शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014


अभिषेक कांत पांडेय
हम पिजड़ों में 
हम सब ने एक नेता चुन लिया।
उसने कहा उड़ चलो।
ये बहेलिया की चाल है,
ये जाल लेकर एकता शक्ति है।
हम सब चल दिये नेता के साथ
नई आजादी की तरफ
हम उड़ रहें जाल के साथ।
आजादी और नेता दोनों पर विश्वास
हम पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास
अब तक बहेलिया दिखा नहीं,
अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया
एक अजीब आवाज-
कई बहेलिये सामने खड़े थे
नेता उड़ने के लिए तैयार
बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट
एक सहमति थी ।
हम एक कुटिल चाल के शिकार
नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था
बहेलिया एक कुशल शिकारी निकला
सारे के सारे कबूतर पिजड़े में,
अब हम सब अकेले।
इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किस्मत लिए
किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक।
फिर कोई नेता और बहेलिया हमें
पहुंचा देगा पिजड़ों में।

 यथार्थ
वह दीवारों से निकल गई
विचारों से लड़ रही
सही मायने में
मकानों को घरों में तब्दील कर रही
यर्थाथ है उसका जीवन
चूल्हों पर लिपी आंसू नहीं
उर्ज़ा है अणु परमाणु की
आसमान में बादलों की नीर नहीं
 केंद्र बिदु है
समाज की नजरें
लटकती लाशें
उस हुक्मरान के खिलाफ
उसके दो टूक खामोशी
उन हिसक मादक चेहरों के खिलाफ
चेतावनी।
प्रकृति के आंचल में
बैठी उस नारी में
लज्जा की शीतलता है
वात्सल्यता की रोशनी समेटे
हर एक सवाल पुरुष के खिलाफ
पूछ उठती है
सभ्यता के इस मोड़ पर
उसकी आंखे पूछती एक सवाल
हम है इस दुनिया के आधे के हकदार।

 संगम पर हम

संगम की रेती
रेत के ऊपर गंगा
दौड़ती, यहाँ थकती गंगा
अभी-अभी बीता महाकुम्भ
सब कुछ पहले जैसा
सुनसान बेसुध।
टिमटिमाते तारें तले बहती, काली होती गंगा
बूढी होती यमुना।
महाकुम्भ गया
नहीं हो हल्ला
भुला दिया गया संगम।
एक संन्यासी
एक छप्पर बचा
फैला मीलों तक सन्नाटा


सिकुड़ गई संगम की चहल
नहीं कोई सरकारी पहल है-
चहल-पहल है-
कानों में नहीं संगम
आस्था है
वादे भुला दिए गए
भूला कोई यहाँ, ढूँढ नहीं पाया
यहाँ था कोई महाकुम्भ।
सरपट सरपट बालू केवल
उपेछित अगले कुम्भ तक।
फिर जुटेगी भीड़
फिर होंगे वादे
विश्व में बखाना जाएगा महामेला
अभी भी संगम की रेती में पैरों के निशान
रेलवे स्टेशन की चीखातीं सीढियाँ
टूटे चप्पल के निशान
हुक्मरान ढूंढ़ रहें आयोजन का श्रेय।
अब पर्यटक, पर्यटन और आस्था गुम
महाकुम्भ के बाद
यादें, यादें, गायब वादे, वादे
धसती रेतीली धरा
सिमटती प्रदूषण वाली गंगा।
 आने दो फिर
हम करेंगे अनशन
त्यौहार की तरह हर साल
बुलंद होगी आवाज
फिर खामोशी संगम तट पर
बस, बास डंडों, झंडों में सिमट चुका संगम।

बदलना जारी
बदलना जारी
मोबाइल रिगटोन आदमी
धरती मौसम
आकाश, सरकारी स्कूल
कुंआ उसका कम होता पानी
चैपाल
फैसला
रिश्ते
इंजेक्शन वाली लौकी और दूध
गरीबी गरीब
आस्था प्रसाद
प्रवचन भाषण
नेता अनेता
पत्थर गाँव का ढेला
ओरतें कामयाबी
साथी एकतरफा प्यार
भीड़ हिसक चेहरा
सूरज थकता नहीं
चूसता खून
बंजर मन
अवसाद मन
मधुमेह रक्तचाप
प्रकृति प्रेम कापी,पन्नों, किताबों में
नीली धरती नील आर्मस्ट्राम की
रिगटोन मोबाइल आदमी
बदलता समाज पार्यावरण।

प्रेम-याद, भूल याद
बार-बार की आदत
प्रेम में बदल गया
आदत ही आदत
कुछ पल सबकी की नजरों में चर्चित मन
 सभी की ओठों में वर्णित प्रेम की संज्ञा।
अपने दायित्व की इतिश्री, लो बना दिया प्रेमी जोड़ा
बाजार में घूमो, पार्क में टहलों
हमने तुम दोनों की आँखों में पाया अधखिला प्रेम।
हम समाज तुम्हारे मिलने की व्याख्या प्रेम में करते हैं
अवतरित कर दिया एक नया प्रेमी युगल।
 अब चेतावनी मेरी तरफ से
तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा नहीं
ये प्रेम बंधन है किसी का
अब मन की बात जान
याद करो नदियों का लौटना
बारिश का ऊपर जाना
कोल्हू का बैल बन भूल जा, भूल था ।
जूठा प्रेम तेरा
सोच समझ
जमाना तैराता परंपरााओं में
बना देती है प्रेमी जोड़ा
बंधन वाला प्रेम तोड़
बस बन जा पुरातत्व
अब बन जा वर्तमान आदमी
छोड़ चाँद देख रोटी का टुकड़ा
फूल ले बना इत्र, बाजार में बेच
कमा खा, बचा काले होते चेहरे
प्रेम याद, याद भूल
देख सूरज, चाँद देख काम
रोटी, टुकड़ा और जमाना
भूला दे यादें प्रेम की।

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी और मलाला पर सवाल क्यों?

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी और मलाला पर सवाल क्यों?
अभिषेक कांत पाण्डेय
नोबेल पुरस्कार और फिर इसमें राजनीति यह सब बातें इन दिनों चर्चा में है। देखा जाए तो विष्व के इतिहास में दूसरे विष्व युद्ध के बाद दुनिया का चेहरा बदला है। आज तकनीकी के इस युग में हम विकास के साथ अषांति की ओर भी बढ़ रहे हंै। विष्व के कई देष तरक्की कर रहे, तो वहीं अषांति चाहने वाले आज भी मध्ययुगीन समाज की बर्बबरता को आतंकवाद और नष्लवाद के रूप में इस धरती पर जहर का बीज बो रहे हैं। एषिया में बढ़ रहे आतंकवाद के कारण शांति भंग हो रही है। ऐसे में शंाति के लिए दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कार को राजनीति के चष्में से देखना ठीक नहीं है। बहुत से लोग विष्व शांति के लिए आगे बढ़ रहे हैं। पाकिस्तान की मलाला यूसूफजई को उसके साहस और तालिबानी सोच के खिलाफ उसके आवाज को विष्व में सराहा गया है, ऐसे में मलाला यूसुफजई को दिया गया ष्शांति का नोबेल पुरस्कार की वह सही हकदार भी है। वहीं भारत के कैलाष सत्यार्थी को बेसहारा और गरीब बच्चों को षिक्षा और उनका हक दिलाने के लिए नोबेल का पुरस्कार दिया गया है। संयुक्त रूप से मिला यह नोबेल पुरस्कार में भारत और पाकिस्तानी नागरिक के विष्व में शांति अमन के उनके काम के लिए दिया गया है, जबकि पुरस्कारों की राजनीति में कई अलग निहितार्थ खोज जा रहे हैं। जाहिर है विष्व में आज दो समस्या विकाराल रूप ले रहा  है- विष्व आतंकवाद और बच्चों पर हो रहे अमानवीय अत्याचार। ऐसे में हम विष्व की भावी पीढ़ी इन बच्चों को अगर उनका हक नहीं दिला पाएंगे तो निष्चित ही यह सभ्य समाज विष्व आषांति की ओर बढ़ता जाएगा। ग्यारह वर्षीय मलाला यूसुफजई विष्व के उन बच्चों के लिए आईकान है जो किन्हीं कारण से अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते हैं। आधुनिक युग में षिक्षा के माध्यम से हम आतंकवाद और नष्लवाद के खिलाफ जीत हासिल कर सकते हैं। इसके लिए हमें विष्व के सभी बच्चों को षिक्षा आधिकार दिलाना जरूरी है। भारत और पाकिस्तान जैसे देष में आज भी सरकारी स्कूल की स्थिति चिंताजनक है। षिक्षा देने के मामले में लड़का और लड़की में भेद किया जाता है। यह सोच खतरनाक है। मलाला एक लड़की है और उस जैसी सभी लड़कियों को तालिबान ने स्कूल न जाने की हिदायद दी लेकिन मालाला फिर भी डरने वाली नहीं थी, वह पढ़ना चाहती थी, उसे सिखाया गया कि तालीम से ही दुनिया में अमन आ सकता है। आखिरकार उसने तालिबानी सोच का षिकार होना पड़ा। इन सबके बावजूद मलाला ने हार नहीं मानी अपनी पढ़ाई जारी रखी। जाहिर है कि विष्व में इन दिनों बच्चों पर अत्याचार की घटना बढ़ी है, ऐसे में पाकिस्तान की मलाला युसूफजई और भारत के कैलाष सत्यार्थी को अगर नोबेल पुरस्कार दिया जाता है, तो इसे राजनीति के चष्में से देखना उचित नहीं है। यह भी सही है कि नोबेल का शांति पुरस्कार देने में कई हस्तियों को अनदेखा भी किया गया है लेकिन इसका कतई ये मतलब नहीं है कि कैलाष सत्यार्थी और यूसुफजई मलाला इस योग्य नहीं है। देखा जाए तो यह एक ऐसे सोच के खिलाफ लड़ाई है, कुछ असमाजिक संगठन पूरे विष्व में बच्चों के षिक्षा अधिकार से वंचित कर शांति अमन के खिलाफ काम कर रहे हंै।
 भारत में षिक्षा आधिकार कानून लागू होने के बाद भी बाल मजदूरी और षिक्षा की दोहरी नीति जैसी समस्याओं पर सरकार केवल खानापूर्ति कर रही हैं। भारत विष्व के महाषक्ति केंद्र की तौर पर उभर रहा है तो वहीं पाकिस्तान तालिबानी सोच और आंतकवादी पनाह स्थल के तौर पर विष्व में अशांति फैलाने वाले देष के रूप में दुनिया के मानचित्र में सामने आ रहा है, ऐसे में तालिबानी सोच के खिलाफ वहा जन्मी एक बच्ची मलाला ने अपनी हक की लड़ाई रही है जो यह बताता है कि पाकिस्तान के नागरिक शांति व अमन चाहते हैं।
 भारत की आधी से ज्यादा आबादी षिक्षा, स्वास्थ, भोजन और जल जैसे मूलभूत आवष्यकता से महरूम है। वहीं लड़कियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। महिलाओं के साथ बढ़़ते आपराध पर यहां पर बयानबाजी कर सरकारें अपने दायित्व से बचना चाहती हंै। भारत में भी खाप पंचायतों जैसे कुछ चेहरे हैं जो तालिबानी सोच को उजागर करते हंै। जातिवाद के तिकड़म जाल में  आज भी दलितों के साथ दुव्र्यवहार की घटना आम है। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले खुद सरकारी महकमों से जुड़े हैं, उत्तर प्रदेष में एक दलित षिक्षक को रात में उठाकर आइएस आधिकारी ने मुर्गा बनाया, हालांकि उस आफिसर को सरकार ने तुरंत निलंबित कर दिया। अभी हाल ही में बिहार में गरीब दलित महिलाओं को रस्सी से बांधकर बलात्कार की शर्मसार करने वाली यह घटना बताती हैं कि महिलाएं अभी भी शोषित हैं। वहीं भारत तरक्की की ओर बढ़ रहा है, दुनिया का  सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देष है, यहां के नागरिक शांति पसंद है। विष्व शांति के लिए आगे बढ़ रहे है।
कैलाष सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई ने समाज के  भयाानक चेहरे को उजागिर किया है, इस हक की लड़ाई में अपने जीवन की परवाह नहीं किया। बाल मजदूरी जैसी बुराई के खिलाफ लड़ने के कारण कई बार अविचल सत्यार्थी पर जानलेवा हमले हुए, लेकिन फिर भी वह अपने मिषन को जारी रखा, बच्चों के षिक्षा और उनके अधिकार के लिए अपना जीवन लगा दिया। वहीं मलाला ने पाकिस्तान में उस तालिबानी सोच जहां महिलओं की आजादी को पिंजड़ों में कैद की जाती है। लड़कियों के तालीम के खिलाफ ऐलान और जानलेवा हमलों के बाद यह बच्ची आज लड़कियों के तालिम के हक में इस छोटे से लगने वाले लेकिन प्रभावी विचार के सामने विष्व में बच्चों, लड़कियों और महिलाओं के हक में हमारे समाने है।  कैलाष सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई कोई फिल्म स्टार या नेता नहीं है, ना ही किसी चर्चित व्यक्ति की संतान, ये साधारण परिवार में जन्में उस आम आदमी के प्रतीक है, जो दुनिया में हो रहे अत्याचाार के खिलाफ बिना किसी धर्म, जाति और देष की सीमाओं से आगे की सोच रखने वाले हैं। ऐसे बहुत से लोग अपने जीवन में साहस दिखाते हैं और मानवीय अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। यह हमारी विडंबना है कि मीडिया की चकाचैंध और राजनीतिक समाचार के बीच हम ऐसे लोगों को तब जानते है, जब उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिलता है। देखा जाए तो सूचना के इस युग में हम अनावष्यक सुचनाओं से घिरे हैं जबकि हकीकत यह है कि दुनिया का एक खास हिस्सा अंषाति की ओर बढ़ रहा है, एक तरह का असंतोष बढ़ रहा है, इन सबके बावजूद यह दुनिया तरक्की की ओर भी बढ़ रहा है।  हमें अपने आसपास देखे तो कई ऐसे अविचल सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई मिल जाएंगे, लेकिन हम इनके साथ खड़े होने का साहस नहीं कर पाते हैं,  साफ है कि समाज में आज भी लोग अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का साहस नहीं कर पाते हंै और साहस दिखाने वाले लोगों के साथ देने के समय घर में किसी गुंडे या माफिया के हमले की आषंका से दुबक जाते हैं। इसी सोच को बदलना है, अपनी इसी सोच को बदलने वालों के लिए कैलाष सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई एक आइकान है।

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

हम पिंजड़ों में



हम सब ने एक नेता चुन लिया
उसने कहा उड़ चलो
ये बहेलिया की चाल है
ये जाल लेकर एकता शक्ति है।
हम सब चल दिये नेता के साथ
नई आजादी की तरफ
हम उड़ रहे जाल के साथ
आजादी और नेता दोनों पर विष्वास
हम पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास
अब तक बहेलिया दिखा नहीं
अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया
एक अजीब आवाज-
कई बहेलिये सामने खड़े थे
नेता उड़ने के लिए तैयार
बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट
एक सहमति थी
हम एक कुटिल चाल के षिकार
नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था
बहेलिया एक कुषल षिकारी निकला
सारे के सारे कबूतर पिंजड़े में,
हम सब अकेले।
इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किष्मत लिए
किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक
फिर कोई नेता और बहेलिया हमें
पहुंचा देगा पिंजड़ों में।
                 अभिषेक कांत पाण्डेय

अहिंसा और सादगी


अहिंसा और सादगी

आज 2 अक्टूबर महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्म दिवस है। एक अहिंसा और दूसरे सादगी के प्रणेता। सभ्य समाज में शांति का महत्व है, यह शांति समाजिक न्याय से आती है। शांति और सादगी दोनों एक दसरे से जुड़े हैं। जीवन में सादगी की जगह अगर हम दिखावा करने पर उतारू हो जाते हैं, तब हम दूसरों की शांति भंग करना शुरू कर देते हैं। खूब बड़ा बंगला, कार, हीरे जवाहरात, रूपयों की गड्डी और इस सब पाने के लिए झूठ और भ्रष्टाचार का सहारा लेना शुरू करते हैं।  गांधी जी एवं लाल बहादुर जी का व्यक्तिव्य विशाल है, जिसमें जीवन की सादगी, दया—करूणा के साथ हर इंसान के सुख—दुख की बात करता हमारे सामने है। अफसोस तब होता है जब आज के नेता का व्यक्तिव्य केवल सुख—सुवधिा के पीछे भागता है, सेवा भाव समाप्त और उपदेश देने के लिए सबसे आगे रहते हैं, चाहे वह जिस तकिए पर सो नहीं पाते हैं वह महात्मा गांधी के चित्रांकित 500 व हजार की गड्डी वाली होती है। ऐसे में हाय कमाई करने वाले ऐसे लोग सही मायने में लोगों के हक को हड़प कर जाते है। जिस तरह से हर साल फोर्बस पत्रिका में रइसों की संपत्ति के बढ़ने से लोगों खातौर पर मध्यम वर्गीय को यह समझाया जाता है कि दुनिया में खुशहाली है बिल्कुल उसी तरह जैसे मच्छर से बचने के लिए खाली मार्टिन का पैकेट रख देना कि अब हमारा खून नहीं चूसा जाएगा। गरीब तो फोर्ब्र्स शब्द नहीं जानते और कूड़े में भी यह मैगजीन नसीब नहीं होता क्योंकि इसके पन्ने किसी मंहगे पन्ने सहेज  लिए जाते है, उन्हें हिंसा और भ्रष्टाचार वाली हिंदी खबरों की हेड लाइन वाली अखबार की काली उतरती स्याही वाली चुरमुरा या समोसे में लिपटी मिलत है, जिसे देखकर वह यही कहता है कि अखबार के पुलेंदे में लिपटी सच्चाई। सादगी और अहिंसा का व्रत धारण करने वाला व्यक्ति वहीं है आज के समय में जो लड़ न सके थप्पड़ न मार सके क्योंकि उसकी आवाज बुलंद नहीं है, गरीब है, डरा है और कम मजदूरी में जी रहा है, वहीं सादगी का पालन करता है। बाकी तो सिविल लाईंस जैसे हाई सोशायटी के बाजार में चहलकदमी में बड़ी—बडी माल वाली ईमारतें हम पर फब्तियां कसती है, आओं हम सब उसूल लेंगे तुमसे। लाईट, एसी , सफाई का सारा पैसा बस कुछ खरीद लो पर हम जैसे तो घूम आते मन बहला आते हैं लेकिन मन को टस से मस और बहकने नहीं देते है बिल्कुल ज्ञानी योगी की तरह और खाली जेब हमें यह ऊर्जा देता अपनी खाली सिक्कों वाली जेब 1999 रूपये टैग देख 99 रूपये के सिक्के वाला जेब समझ जाता है, बेटा सादगी ही जीवन है, चलों नुक्कड़ वाली दुकान और अपना प्राचीनकाल से घोषित फास्ट फूड रूपी समोसा और एक प्याली चाय की चुस्की के साथ आज के टापिक अहिंसा और सादगी पर सवाल दोस्तों के साथ शेयर करते हैं और छाप मारते है ब्लाग

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सफलता!



नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सफलता!
अभिषेक कांत पाण्डेय
न्यू इंडिया प्रहर डेस्क लखनऊ। चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी ने विकास का वायदा किया था, इस वायदे को पूरा करने और सबकों को साथ लेकर चलने की राह पर नरेंद्र मोदी का ऐजेण्डा सामने आ चुका है। एक सवाल उठता रहा कि क्या भारतीय जनता पार्टी में मुसलमानों को लेकर सोच मे बदलाव आया है कि नहीं? जब भाजपा के सांसद का लोकसभा में बयान के बाद हंगामा हुआ तब और अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले इंटर नेष्नल इंटरव्यू में अलकायदा की चिंता को खारिज कर दिया और कहा कि अगर किसी को लगता है कि उनकी धुन पर भारतीय मुस्लिम नाचेंगे तो वह भ्रम है। भारत के मुसलामान देष के लिए जीएंगे और देष के लिए मरेंगे, वे कभी भारत का बुरा नहीं चाहेंगे। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का यह इंटरव्यू खास मायने रखती है, जिस तरह से एक समय था कि अमेरिका नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। वहीं आज की परिस्थिति में विष्व के सामने नरेंद्र मोदी एक ऐसे लोकतांत्रिक देष का नेतृत्व कर रहे हैं, जहां पर हिंदू व मुस्लिम धर्म के लोग एक साथ रहते हैं। जाहिर है  कि भारत की विविधता में ही एकता है, जिस तरह से अलकायदा भारत जैसे देष में अपना असर फैलाना चाहता है, इसके लिए भारत के मुस्लमानों को भारत के खिलाफ भड़काने का नापाक इरादा जाहिर किया है। वहीं यह भी गौर करने वाली बात है कि यूपीए सरकार के लंबे अंतराल के बाद भारतीय जनता पार्टी का सत्ता में आना और नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना आतंकवाद फैलाने वाले चेहरों को रास नहीं आ रहा है। भारतीय मुस्लमानों की चिंता करने का ढोंग करने वाली अलकायदा जैसी आतंकी संगठन भारत में दहषत फैलाने का मनसूबा बना रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा का चेहरा विकास के मुद्दे पर केंद्रित किया जिसे मुस्लिम तबका ने हाथों-हाथ लिया। वहीं भाजपा की हिंदुत्व की छवि का चेहरा अब सबके विकास के एजेण्डे में तब्दील हो रहा है। नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषण में साफ-साफ कहा था कि गरीबी का कोई धर्म नहीं होता है। उन्होंने हर तबके के विकास का वायदा भी चुनाव से पहले किया, इस तरह से देखा जाए तो भारतीय राजनीति में अब तक जाति और धर्म हीे धुरी पर रही है। जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने सबके विकास की बातें कहीं, जाहिर है कि लोकसभा चुनाव के बाद यह सभी दलों को समझ में आ गया कि हिंदू, मुस्लमान में बांटकर राजनीति नहीं की जा सकती है, यह बात भाजपा के साथ ही सपा, बसपा और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को समझ में आ रही है। वहीं भाजपा के दूसरी लाईन के नेताओं का हिंदुत्ववादी विचारधारा  पर घमासान और नरेंद्र मोदी का विष्व पटल पर मुसलमानों के प्रति सकारात्मक बयान में यह संकेत छिपा है कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने जीता है, ऐसे में नरेंद्र मोदी का प्रभाव भाजपा मे ंसाफ देखा जा रहा है लेकिन भाजपा के अन्य नेतओं में हिंदुत्व छवि को भुनाने की होड़ भी लगी है इसीलिए नरेंद्र मोदी के विकास के एजेण्डे के अलावा हिंदुत्व विचारधारा की बात अलग-अलग तरीके से उपचुनाव के पहले परोसी गई, जिसका नुकसान उपचुनाव में भाजपा को उठाना पड़ा।  भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने में अभी भी हिंदुत्ववादी छवि को एक खास मतदाता वर्ग को  भुनाने की गोटी की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति उपचुनाव में मतदाताओं को खींचने में असफल प्रयोग साबित हुआ। वहीं नरेंद्र मोदी ने विष्व पटल पर मुसलमानों के प्रति सकारात्मक बयान देकर, निष्चित तौर पर नये राजनीति की तरफ संकेत यह है कि नरेंद्र मोदी सबको ले कर चलने वाली नीति में सबके विकास के हिमायती और अपने एजेण्डे को कायम रखेंगे। वहीं मुसलमानों में यह लहर साफ देखी जा सकती है, आखिर इस मुल्क के सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी चाहे जिस मजहब को मानते हो लेकिन वह सबसे पहले भारतवासी हंै। इस तरह से धर्म की राजनीति करने वाले विरोधियों को नरेंद्र मोदी ने करारा जवाब दिया है। 
वहीं उपचुनाव में भाजपा को खासी सफलता न मिलने के कई कारण हैं, उपचुनाव में नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर नहीं लड़ा गया लेकिन उपचुनाव से पहले भाजपा की एक खास रणनीति जिम्मेदार है, जिसमें हिंदुत्व के मुद्दे को उठाया गया, देखा जाए तो भाजपा का चेहरा नरेंद्र मोदी ही है लेकिन विकास के ऐजेण्डा से हटकर कोई भी प्रयोग इनके लिए घातक साबित होगा लेकिन उपचुनाव से पहले जिस तरह लव जिहाद और हिन्दुत्ववाद पर बखेड़ा खड़ा हुआ, भाजपा के  नेताओं की ओर से भुनाने की कोषिष की गई, यह कोषिष भाजपा ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को एक करने के एवज में ऐस बयान देना शुरू किया। देखा जाए तो उपचुनाव भाजपा की खराब प्रदर्षन को  नरेंद्र मोदी से जोड़ा जाना उचित नहीं है। 
वहीं  नरेंद्र मोदी और मजबूत हुए है, जापान, चीन, नेपाल व अमरीका में आर्थिक व राजनीति दृष्टि से सफलता मिली है, जिसे एक प्रधानमंत्री के रूप में शुरूआती तौर पर बड़ी उपलब्धि है। लेकिन केंद्र की राजनीति और राज्य की राजनीति में बहुत बड़ा अन्तर है। उत्तर प्रदेष में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें जीती लेकिन उपचुनाव में भाजपा में बिखराव ने यह स्थिति खड़ी कर दी है। वहीं उत्तर प्रदेष में सपा सरकार के लिए राह आसान बना दिया है। इन सबके बावजूद नरेंद्र मोदी की लोकसभा चुनाव के बाद भी लोकप्रियता बनी हुई है। इसका कारण साफ है कि जिस तरह धर्म व जाति विषेष की राजनीति को नरेंद्र मोदी ने तोड़ा है, वह काबिले तारीफ है, बषर्तें भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेतओं में आपसी समझ विकसित होनी चाहिए। हालांकि नरेंद्र मोदी को नेतृत्व की इस कसौटी में खरा उतरना है। वहीं उनके सकारात्मक बयान पर उनके पार्टी के नेताओं को भी उनके लाइन को आगे बढ़ना है। सफलता के मद में विफलता का बादल बहुत ही जल्द घेर लेती है और उपचुनाव इसी खतरे की घण्टी प्रतीत होती है। 
जम्मू कष्मीर 109 साल बाद आए भयानक बाढ़ में राहत कार्य में केंद्र सरकार की मदद ने यह साबित कर दिया की  वोट बैंक की राजनीति के चलते राज्यों के प्रति अब तक हो रही उपेक्षापूर्ण नीति का भाजपा ने बदलाव की नई परंपरा डाली है। ऐसे में नरेंद्र मोदी के प्रति भारत की जनता का विष्वास और बढ़ा है। इस विष्वास को मुस्लिम धर्म गुरूओं ने भी सकारात्मक रूप से स्वीकार  भी किया है। महंगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी नरेंद्र मोदी की रणनीति  कार्यगर साबित हो रही है। नई सरकार के आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार से विदेष नीति की सुखद  आपेक्षा पर भी वह कई मील का पत्थर साबित हुई है। अपने शपथ समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को दावत देना और उनका षिरकत करना, एक अच्छी कूटनीति साबित हुई, वहीं इसके बाद के घटनाक्रम में जिस तरह से भारत और पाकिस्तान सीमा में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद पर उनका मुखर बयान वार्ता के लिए शांति आवष्यक है, यह खबर विष्व मीडिया में हलचल पैदा कर दिया। वहीं एषिया में चीन की बढ़ता प्रभुत्व को भी नजर आंदाज नहीं किया जा सकता है, वहीं इस रणनीति में भारत की आर्थिक नीति के लिए चीन से व्यापरिक समझौते आवष्यक हैं और यह एक बड़ी उपलब्धि के मायने के तौर पर देखी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ जापान जैसे प्रभुत्व देष से भी व्यापारिक सामझौते भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे। इस तरह से देखा जाए तो नरेंद्र मोदी विदेष नीति के जरिये जापान, चीन के बाद अब अमरीका में सफलता प्राप्त की है। इस मायने में इस सरकार की लोकप्रियतता बढना लाजिमी है। विष्व के अन्य देषों में भारत की छवि नरेंद्र मोदी की सरकार के बनने के बाद उज्ज्वल हुई है। भारत हमेषा शांति प्रिय देष के रूप में जाना जाता रहा है, इसी छवि और नीति को नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़ाने का कार्य किया है। विष्व के मानचित्र में चीन और भारत दोनों महाषक्ति के रूप में उभर रहे हैं। चीन  के राष्ट्रपति जिनपिंग से नरेद्र मोदी की मुलाकात एषिया में शांति और सौहार्द के नजरिया से देखा जा सकता है। जिस तरह से गुजरात दंगे के बाद से अमरीका ने नरेद्र मादी की वीजा देन पर रोक लगा दिया था जिस पर भारत की राजनीति में खूब बवाल मचा, जिसके चलते राजनीतिक विरोधियों ने नरेंद्र मोदी का विरोध भी किया, लेकिन आज कि स्थिति में अमरीका ने नरेद्र मोदी को अमरीका मे आने का निमंत्रण दिया और उनकी कार्यप्रणाली की तारीफ भी किया। इससे जाहिर है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लोहा अमरीका भी मानता है और वह कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता है। इस सबके बीच नरेंद्र मोदी भारत की जनता से किये गए वादे को पूरा करना है, विकास के  मुद्दे के इतर पारंपरिक सोच से भाजपा को बदलाव की ओर ले जाना होगा, यह उचित समय है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में धर्म और जाति की राजनीति की जगह विकास की राजनीति का ऐजेण्डा सभी दलों में प्रमुख्य रूप से होगा, सही अर्थो में यही बदलाव ही भारत को विष्व के देषों में अग्रणी रूप से स्थापित करेगा, जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है।





शुक्रवार, 13 जून 2014

रूटीन

रूटीन
पेड़ों पर टांग दिये गये आइनें
बर्बरता की ओट में
तय नफा नुकसान के पैमाने
नापती सरकारें।
चीर प्रचीर सन्नाटा
तय है मरना
जिंदगियों के साथ।
सभ्य सभ्यता के साथ
हाथ पे हाथ रख मौन
वक्त।
पेड़ों पर बर्बता
लोकतंत्र झूलता
पंक्षी भी आवाक
नहीं सुस्ताना पेड़ों पर
संसद में चूं चूं
रूटीन क्या है
आंसुओं का सैलाब बनना
या उससे नमक बनाना
ताने बाने में मकड़जाल
कांपती जीती आधी आबादी
दर्द मध्यकाल का नहीं
आधुनिकता की चादर ओढ़े
मुंह छुपाए
रूटीन षब्द की हुंकार लिए
ये सरकारें
रूटीन
ये लालफीताषाही
रूटीन
लटकती फीतों वाली रस्सियां
पेड़ों से,
रूटीन
हम और आप।
तैयार हमें होना
रूटीन रूटीन सोच के खिलाफ।
अभिषेक कांत पाण्डेय।

हम बिजली चले जाने पर

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शुक्रवार, 23 मई 2014

सफलता माने नरेंद्र मोदी

                                  सफलता माने नरेंद्र मोदी

                                                                                                                   अभिषेक कांत पाण्डेय

चुनाव के आखिरी चरण में सभी की निगाहें वाराणसी पर लगी थी।  जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अमेठी में अपनी रैली के दौरान राहुल गांधी पर हमले किये उससे साफ जाहिर था कि नरेंद्र मोदी अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेठी के मौजूदा सांसद राहुल से जब वहीं के लोग यह सवाल पूछा कि आखिर इतने साल के बाद ही क्यों उनकी याद आई। सड़क की खराब हालत पर ग्रमीणों ने राहुल से प्रश्न  ऐन चुनाव के वक्त किया तो यह समझना बिल्कुल आसान है कि लोकतंत्र में जनता जब सवाल पूछती है तो नेता भी सोच में पड़ सकते हैं। इस तरह से देखा जाए तो
राहुल गांधी के लिए अमेठी में चुनौती बढ़ चुकी है। इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गजों के माथे पर सिकन ला दिया है। चाहे वह अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीद्वार डा0 कुमार विश्वास और भजापा के उम्मीद्वार  टीवी एक्टर से बनी नेता स्मृति ईरानी की चुनौती राहुल गांधी को मिली, वहीं आजमगढ़ में भाजपा के उम्मीदवार रामकांत यादव से मिली। किसी पार्टी के गढ़ विशेष मानी जाने वाली इन जगहों पर खास चुनौती नही होने से जिस तरह से आसानी से चुनाव जीत जाने की परंपरा कही नई बहस को जन्म नहीं देती थी लेकिन आज इन स्थानों पर स्थानीय विकास और यहां के उद्योग धंधों की बात होती नजर आ रही है।

जिस तरह से चुनाव के अंतिम चरण में नरेंद्र मोदी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और जनता को अपनी ओर खींचने के लिए उन्होंने कांग्रेस को घेरे में लिया है, ऐसे में खासतौर पर उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बसपा का सूपड़ा साफ हो गया वहीं सपा कुनबे तक ही सीमट गई।  वाराणसी में नरेंद्र मोदी के नामंकन के वक्त उमीड़ी भीड़ की परिभाषा सपा, बसपा और कांग्रेस इसे मोदी लहर नही मानने से इंकार कर रहे है, वहीं नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले कांग्रेस, सपा और बसपा की तरफ से हो रहे है जिससे नरेंद्र मोदी की हवा को जनता ने लहर में तब्दील कर दिया।  इस चुनाव में नरेंद्र मोदी बनाम सभी दल बन गया, क्रिकेट टेस्ट मैच में नरेंद्र मोदी एक तरफ और दूसरी तरफ कांग्रेस को समर्थन देने वाले सारे दल लग गए थे।

लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का हक है लेकिन जब अमर्यादित और व्यक्तिगत टिप्पणी की जाती है तब विकास के मुद्दे कहीं छोड़ने की बात कर जाति और धर्म के नाम पर बरगलाना शुरू हो जाता है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति में जिस तरह से जातिवाद और धर्म की राजनीति हावी है और उसके सहारे चुनाव के अंतिम चरण में अधिक से अधिक सीटों से जीतने की मंशा लिए बसपा, कांग्रेस और सपा मैदान में थी लेकिन ऐन वक्त में नरेंद्र मोदी ने अपने को पिछड़ा बताया और विकास के नाम पर वोटरों के हर तबके को खींचने में सफल रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सपा, बसपा और कांग्रेस को दयनीय स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया। वहीं बसपा सुप्रीमों मायावती को मैदान में उतरकर यह जवाब देना पड़ता है कि दलितों को भाजपा बरगला रही है, जाहिर है यहां मायावती को अपने वोटर फिसलते हुए नजर आया था, मायावती यह बात इस तरह समझाती नजर आती है कि भाजपा सत्ता पाने के बाद आरक्षण व्यवस्था समाप्त कर देगी, नरेंद्र मोदी ने आरक्षण और हिंदुत्व के विषय में अपनी रैलियों में नहीं बोला, जबकि गरीब तबके के साथ सबके विकास की बात कही, यहीं से नरेंद्र मोदी के प्रति झुकाव बढ़ना शुरू हुआ। केंद्र की राजनीति में नरेंद्र मोदी को एक मौका सभी ने देने के लिए अपने जाति बंधन से मुक्त होकर वोट किया। वहीं कांग्रेस संाप्रदायिकता का सवाल उठाकर अल्पसंख्यकों के वोट बटोरने की कवायद करती नजर आई। देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण और जाति के आधार पर बंटते वोटों की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश राज्य में पिछले दो दशक से कांग्रेस ओर भाजपा सत्ता से दूुर रहने का कारण भाजपा और कांग्रेस की कमजोर नीति पर ही सवाल उठाया। देखा जाए तो 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में समजावादी पार्टी ने जिस तरह से पूर्णबहुमत प्राप्त किया,  उससे साफ जाहिर है कि सपा और बसपा के पारंपरिक वोटर के स्थान पर नये युवा वोटरों ने बसपा को नकारा और कमजोर कांग्रेस और भाजपा की जगह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को थोक के भाव में वोट किया था लेकिन इस लोकसभा चुनाव में खासतौर पर उत्तर प्रदेश में युवावर्ग सपा, कांग्रेस और बसपा  से मोहभंग होता दिखा। युवा वोटर सपा के अब तक के कार्यकाल में बेरोजगारी और शासन व्यवस्था के साथ तुष्टिकरण की राजनीति से उब चुका थां, ऐसे में युवा मतदाता केंद्र की सरकार चुनने में भाजपा को विकल्प के तौर पर चुना और उसे चुनने के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती है ताकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बने, ऐसे में युवा वर्ग भजापा को स्वीकार करती नजर आ रही है। यह बात भी गौर करने वाली है कि 18 से 28 साल का युवा वह अपनी जाति और धर्म से उपर उठकर वोटिंग बूथ तक गया। आखिर इसके पीछे नरेंद्र मोदी का विकास का एजेंडा कारगर साबित हुआ है। जाहिर है कि युवा मतदाताओं  का यह झुकाव उत्तर प्रदेश में नये परिवर्तन की ओर इशारा करती है। चुनावी विश्लेषण में जातिगत बंधन को तोड़कर देखना उत्तर प्रदेश में जरूरी है। राजनीति का सुखद पहलू यह है कि जाति और धर्म से परे युवाओं की सोच विकास के तराजू पर सभी दलों को तौलकर देखा है और उससे इस बार भाजपा को मौका दिया। जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने युवाओं को आकर्षित करने के लिए अपनी रैली में विकास और रोजगार की बात की है उससे युवा वर्ग खासा उत्साहित है।

इस बार के चुनाव में इंटरनेट का प्रयोग कम दिलचस्प नहीं रहा है। फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल मीडिया साइटों पर युवाओं ने जमकर अपनी सोच शेयर की है। भाजापा ने भी युवाओं के इस मूड को पहचाना है। यह भी कहा जा सकता है कि जिस तरह से भाजापा की रणनीति सोशल मीडिया पर कामयाब होती नजर आ रही है, ऐसे में अन्य दल यह भाप ही नहीं पाए, इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा नरेंद्र मोदी जमीनी स्तर पर को मिलता दिख रहा है। देखा जाए तो चुनाव आयोग ने जिस तरह से नये मतदाताओं को आकर्षित किया और लोकतंत्र को में अपने मताधिकार का प्रयोग करने की जन जागरूकता का कार्यक्रम बढ़ाया उनमें मध्यमवर्गीय पोलिंग बूथ पर जाने लगे हैं। इसे साकरात्क देखे तो ऐसे वोटर जो राजनीति में कोई इंटेªस्ट नहीं लेता था वह भी अपने पोलिंग बूथ पर जाकर वोटिंग कर रहा है। ऐसे में इस बार वोट प्रतिशत बढ़ने का यह भी महत्वपूर्ण कारण रहा है। अगर इसे हम ऐसे समझे कि कांग्रेस के शासन के खिलाफ नरेंद्र मोदी के विकास का एजेण्डा ज्यादा कामयाब होता दिख रहा है और मतदाता घरों से निकल रहा है तब भी चाहे वह भाजपा के पक्ष में वोट पड़े या भजापा के लिए एंटी वोट पड़े, दोनों स्थिति में नरेंद्र मोदी की लहर को नकारा नहीं जा सकता है, इसमें सीधी बात है कि भाजापा के वोटर घरों से निकल रहे हैं। यह स्थिति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में देखने को मिला।

जिस तरह से माना जाता है कि भाजपा हिंदूत्वादी ऐजेंडे पर चलती है इस अक्स को इस चुनाव में नरेंद्र मोदी तोड़ते नजर आएं हालांकि फैजाबाद के चुनावी रैली में मंच पर प्रस्तावित राम मंदिर पीछे बने चित्र पर नरेंद्र मोदी ने अपने एक इंटरव्यू में इससे अंजान बने रहे हैं, जाहिर है कि नरेंद्र मोदी की ऐसे मामलों में मौन रहते है ताकि वोट बैंक फिसले नहीं और दूसरी तरफ इसका फायदा भी वोट के रूप में मिले, यह राजनीतिक मजबूरी से ज्यादा सफल रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि अन्य दल इसे भुनाकर भाजपा को ही फायदा पहुचाने की रणनीति भाजपा की सफल होती नजर आती है।

खुद को बार-बार पिछड़ी जाति का बताने की रणनीति कारगर साबित होती नजर आती है। वहीं विकास के मुद्दे से शुरू राजनीति व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के साथ बदजूबानी की राजनीति में तब्दील भी हुई लेकिन अंत आते आते जिस तरह से भाजपा की तरफ से हिंदूत्ववादी और कांग्रेस की तरफ से तु्ष्टिकरण की राजनीति का स्वर भी प्रबल हुआ। जाहिर है कि ऐन वक्त में कोई भी पार्टी हारना नहीं चाहती वहीं जहा कांग्रेस कम से कम नुकसान पर लड़ रही है तो भाजपा 272 के मिशन से चूकना नहीं चाहती है, ऐसे में जति और धर्म के आधार पर वोट को पैमाना कसना नेताओं को आसान लगता। वहीं इस बार के चुनाव में जिस तरह से मोदी लहर ने क्षेत्रीय पार्टियों को धरातल पर ला दिया और नरेंद्र मोदी की शानदार सफलता के पीछे उनका गजब का आत्मविश्वास और सभी के विकास की बात कहने वाले को भारत की जनता प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है। वहीं जाति और तुष्टिकरण की राजनीति ने  सपा, कांग्रेस, बसपा को जनता ने साफ नकार दिया है। 1991 के राजनीति के बाद यह बदलाव देश के लिए शुभ संकेत है लेकिन जनता के उम्मीदों पर नरेंद्र मोदी को खरा उतराने का इम्तिहान उनका 26 मई से शुरू हो जाएगा। एक बात साफ है कि जातिगत और धर्म की राजनीति के साथ विकास का मुद्दा भी हावी रहा है।

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?                                           

                                                                                                अभिषेक कांत पाण्डेय


लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों के बारे में बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी फेल हो गए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति में मील के पत्थर साबित हुए। जाहिर है कि केंद्र के चुनाव में सत्ता पक्ष आपने अच्छे दिनों के शासनकाल के बारे में बताकर चुनाव में उतरता है लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस राहुल गांधी के पास जनता को सपने दिखाने की कोई तस्वीर नहीं थी। यूपीए के शासनकाल में हुए घोटाला, महंगाई और भ्रष्टाचार के चेहरा जनता को याद रहा। जिस तरह से यूपीए के शासन को सपा और बसपा जैसी पार्टी समर्थन दे रही थी, उनका भी हश्र वहीं हुआ जो पूरे भारत के राज्यों में कांग्रेस का हुआ यानी दहाई का आंकड़ा भी सत्ता पक्षा नहीं छू  पाई। जनता ने नरेंद्र मोदी के विकास के माडल को स्वीकार किया, उनके भाषणों में जनता ने नये भारत के विकास की तस्वीर देखी, जाहिर है नरेंद्र मोदी की इसी स्वीकारता ने कांग्रेस, सपा और बसपा में बौखलाहट पैदा कर दी और पूरे चुनाव में नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ अन्य दल लामबद्ध हो गए। इसी के साथ सवाल जवाब और प्रत्यारोप की राजनीति के इस अवसर पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के मन में बस एकही सवाल था कि पिछले 10 साल हमने कांग्रेस का शासनकाल देखा है लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी को जीताकर देखा जाए, उम्मीद और परिवर्तन लिए मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को स्वीकार किया। लेकिन इसी के साथ जाति और धर्म की राजनीति करने वाली सपा और बसपा के लिए यह चुनाव बदलाव की तरफ इशारा कर रही है। जिस तरह से 1991 के चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व शुरू हुआ, यहां हाशिए पर चले गए पिछड़ों और दलितों को सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता लाने के लिए क्षेत्रीय दलों ने जाति फैक्टर को भुनाया लेकिन इस तरह की राजनीति का फायदा  केवल क्षत्रपों को हुआ, ऐसी पार्टियां अपने आगे किसी को उभरने का मौका नहीं दिया। बसपा नेता मायावती ने किसी दलित नेता को सैकेंड लाइन में भी नहीं रहने दिया, इससे साफ जाहिर है कि बसपा खास दलित वर्ग के स्थाई वोटरों के साथ सवर्ण जाति, मुस्लिमो और पिछड़ों के बिखरे वोटों के जरिये उत्तर प्रदेश के सत्ता पर काबिज होने की रणनीति पर ही अभी तक कायम है। सवर्णांे को गाली देकर फिर सोशल इंजिनियरिंग के बल बूते पर मुख्यमंत्री बन चुकी लेकिन उनकी इस बार की रणनीति ने उन्हें नकार दिया है, जनता ने उसे चुना है जिसने अंतिम गरीब व्यक्ति के विकास की बात की जिसमें सभी के विकास की बात जनता के सामने रखा, इस तरह से नरेंद्र मोदी ने जातिवाद के फैक्टर को प्रभावित किया। वहीं मुस्लिम और यादवों की राजनीति की पर्याय बन चुकी समजावादी पार्टी इस बार के चुनाव में अपने परिवार को ही बचा पाए, परिवारवादी पार्टी के अरोपो में हमेशा विरोधी पार्टियों के निशाने में रहने वाली सपा ने भी जाति और धर्म के फैक्टर को सर्वपरि रखा और इसी के बल पर नरेंद्र मोदी के सामने उतरे लेकिन 5 सीटों के साथ सिमटने का कारण साफ है कि मुलायम सिंह यादव ने 2012 के विधानसभा चुनाव मेें युवा मतदाता के मिले वोटों को इस लोकसभा चुनाव तक बचा नहीं पाई कारण साफ रहा कि उत्तर प्रदेश के शासनकाल में अखिलेश सरकार युवाओं को रोजगार दिलाने और उनककी अकांक्षाओं पर खड़ा नहीं उतर पाई, जिस तरह से पढ़ा लिखा नौजवानों को सरकार की तरफ से सरकारी नौकरी में रिक्तियों की भर्ती नही होना, शिक्षकों 72825 पदों के नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आदेश के बावजूद जिस तरह से लचर प्रक्रिया अपनाना, शिक्षा मित्रों को स्थाई करने के मामले में देरी वहीं योग्य युवाओं को सरकारी महकमें पदों को नहीं भरना जैसी मुद्दे भी सपा सरकार से युवाओं का मोह भंग होना स्वाभाविक था। सपा नेताओं के ऐन चुनाव के समय अपत्तिजनक बयानों ने महिला वोटरों ने भी दूरी बना ली। वहीं सपा, बसपा और कांग्रेस को मुस्लमानों के प्रति तुष्टिकरण की रणनीति ने भी हिंदू मतदाताओं को एकजूट पोलराइज किया वहीं मुस्लिम मतदाता के वोट कांग्रेस, बसपा और सपा में बिखरे हंै।

देखा जाए तो इस चुनाव में शुरू से विकास का मुद्दा छाया रहा। जब केंद्र की सरकार के गठन के लिए चुनाव हो और विकास के मुद्दा सर्वाधिक लोगों को आकर्षित करता है, नरेद्र मोदी ने गुजरात विकास की बातें अपने हर भाषण में जनता के सामने रखकर कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर दी। वहीं कांग्रेस के खेमें से राहुल गांधी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और घोटाले पर वह मौन रहे। देखा जाए तो राहुल गांधी की लड़ाई अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे थे। राहुल गांधी ने कांग्रेस को कम से कम नुकसान के लिए लड़ते हुए नजर तो वहीं नरेंद्र मोदी ने अंत में विकास के मुद्दे के साथ  प्रियंका गांधी के नीच राजनीति करने के आरोप के जवाब में नरेंद्र मोदी ने उसे जाति के राजनीति से जोड़कर कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा भी अपने हाथ में ले लिया। भारतीय जनता पार्टी ने संप्रग सरकार के नकामयाबी को निशाना बनाया जिसका जवाब राहुल गांधी के पास नहीं था वही उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को निशाने में लेते हुए बसपा पर क्षत्रप् दलित की राजनीति करने की बात नरेंद्र मोदी ने कहीं वही इसी के साथ सपा को परिवारवादी पार्टी का आरोप लगाकर सपा के वोटरों को भारत के विकास के लिए वोट करने के लिए कहा। जाहिार है इस लोकसभा चुनाव का परिणाम भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया। इस चुनाव में जाति की गणित बिगड़ गई है। लेकिन सवाल अब यह उठता है कि भाजपा को सभी जाति के वोट मिलने पर यह देखा जा रहा है कि क्या जातियगत आधार पर  राजनीति करने वालो क्षेत्रीय दलों की राजनीति खत्म हो गई। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बसपा को एक सीट भी नहीं मिली और इस बार के लोकसभा चुनाव में उसका खाता नहीं खुला तब ऐसे में मायावती के लिए चिंता का विषय की उनका मूल वोटर दलित भी उनसे दूर होता नजर आ रहा है। वहीं बिहार में यही स्थति बनी की सुशासन बाबू नीतिश कुमार का भी ऐजेंडा इस लोकसभा चुनाव में फेल हो गया। बिहार में लालू प्रसाद यादव का जाति समीकरण से कोई खासा फायदा नहीं मिला। देखा जाए तो पूरे भारत में नरेंद्र मोदी का जादू चला, सवाल यह भी है कि जब सभी के विकास की बात करते हुए नरेंद्र मोदी समाने आ रहे हैं और आने वाले समय में विकास के ऐजेण्डे पर काम करेंगे तब बसपा सपा राजद जैसी पार्टियों के लिए चुनौतियां अगले चुनाव में बढ़ जाएगी।

सोमवार, 5 मई 2014

कविता संग्रह समीक्षा- मीरखां का सजरा-श्रीरंग


कविता संग्रह समीक्षा-   मीरखां का सजरा-श्रीरंग

समकालीन हिन्दी कविता में मीरखां का सजरा श्रीरंग की ताजा कविता संग्रह
है। यह संग्रह पाठकों को आकर्षित करती हुई है।  इस संग्रह में कुल 74
कविताएं है जो नये समाज की कहानी बड़ी बारीकी से बयान करती है। श्रीरंग का
यह तीसरा कविता संग्रह है, इससे पहले यह कैसा समय और नुक्कड़ से नोमपेन्ह
कविता संग्रह प्रकशित हो चुके हैं। नये अनछुए पहलूओं को खींचती यह कविता
संग्रह वर्तमान जीवन को समझने पर मजबूर कर देती है। लोकतंत्र को सावधान
करती एक कविता में सावधान/ शाम को महराज/ एक विशाल भीड़ को सम्बोधित
करेंगे/ परिवहान आधिकारी सावधान/ नगर की सभी बसें, कारें, जीपें में
कविता का स्वर इर्द-गिर्द होने वाले भीड़-भाड़ का आरेख खीचती है। वहीं इस
संग्रह की बहुरूपिया शीर्षक कविता में बहुरूपिया के चरित्र को दर्शाती है
जहां पर ना ही उसका कोई धर्म होता है न उसकी पहचान बस चुपचाप वह बदल लेता
है आपना खेमा। देखा जाए तो श्रीरंग अपने समकालीन कवियों में नये और
ताजेपन के साथ दुनिया में हो रहे बदलाव के संदेशवाहक है पर संदेह से परे
सच की शुरूआत भी अपनी कविता के माध्यम से करते हैं। यही एक कवि का असली
पहचान है कि वह समाज के नस को पहचानता है। शासन सत्ता का सुख भोगने वाले
धर्मपुरूष, राजपुरषों की चीखों को दर्ज करती कविता शीर्षक खतरा किससे है?
सत्ता भोग की लालसा में उथल-पुथल के जाल को सत्ताधारी चींखने और उसमें खो
जाने वाले आम आदमी की चींखों के बीच उलझते जीवन को केंद्रित करती कविता
और अधिक मुखर हो उठती है।
श्रीरंग की कविताओं में रंगीन दुनिया के ब्लैक एण्ड वाइट तस्वीर को बखूबी
से उतारा गया है। नैपथ्य के पीछे का सच कौन नहीं जनाता है, क्या यह सच
मनुष्य होने का पर्याय है? ऐसे अनगिनत सवाल का जवाब ढूंढती कविता पाठकों
के साथ तटस्था समांजस्य बैठा पाने में सफल हुई है। अपने समय की विद्रूपता
और उसमें सत्ताधरी, नारी, ग्रामीण महिला, देसी औरत और शैतान के ठहाके सभी
को मंतव्य समझाया गया है। एक बात तो साफ है कि शैतान ठहाके लगा रहा है
शीर्षक कविता की चंद पंक्तियां देखिए जहां जर कुटिल बुद्धि कमयाब होता
है। वे लोग/ जिन्हें, धर्म में कतई आस्था नहीं थी? / आंख मूंदकर मानने
लगे हैं- धर्म/ पढने लगे हैं-पांच वक्त का नमाज/ वे लोग/ जिन्हें, ईश्वर
पर विश्वास नहीं था?/ जाने लगे हैं- मंदिर/ करने लगे सजदे/ जबकि शैतान
ठहाके लगा रहा है।
श्रीरंग की अधिकांश कविता नई शताब्दी को समेटे हुए है। कई ऐसे विषय हैं
जिसमें अब तक ध्यान किसी का नहीं गया है जिसमें- खटनबिनवा, अबाबील,
महाकाल, पुरखे, बम्मा, शनि की महादशा, कविता जहां उगती है, व्यवस्थ और
बच्चे, छोटी सूई बनाम बड़ी सुई, परवतिया आदि समकालीन युवा कवि का मन पडताल
करती नजर आती है। दृष्टि इन किरदारों पर जब पड़ती है तो पाठक को अपनापन का
अहसास करती हैं। वहीं इनमें मुखरता का स्वर जाना पहचाने से छिपे पहलूओं
से उजागर करती हुई नजर आती है। एक कविता रतीनाथ शीर्षक में टाईपराइटर पर/
लगतार जूझती है उंगलियां/ लेकिन हार नहीं मानता रतीनाथ- शब्द संयोजन चयन
में कवि अपने आपको चूकने नहीं देता है। चरित्रों के गढें़ उन सहज शब्दों
को ढूंढ लेना कवि की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। कहां जाए तो आगे की
कविता की दृष्टि क्या होगी? यक्ष प्रश्न यही है कि कवि इस रफ्तार भरी
जिंदगी को कितनी बारीकी से जी लेता है और फिर जीला लेता है। श्रीरंग की
कविता संग्रह मीरखां का सजरा में सजीव कविता के समरसता का हर पहलू
विधमान है।

कविता संग्रह- मीरखां का सजरा
कवि- श्रीरंग
प्रकाशक- साहित्य भण्डार, 50, चाहचन्द, इलाहाबाद-2011003 फोन-
0532-2400787, 2402072।
मूल्य- 50 रूपये।

विश्वविद्यालय की डिग्री

विश्वविद्यालय की डिग्री  
यहीं से सीखा पाया
समाज में उतरने के लिए
फैलाना था पंख
लौट के आने वाली उड़ान
भरी थी मैंने विश्वविद्यलाय की दीवारों में।
दस साल बाद
विश्वविद्यालय की सीलन भरी दीवार
सब कुछ बयान कर रही 
नहीं ठीक 
सूखे फव्वारे अब किसी को नहीं सुख देते
सलाखों में तब्दील विश्वविद्यालय।
समय बदल गया
पर मेरी डिग्री वही
याद वहीं 
इमारतों के घोसले भी गायब
पंख नहीं मार सकती चिड़िया
अजादी पैरों में नहीं
विचारों में पैदा नहीं होने दी गई।
विचरने वाले पैसों में ज्ञान को बदल रहें
दस साल का हिसाब मुझसे मांग रहा
विश्वविद्याल की इमारतें।
ंबयान कर रहा है जैसे नहीं बदला
बता रही बदल गए तुम।
मैंने कहा डिग्री सीढ़ा गई
सीलन भरी दीवार में अटकी 
फांक रही है धूले
मैंने सीख लिया है 
नया ताना बाना,
विश्वविद्यालय सीखने को नहीं 
नहीं बदलने को तैयार
मैंन भी निकाल ली अखबार की कतरने 
दिखा दिया बेरोजगार डिग्री 
गिना दिया दफन हो गई डिग्रियों के नाम 
कल आज में,
बिना डिग्री वाला नाम 
तुझ पर इतिहास बनाएगा 
तुझे नचाएगा
डिग्री वाले ताली बजाएंगे
एक अदद नौकरी के लिए। 
     अभिषेक कांत पाण्डेय

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