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क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?

क्या जाति आधारित राजनीति का अंत ?                                           

                                                                                                अभिषेक कांत पाण्डेय


लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों के बारे में बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी फेल हो गए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत की राजनीति में मील के पत्थर साबित हुए। जाहिर है कि केंद्र के चुनाव में सत्ता पक्ष आपने अच्छे दिनों के शासनकाल के बारे में बताकर चुनाव में उतरता है लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस राहुल गांधी के पास जनता को सपने दिखाने की कोई तस्वीर नहीं थी। यूपीए के शासनकाल में हुए घोटाला, महंगाई और भ्रष्टाचार के चेहरा जनता को याद रहा। जिस तरह से यूपीए के शासन को सपा और बसपा जैसी पार्टी समर्थन दे रही थी, उनका भी हश्र वहीं हुआ जो पूरे भारत के राज्यों में कांग्रेस का हुआ यानी दहाई का आंकड़ा भी सत्ता पक्षा नहीं छू  पाई। जनता ने नरेंद्र मोदी के विकास के माडल को स्वीकार किया, उनके भाषणों में जनता ने नये भारत के विकास की तस्वीर देखी, जाहिर है नरेंद्र मोदी की इसी स्वीकारता ने कांग्रेस, सपा और बसपा में बौखलाहट पैदा कर दी और पूरे चुनाव में नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ अन्य दल लामबद्ध हो गए। इसी के साथ सवाल जवाब और प्रत्यारोप की राजनीति के इस अवसर पर उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के मन में बस एकही सवाल था कि पिछले 10 साल हमने कांग्रेस का शासनकाल देखा है लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी को जीताकर देखा जाए, उम्मीद और परिवर्तन लिए मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को स्वीकार किया। लेकिन इसी के साथ जाति और धर्म की राजनीति करने वाली सपा और बसपा के लिए यह चुनाव बदलाव की तरफ इशारा कर रही है। जिस तरह से 1991 के चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व शुरू हुआ, यहां हाशिए पर चले गए पिछड़ों और दलितों को सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता लाने के लिए क्षेत्रीय दलों ने जाति फैक्टर को भुनाया लेकिन इस तरह की राजनीति का फायदा  केवल क्षत्रपों को हुआ, ऐसी पार्टियां अपने आगे किसी को उभरने का मौका नहीं दिया। बसपा नेता मायावती ने किसी दलित नेता को सैकेंड लाइन में भी नहीं रहने दिया, इससे साफ जाहिर है कि बसपा खास दलित वर्ग के स्थाई वोटरों के साथ सवर्ण जाति, मुस्लिमो और पिछड़ों के बिखरे वोटों के जरिये उत्तर प्रदेश के सत्ता पर काबिज होने की रणनीति पर ही अभी तक कायम है। सवर्णांे को गाली देकर फिर सोशल इंजिनियरिंग के बल बूते पर मुख्यमंत्री बन चुकी लेकिन उनकी इस बार की रणनीति ने उन्हें नकार दिया है, जनता ने उसे चुना है जिसने अंतिम गरीब व्यक्ति के विकास की बात की जिसमें सभी के विकास की बात जनता के सामने रखा, इस तरह से नरेंद्र मोदी ने जातिवाद के फैक्टर को प्रभावित किया। वहीं मुस्लिम और यादवों की राजनीति की पर्याय बन चुकी समजावादी पार्टी इस बार के चुनाव में अपने परिवार को ही बचा पाए, परिवारवादी पार्टी के अरोपो में हमेशा विरोधी पार्टियों के निशाने में रहने वाली सपा ने भी जाति और धर्म के फैक्टर को सर्वपरि रखा और इसी के बल पर नरेंद्र मोदी के सामने उतरे लेकिन 5 सीटों के साथ सिमटने का कारण साफ है कि मुलायम सिंह यादव ने 2012 के विधानसभा चुनाव मेें युवा मतदाता के मिले वोटों को इस लोकसभा चुनाव तक बचा नहीं पाई कारण साफ रहा कि उत्तर प्रदेश के शासनकाल में अखिलेश सरकार युवाओं को रोजगार दिलाने और उनककी अकांक्षाओं पर खड़ा नहीं उतर पाई, जिस तरह से पढ़ा लिखा नौजवानों को सरकार की तरफ से सरकारी नौकरी में रिक्तियों की भर्ती नही होना, शिक्षकों 72825 पदों के नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आदेश के बावजूद जिस तरह से लचर प्रक्रिया अपनाना, शिक्षा मित्रों को स्थाई करने के मामले में देरी वहीं योग्य युवाओं को सरकारी महकमें पदों को नहीं भरना जैसी मुद्दे भी सपा सरकार से युवाओं का मोह भंग होना स्वाभाविक था। सपा नेताओं के ऐन चुनाव के समय अपत्तिजनक बयानों ने महिला वोटरों ने भी दूरी बना ली। वहीं सपा, बसपा और कांग्रेस को मुस्लमानों के प्रति तुष्टिकरण की रणनीति ने भी हिंदू मतदाताओं को एकजूट पोलराइज किया वहीं मुस्लिम मतदाता के वोट कांग्रेस, बसपा और सपा में बिखरे हंै।

देखा जाए तो इस चुनाव में शुरू से विकास का मुद्दा छाया रहा। जब केंद्र की सरकार के गठन के लिए चुनाव हो और विकास के मुद्दा सर्वाधिक लोगों को आकर्षित करता है, नरेद्र मोदी ने गुजरात विकास की बातें अपने हर भाषण में जनता के सामने रखकर कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर दी। वहीं कांग्रेस के खेमें से राहुल गांधी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और घोटाले पर वह मौन रहे। देखा जाए तो राहुल गांधी की लड़ाई अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे थे। राहुल गांधी ने कांग्रेस को कम से कम नुकसान के लिए लड़ते हुए नजर तो वहीं नरेंद्र मोदी ने अंत में विकास के मुद्दे के साथ  प्रियंका गांधी के नीच राजनीति करने के आरोप के जवाब में नरेंद्र मोदी ने उसे जाति के राजनीति से जोड़कर कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा भी अपने हाथ में ले लिया। भारतीय जनता पार्टी ने संप्रग सरकार के नकामयाबी को निशाना बनाया जिसका जवाब राहुल गांधी के पास नहीं था वही उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को निशाने में लेते हुए बसपा पर क्षत्रप् दलित की राजनीति करने की बात नरेंद्र मोदी ने कहीं वही इसी के साथ सपा को परिवारवादी पार्टी का आरोप लगाकर सपा के वोटरों को भारत के विकास के लिए वोट करने के लिए कहा। जाहिार है इस लोकसभा चुनाव का परिणाम भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया। इस चुनाव में जाति की गणित बिगड़ गई है। लेकिन सवाल अब यह उठता है कि भाजपा को सभी जाति के वोट मिलने पर यह देखा जा रहा है कि क्या जातियगत आधार पर  राजनीति करने वालो क्षेत्रीय दलों की राजनीति खत्म हो गई। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बसपा को एक सीट भी नहीं मिली और इस बार के लोकसभा चुनाव में उसका खाता नहीं खुला तब ऐसे में मायावती के लिए चिंता का विषय की उनका मूल वोटर दलित भी उनसे दूर होता नजर आ रहा है। वहीं बिहार में यही स्थति बनी की सुशासन बाबू नीतिश कुमार का भी ऐजेंडा इस लोकसभा चुनाव में फेल हो गया। बिहार में लालू प्रसाद यादव का जाति समीकरण से कोई खासा फायदा नहीं मिला। देखा जाए तो पूरे भारत में नरेंद्र मोदी का जादू चला, सवाल यह भी है कि जब सभी के विकास की बात करते हुए नरेंद्र मोदी समाने आ रहे हैं और आने वाले समय में विकास के ऐजेण्डे पर काम करेंगे तब बसपा सपा राजद जैसी पार्टियों के लिए चुनौतियां अगले चुनाव में बढ़ जाएगी।

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