शुक्रवार, 23 मई 2014

सफलता माने नरेंद्र मोदी

                                  सफलता माने नरेंद्र मोदी

                                                                                                                   अभिषेक कांत पाण्डेय

चुनाव के आखिरी चरण में सभी की निगाहें वाराणसी पर लगी थी।  जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अमेठी में अपनी रैली के दौरान राहुल गांधी पर हमले किये उससे साफ जाहिर था कि नरेंद्र मोदी अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेठी के मौजूदा सांसद राहुल से जब वहीं के लोग यह सवाल पूछा कि आखिर इतने साल के बाद ही क्यों उनकी याद आई। सड़क की खराब हालत पर ग्रमीणों ने राहुल से प्रश्न  ऐन चुनाव के वक्त किया तो यह समझना बिल्कुल आसान है कि लोकतंत्र में जनता जब सवाल पूछती है तो नेता भी सोच में पड़ सकते हैं। इस तरह से देखा जाए तो
राहुल गांधी के लिए अमेठी में चुनौती बढ़ चुकी है। इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गजों के माथे पर सिकन ला दिया है। चाहे वह अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीद्वार डा0 कुमार विश्वास और भजापा के उम्मीद्वार  टीवी एक्टर से बनी नेता स्मृति ईरानी की चुनौती राहुल गांधी को मिली, वहीं आजमगढ़ में भाजपा के उम्मीदवार रामकांत यादव से मिली। किसी पार्टी के गढ़ विशेष मानी जाने वाली इन जगहों पर खास चुनौती नही होने से जिस तरह से आसानी से चुनाव जीत जाने की परंपरा कही नई बहस को जन्म नहीं देती थी लेकिन आज इन स्थानों पर स्थानीय विकास और यहां के उद्योग धंधों की बात होती नजर आ रही है।

जिस तरह से चुनाव के अंतिम चरण में नरेंद्र मोदी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और जनता को अपनी ओर खींचने के लिए उन्होंने कांग्रेस को घेरे में लिया है, ऐसे में खासतौर पर उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बसपा का सूपड़ा साफ हो गया वहीं सपा कुनबे तक ही सीमट गई।  वाराणसी में नरेंद्र मोदी के नामंकन के वक्त उमीड़ी भीड़ की परिभाषा सपा, बसपा और कांग्रेस इसे मोदी लहर नही मानने से इंकार कर रहे है, वहीं नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले कांग्रेस, सपा और बसपा की तरफ से हो रहे है जिससे नरेंद्र मोदी की हवा को जनता ने लहर में तब्दील कर दिया।  इस चुनाव में नरेंद्र मोदी बनाम सभी दल बन गया, क्रिकेट टेस्ट मैच में नरेंद्र मोदी एक तरफ और दूसरी तरफ कांग्रेस को समर्थन देने वाले सारे दल लग गए थे।

लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का हक है लेकिन जब अमर्यादित और व्यक्तिगत टिप्पणी की जाती है तब विकास के मुद्दे कहीं छोड़ने की बात कर जाति और धर्म के नाम पर बरगलाना शुरू हो जाता है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति में जिस तरह से जातिवाद और धर्म की राजनीति हावी है और उसके सहारे चुनाव के अंतिम चरण में अधिक से अधिक सीटों से जीतने की मंशा लिए बसपा, कांग्रेस और सपा मैदान में थी लेकिन ऐन वक्त में नरेंद्र मोदी ने अपने को पिछड़ा बताया और विकास के नाम पर वोटरों के हर तबके को खींचने में सफल रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सपा, बसपा और कांग्रेस को दयनीय स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया। वहीं बसपा सुप्रीमों मायावती को मैदान में उतरकर यह जवाब देना पड़ता है कि दलितों को भाजपा बरगला रही है, जाहिर है यहां मायावती को अपने वोटर फिसलते हुए नजर आया था, मायावती यह बात इस तरह समझाती नजर आती है कि भाजपा सत्ता पाने के बाद आरक्षण व्यवस्था समाप्त कर देगी, नरेंद्र मोदी ने आरक्षण और हिंदुत्व के विषय में अपनी रैलियों में नहीं बोला, जबकि गरीब तबके के साथ सबके विकास की बात कही, यहीं से नरेंद्र मोदी के प्रति झुकाव बढ़ना शुरू हुआ। केंद्र की राजनीति में नरेंद्र मोदी को एक मौका सभी ने देने के लिए अपने जाति बंधन से मुक्त होकर वोट किया। वहीं कांग्रेस संाप्रदायिकता का सवाल उठाकर अल्पसंख्यकों के वोट बटोरने की कवायद करती नजर आई। देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण और जाति के आधार पर बंटते वोटों की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश राज्य में पिछले दो दशक से कांग्रेस ओर भाजपा सत्ता से दूुर रहने का कारण भाजपा और कांग्रेस की कमजोर नीति पर ही सवाल उठाया। देखा जाए तो 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में समजावादी पार्टी ने जिस तरह से पूर्णबहुमत प्राप्त किया,  उससे साफ जाहिर है कि सपा और बसपा के पारंपरिक वोटर के स्थान पर नये युवा वोटरों ने बसपा को नकारा और कमजोर कांग्रेस और भाजपा की जगह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को थोक के भाव में वोट किया था लेकिन इस लोकसभा चुनाव में खासतौर पर उत्तर प्रदेश में युवावर्ग सपा, कांग्रेस और बसपा  से मोहभंग होता दिखा। युवा वोटर सपा के अब तक के कार्यकाल में बेरोजगारी और शासन व्यवस्था के साथ तुष्टिकरण की राजनीति से उब चुका थां, ऐसे में युवा मतदाता केंद्र की सरकार चुनने में भाजपा को विकल्प के तौर पर चुना और उसे चुनने के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती है ताकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बने, ऐसे में युवा वर्ग भजापा को स्वीकार करती नजर आ रही है। यह बात भी गौर करने वाली है कि 18 से 28 साल का युवा वह अपनी जाति और धर्म से उपर उठकर वोटिंग बूथ तक गया। आखिर इसके पीछे नरेंद्र मोदी का विकास का एजेंडा कारगर साबित हुआ है। जाहिर है कि युवा मतदाताओं  का यह झुकाव उत्तर प्रदेश में नये परिवर्तन की ओर इशारा करती है। चुनावी विश्लेषण में जातिगत बंधन को तोड़कर देखना उत्तर प्रदेश में जरूरी है। राजनीति का सुखद पहलू यह है कि जाति और धर्म से परे युवाओं की सोच विकास के तराजू पर सभी दलों को तौलकर देखा है और उससे इस बार भाजपा को मौका दिया। जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने युवाओं को आकर्षित करने के लिए अपनी रैली में विकास और रोजगार की बात की है उससे युवा वर्ग खासा उत्साहित है।

इस बार के चुनाव में इंटरनेट का प्रयोग कम दिलचस्प नहीं रहा है। फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल मीडिया साइटों पर युवाओं ने जमकर अपनी सोच शेयर की है। भाजापा ने भी युवाओं के इस मूड को पहचाना है। यह भी कहा जा सकता है कि जिस तरह से भाजापा की रणनीति सोशल मीडिया पर कामयाब होती नजर आ रही है, ऐसे में अन्य दल यह भाप ही नहीं पाए, इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा नरेंद्र मोदी जमीनी स्तर पर को मिलता दिख रहा है। देखा जाए तो चुनाव आयोग ने जिस तरह से नये मतदाताओं को आकर्षित किया और लोकतंत्र को में अपने मताधिकार का प्रयोग करने की जन जागरूकता का कार्यक्रम बढ़ाया उनमें मध्यमवर्गीय पोलिंग बूथ पर जाने लगे हैं। इसे साकरात्क देखे तो ऐसे वोटर जो राजनीति में कोई इंटेªस्ट नहीं लेता था वह भी अपने पोलिंग बूथ पर जाकर वोटिंग कर रहा है। ऐसे में इस बार वोट प्रतिशत बढ़ने का यह भी महत्वपूर्ण कारण रहा है। अगर इसे हम ऐसे समझे कि कांग्रेस के शासन के खिलाफ नरेंद्र मोदी के विकास का एजेण्डा ज्यादा कामयाब होता दिख रहा है और मतदाता घरों से निकल रहा है तब भी चाहे वह भाजपा के पक्ष में वोट पड़े या भजापा के लिए एंटी वोट पड़े, दोनों स्थिति में नरेंद्र मोदी की लहर को नकारा नहीं जा सकता है, इसमें सीधी बात है कि भाजापा के वोटर घरों से निकल रहे हैं। यह स्थिति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में देखने को मिला।

जिस तरह से माना जाता है कि भाजपा हिंदूत्वादी ऐजेंडे पर चलती है इस अक्स को इस चुनाव में नरेंद्र मोदी तोड़ते नजर आएं हालांकि फैजाबाद के चुनावी रैली में मंच पर प्रस्तावित राम मंदिर पीछे बने चित्र पर नरेंद्र मोदी ने अपने एक इंटरव्यू में इससे अंजान बने रहे हैं, जाहिर है कि नरेंद्र मोदी की ऐसे मामलों में मौन रहते है ताकि वोट बैंक फिसले नहीं और दूसरी तरफ इसका फायदा भी वोट के रूप में मिले, यह राजनीतिक मजबूरी से ज्यादा सफल रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि अन्य दल इसे भुनाकर भाजपा को ही फायदा पहुचाने की रणनीति भाजपा की सफल होती नजर आती है।

खुद को बार-बार पिछड़ी जाति का बताने की रणनीति कारगर साबित होती नजर आती है। वहीं विकास के मुद्दे से शुरू राजनीति व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के साथ बदजूबानी की राजनीति में तब्दील भी हुई लेकिन अंत आते आते जिस तरह से भाजपा की तरफ से हिंदूत्ववादी और कांग्रेस की तरफ से तु्ष्टिकरण की राजनीति का स्वर भी प्रबल हुआ। जाहिर है कि ऐन वक्त में कोई भी पार्टी हारना नहीं चाहती वहीं जहा कांग्रेस कम से कम नुकसान पर लड़ रही है तो भाजपा 272 के मिशन से चूकना नहीं चाहती है, ऐसे में जति और धर्म के आधार पर वोट को पैमाना कसना नेताओं को आसान लगता। वहीं इस बार के चुनाव में जिस तरह से मोदी लहर ने क्षेत्रीय पार्टियों को धरातल पर ला दिया और नरेंद्र मोदी की शानदार सफलता के पीछे उनका गजब का आत्मविश्वास और सभी के विकास की बात कहने वाले को भारत की जनता प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है। वहीं जाति और तुष्टिकरण की राजनीति ने  सपा, कांग्रेस, बसपा को जनता ने साफ नकार दिया है। 1991 के राजनीति के बाद यह बदलाव देश के लिए शुभ संकेत है लेकिन जनता के उम्मीदों पर नरेंद्र मोदी को खरा उतराने का इम्तिहान उनका 26 मई से शुरू हो जाएगा। एक बात साफ है कि जातिगत और धर्म की राजनीति के साथ विकास का मुद्दा भी हावी रहा है।

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?                                           

                                                                                                अभिषेक कांत पाण्डेय


लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों के बारे में बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी फेल हो गए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति में मील के पत्थर साबित हुए। जाहिर है कि केंद्र के चुनाव में सत्ता पक्ष आपने अच्छे दिनों के शासनकाल के बारे में बताकर चुनाव में उतरता है लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस राहुल गांधी के पास जनता को सपने दिखाने की कोई तस्वीर नहीं थी। यूपीए के शासनकाल में हुए घोटाला, महंगाई और भ्रष्टाचार के चेहरा जनता को याद रहा। जिस तरह से यूपीए के शासन को सपा और बसपा जैसी पार्टी समर्थन दे रही थी, उनका भी हश्र वहीं हुआ जो पूरे भारत के राज्यों में कांग्रेस का हुआ यानी दहाई का आंकड़ा भी सत्ता पक्षा नहीं छू  पाई। जनता ने नरेंद्र मोदी के विकास के माडल को स्वीकार किया, उनके भाषणों में जनता ने नये भारत के विकास की तस्वीर देखी, जाहिर है नरेंद्र मोदी की इसी स्वीकारता ने कांग्रेस, सपा और बसपा में बौखलाहट पैदा कर दी और पूरे चुनाव में नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ अन्य दल लामबद्ध हो गए। इसी के साथ सवाल जवाब और प्रत्यारोप की राजनीति के इस अवसर पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के मन में बस एकही सवाल था कि पिछले 10 साल हमने कांग्रेस का शासनकाल देखा है लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी को जीताकर देखा जाए, उम्मीद और परिवर्तन लिए मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को स्वीकार किया। लेकिन इसी के साथ जाति और धर्म की राजनीति करने वाली सपा और बसपा के लिए यह चुनाव बदलाव की तरफ इशारा कर रही है। जिस तरह से 1991 के चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व शुरू हुआ, यहां हाशिए पर चले गए पिछड़ों और दलितों को सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता लाने के लिए क्षेत्रीय दलों ने जाति फैक्टर को भुनाया लेकिन इस तरह की राजनीति का फायदा  केवल क्षत्रपों को हुआ, ऐसी पार्टियां अपने आगे किसी को उभरने का मौका नहीं दिया। बसपा नेता मायावती ने किसी दलित नेता को सैकेंड लाइन में भी नहीं रहने दिया, इससे साफ जाहिर है कि बसपा खास दलित वर्ग के स्थाई वोटरों के साथ सवर्ण जाति, मुस्लिमो और पिछड़ों के बिखरे वोटों के जरिये उत्तर प्रदेश के सत्ता पर काबिज होने की रणनीति पर ही अभी तक कायम है। सवर्णांे को गाली देकर फिर सोशल इंजिनियरिंग के बल बूते पर मुख्यमंत्री बन चुकी लेकिन उनकी इस बार की रणनीति ने उन्हें नकार दिया है, जनता ने उसे चुना है जिसने अंतिम गरीब व्यक्ति के विकास की बात की जिसमें सभी के विकास की बात जनता के सामने रखा, इस तरह से नरेंद्र मोदी ने जातिवाद के फैक्टर को प्रभावित किया। वहीं मुस्लिम और यादवों की राजनीति की पर्याय बन चुकी समजावादी पार्टी इस बार के चुनाव में अपने परिवार को ही बचा पाए, परिवारवादी पार्टी के अरोपो में हमेशा विरोधी पार्टियों के निशाने में रहने वाली सपा ने भी जाति और धर्म के फैक्टर को सर्वपरि रखा और इसी के बल पर नरेंद्र मोदी के सामने उतरे लेकिन 5 सीटों के साथ सिमटने का कारण साफ है कि मुलायम सिंह यादव ने 2012 के विधानसभा चुनाव मेें युवा मतदाता के मिले वोटों को इस लोकसभा चुनाव तक बचा नहीं पाई कारण साफ रहा कि उत्तर प्रदेश के शासनकाल में अखिलेश सरकार युवाओं को रोजगार दिलाने और उनककी अकांक्षाओं पर खड़ा नहीं उतर पाई, जिस तरह से पढ़ा लिखा नौजवानों को सरकार की तरफ से सरकारी नौकरी में रिक्तियों की भर्ती नही होना, शिक्षकों 72825 पदों के नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आदेश के बावजूद जिस तरह से लचर प्रक्रिया अपनाना, शिक्षा मित्रों को स्थाई करने के मामले में देरी वहीं योग्य युवाओं को सरकारी महकमें पदों को नहीं भरना जैसी मुद्दे भी सपा सरकार से युवाओं का मोह भंग होना स्वाभाविक था। सपा नेताओं के ऐन चुनाव के समय अपत्तिजनक बयानों ने महिला वोटरों ने भी दूरी बना ली। वहीं सपा, बसपा और कांग्रेस को मुस्लमानों के प्रति तुष्टिकरण की रणनीति ने भी हिंदू मतदाताओं को एकजूट पोलराइज किया वहीं मुस्लिम मतदाता के वोट कांग्रेस, बसपा और सपा में बिखरे हंै।

देखा जाए तो इस चुनाव में शुरू से विकास का मुद्दा छाया रहा। जब केंद्र की सरकार के गठन के लिए चुनाव हो और विकास के मुद्दा सर्वाधिक लोगों को आकर्षित करता है, नरेद्र मोदी ने गुजरात विकास की बातें अपने हर भाषण में जनता के सामने रखकर कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर दी। वहीं कांग्रेस के खेमें से राहुल गांधी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और घोटाले पर वह मौन रहे। देखा जाए तो राहुल गांधी की लड़ाई अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे थे। राहुल गांधी ने कांग्रेस को कम से कम नुकसान के लिए लड़ते हुए नजर तो वहीं नरेंद्र मोदी ने अंत में विकास के मुद्दे के साथ  प्रियंका गांधी के नीच राजनीति करने के आरोप के जवाब में नरेंद्र मोदी ने उसे जाति के राजनीति से जोड़कर कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा भी अपने हाथ में ले लिया। भारतीय जनता पार्टी ने संप्रग सरकार के नकामयाबी को निशाना बनाया जिसका जवाब राहुल गांधी के पास नहीं था वही उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को निशाने में लेते हुए बसपा पर क्षत्रप् दलित की राजनीति करने की बात नरेंद्र मोदी ने कहीं वही इसी के साथ सपा को परिवारवादी पार्टी का आरोप लगाकर सपा के वोटरों को भारत के विकास के लिए वोट करने के लिए कहा। जाहिार है इस लोकसभा चुनाव का परिणाम भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया। इस चुनाव में जाति की गणित बिगड़ गई है। लेकिन सवाल अब यह उठता है कि भाजपा को सभी जाति के वोट मिलने पर यह देखा जा रहा है कि क्या जातियगत आधार पर  राजनीति करने वालो क्षेत्रीय दलों की राजनीति खत्म हो गई। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बसपा को एक सीट भी नहीं मिली और इस बार के लोकसभा चुनाव में उसका खाता नहीं खुला तब ऐसे में मायावती के लिए चिंता का विषय की उनका मूल वोटर दलित भी उनसे दूर होता नजर आ रहा है। वहीं बिहार में यही स्थति बनी की सुशासन बाबू नीतिश कुमार का भी ऐजेंडा इस लोकसभा चुनाव में फेल हो गया। बिहार में लालू प्रसाद यादव का जाति समीकरण से कोई खासा फायदा नहीं मिला। देखा जाए तो पूरे भारत में नरेंद्र मोदी का जादू चला, सवाल यह भी है कि जब सभी के विकास की बात करते हुए नरेंद्र मोदी समाने आ रहे हैं और आने वाले समय में विकास के ऐजेण्डे पर काम करेंगे तब बसपा सपा राजद जैसी पार्टियों के लिए चुनौतियां अगले चुनाव में बढ़ जाएगी।

सोमवार, 5 मई 2014

कविता संग्रह समीक्षा- मीरखां का सजरा-श्रीरंग


कविता संग्रह समीक्षा-   मीरखां का सजरा-श्रीरंग

समकालीन हिन्दी कविता में मीरखां का सजरा श्रीरंग की ताजा कविता संग्रह
है। यह संग्रह पाठकों को आकर्षित करती हुई है।  इस संग्रह में कुल 74
कविताएं है जो नये समाज की कहानी बड़ी बारीकी से बयान करती है। श्रीरंग का
यह तीसरा कविता संग्रह है, इससे पहले यह कैसा समय और नुक्कड़ से नोमपेन्ह
कविता संग्रह प्रकशित हो चुके हैं। नये अनछुए पहलूओं को खींचती यह कविता
संग्रह वर्तमान जीवन को समझने पर मजबूर कर देती है। लोकतंत्र को सावधान
करती एक कविता में सावधान/ शाम को महराज/ एक विशाल भीड़ को सम्बोधित
करेंगे/ परिवहान आधिकारी सावधान/ नगर की सभी बसें, कारें, जीपें में
कविता का स्वर इर्द-गिर्द होने वाले भीड़-भाड़ का आरेख खीचती है। वहीं इस
संग्रह की बहुरूपिया शीर्षक कविता में बहुरूपिया के चरित्र को दर्शाती है
जहां पर ना ही उसका कोई धर्म होता है न उसकी पहचान बस चुपचाप वह बदल लेता
है आपना खेमा। देखा जाए तो श्रीरंग अपने समकालीन कवियों में नये और
ताजेपन के साथ दुनिया में हो रहे बदलाव के संदेशवाहक है पर संदेह से परे
सच की शुरूआत भी अपनी कविता के माध्यम से करते हैं। यही एक कवि का असली
पहचान है कि वह समाज के नस को पहचानता है। शासन सत्ता का सुख भोगने वाले
धर्मपुरूष, राजपुरषों की चीखों को दर्ज करती कविता शीर्षक खतरा किससे है?
सत्ता भोग की लालसा में उथल-पुथल के जाल को सत्ताधारी चींखने और उसमें खो
जाने वाले आम आदमी की चींखों के बीच उलझते जीवन को केंद्रित करती कविता
और अधिक मुखर हो उठती है।
श्रीरंग की कविताओं में रंगीन दुनिया के ब्लैक एण्ड वाइट तस्वीर को बखूबी
से उतारा गया है। नैपथ्य के पीछे का सच कौन नहीं जनाता है, क्या यह सच
मनुष्य होने का पर्याय है? ऐसे अनगिनत सवाल का जवाब ढूंढती कविता पाठकों
के साथ तटस्था समांजस्य बैठा पाने में सफल हुई है। अपने समय की विद्रूपता
और उसमें सत्ताधरी, नारी, ग्रामीण महिला, देसी औरत और शैतान के ठहाके सभी
को मंतव्य समझाया गया है। एक बात तो साफ है कि शैतान ठहाके लगा रहा है
शीर्षक कविता की चंद पंक्तियां देखिए जहां जर कुटिल बुद्धि कमयाब होता
है। वे लोग/ जिन्हें, धर्म में कतई आस्था नहीं थी? / आंख मूंदकर मानने
लगे हैं- धर्म/ पढने लगे हैं-पांच वक्त का नमाज/ वे लोग/ जिन्हें, ईश्वर
पर विश्वास नहीं था?/ जाने लगे हैं- मंदिर/ करने लगे सजदे/ जबकि शैतान
ठहाके लगा रहा है।
श्रीरंग की अधिकांश कविता नई शताब्दी को समेटे हुए है। कई ऐसे विषय हैं
जिसमें अब तक ध्यान किसी का नहीं गया है जिसमें- खटनबिनवा, अबाबील,
महाकाल, पुरखे, बम्मा, शनि की महादशा, कविता जहां उगती है, व्यवस्थ और
बच्चे, छोटी सूई बनाम बड़ी सुई, परवतिया आदि समकालीन युवा कवि का मन पडताल
करती नजर आती है। दृष्टि इन किरदारों पर जब पड़ती है तो पाठक को अपनापन का
अहसास करती हैं। वहीं इनमें मुखरता का स्वर जाना पहचाने से छिपे पहलूओं
से उजागर करती हुई नजर आती है। एक कविता रतीनाथ शीर्षक में टाईपराइटर पर/
लगतार जूझती है उंगलियां/ लेकिन हार नहीं मानता रतीनाथ- शब्द संयोजन चयन
में कवि अपने आपको चूकने नहीं देता है। चरित्रों के गढें़ उन सहज शब्दों
को ढूंढ लेना कवि की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। कहां जाए तो आगे की
कविता की दृष्टि क्या होगी? यक्ष प्रश्न यही है कि कवि इस रफ्तार भरी
जिंदगी को कितनी बारीकी से जी लेता है और फिर जीला लेता है। श्रीरंग की
कविता संग्रह मीरखां का सजरा में सजीव कविता के समरसता का हर पहलू
विधमान है।

कविता संग्रह- मीरखां का सजरा
कवि- श्रीरंग
प्रकाशक- साहित्य भण्डार, 50, चाहचन्द, इलाहाबाद-2011003 फोन-
0532-2400787, 2402072।
मूल्य- 50 रूपये।

विश्वविद्यालय की डिग्री

विश्वविद्यालय की डिग्री  
यहीं से सीखा पाया
समाज में उतरने के लिए
फैलाना था पंख
लौट के आने वाली उड़ान
भरी थी मैंने विश्वविद्यलाय की दीवारों में।
दस साल बाद
विश्वविद्यालय की सीलन भरी दीवार
सब कुछ बयान कर रही 
नहीं ठीक 
सूखे फव्वारे अब किसी को नहीं सुख देते
सलाखों में तब्दील विश्वविद्यालय।
समय बदल गया
पर मेरी डिग्री वही
याद वहीं 
इमारतों के घोसले भी गायब
पंख नहीं मार सकती चिड़िया
अजादी पैरों में नहीं
विचारों में पैदा नहीं होने दी गई।
विचरने वाले पैसों में ज्ञान को बदल रहें
दस साल का हिसाब मुझसे मांग रहा
विश्वविद्याल की इमारतें।
ंबयान कर रहा है जैसे नहीं बदला
बता रही बदल गए तुम।
मैंने कहा डिग्री सीढ़ा गई
सीलन भरी दीवार में अटकी 
फांक रही है धूले
मैंने सीख लिया है 
नया ताना बाना,
विश्वविद्यालय सीखने को नहीं 
नहीं बदलने को तैयार
मैंन भी निकाल ली अखबार की कतरने 
दिखा दिया बेरोजगार डिग्री 
गिना दिया दफन हो गई डिग्रियों के नाम 
कल आज में,
बिना डिग्री वाला नाम 
तुझ पर इतिहास बनाएगा 
तुझे नचाएगा
डिग्री वाले ताली बजाएंगे
एक अदद नौकरी के लिए। 
     अभिषेक कांत पाण्डेय

यह ब्लॉग खोजें

नये प्रयोग के रूप में मृच्छकटिकम् नाटक का सफल मंचन

रंगमंच नाटक समीक्षा- अभिषेक कांत पांडेय प्रयागराज। उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में  प्रख्यात  संस्कृत नाटक  'मृच्छकट...