शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

अभिषेक कांत पाण्डेय  5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष सामग्री

                गुरू के बिन ज्ञान कहां
कोई भी व्यक्ति बिना गुरू के अधूरा है। महाभारत के युद्ध में विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया जिसके बाद अर्जुन ने सत्य का साथ दिया। इस तरह अर्जून के जीवन का अंधेरा गुरू के ज्ञान के प्रकाश से दूर हो गया और अर्जुन ने श्रीकृष्ण को गुरू के रूप में स्वीकार किया। हमारे देश की संस्कृति में गुरू और शिष्य परंपरा प्राचीनकाल से ही देखने को मिलती है।
मनुष्य को सही राह गुरू ही दिखा सकता है, बिना गुरू के ज्ञान नहीं मिलता है। आज की स्कूली पद्धति में गुरू और शिष्य परंपरा लोप होती जा रही है। विद्या अर्जन जबसे व्यावसायिक हो गई है तब से हमने अपनी संस्कृति व परंपरा को पीछे छोड़ दिया है। पश्चिमी देशों में जिस तरह से स्कूल में छात्रों के द्वारा हिंसक घटनाएं देखने को मिलती हैं और वहीं हमारे देश में भी छात्रों और गुरूओं के कथित व्यवहार हमारे समाज में स्वीकृत नहीं है। भारतीय संस्कृति और परंपरा के विरूद्ध है।
यह माना जाता है कि किसी देश का विकास उसके स्कूलों में होता है जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ सही इंसान बनने की सीख लेते हैं, लेकिन जब गुरू ही विचलित हो तो अर्जुन को ज्ञान कहा से दे सकता है। गुरू व शिष्य परंपरा में हमें ज्ञान के साथ नैतिकता, सदाचार की शिक्षा भी मिलती है। अफसोस कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में नैतिक मूल्यों का महत्व कम होता जा रहा है।

सर्वपल्ली राधाकृष्णनन जो भारतीय संस्कृति के मनीषी और  शिक्षाविद्व थे उनके जन्मदिन पर प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मानाया जाता है। हमारी वैदिक संस्कृति में शिक्षा गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार आश्रम में दी जाती थी। गुरू शिष्य को पुत्र की तरह मानता था और शिष्य अपने गुरू के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होता था। आज शिक्षक दिवस पर गुरू के सम्मान में औपचारिकताएं होती हैं।
सही मायने अगर छात्र को सही और उचित मूल्यों वाली शिक्षा बिना व्यावसायिक भाव के एक समान नजरिये से दिया जाए तो वह दिन दूर नहीं है कि हम विज्ञान और सूचना क्षेत्र प्रोफेश्नल के साथ ही एक सच्चा नागरिक और सही मायनों में सही इंसान बना सकते हैं।
हम गुरूओं की पूजा करने वाले देश के नागरिक है जो इस श्लोक से सार्थक हाता है—गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

माटी के लाल की बातें

माटी के लाल की बातें
कहां जाएं हम इस डगर में, इस शहर में सड़कें नहीं।
मंजिल है मुसाफिर भी है, वो मुस्कान नहीं।
वो यादें नहीं, वे तन्हाई नहीं,बिक गई वह मुस्कान यहीं।
न जाने मेरी वो तन्हाईयां कहां,
न जाने मेरी वो यादें कहां।
ढूंढता हूं मैं उस उजड़े रास्तों में,
धूमिल हो रही जिंदगी से पूछता हूं।
कब तू तन्हाईयों को, मेरी यादों को ढूढ़ लाएगी।
इस शहर में नहीं, इस सड़क में नहीं।
जगमाती शहर की रोशनी
मेरे इस गांव में ​कब आएगी।
गांव की सड़क से कब हम शहर की सड़कों पर जाएंगे।
हम हैं हमारे हिस्से जिंदगी, कब तक अपने स्वार्थ के लिए  कोई जिएगा।
मंजिल है मुसाफिर भी है, वो दिन हम यूं ही गुजार देंगे।
मेरा भारत है मेरा, कब हमें मिलेगा हमारे हिस्से की रोटी
कब तक कोई कागज़ के पैसों से कमाएगा रकम मोटी।
कब तक हम यूं हलों से हम जमीन पर बोते रहेंगे।
कोई और कब तक हमारी जिंदगी के हिस्से बांटते रहेंगे।
सूनी कालाई, जिसने गंवाई सीमा के पार अपने माटी के लाल।
और कब होगी दिल्ली में इस गांव की कदर।
कब तक कोयले में जलेगा हिंदुस्तान।
                                                              अभिषेक कांत पाण्डेय

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

श्री कृष्ण होने के मायने

                                                             श्री कृष्ण होने के मायने

श्री कृष्ण शब्द हमारे जन चेतना का हिस्सा है। जन्माष्टमी का त्योहार हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती है जिसमें श्रीकृष्ण ने हमारे लिए जीवन का मार्ग दिखाया।  माखन चोर श्रीकृष्ण का बाल रूप उनका नटखटपन, यशोदा माता के सामने भोलेपन से कहना-मइया मोरी मय माखन नहीं खायो। वहीं गोपियों के संग श्रीकृष्ण की रासलीला हमारे जीवन में जीवंतता का रस घोलती है। 
एक बार श्रीकृष्ण मथुरा में महल के प्रांगण में टहल रहे थे तभी उनका मित्र उद्धव उनके पास आया और बृजधाम का हाल चाल जानने के लिए श्रीकृष्ण ने पूछा। हे उद्धव! मुझे बृज के बारे में बताओं कैसा है मेरा गोकुल तुम तो वहां से लौटे हो।  यमुना के सुंदर तट के वृक्षों की ठण्डी छाया, गोपियों की कोलाहाल, सखी-बंधु कैसे है सब, उनका हाल बताओ।
उद्धव -  हे! श्रीकृष्ण जैसे ही मैंने वहां आपका संदेशा सुनाया। गोपियां बेसुध हो गईं। बृज के सभी पशु-पक्षी पेड़, खेत बस तुम्हारी ही राह तक रहे हैं। जल्दी वहां जाओ यमुना के तीर, बाल- गोपाल, सखी गोपियां सभी तुम्हारी राह तक रहे हैं। इस मथुरा में क्या रखा है। यदि तुम शीघ्र नहीं गए तो पूरा गोकुल - बृज तुम्हारे लिए अन्न- जल त्याग देगा। गोपियां तुम्हारे बिन अधूरी हैं- हे! कृष्ण सारा बृज तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा है। 
हे! श्रीकृष्ण गोपियों ने  ये लिखित संदेश तुम्हे भेजा है-(उद्धव संदेश यथा पढ़ते हैं।) प्रिय, कृष्णा, आपको कंस का संहार किये कितने दिन बीत गए, अपने देश क्यों नहीं आ रहे हो, अब कौन-सा कार्य शेष रह गया है। मुरलीधर आप तो हमारे प्राण हैं। बृज में तुम्हारे बिना हमारा शरीर बिना जीवन के नीरस है। आप अतिशीघ्र अपने बृजधाम पधारे और हमारे प्राण लौटा दें। यदि आप बृज वापस नहीं लौटे तो हम अपना प्राण त्याग देंगे।
श्रीकृष्ण- (विचलित होकर) हे! उद्धव तुम शीघ्र वापस जाओ और गोकुल - बृज की गोपियों को समझाओं की मेरी आवश्यकता इस संसार को है अभी मुझे एक बड़ा कार्य करना, सत्य की स्थापना करनी है मेरे जीवन का उद्देश्य इस धरती की रक्षा करना है। उन्हें बताओं की कृष्ण उनके मन में सच्चे प्रेम की मोती की तरह है, गोकुल व बृज के कण कण में मैं समाया हूं। कहना मैं उनमें शाशवत समाया हंू। अभी मुझे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करना है, न्याय के लिए किए जाने वाले युद्ध में मुझे मार्गदर्शक के रूप में सारथी बनना है। 
श्रीकृष्ण ने अपने लक्ष्य की पहचान पहले ही कर लिया था। गोपियों के साथ उनका जीवन बृज की भूमि में रासलीला में डूबा रहा लेकिन सत्य के लिए उन्होंने कंस के अत्याचार से मुक्ति प्रदान करने के लिए, श्रीकृष्ण ने मथुरा को अपना लक्ष्य बनाया। 
श्रीकृष्ण के जीवन को उद्देश्य सही मायने में महाभारत के युद्ध में उनकी भूमिका और बिना शस्त्र के युदध में सारथी बन भाग लिया। गीता रहस्य में जीवन सार छिपा है विचलित अर्जुन को सत्य की स्थापना के लिए युद्ध करने की प्रेरण दिया। विचलित अर्जुन ने कहा हे! कृष्ण मैं कैसे यद्ध करू, मेरे सामने मुझे शिक्षा देेने वाले गुरू द्रोणाचार्य हैं, मेरे पितामह भीष्म हैं, जिन्होंने मुझे पालापोसा इन सगे संबंधियों के विरूद्ध मैं कैसे शस्त्र उठांऊ। यह धर्म के विरूद्ध है, ये पाप है। मैं यह पाप नहीं कर सकता हूं। श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा  हे! अर्जुन तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चहिए तुम एक योद्धा हो और सच्चा योद्धा सत्य और धर्म के लिए युद्ध करता है। तुम भूल जाओ कि तुम्हारे सामने गुरू है, संगे संबधी है। सत्य यह कहता है कि जो व्यक्ति अधर्म करता है, उससे तुम्हारा कोई सबंध नहीं है, तुम केवल अपने धर्म और सत्य का पालन करों और सत्य एवं धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाओं। श्रीकृष्ण ने अपने होने का पर्याय इस श्लोक के माध्यम से बताया-
यदा  यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमर्धस्य तदात्मानं सृजाम्यहाम।।
अर्थात हे भारतवंशी! जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मंै अवतार लेता हूं।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
मैं सदा जनों का उद्धार करने लिए, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व विविधताओं से भरा है। बालपन का नटखट माखन चोर, सभी को आकर्षित करता है तो वहीं गोपियों के संग जीवन के यौवनकाल में शाश्वत प्रेम की परिभाषा देने वाले श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में सत्य की स्थापना के लिए न्याय की भूमिका दिखते हैं। जहां इस संसार मे अपने होने को प्रमाण देते हैं। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व अद्तिीय है।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मेरा शहर कूड़े में तब्दील

मेरा शहर कूड़े में तब्दील
    http://prakharchetna.blogspot.in/ इलाहाबाद। शहर सभ्यता के प्रतीक हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता शहरी थी। चारों ओर पक्की नालियां पक्के मकान, कूड़े फेंकने का उचित प्रबंध था लेकिन आज मेरा श​हर कूड़े खाने और कचरे में तब्दील हो रहा है। जगह—जगह​ बेतरकीब कूड़े का अंबार बदबू करता आपकों मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद जिले का यही हाल है जगह—जगह ​कूड़े करकट पड़ा हुआ है। लोगों की जिम्मेदारी अपने घरों को साफ रखना है यही कारण है कि पार्क, गली में वे बड़े इत्मनान के साथ कूड़ा फेंक अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। इस तरह एक अच्छे शहरी होने का धर्म निभाते हैं। हमारा घर साफ रहे भले गली मुहल्ला, कूड़े के इधर—उधर फेंकने से गंदा दिखे, कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन दिनों बारिश का मौसम है और नगर निगम की दया से पड़े कूड़े बदबू और बीमारियां बांट रहे हैं। राजापुर के पीछे ऐतिहासिक कब्रिस्तान के पास तो कूड़ा जानबूझकर डम्प किया गया। वहीं पानी टंकी से सुलेम सराय के बीच खाली पड़े जगह पर तो गड्ढे पाटने के नाम पर कूड़े की कुरबानी दी गई है। यहां से गुजरने वाला रूमाल को मुंह और नाक पर रखकर ही गुजरता है और कम से कम सांस लेने की कोशिश करता है। यही हाल कटरा, मनमोहन पार्क, अल्लापुर का है जगह जगह कूड़े के छोटे पहाड़ अपनी बदबू और सड़न से इलहाबाद से शहर होने का खिताब छीन रही है। 

    नगर निगम का कूड़े कचरे के निस्तारण की व्यवस्था ​कबिल नहीं दिख रही है। मुंडेरा सब्जी मंडी में कूड़े का ढेर दिन भर देखा जा सकता है। अगर आप के साथ कोई पहली बार इलाहाबाद घूमने आया है तो उसे इन सब जगहों से चाहे जितना बचाए शहर के हर ग​ली मुहल्ले में ऐसे बचबचाते हुए कूड़े का ढेर मिल जाएगा। ​कूड़ेदान की परंपरा जैसे समाप्त हो गई है। पालीथीन में एक दिन का कूड़ा बालर की तरह घुमा के ऐसा फेंका जाता है की सुबह—सुबह कूड़ेदान के आस—पास जैसे शहीद होकर पालीथीन छितरी बितरी पड़ी हो। 

   बहरहाल इलाबाद का केवल यह हाल नहीं है— वाराणसी, कानपुर का भी यही हाल है। कूड़े के ​सही निस्तारण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो हंसी में मत लीजिए एक दिन हम कूड़ों के शहर में बैठे होंगे और हमारी पृथ्वी नील आस्ट्राम को नीला नहीं कूड़ों का काला पहाड़ नज़र आएगा, काश हम सुधर जाएं।

बुधवार, 21 अगस्त 2013

प्याज कहे एक कहानी

प्याज कहे एक कहानी
जहां प्याज लोगों को रूला रहा है। वहीं प्याज के बढ़ते दाम से व्यापारी लाखों कमा रहे हैं। गरमियों में नासिक की प्याज की औकात थोक में 8 से 10 रूपये थी। मुनाफाखोरी और गैर तरीके से ​थोक व्यापरियों ने जमकर प्याज का स्टोर शुरू किया। इधर प्याज की कम पैदावार के साथ आयात और निर्यात की सही नीति न होने के कारण घरेलू प्याज की कीमत बढ़ना शुरू हो गया। ऐसे में व्यापारियों को जबरजस्त मुनाफा हो रहा है। जहां किसान अपनी पैदावार को पहले ही कम दामों में प्याज बेच चुके हैं ऐसे मे सारा फायदा सीधे—सीधे बड़े व्यापरियों को हो रहा है। इसी बहाने सियासत गर्म हो रहा है, प्याज कभी बीजेपी सरकार की सत्ता पल्ट दी थी आज बिल्कुल उसी तरह हाल है कांग्रेस की सरकार है और प्याज दिल्ली में 80 रूपये किलों बिक रहा है। ऐसे में प्याज में राजनीति गरम हो रही है भले आम भारतियों के थाली में प्याज गायब है। वहीं पांच रूपये में भरपेट भोजन कराने वाले नेता कुछ बोल नहीं रहे हैं।
आज तो यह है कि​ प्याज खरीदने में उपभोक्ता के आंसू निकल रहा है। प्याज आज स्टेटस सिंबल बन गया है। एक खबर के मुताबिक प्याज बेचकर एक व्यापारी ने भोपाल में कार खरीद ली है। जय हो प्याज की महिमा काश मई व जून में मुझे भी सदबुद्धि आ जाती और एक—दो बोरा प्याज खरीद लेता, इसका फायदा अब उठाता एक आध किलों प्याज आफिस ले जाता और आफर के साथ बेचता तो 40—50 रूपये का मुनाफा इस मानसून में हो जाता। रेनकोर्ट, आम्ब्रेला खरीदने में काम आता।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

आजादी में हम

आजादी के 66 साल बाद भी हम आज विकास कर रहे हैं। विकास में हम आज भी गरीबी की परिभाषा केवल जीने से भी बत्तर कर पा रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा और खराब सड़कें सबकी हालत राजनैतिक भ्रष्टाचार ने कर दी है। हम लगातार लोकतंत्र को सशक्त बना रहे हैं। 
वहीं राजनीतिक जमात आरोप—प्रत्यारोप की  ओछी राजनीति  में मशगूल है। हमारा भारत अब कुछ अमीरों के हाथों में है। गरीब केवल मतदाता है उसे सपने देखने का हक है और उनके सपनों को छिनने का हक उन लोगों का है जो सता के नशे में चूर है। इन सबके बावजूद भारत तरक्की कर रहा है।
 हम अब तरक्की के लिए छोटे राज्यों में बटने लगे है और इसमें विकास कम राजनीतिक मंशा ज्यादा है। हमारी आजादी के इतने साल के बाद भी हम भारतीय है ये हमारी पहचान होनी चाहिए लेकिन नेता अब वोट बैंक के लिए हमें जातियों में बांट चुकी है। हम धर्मों में बंट रहे है जबकि हम एक देश के निवासी है। भारतीयता ही हमारी पहचान है। 
राजनीति में जो युवा शीर्ष में है उनसे भी कुछ अलग करने की अपेक्षा  नही कर सकते हैं वे विरासत से आए हैं और पुराने विचारों से ही राजनीति करेंगे। समझिये कि विरासत की सत्ता उनके पास है और वे भी इसी तरह की राजनीति कर रहे है। जुझारू लोग निचले स्तर पर संघर्ष कर रहे है। फिल्मों में और राजनीति में परिवारवाद हावी है। बदलते भारत की तस्वीर धुंधली हो रही है। जनता की भागीदारी जब तक नहीं बढ़ेगी तब तक हम चंद नेताओं के भरोसे भारत को नहीं छोड़ सकते हैं। हमें अपने मत की ताकत दिखानी है। हमें भारत के विकास के लिए स्वंय एक या दो कार्य ऐसे करने है जो हम कर सकते हैं। इसी तरह हम सच्ची देशभक्ति कर सकते हैं। यही हमारे लिए देश के वीर सपूतों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। जय हिंद। जय भारत। 
                                          संपादक 
                                       प्रखर चेतना

रविवार, 4 अगस्त 2013

मुसीबत की चाभी सच्चा दोस्त


हमें उम्र के पड़ाव में एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो हमारे सुख दुख को समझे उसे ही दोस्त कहते हैं। श्रीकृष्ण ने ​सुदामा से अपनी मित्रता निभाई। अमीर—गरीब, जाति व धर्म के बंधन से परे है दोस्ती। इस दुनिया में भीड़ होने के बाद भी आप अकेला हैं, आपके पास सब कुछ हो रूपया—पैसा,बैंक बैलेंस, मां, बाप, पत्नी, बच्चे हैं लेकिन एक सच्चा दोस्त नहीं तो आपकी जिंदगी जिम्मेदारियों के तले खत्म पत्नी की फरमाईश और बच्चें की जिद में ही जिंदगी दफन। दोस्त तो दोस्ती सांय  पांच बजे से दुनियादारी की सीख दोस्त से मिलती है और जादूई पिटारे की तरह आपका दोस्त आपकी मुसीबत का हल भी निकाल लेता है। घर में कोई कार्यक्रम है, शादी, पार्टी, बेचारा दोस्त ही पूरी विश्वसनीयता के साथ लगा रहेगा। वहीं आपके रिश्तेदार तो बस एकही फिराक में कहीं से कमी हो और बना दे तिल का ताड़। अपना दोस्त इन सब चीज़ों से बचाता आपकी नाक भी बचा लेता है। दोस्त हर मुसीबत की चाभी है। 
दोस्त के खाल में चमचों से बचकर रहना चाहिए तिल के ताड़ पर चढ़ा देते हैं। कथाक​थित दोस्त की भूमिका में कहलाने वाले असल में ये चमचे होते हैं जो आपसे अपना उल्लू सीधा करते हैं, आजमाना हो तो अभी फोन उठाइये अपने को मुसीबत में फंसा बताइए और कहिए दोस्त जल्दी से अपनी बाइक लेकर आ जाओं जाम में फंस गया हूं कोई साधन नहीं मिल रहा है तो देखिए तो वे कितने बहाने बतायेगा, अपनी बाइक और पेट्रोल बचाने के लिए। बाइक भाई ले गया, शहर से बाहर गांव में हूं आदि इत्यादि। ये तो छोटी मुसीबत है बड़ी मुसीबत के लिए उसके पास बड़े— बहाने है। 
आप भी सोच रहे दोस्त दोस्त होता है मैं भी यही सोचता हूं और हमेशा अच्छे दोस्तों की कद्र करता हूं कभी— कभी देर रात तक दोस्त की मुसीबत में काम के लिए गया तो मां, बाप, पत्नी सभी लेक्चर देना शुरू कर देते हैं। भाई! मैं सबकी सुनता हूं करता हूं अपने दोस्त के लिए। मेरा कहना है— मित्रम् परमधनम् और श्रीकृष्ण तो सच्चे दोस्त हैं।

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