सोमवार, 5 मई 2014

कविता संग्रह समीक्षा- मीरखां का सजरा-श्रीरंग


कविता संग्रह समीक्षा-   मीरखां का सजरा-श्रीरंग

समकालीन हिन्दी कविता में मीरखां का सजरा श्रीरंग की ताजा कविता संग्रह
है। यह संग्रह पाठकों को आकर्षित करती हुई है।  इस संग्रह में कुल 74
कविताएं है जो नये समाज की कहानी बड़ी बारीकी से बयान करती है। श्रीरंग का
यह तीसरा कविता संग्रह है, इससे पहले यह कैसा समय और नुक्कड़ से नोमपेन्ह
कविता संग्रह प्रकशित हो चुके हैं। नये अनछुए पहलूओं को खींचती यह कविता
संग्रह वर्तमान जीवन को समझने पर मजबूर कर देती है। लोकतंत्र को सावधान
करती एक कविता में सावधान/ शाम को महराज/ एक विशाल भीड़ को सम्बोधित
करेंगे/ परिवहान आधिकारी सावधान/ नगर की सभी बसें, कारें, जीपें में
कविता का स्वर इर्द-गिर्द होने वाले भीड़-भाड़ का आरेख खीचती है। वहीं इस
संग्रह की बहुरूपिया शीर्षक कविता में बहुरूपिया के चरित्र को दर्शाती है
जहां पर ना ही उसका कोई धर्म होता है न उसकी पहचान बस चुपचाप वह बदल लेता
है आपना खेमा। देखा जाए तो श्रीरंग अपने समकालीन कवियों में नये और
ताजेपन के साथ दुनिया में हो रहे बदलाव के संदेशवाहक है पर संदेह से परे
सच की शुरूआत भी अपनी कविता के माध्यम से करते हैं। यही एक कवि का असली
पहचान है कि वह समाज के नस को पहचानता है। शासन सत्ता का सुख भोगने वाले
धर्मपुरूष, राजपुरषों की चीखों को दर्ज करती कविता शीर्षक खतरा किससे है?
सत्ता भोग की लालसा में उथल-पुथल के जाल को सत्ताधारी चींखने और उसमें खो
जाने वाले आम आदमी की चींखों के बीच उलझते जीवन को केंद्रित करती कविता
और अधिक मुखर हो उठती है।
श्रीरंग की कविताओं में रंगीन दुनिया के ब्लैक एण्ड वाइट तस्वीर को बखूबी
से उतारा गया है। नैपथ्य के पीछे का सच कौन नहीं जनाता है, क्या यह सच
मनुष्य होने का पर्याय है? ऐसे अनगिनत सवाल का जवाब ढूंढती कविता पाठकों
के साथ तटस्था समांजस्य बैठा पाने में सफल हुई है। अपने समय की विद्रूपता
और उसमें सत्ताधरी, नारी, ग्रामीण महिला, देसी औरत और शैतान के ठहाके सभी
को मंतव्य समझाया गया है। एक बात तो साफ है कि शैतान ठहाके लगा रहा है
शीर्षक कविता की चंद पंक्तियां देखिए जहां जर कुटिल बुद्धि कमयाब होता
है। वे लोग/ जिन्हें, धर्म में कतई आस्था नहीं थी? / आंख मूंदकर मानने
लगे हैं- धर्म/ पढने लगे हैं-पांच वक्त का नमाज/ वे लोग/ जिन्हें, ईश्वर
पर विश्वास नहीं था?/ जाने लगे हैं- मंदिर/ करने लगे सजदे/ जबकि शैतान
ठहाके लगा रहा है।
श्रीरंग की अधिकांश कविता नई शताब्दी को समेटे हुए है। कई ऐसे विषय हैं
जिसमें अब तक ध्यान किसी का नहीं गया है जिसमें- खटनबिनवा, अबाबील,
महाकाल, पुरखे, बम्मा, शनि की महादशा, कविता जहां उगती है, व्यवस्थ और
बच्चे, छोटी सूई बनाम बड़ी सुई, परवतिया आदि समकालीन युवा कवि का मन पडताल
करती नजर आती है। दृष्टि इन किरदारों पर जब पड़ती है तो पाठक को अपनापन का
अहसास करती हैं। वहीं इनमें मुखरता का स्वर जाना पहचाने से छिपे पहलूओं
से उजागर करती हुई नजर आती है। एक कविता रतीनाथ शीर्षक में टाईपराइटर पर/
लगतार जूझती है उंगलियां/ लेकिन हार नहीं मानता रतीनाथ- शब्द संयोजन चयन
में कवि अपने आपको चूकने नहीं देता है। चरित्रों के गढें़ उन सहज शब्दों
को ढूंढ लेना कवि की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। कहां जाए तो आगे की
कविता की दृष्टि क्या होगी? यक्ष प्रश्न यही है कि कवि इस रफ्तार भरी
जिंदगी को कितनी बारीकी से जी लेता है और फिर जीला लेता है। श्रीरंग की
कविता संग्रह मीरखां का सजरा में सजीव कविता के समरसता का हर पहलू
विधमान है।

कविता संग्रह- मीरखां का सजरा
कवि- श्रीरंग
प्रकाशक- साहित्य भण्डार, 50, चाहचन्द, इलाहाबाद-2011003 फोन-
0532-2400787, 2402072।
मूल्य- 50 रूपये।