हैं, मेरे पितामह भीष्म हैं, जिन्होंने मुझे पालापोसा इन सगे संबंधियों के विरूद्ध मैं कैसे शस्त्र उठांऊ। यह धर्म के विरूद्ध है, ये पाप है। मैं यह पाप नहीं कर सकता हूं। श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा  हे! अर्जुन तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चहिए तुम एक योद्धा हो और सच्चा योद्धा सत्य और धर्म के लिए युद्ध करता है। तुम भूल जाओ कि तुम्हारे सामने गुरू है, संगे संबधी है। सत्य यह कहता है कि जो व्यक्ति अधर्म करता है, उससे तुम्हारा कोई सबंध नहीं है, तुम केवल अपने धर्म और सत्य का पालन करों और सत्य एवं धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाओं। श्रीकृष्ण ने अपने होने का पर्याय इस श्लोक के माध्यम से बताया-
यदा  यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमर्धस्य तदात्मानं सृजाम्यहाम।।
अर्थात हे भारतवंशी! जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मंै अवतार लेता हूं।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
मैं सदा जनों का उद्धार करने लिए, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व विविधताओं से भरा है। बालपन का नटखट माखन चोर, सभी को आकर्षित करता है तो वहीं गोपियों के संग जीवन के यौवनकाल में शाश्वत प्रेम की परिभाषा देने वाले श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में सत्य की स्थापना के लिए न्याय की भूमिका दिखते हैं। जहां इस संसार मे अपने होने को प्रमाण देते हैं। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व अद्तिीय है।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मेरा शहर कूड़े में तब्दील

मेरा शहर कूड़े में तब्दील
    http://prakharchetna.blogspot.in/ इलाहाबाद। शहर सभ्यता के प्रतीक हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता शहरी थी। चारों ओर पक्की नालियां पक्के मकान, कूड़े फेंकने का उचित प्रबंध था लेकिन आज मेरा श​हर कूड़े खाने और कचरे में तब्दील हो रहा है। जगह—जगह​ बेतरकीब कूड़े का अंबार बदबू करता आपकों मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद जिले का यही हाल है जगह—जगह ​कूड़े करकट पड़ा हुआ है। लोगों की जिम्मेदारी अपने घरों को साफ रखना है यही कारण है कि पार्क, गली में वे बड़े इत्मनान के साथ कूड़ा फेंक अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। इस तरह एक अच्छे शहरी होने का धर्म निभाते हैं। हमारा घर साफ रहे भले गली मुहल्ला, कूड़े के इधर—उधर फेंकने से गंदा दिखे, कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन दिनों बारिश का मौसम है और नगर निगम की दया से पड़े कूड़े बदबू और बीमारियां बांट रहे हैं। राजापुर के पीछे ऐतिहासिक कब्रिस्तान के पास तो कूड़ा जानबूझकर डम्प किया गया। वहीं पानी टंकी से सुलेम सराय के बीच खाली पड़े जगह पर तो गड्ढे पाटने के नाम पर कूड़े की कुरबानी दी गई है। यहां से गुजरने वाला रूमाल को मुंह और नाक पर रखकर ही गुजरता है और कम से कम सांस लेने की कोशिश करता है। यही हाल कटरा, मनमोहन पार्क, अल्लापुर का है जगह जगह कूड़े के छोटे पहाड़ अपनी बदबू और सड़न से इलहाबाद से शहर होने का खिताब छीन रही है। 

    नगर निगम का कूड़े कचरे के निस्तारण की व्यवस्था ​कबिल नहीं दिख रही है। मुंडेरा सब्जी मंडी में कूड़े का ढेर दिन भर देखा जा सकता है। अगर आप के साथ कोई पहली बार इलाहाबाद घूमने आया है तो उसे इन सब जगहों से चाहे जितना बचाए शहर के हर ग​ली मुहल्ले में ऐसे बचबचाते हुए कूड़े का ढेर मिल जाएगा। ​कूड़ेदान की परंपरा जैसे समाप्त हो गई है। पालीथीन में एक दिन का कूड़ा बालर की तरह घुमा के ऐसा फेंका जाता है की सुबह—सुबह कूड़ेदान के आस—पास जैसे शहीद होकर पालीथीन छितरी बितरी पड़ी हो। 

   बहरहाल इलाबाद का केवल यह हाल नहीं है— वाराणसी, कानपुर का भी यही हाल है। कूड़े के ​सही निस्तारण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो हंसी में मत लीजिए एक दिन हम कूड़ों के शहर में बैठे होंगे और हमारी पृथ्वी नील आस्ट्राम को नीला नहीं कूड़ों का काला पहाड़ नज़र आएगा, काश हम सुधर जाएं।

बुधवार, 21 अगस्त 2013

प्याज कहे एक कहानी

प्याज कहे एक कहानी
जहां प्याज लोगों को रूला रहा है। वहीं प्याज के बढ़ते दाम से व्यापारी लाखों कमा रहे हैं। गरमियों में नासिक की प्याज की औकात थोक में 8 से 10 रूपये थी। मुनाफाखोरी और गैर तरीके से ​थोक व्यापरियों ने जमकर प्याज का स्टोर शुरू किया। इधर प्याज की कम पैदावार के साथ आयात और निर्यात की सही नीति न होने के कारण घरेलू प्याज की कीमत बढ़ना शुरू हो गया। ऐसे में व्यापारियों को जबरजस्त मुनाफा हो रहा है। जहां किसान अपनी पैदावार को पहले ही कम दामों में प्याज बेच चुके हैं ऐसे मे सारा फायदा सीधे—सीधे बड़े व्यापरियों को हो रहा है। इसी बहाने सियासत गर्म हो रहा है, प्याज कभी बीजेपी सरकार की सत्ता पल्ट दी थी आज बिल्कुल उसी तरह हाल है कांग्रेस की सरकार है और प्याज दिल्ली में 80 रूपये किलों बिक रहा है। ऐसे में प्याज में राजनीति गरम हो रही है भले आम भारतियों के थाली में प्याज गायब है। वहीं पांच रूपये में भरपेट भोजन कराने वाले नेता कुछ बोल नहीं रहे हैं।
आज तो यह है कि​ प्याज खरीदने में उपभोक्ता के आंसू निकल रहा है। प्याज आज स्टेटस सिंबल बन गया है। एक खबर के मुताबिक प्याज बेचकर एक व्यापारी ने भोपाल में कार खरीद ली है। जय हो प्याज की महिमा काश मई व जून में मुझे भी सदबुद्धि आ जाती और एक—दो बोरा प्याज खरीद लेता, इसका फायदा अब उठाता एक आध किलों प्याज आफिस ले जाता और आफर के साथ बेचता तो 40—50 रूपये का मुनाफा इस मानसून में हो जाता। रेनकोर्ट, आम्ब्रेला खरीदने में काम आता।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

आजादी में हम

आजादी के 66 साल बाद भी हम आज विकास कर रहे हैं। विकास में हम आज भी गरीबी की परिभाषा केवल जीने से भी बत्तर कर पा रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा और खराब सड़कें सबकी हालत राजनैतिक भ्रष्टाचार ने कर दी है। हम लगातार लोकतंत्र को सशक्त बना रहे हैं। 
वहीं राजनीतिक जमात आरोप—प्रत्यारोप की  ओछी राजनीति  में मशगूल है। हमारा भारत अब कुछ अमीरों के हाथों में है। गरीब केवल मतदाता है उसे सपने देखने का हक है और उनके सपनों को छिनने का हक उन लोगों का है जो सता के नशे में चूर है। इन सबके बावजूद भारत तरक्की कर रहा है।
 हम अब तरक्की के लिए छोटे राज्यों में बटने लगे है और इसमें विकास कम राजनीतिक मंशा ज्यादा है। हमारी आजादी के इतने साल के बाद भी हम भारतीय है ये हमारी पहचान होनी चाहिए लेकिन नेता अब वोट बैंक के लिए हमें जातियों में बांट चुकी है। हम धर्मों में बंट रहे है जबकि हम एक देश के निवासी है। भारतीयता ही हमारी पहचान है। 
राजनीति में जो युवा शीर्ष में है उनसे भी कुछ अलग करने की अपेक्षा  नही कर सकते हैं वे विरासत से आए हैं और पुराने विचारों से ही राजनीति करेंगे। समझिये कि विरासत की सत्ता उनके पास है और वे भी इसी तरह की राजनीति कर रहे है। जुझारू लोग निचले स्तर पर संघर्ष कर रहे है। फिल्मों में और राजनीति में परिवारवाद हावी है। बदलते भारत की तस्वीर धुंधली हो रही है। जनता की भागीदारी जब तक नहीं बढ़ेगी तब तक हम चंद नेताओं के भरोसे भारत को नहीं छोड़ सकते हैं। हमें अपने मत की ताकत दिखानी है। हमें भारत के विकास के लिए स्वंय एक या दो कार्य ऐसे करने है जो हम कर सकते हैं। इसी तरह हम सच्ची देशभक्ति कर सकते हैं। यही हमारे लिए देश के वीर सपूतों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। जय हिंद। जय भारत। 
                                          संपादक 
                                       प्रखर चेतना

रविवार, 4 अगस्त 2013

मुसीबत की चाभी सच्चा दोस्त


हमें उम्र के पड़ाव में एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो हमारे सुख दुख को समझे उसे ही दोस्त कहते हैं। श्रीकृष्ण ने ​सुदामा से अपनी मित्रता निभाई। अमीर—गरीब, जाति व धर्म के बंधन से परे है दोस्ती। इस दुनिया में भीड़ होने के बाद भी आप अकेला हैं, आपके पास सब कुछ हो रूपया—पैसा,बैंक बैलेंस, मां, बाप, पत्नी, बच्चे हैं लेकिन एक सच्चा दोस्त नहीं तो आपकी जिंदगी जिम्मेदारियों के तले खत्म पत्नी की फरमाईश और बच्चें की जिद में ही जिंदगी दफन। दोस्त तो दोस्ती सांय  पांच बजे से दुनियादारी की सीख दोस्त से मिलती है और जादूई पिटारे की तरह आपका दोस्त आपकी मुसीबत का हल भी निकाल लेता है। घर में कोई कार्यक्रम है, शादी, पार्टी, बेचारा दोस्त ही पूरी विश्वसनीयता के साथ लगा रहेगा। वहीं आपके रिश्तेदार तो बस एकही फिराक में कहीं से कमी हो और बना दे तिल का ताड़। अपना दोस्त इन सब चीज़ों से बचाता आपकी नाक भी बचा लेता है। दोस्त हर मुसीबत की चाभी है। 
दोस्त के खाल में चमचों से बचकर रहना चाहिए तिल के ताड़ पर चढ़ा देते हैं। कथाक​थित दोस्त की भूमिका में कहलाने वाले असल में ये चमचे होते हैं जो आपसे अपना उल्लू सीधा करते हैं, आजमाना हो तो अभी फोन उठाइये अपने को मुसीबत में फंसा बताइए और कहिए दोस्त जल्दी से अपनी बाइक लेकर आ जाओं जाम में फंस गया हूं कोई साधन नहीं मिल रहा है तो देखिए तो वे कितने बहाने बतायेगा, अपनी बाइक और पेट्रोल बचाने के लिए। बाइक भाई ले गया, शहर से बाहर गांव में हूं आदि इत्यादि। ये तो छोटी मुसीबत है बड़ी मुसीबत के लिए उसके पास बड़े— बहाने है। 
आप भी सोच रहे दोस्त दोस्त होता है मैं भी यही सोचता हूं और हमेशा अच्छे दोस्तों की कद्र करता हूं कभी— कभी देर रात तक दोस्त की मुसीबत में काम के लिए गया तो मां, बाप, पत्नी सभी लेक्चर देना शुरू कर देते हैं। भाई! मैं सबकी सुनता हूं करता हूं अपने दोस्त के लिए। मेरा कहना है— मित्रम् परमधनम् और श्रीकृष्ण तो सच्चे दोस्त हैं।

रविवार, 28 जुलाई 2013

संविदा शिक्षक की परेशानी और हल किस्तों में मिला

प्रखर चेतना। मध्यप्रदेश। संविदा शिक्षक की परेशानी और हल किस्तों में मिला। सरकार से उम्मीद लगाए बैठे संविदा शिक्षकों की झोली में समान कार्य के लिए समान वेतन किस्त में मिलेंगे। संविदा शिक्षक की मांग यह भी है कि नई स्थनांतरण नीति लागू होनी चाहिए लेकिन सरकार इस मसले पर कोई फैसला अभी तक नहीं लिया। मंहगाई में घर चलाना मुश्किल है। अब संविदा शिक्षक आंदोलन के मूड में है। वही मध्यप्रदेश में कई सर्वे फिर से बीजेपी को कमान संभालने वाली बता रही है। ऐसे में असंतुष्ट शिक्षक कहीं बाजी पलट न दें। सरकार को कोई ठोस कदम उठाना होगा नहीं तो परिणाम बदलते देर नहीं लगेगी। संविदा शिक्षकों का कहना है कि हम कई सालों से इंतजार कर रहे हैं ऐसे में सरकार की नीति हमारे प्रति स्पष्ट नहीं है और हम आंदोलन करने के लिए बाध्य हैं। देखा जाए तो सूबे में संविदा शिक्षक नियमित शिक्षक के बराबर कार्य करते है लेकिन वेतन व सुविधाओं के मामले में इनके सा​थ दोयम दर्जे की नीति बनाई जा रही है। ​आरटीआई कानून लागू होने के बाद शिक्षकों को वेतन भत्ते में परिवर्तन करना जरूरी है। वहीं देखा जाए तो छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, ​हरियाणा जैसे राज्यों में संवदिा के नाम पर शिक्षकों को वेतन कम दिया जाता है जिससे इन्हें घर चलाना मुश्किल होता है। कई बार यह समस्या केंद्र सरकारक के समझा उठायी गई लेकिन कोई पहल नहीं हुई। लोकसभी चुनाव होने वाले हैं और संविदा शिक्षकों की मांग तेजी पकड़ रही है। ऐसे में राज्य सरकार को कोई ठोस पहल करनी होगी।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

अभी हम तरूणाई है

अभी हम तरूणाई है
अभी मंहगाई है
अभी भ्रष्टाचार है
अभी चुनाव है
अभी वादें हैं
अभी हम खोखले नहीं
अभी हम खेल भी नहीं
अभी हम तरूणाई हैं
अभी हम कुछ नहीं
कल हम है
कल हमारा है
कल हम वोट डालेंगे
कल हम फिजा बदेलेंगे
हम लोकतंत्र बनेंगे।

चलो धरा में हरियाली रचे

चलो धरा में हरियाली रचे कविता अभिषेक कांत पाण्डेय

चलो धरा में हरियाली रचे
गगन को न्योता
पंक्षियों को बनाये देवता
संदेश दे
हरियाली की
सपने में हरा भरा
दिखे गगन से धरा
पंक्षी तू देख जंगल कितना
बता फिर लगा दूं कई वृक्ष
बैठ जाना कहीं
दु​निया तेरी भी।

पहाड़ मत हो गंभीर
धीरे बहने दे नीर
​हरियाली सौंप दूंगा
अब नहीं करना हलचल
हमने भेजा है संदेश
चिड़ियों का यह देश
मानव सीख रहा आदिमानव से
​हरी डालियों से तेरे देह से।

बुधवार, 17 जुलाई 2013

कोयल कूंकेगी अब हर डाली

कोयल कूंकेगी अब हर डाली
पतझड़ आया पेड़ों के पत्ते झड़ते
नया प्रभात, नया जीवन संचार रचते
उदास बैठे कोयल को आस
तेज पवन के झोंकों के बाद
फिर नव संचार बसेगा
वृक्ष बदलेंगे अपने गहने
फिर आएंगी जंगल की हरियाली।

नये पत्ते, नई उमंग के साथ
करेंगे वसूंधर का श्रृंगार
हवा के साथ खनक रहें सूखे पत्ते
मिल जाना चाहते हैं मिट्टी में
बनकर वो खाद
फिर बनेंगे वृक्ष की हरियाली।

जीवन चलता, बदलता हर पल
फिर नये कलेवर में नई हरियाली
पात—पात डालियों से गिर कर
अपना जीवन नेवछावर करना सीखाती
सीख यही बड़ी सबसे
जो आया जाना उसे
धरा का चक्र यही
हर पतझड़ के बाद हरियाली
कोयल कूंकेगी अब हर डाली

रविवार, 14 जुलाई 2013

संविदा शिक्षक की मांग ​समान कार्य के लिए दे समान वेतन: समान कार्य समान वेतन

संविदा शिक्षक की मांग ​समान कार्य के लिए दे समान वेतन: समान कार्य समान वेतन
अभिषेक कांत पाण्डेय। भोपाल। ​सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा कानून लागू होने के चार साल के बाद भी मध्यप्रदेश की सरकार गुणवत्ता वाली शिक्षा दे नहीं पा रही है। अभी भी शिक्षकों की भर्ती संविदा में की जाती है। शिक्षाकार्य करने वाले संविदा शिक्षकों का वेतन प्राईवेट स्कूलों से भी कम है। स्थाई नौकरी, समानकार्य, समान वेतन और सम्मान के लिए संविदा शिक्षक सड़कों पर भी उतर चुके हैं। इसके बावजूद भी संविदा शिक्षकों की सरकार नहीं सुन रही है। जबकि प्रदेश सहित सारे देश में एक से लेकर कक्षा आठ तक निशुल्क और अनिवार्य ​शिक्षा कानून लागू हो चुका है लेकिन शिक्षकों को अभी भी उचित वेतन नहीं दिया जा रहा है। संविदा शिक्षकों का कहना है​ कि कम वेतन की वजह से जीविकोपार्जन कर पाना कठिन हो रहा। सरकारी शिक्षकों के बराबर काम व योग्यता होने के बावजूद भी इन्हें कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वहीं आरटीआई लागू होने के बाद कम वेतन में शिक्षण कार्य कराना इस कानून में गुणवत्तयुक्त शिक्षा की बात बेईमानी साबित हो रही है। स्पष्ट है​ कि कम वेतन में परिवार की जिम्मेदारियों को उठाते हुए उचित शिक्षण कार्य करने में मानसिक रूप से व्यवधान पड़ता है। सरकार इनकी मजबूरियों को नहीं समझ रही है। आपकों बता दें कि प्रदेश सरकार सरकारी शिक्षकों की भर्ती संविदा पर करने की नीति बना रखी जिसमें इन्हें कम वेतन में योग्य शिक्षक प्राप्त होते हैं। जबकि इनसे कार्य नियमित शिक्षक की भांति लिया जाता है। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्र भी कम वेतन में रखे गए हैं। वहां भी वेतन बढ़ाने और स्थाई करने के लिए कई बार शिक्षा मित्र सड़कों पर उतर चुके। वहीं सरकार इन्हें वोट बैंक की तरह इस्तमाल करने हेतु बार बार उनकी मांगों को मानने के लिए केवल आश्वासन ही दे रही है।
यही हाल मध्य प्रदेश में है यहां भी संविदा शाला के नाम पर कम वेतन पर शिक्षक रखा जा रहा है जबकि कार्य और योग्यता में सरकारी शिक्षक के समान ही है। देश में आरटीआई एक्ट लागू और उचित शिक्षण कार्य के लिए शिक्षकों को समान कार्य के लिए समान वेतन देना आवश्यक है लेकिन अगर ऐसा नही होता है तो शिक्षा की गुणवत्ता से खिलावाड़ किया जा रहा है।
संविदा शिक्षक की मांग ​समान कार्य के लिए दे समान वेतन: समान कार्य समान वेतन 

शनिवार, 13 जुलाई 2013

सृजनात्मक लेखन बच्चों में आभव्यक्ति का विकास करती है। कहानी, कविता व लेख लेखन से बच्चे अपने आसपास की विषय वस्तु, घटनाक्रम व विश्लेषण की अदृभुत श्रमता का विकास करते हैं। बच्चों दृवारा लिखित कहानी, कविता व लेख आदि से उनकी समझ का विकास और दुनिया के साथ स्थानीय परिवेश को देखने की झमता की अभिवृद्धि् होती है। इस श्रृंखला में बच्चों से मौलिक लेखन के लिए प्रेरित करना और उनके लिखे लेखों को प्रकाशित कराना उनके सृजनात्मक कल्पना शक्ति को निखारना शिक्षा का एक अनिवार्य भाग है।
कक्षा 1 से लेकर 12 तक के विद्यार्थी अपनी मौलिक रचना कहानी, लेख्र, कविता,यात्रा वृतांत भ्रेजे मेल 
abhishekkantpandey@gmail.com

शनिवार, 29 जून 2013

संविद शिक्षक भर्ती में हाईकोर्ट ने दिए स्पष्ट आदेश, फिर भी अफसर कन्फ्यूज क्यों हैं

संविद शिक्षक भर्ती में हाईकोर्ट ने दिए स्पष्ट आदेश, फिर भी अफसर कन्फ्यूज क्यों हैं
अभिषेक कांत पाण्डेय/भोपाल। सभी के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा कानून के तहत 14 साल तक के बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा देना राज्य का परम कर्तव्य है। लेकिन आरटीई एक्ट का पालन राज्य सरकार करने मे लचीला रवैया अपना रहे हैं। जिसके चलते गुणवत्ता युक्त शिक्षा की बात बेईमानी साबित हो रही है।

वहीं संविदा शाला वर्ग दो में बीए में सामान्य वर्ग के उन आवेदकों को जिन्होंने बीएड में 22 अगस्त 2010 तक प्रवेश लेकर 2011 तक बीएड उतीर्ण किया है उन्हे 50 प्रतिशत की बाध्यता नहीं है क्योंकि आरटीई एक्ट पात्रता 23 अगस्त 2010 में लागू हुआ है।

इसीलिए वर्ग 3 के लिए जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले में भी 50 प्रतिशत की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया है। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले में मनीष सिंह के याचिका में हाईकोर्ट ने परास्नातक 50 प्रतिशत के आधार पर बीएड करने वाले को बीए में कोई अंकों की बध्यता नहीं है यह बात एनसीटीई के वकील में ने भी हाईकोर्ट के सामने स्वीकार किया।

लेकिन नियमों की उपापोह में संविदा शाला भर्ती में अचानक नियमों में परिवर्तन करके स्नातक में 50 प्रतशत के नियम ने हजारों योग्य उम्मीद्वारों को बाहर कर दिया जबकि ये सभी व्यापम की परीक्षा उतीर्ण की।

राजस्थान व उत्तर प्रदेश में सामान्य वर्ग के उम्मीद्वारों के लिए स्नातक में 45 प्रतिशत ही
योग्यता रखी गई है जिसमें वर्तमान भर्ती प्रक्रिया जारी है। सामान्य वर्ग को 45 प्रतिशत में और आरक्षित वर्ग ने 45 प्रतिशत से कम अंकों से बीएड की परीक्षा एनसीटीई के नियमानुसार डिग्री प्राप्त करने वाले हजारों उम्मीद्वार हैं।

वहीं केंद्रीय अध्यापक परीक्षा में भी सामान्य वर्ग के उम्मीद्वार पात्र हैं जिन्होंने बीएड प्रशिक्षण स्नातक के 45 प्रतिशत के साथ उतीर्ण किया और आरक्षित वर्ग के लिए 40 प्रतिशत है। मध्यप्रदेश में नियमों की अनदेखी हो रही है और भर्ती प्रक्रिया में ऐसे बीएड योग्ताधारी को जिन्होंने स्नातक में 50 प्रतिशत से कम अंक के साथ व्यापम की परीक्षा उतीर्ण की है उन्हें वचित किया जा रहा है।

गुरुवार, 27 जून 2013

मानव बनों

मानव बनों

हम जाग गए सवेरा हो गया
कल रात का मंजर
अभी भी है
सुनसान चीखें
बहती पानी के साथ आवाजें
जिंदा शब्द हिलना डुलना में तब्दील
गड़गड़हाट ध्यान से सुन सैलाब नहीं
अब हेलीकाप्टर
उम्मीद खोने के बाद जागने की
हालात देश में
देव भूमि से बत्तर
बच्चे ने बताया
हम कट रहे
काट रहे पेड़।

दिल्ली से
देवभूमि
लाओं उनकों
बताओ
प्र​कृति क्या है
            अभिषेक कांत पाण्डेय

संविदा शाला वर्ग 2 व 3 में 50 प्रतिशत से कम अंक वाले हजारों बेरोजगारों के साथ अन्याय हो रहा है।

संविदा शाला वर्ग 2 व 3 में 50 प्रतिशत से कम अंक वाले हजारों बेरोजगारों के साथ अन्याय हो रहा है।

अभिषेक कांत पाण्डेय/मध्य प्रदेश में व्यापम परीक्षा उतीर्ण योग्य ऐसे बेरोजगारों जिन्होंने बीए व डीएड की डिग्री एनसीटीई के नियमानुसार प्राप्त की लेकिन उन्हें नौकरी इसलिए नहीं दी जा रही है कि उनका पिछली परीक्षा स्नातक या इंटर में 50 प्रतिशत से कम अंक है। इस कारण से ऐसे हजारों योग्य उमीद्वारों को बाहर कर दिया वहीं व्यापम परीक्षा में अनुतीर्ण अतिथि शिक्षकों के हवाले माडल स्कूल सौंप दिया गया है। सरकार की अदूरदर्शिता के चलते व्यापम परीक्षा उतीर्ण बीएड व डीएड डिग्री धारक सड़कों पर आंदोलन करने के लिए बाध्य हो गये हैं। संविदा शाला वर्ग 1 व 2 हजारों सीटें रिक्त है। जबकि 14 जून 2013 को हाईकोर्ट जबलपुर का एक फैसले में 50 प्रतिशत की बाध्यता को निरस्त कर दिया गया वहीं सरकार को चार हप्ते में शीध्र भर्ती करने को आदेश भी दिया गया है। इसके बावजूद व्यापम परीक्षा में अनुतीर्ण कुछ अतिथि शिक्षक को माडल स्कूल  में पढ़ाने का दायित्व सौंपा गया है। जबकि प्रदेश में हजारों योग्या व्यापम परीक्षा उतीर्ण बीएड एवं डीएड योगयातधारी की अनदेखी की जा रही है।

व्यापम परीक्षा उमीर्ण और संविदा शाला वर्ग दो के उमीद्वार मनीष नामदेव को कहना है कि जब हमने एनसीटीई के नियमानुसार बीएड का प्रशिक्षण स्नातका में 50 प्रतिशत से कम अंक में किया और बीएड उतीर्ण के साथ व्यापम की परीक्षा उतीर्ण की है तो सरकार हमारी अनदेखी नहीं कर सकती है। अगर जल्द सरकार चेती नहीं तो हम फिर अपने हक के लिए सड़को पर उतरेंगें।

गुरुवार, 13 जून 2013

उपेछित संगम नई कविता

उपेछित संगम            नई कविता                 अभिषेक कान्त पाण्डेय 

संगम की रेती 
रेत के ऊपर गंगा 
दौड़ती, यहाँ थकती गंगा 
अभी-अभी बीता महाकुम्भ 
सब कुछ पहले जैसा 
सुनसान बेसुध।
टिमटिमाते तारें तले बहती, काली होती गंगा
बूढी होती  यमुना।

महाकुम्भ गया 
नहीं हो हल्ला 
भुला दिया गया संगम।
एक संन्यासी 
एक छप्पर बचा 
फैला मीलों तक सन्नाटा 
सिकुड़ गई संगम की चहल 
नहीं कोई  सरकारी पहल है-
चहल-पहल है-
कानों में नहीं संगम 
आस्था है 
वादे भुला दिए गए 
भूला कोई यहाँ, ढूँढ नहीं पाया 
यहाँ था कोई  महाकुम्भ।
सरपट सरपट बालू केवल 
उपेछित अगले कुम्भ  तक।
फिर जुटेगी भीड़ 
फिर होंगे वादे
विश्व में बखाना जाएगा महामेला 
अभी भी संगम की रेती में पैरों के निशान
रेलवे स्टेशन की चीखातीं सीढियाँ 
टूटे चप्पल के निशान 
हुक्मरान ढूंढ़ रहें  आयोजन का  श्रेय।

अब पर्यटक, पर्यटन और आस्था गुम 
महाकुम्भ के बाद 
यादें, यादें गायब वादे, वादे 
धसती रेतीली धरा
सिमटती प्रदूषण वाली गंगा।

आने दो फिर 
हम करेंगे अनशन 
त्यौहार की तरह हर साल 
बुलंद होगी आवाज़ 
फिर खामोशी संगम तट पर 
बस, बास डंडों, झंडों में सिमट चुका संगम 
उपेछित संगम।                                           अभिषेक कान्त पाण्डेय 

प्रेम-याद, भूल याद नई कविता

प्रेम-याद, भूल याद             नई कविता                       अभिषेक कान्त पाण्डेय 

बार-बार की आदत 
प्रेम में बदल गया 
आदत ही आदत 
कुछ पल सबकी  की नज़रों में चर्चित  मन 

 सभी की ओठों में वर्णित प्रेम की संज्ञा 
अपने दायित्त्व की इतिश्री, लो बना दिया प्रेमी जोडा 
बाज़ार में घूमो, पार्क में टहलों 
हमने तुम दोनों की आँखों में पाया अधखिला प्रेम।
हम समाज तुम्हारे मिलने की व्याख्या प्रेम में करते हैं 
अवतरित कर दिया एक नया प्रेमी युगल।

अब चेतावनी मेरी तरफ से 
तुम्हारा प्रेम, तुमहरा नहीं 
ये प्रेम बंधन है किसी का 
अब मन की बात जान 
याद  करों नदियों का लौटना 
बारिश का ऊपर जाना 
कोल्हू का बैल बन भूल जा, भूल था ।
जूठा प्रेम तेरा 
सोच समझ 
जमाना तैराता  परम्परा में 
बना देती है प्रेमी जोड़ा 
बंधन वाला प्रेम तोड़ 
बस बन जा पुरातत्व 
अब बन जा वर्तमान आदमी 
छोड़ चाँद देख रोटी  का टुकड़ा 
फूल ले बना इत्र, बाज़ार में बेच 
कमा खा, बचा काले होते चेहरे 
प्रेम याद , याद भूल 
देख सूरज, चाँद देख काम
रोटी, टुकड़ा और ज़माना 
भूला दे यादें प्रेम की।

                                         अभिषेक कान्त पाण्डेय 

बदलना जारी

 बदलना जारी        नई कविता  अभिषेक कान्त पाण्डेय 

बदलना जारी 
मोबाइल रिंगटोन आदमी 
धरती मौसम 
आकाश, सरकारी स्कूल 
कुआँ उसका कम होता पानी 
चौपाल 
फैसला 
रिश्ते 
इंजेक्शन वाली लौकी और दूध 
गरीबी गरीब 
आस्था प्रसाद 
प्रवचन भाषण 
नेता अनेता 
पत्थर गाँव का ढेला 
ओरतें  कामयाबी 
साथी एकतरफा प्यार 
भीड़ हिंसक चेहरा 
सूरज थकता नहीं 
चूसता खून 
बंजर मन 
अवसाद मन 
मधुमेह रक्तचाप 
प्रकृति प्रेम कापी पन्नों  किताबों में
स्रजन दूर 
नीली धरती नील आर्मस्ट्राम की 

रिंगटोन मोबाइल आदमी 
बदलता समाज  पार्यावरण 
                                     अभिषेक कान्त पाण्डेय 

सोमवार, 10 जून 2013

जूठे मन


कविता
जूठे  मन

कुछ हिस्सा जीवन
बदरंग आदमी
सोच
कृत्य
राजधानी
लगातार बार बार
जंगल में तब्दील
सड़क से संसद।

गलत गलत
चश्मे वाली आखों से
देसी वादे
उतरे -नहीं
हज़म सब
ख़त्म खेल।
पुराने मन में
नयापन
नहीं नहीं
भ्रम समझ
वही राजधानी
जंगल
सड़क से संसद
चेहरे मोहरे
बदरंग आदमी
बहुरे छत,
हत -प्रत
बुझा मन
वहीं चश्मे वाली नंगी ऑंखें
लुटेरा
सीधा-साधा
करोडों खाली पेट
तैरती दुगनी आंखे
उठाते इतने सिर।
कहीं अरबों की डकार
बडा  थैला
असरदार मुखिया
टाले  नहीं
हजारो घोटाले।
                           अभिषेक कान्त पाण्डेय 

रविवार, 12 मई 2013

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नये प्रयोग के रूप में मृच्छकटिकम् नाटक का सफल मंचन

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