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May, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सफलता माने नरेंद्र मोदी

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सफलता माने नरेंद्र मोदी                                                                                                                    अभिषेक कांत पाण्डेय
चुनाव के आखिरी चरण में सभी की निगाहें वाराणसी पर लगी थी।  जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अमेठी में अपनी रैली के दौरान राहुल गांधी पर हमले किये उससे साफ जाहिर था कि नरेंद्र मोदी अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेठी के मौजूदा सांसद राहुल से जब वहीं के लोग यह सवाल पूछा कि आखिर इतने साल के बाद ही क्यों उनकी याद आई। सड़क की खराब हालत पर ग्रमीणों ने राहुल से प्रश्न  ऐन चुनाव के वक्त किया तो यह समझना बिल्कुल आसान है कि लोकतंत्र में जनता जब सवाल पूछती है तो नेता भी सोच में पड़ सकते हैं। इस तरह से देखा जाए तो राहुल गांधी के लिए अमेठी में चुनौती बढ़ चुकी है। इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गजों के माथे पर सिकन ला दिया है। चाहे वह अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीद्वार डा0 कुमार विश्वास और भजापा के उम्मीद्वार  टीवी एक्टर से बनी नेता स्मृति ईरानी की चुनौती राहुल गांधी को मिली, वहीं आजमगढ़ में भाजपा के उम्मीदवार रा…

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?

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क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?                                                                                                         अभिषेक कांत पाण्डेय
लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों के बारे में बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी फेल हो गए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति में मील के पत्थर साबित हुए। जाहिर है कि केंद्र के चुनाव में सत्ता पक्ष आपने अच्छे दिनों के शासनकाल के बारे में बताकर चुनाव में उतरता है लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस राहुल गांधी के पास जनता को सपने दिखाने की कोई तस्वीर नहीं थी। यूपीए के शासनकाल में हुए घोटाला, महंगाई और भ्रष्टाचार के चेहरा जनता को याद रहा। जिस तरह से यूपीए के शासन को सपा और बसपा जैसी पार्टी समर्थन दे रही थी, उनका भी हश्र वहीं हुआ जो पूरे भारत के राज्यों में कांग्रेस का हुआ यानी दहाई का आंकड़ा भी सत्ता पक्षा नहीं छू  पाई। जनता ने नरेंद्र मोदी के विकास के माडल को स्वीकार किया, उनके भाषणों में जनता ने नये भारत के विकास की तस्वीर देखी, जाहिर है नरेंद्र मोदी की इसी स्वीकारता ने कांग्रेस, सपा और बसपा में बौखलाहट पैदा कर दी और पूरे चुनाव में नरे…

कविता संग्रह समीक्षा- मीरखां का सजरा-श्रीरंग

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कविता संग्रह समीक्षा-   मीरखां का सजरा-श्रीरंगसमकालीन हिन्दी कविता में मीरखां का सजरा श्रीरंग की ताजा कविता संग्रह है। यह संग्रह पाठकों को आकर्षित करती हुई है।  इस संग्रह में कुल 74 कविताएं है जो नये समाज की कहानी बड़ी बारीकी से बयान करती है। श्रीरंग का यह तीसरा कविता संग्रह है, इससे पहले यह कैसा समय और नुक्कड़ से नोमपेन्ह कविता संग्रह प्रकशित हो चुके हैं। नये अनछुए पहलूओं को खींचती यह कविता संग्रह वर्तमान जीवन को समझने पर मजबूर कर देती है। लोकतंत्र को सावधान करती एक कविता में सावधान/ शाम को महराज/ एक विशाल भीड़ को सम्बोधित करेंगे/ परिवहान आधिकारी सावधान/ नगर की सभी बसें, कारें, जीपें में कविता का स्वर इर्द-गिर्द होने वाले भीड़-भाड़ का आरेख खीचती है। वहीं इस संग्रह की बहुरूपिया शीर्षक कविता में बहुरूपिया के चरित्र को दर्शाती है जहां पर ना ही उसका कोई धर्म होता है न उसकी पहचान बस चुपचाप वह बदल लेता है आपना खेमा। देखा जाए तो श्रीरंग अपने समकालीन कवियों में नये और ताजेपन के साथ दुनिया में हो रहे बदलाव के संदेशवाहक है पर संदेह से परे सच की शुरूआत भी अपनी कविता के माध्यम से करते हैं। यही एक कवि…

विश्वविद्यालय की डिग्री

विश्वविद्यालय की डिग्री   यहीं से सीखा पाया समाज में उतरने के लिए फैलाना था पंख लौट के आने वाली उड़ान भरी थी मैंने विश्वविद्यलाय की दीवारों में। दस साल बाद विश्वविद्यालय की सीलन भरी दीवार सब कुछ बयान कर रही  नहीं ठीक  सूखे फव्वारे अब किसी को नहीं सुख देते सलाखों में तब्दील विश्वविद्यालय। समय बदल गया पर मेरी डिग्री वही याद वहीं  इमारतों के घोसले भी गायब पंख नहीं मार सकती चिड़िया अजादी पैरों में नहीं विचारों में पैदा नहीं होने दी गई। विचरने वाले पैसों में ज्ञान को बदल रहें दस साल का हिसाब मुझसे मांग रहा विश्वविद्याल की इमारतें। ंबयान कर रहा है जैसे नहीं बदला बता रही बदल गए तुम। मैंने कहा डिग्री सीढ़ा गई सीलन भरी दीवार में अटकी  फांक रही है धूले मैंने सीख लिया है  नया ताना बाना, विश्वविद्यालय सीखने को नहीं  नहीं बदलने को तैयार मैंन भी निकाल ली अखबार की कतरने  दिखा दिया बेरोजगार डिग्री  गिना दिया दफन हो गई डिग्रियों के नाम  कल आज में, बिना डिग्री वाला नाम  तुझ पर इतिहास बनाएगा  तुझे नचाएगा डिग्री वाले ताली बजाएंगे एक अदद नौकरी के लिए।       अभिषेक कांत पाण्डेय