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हुकूमत की धूप

किताबों में कैद गुजरा वक्त
बेइंतहा ले रहा है।
कुछ कतरन यूं
हवा से बातें कर रहें
बीतने से पहले पढ़ा देना चाहते हैं
हवा को भी मेरे खिलाफ बहका देना चाहते
इस मिट्टी की मिठास
पानी के साथ
मेरी खुशबू बता देना चाहती है।
बे परवाह है इस हुकूमत की धूप
अमीरों के घर पनाह लेती है।
झोपड़ी का चिराग
खेतों तक रौशनी फैला देती है
भटके भ्रमजाल में राहगीर
रास्तें में संभाल लेती है।
रौशनी अंधेरे को चीरती
बगावत की लौ जला देती है।

अभिषेक कांत पाण्डेय

झोपड़ी

झोपड़ी

कहां है घर
किस नगर में है
यह घर कहां
महल की रोशनी
आबाद है।
घर
यहां है
घर नहीं
महलों में सने
खून की बूंदें।
हर ईंट में
झोपड़ी की मेंहनत।
बीमार झोपड़ी
बीमार सरकारी अस्पताल
बीमार है तंत्र
झोपड़ी में खाना
झोपड़ी की आवाज
नहीं सुनी
सुनसान झोपड़ी पड़ी
अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।

झोपड़ी

झोपड़ी

कहां है घर
किस नगर में है
यह घर कहां
महल की रोशनी
आबाद है।
घर
यहां है
घर नहीं
महलों में सने
खून की बूंदें।
हर ईंट में
झोपड़ी की मेंहनत।
बीमार झोपड़ी
बीमार सरकारी अस्पताल
बीमार है तंत्र
झोपड़ी में खाना
झोपड़ी की आवाज
नहीं सुनी
सुनसान झोपड़ी पड़ी
अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।