शुक्रवार, 27 मार्च 2015

क्या तुम जानते हो?

तूफान क्यों आते हैं?
जब नमी से भरी हुई ढेर-सी गर्म हवा तेजी से ऊपर की ओर उठती है तब तूफान आते हैं। बच्चो, तुमने तूफान की शुरुआत से पहले हवा को तेज होते हुए देखा होगा। जब पानी वाले बादल बड़े होते जाते हैं और गहरे होते हुए आसमान में अंधेरा छाने लगता है। ये तूफान के लक्षण हैं। बादलों के अंदर पानी के कण तेजी से घूमते हैं, जो आपस में टकराते हैं और इससे बिजली बनती है। बिजली बनने का काम तब-तक चलता रहता है, जब तक वह बड़ी-सी चिगारी बन कर एक बादल से दूसरे बादल तक होती हुई धरती तक जोरदार चमक नहीं बन जाती। बिजली चमकते समय जब आकाश में बिजली इधर-उधर गुजरती है तो आस-पास की हवा गर्म हो जाती है। यह गर्म हवा तेजी से फैलती है तो गड़गड़ाहट की तेज आवाज सुनाई देती है।बिजली में गरज और चमक एक साथ होती है। चमक पहले दिखाई देती है और गरज बाद में सुनाई देती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रकाश की गति ध्वनि की गति से तेज होती है और चमक हमारे पास तक आवाज से पहले पहुंच जाती है। बिजली, पानी और तूफान से बचने के लिए किसी ऊंचे पेड़ के नीचे खड़ा हो जाना ठीक नहीं है, क्योंकि बिजली धरती पर गिरते समय अकसर किसी ऊंचे वृक्ष का सहारा ले लेती है। आसमान से गिरती हुई बिजली हमें नुकसान पहुंचा सकती ह

चीटियां भी बनाती हैं शौचालय

क्या आपको पता है कि चीटियों का भी अपना एक शौचालय होता है, वो इसके लिए बाहर नहीं जाती हैं बल्कि घोंसले के एक कोने में उनका शौचालय बना होता है। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ रेजेनबर्ग के शोधकर्ता तोमर कजाकजक्स ने बताया कि चीटियों के लिए भी स्वच्छता और शौचालय एक बड़ा मुद्द है, जो हमारे समुदायों में है। चीटियों के दैनिक नित्यकर्म व्यवहार के अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने उनके घोंसले पर पाए गए भूरे रंग के पदार्थों की जांच की और पता लगाया कि क्या वह चीटियों का मल है? शोधकर्ताओं ने अध्ययन के लिए सफेद रंग के प्लास्टर घोंसले में रहने वाली चीटियों को लाल और नीले रंग में रंगा खाना खिलाया और घोंसले का निरीक्षण किया और पाया कि चीटियां भी शौचालय के लिए एक जगह का चुनाव करती है, जो उनका शौचालय है।

ओले क्यों गिरते हैं?



जानकारी

रिंकी पाण्डेय
ओले क्यों गिरते हैं?

बच्चो, कई बार बारिश के दौरान अचानक पानी की बूंदों के साथ बर्फ के छोटे-छोटे गोले भी गिरते हैं। इन्हें हम ओले कहते हैं। ये ओले आसमान में कैसे बनते हैं और ओले क्यों गिरते हैं? तो आओ ओले के बारे में पूरी बात जानें।

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बच्चों, तुम जानते हो कि बर्फ पानी के जमने से बनता है। अब तुम्हारे मन में ये प्रश्न उठ रहा होगा कि आसमान में ये पानी कैसे बर्फ बन जाता है और फिर गोल-गोले बर्फ के टुकड़ों के रूप में ये धरती पर क्यों गिरते हैं? तुमने जैसा कि पढ़ा होगा कि पानी को जमने के लिए शून्य डिग्री सेल्सियत तापमान होना चाहिए, तुमने फ्रीजर में देखा होगा कि पानी के छोटे-छोटे बूंदें बर्फ के गोले के रूप में जम जाता है, ऐसा ही प्रकृति में होता है। हम जैसे-जैसे समुद्र के किनारे से ऊपर यानी ऊंचाई की ओर बढ़ते हैं, तब जगह के साथ ही तापमान धीरे-धीरे कम होता जाता है। तुम इसे ऐसे समझ सकते हो, लोग गर्मी के मौसम में पहाड़ों पर जाना पसंद करते हैं, क्यों? इसलिए कि पहाड़ पर तापमान कम होता है, यानी मैदानी इलाके की तुलना में पहाड़ों पर तापमान ठंडी होती है। अब तुम्हें समझ में आ गया होगा कि ऊंचे स्थानों पर तापमान कम होता है, जैसे हमारे देश के पहाड़ी इलाके मसूरी और नैनीताल में। लेकिन लद्दाख में तो इतनी ठंड पड़ती है कि वहां हमेशा पानी बर्फ के रूप में होता है, क्योंकि यह धरती की सबसे ऊंची जगह मे एक है।
पानी बन जाता है बर्फ
तो अब तुम यह जान गए कि ऊंचाई के साथ तापमान कम होता है। लेकिन प्रश्न आपके मन में फिर उठ रहा है कि आखिर ओले कैसे बनते हैं? तुम यह अच्छी तरीके से जानते हो कि नदियों, तालाबों और समुद्र का पानी भाप बनकर आसमान में वर्षा का बादल बनाता है और यही बादल पानी बरसाते हैं। लेकिन जब आसमान में तापमान शून्य से कई डिग्री कम हो जाता है तो वहां हवा में मौजूद नमी संघनित यानी पानी की छोटी-छोटी बूंदों के रूप में जम जाती है। इन जमी हुई बूंदों पर और पानी जमता जाता है। धीरे-धीरे ये बर्फ के गोलों का रूप धारण कर लेती हैं। जब ये गोले ज्यादा वजनी हो जाते हैं तो नीचे गिरने लगते हैं। गिरते समय रास्ते की गरम हवा से टकरा कर बूंदों में बदल जाते हैं। लेकिन अधिक मोटे गोले जो पूरी तरह नहीं पिघल पाते, वे बर्फ के गोलों के रूप में ही धरती पर गिरते हैं। इन्हें ही हम ओले कहते हैं।
कब गिरते हैं ओले
ओले अक्सर गर्मियों के मौसम में दोपहर के बाद गिरते हैं, सर्दियों में भी ओले गिरते देखे गए हैं। जब ओले गिरते हैं, तो बादलों में गड़गड़ाहट और बिजली की चमक बहुत अधिक होती है। ये ओले कहीं बहुत हल्की तो कहीं बहुत भारी भी हो सकती है। इसका कारण यह है कि बर्फ हवा से उड़ती हुई इधर-उधर जाती हैं और एक जगह पर इकट्ठा हो जाती है। गिरती हुई बर्फ हमेशा नर्म नहीं होती। यह छोटे-छोटे गोल आकार के रूप में भी गिरती है।

ओले गोल क्यों?
ओले हमेशा गोले ही होते हैं? पानी जब बूंद के रूप में गिरता है तो पृष्ठतनाव के कारण पानी की बूंदे गोल आकार ले लेता है, तुमने नल से टपकते हुए पानी की बूंदों को देखा होगा, ये बूंद गोल रूप में होता है। ठीक इसी तरह जब आसमान से पानी गिरता है तो वह बूंद के रूप में बर्फ बन जाता है। इनमें बर्फ की कई सतहें होती हैं। अभी तक सबसे बड़ा ओला एक किलोग्राम का आसमान से गिर चुका है।
 

13 साल की साक्षी ने गोमूत्र से बनाई बिजली


13 साल की साक्षी ने गोमूत्र से बनाई बिजली

साक्षी ने ऐसा कारनामा किया है, जो बड़े-बड़े नहीं कर पाते हैं। अपनी छोटी-सी उमर में गोमूत्र से बिजली बनाने की सफलता अर्जित की है। मई में जापान में होने वाले सेमीनार के आयोजनकर्ता ने उन्हें अपने प्रोजेक्ट की प्रदर्शनी के लिए बुलाया है और वहां पर साक्षी लेक्चर भी देंगी।
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8वीं में पढ़ने वाली 13 वर्षीय साक्षी दशोरा के एक आइडिया ने उन्हें बड़ी सफलता दिलाई। बेकार समझी जाने वाली गाय के गोबर और गोमूत्र का साइंटिफिक यूज करके, इससे बिजली बनाने में कामयाबी मिली है। इस प्रोजेक्ट का नाम है- 'इम्पॉर्टेंस ऑफ काउब्रीड इन 21 सेंचुरी’। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के इंस्पायर अवार्ड ने उनके इस प्रोजेक्ट को अब इंटरनेशनल लेवल पर पहचान दिलाएगी। ये प्रोजेक्ट मई महीने में जापान मे होने वाली सात दिवसीय सेमिनार में प्रदर्शित होगा। वहां साक्षी लेक्चर भी देंगी। साक्षी ने यह प्रोजक्ट अगस्त 2०14 बनाया था, उदयपुर जिले में हुई प्रदर्शनी में छटी रैंक मिला। फिर सितम्बर में डूंगरपुर में आयोजित राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में 12वीं रैंक और इसके बाद नेशनल लेवल में दूसरी रैंक हासिल की है। उनसे पूछा गया कि इतनी छोटी-सी उम्र में बिजली बनाने का आइडिया उन्हें कैसे आया? साक्षी बताती हैं, 'भारत में गायों की संख्या तेजी से घट रही हैं, और कहीं इनका हाल भी भारतीय शेरों जैसा न हो जाए। जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो उसे छोड़ दिया जाता है, जिससे उसकी दुर्दशा हो जाती है। इसीलिए अगर गोमूत्र से बिजली बनने लगेगी तो गायों के दुधारू न रहने पर भी उनकी दुर्दशा नही होगी।’ उनको जब प्रोजेक्ट का आइडिया आया तो टीचर से जाकर इसे शेयर किया। टीचर ने जब यह आइडिया सुना तो उन्होंने ने भी साक्षी का साथ दिया और प्रोजेक्ट बनाने में भरपूर मदद की। साक्षी की मेहनत के साथ टीचर युगल किशोर शर्मा, ललित व्यास और सुशील कुमावत ने साक्षी के इस कार्य को बढ़ावा दिया। साक्षी ने बताया कि गौमूत्र में सोडियम, पोटेशियम, मेग्नीशियम, सल्फर एवं फास्फोरस की मात्रा रहती है। उन्होंने प्रोजेक्ट में एक लीटर यूरीन में कॉपर और एल्युमिनियम की इलेक्ट्रोड डाली, जिसे वायर के जरिए एलईडी वॉच से जोड़ा। बिजली पैदा होते ही वॉच चलने लगी। गौमूत्र की मात्रा के अनुसार बिजली पैदा होगी। गौमूत्र कैंसर सहित अन्य बीमारियों से भी बचा सकता है। गोबर से लेप करें तो तापमान कंट्रोल रहेगा। इससे अगरबत्ती भी बनाई जा सकती है।
साक्षी को गोमूत्र के अंदर कई तत्वों की व्यापक जांच करनी है लेकिन उनके पास जरूरी उपकरण मौजूद नहीं है। साक्षी के पिता पेश्ो से पटवारी हैं और माता गृहिणी हैं। घर की आय केवल 2० हजार रुपये महीना, जिसके कारण से वे गोमूत्र की जांच के लिए महंगी मशीनें नहीं खरीद सकती हैं। साक्षी बताती हैं, 'अगर उन्हें ये उपकरण मिल जाएं तो वे अपने प्रोजेक्ट को और भी ज्यादा व्यापक बना सकती हैं।’ मई में अपने प्रोजक्ट की प्रदर्शनी के लिए वे जापान जा रही हैं, जहां पर उनके इस प्रोजेक्ट को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलेगी और इस नए तरीके से बिजली उत्पन्न करने की खोज से दुनिया को फायदा मिलेगा।

एग्जाम से पहले करें सही तैयारी

बोर्ड एक्जाम स्पेशल
पूनम रल्हन (स्टूडेंट काउंसलर)


एग्जाम से पहले करें सही तैयारी
आपके फाइनल एग्जाम के अब बहुत कम दिन बचे हैं। परीक्षा देते समय बहुत-सी गलतियां हो जाती हैं, जिससे हो सकता है कि आपके मार्क्स कम आए, इसीलिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि एग्जामिनेशन हॉल में क्यूश्चन पेपर को कैसे हल करें, एग्जाम से पहले क्या-क्या तैयारियां जरूरी है। इन तरीकों को अपनाकर आप एग्जाम में हाई मार्क्स ला सकते हैं।
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शुभांगी मिश्रा ने ट्वेल्थ के बोर्ड एग्जाम में 91 प्रतिशत मार्क्स लेकर स्कूल में टॉप रैंक प्राप्त किया, तो सभी को आश्चर्य हुआ। शुभांगी सामान्य तौर पर एक ऐवरेज स्टूडेंट के रूप में क्लास में जानी जाती थी। उससे बात करने पर पता चला कि बोर्ड एग्जाम में ऐपियर होने से पहले उसने स्कूल काउंसलर के दिए टिप्स का पूरी तरह से पालन किया था। आइए जानें बोर्ड एग्जाम में अधिक अंक स्कोर करने के लिए एग्जाम के दौरान छात्रों को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
ध्यान से देखें एग्जाम टाइम टेबल
छात्रों को एग्जाम टाइम टेबल ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। ये न सिर्फ एग्जाम ओरियंटेड स्टडी के लिए जरूरी है बल्कि विषय की जरूरत के अनुसार आवश्यक सामान बैग में रखने के लिए भी जरूरी है। मैथ और साइंस के एग्जाम में पेन और स्केल के अलावा ज्यॉमिट्री बॉक्स ओर रबर पेंसिल रखना न भूलें। सही टाइम टेबल की जानकारी होने पर छात्र के लिए निश्चित दिन और तारीख को विषय विश्ोष की तैयारी के लिए जरूरी भी है। एग्जाम सेंटर कहां है इसकी जानकारी पहले से प्राप्त कर लें ताकि निर्धारित समय से पूर्व छात्र वहां पहुंच सके। एग्जाम के एक दिन पूर्व छात्र को अपना बैग व्यवस्थित कर लेना चाहिए। जिसमें एक्जाम में उपयोगी सामग्री जैसे प्रवेश पत्र, पेन आदि पहले से रख लेंं। गलती से भी कोई अतिरिक्त कागज साथ मंे न ले जाएं।
समय से भोजन कर लें
एक्जाम से 45 मिनट पहले ही छात्र को भोजन कर लेना चाहिए। भोजन ऐसा हो, जिससे उसे 3-4 घंटों तक भूख न लगे।
पुस्तकें व नोट्स लेकर न जाए
एग्जाम सेंटर में जाने से एक घंटे पूर्व छात्र को रिवीजन समा’ कर लेना चाहिए। बेहतर होगा पुस्तकें या नोट्स लेकर स्कूल न जाएं। रिसर्च से पता चलता है कि ऐसा करने से औसत से उच्च अंक प्रा’ करने वाले छात्रों को न केवल कॉन्फिडेंस बढ़ता है बल्कि एग्जाम में बेहतर प्रदर्शन की संभावना में भी वृद्धि होती है।
एग्जाम से पूर्व डिस्कशन से बचें
निर्धारित समय से 2० मिनट पूर्व एग्जाम सेंटर हर स्थिति में पहुंच जाएं। ध्यान रख्ों कि एग्जाम से पूर्व साथियों के साथ अधिक डिस्कशन करना छात्रों को कन्फ्यूज तो करता ही है, साथ ही कई बार अपने में कमी महसूस होने से उनका कॉन्फिडेंस लेवल भी कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी क्यूश्चन पेपर ठीक से कर पाना, उनके लिए संभव नहीं होता। इसलिए एग्जाम पूर्व डिस्कशन से बचें। अपने दिमाग को शांत रख्ों और धैर्यता का परिचय दें।

निर्देशों का पालन करें
एग्जाम हॉल में परीक्षक के निर्देशों को ध्यानपूर्वक सुने और उनका पालन करें। जब तक बहुत आवश्यक न हो अन्य छात्रों की तरफ न तो देख्ो और न ही उनसे बातें करने का प्रयास करें। एग्जाम के दौरान टाइम मैनेजमेंट के लिए छात्र के पास घड़ी होनी जरूरी है। आरंभ से ही छात्र समय का ध्यान रख्ों। निर्धारित समय सीमा के में क्यूश्चन पेपर पूरा करें।
क्यूश्यन पेपर को ध्यान से पढ़ें
छात्र को चाहिए कि वह क्यूश्चन पेपर पढèने के लिए मिले निर्धारित समय में ध्यानपूर्वक सभी प्रश्नों को पढ़ें। उत्तर लिखने से पहले प्रत्येक प्रश्न के सभी भागों को ध्यानपूर्वक पढ़ें, फिर उसके सभी भागों का बारी-बारी से उत्तर लिख्ों। ध्यान रहें कि उत्तर लिखने से पहले, सही प्रश्न संख्या लिखनी चाहिए। लिखावट स्पष्ट और पठनीय होनी चाहिए। छात्रों को चाहिए कि निर्धारित शब्द सीमा में उत्तर लिखने का प्रयास करें। ये प्रयास करे कि स्पेलिंग और ग्रामर संबंधी त्रुटियां न हों। उत्तर पुस्तिका में उत्तरों के अतिरिक्त कोई व्यर्थ वाक्य कभी न लिख्ों। कट और ओवर राईटिंग करने से भी बचें। उत्तर के मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करें। जहां डायग्राम बनाना जरूरी है, साफ-साफ बनाएं और नमांकरण भी लिख्ों। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लिखने के बाद कम से कम दो लाइनें छोड़ कर अगले प्रश्न का उत्तर लिख्ों।
समय सीमा का रखें ध्यान
आरंभ से ही अपनी गति का ध्यान रख्ों ताकि निर्धारित समय अवधि में आपका कोई प्रश्न हल करने से न छूट जाए। यदि हल करते समय आप को क्यूश्चन पेपर बहुत लेंदी लगे तो सावधानी बरतते हुए, पहले अधिक अंकों वाले बड़े प्रश्नों के उत्तर लिख्ों। बाद के बचे कम समय में छोटे प्रश्न के उत्तर तो लिख ही सकते हैं लेकिन छूटे हुए बड़े प्रश्नों के उत्तर लिखना संभव नहीं होता। यदि आप क्रमानुसार प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं और बीच में कोई विश्ोष प्रश्न का उत्तर सूझ नहीं रहा हो तो उसे याद करने का अत्यधिक प्रयास करने में समय नष्ट न करें। ऐसी स्थिति में उसके लिए स्थान छोड़कर अगला प्रश्न हल करें। अंत में बचे हुए समय में आप उस प्रश्न का उत्तर लिखने का प्रयास करें।
एग्जाम देते समय तनाव से बचें
एग्जाम के दौरान कभी-कभी कुछ छात्रों के सामने क्यूश्चन पेपर देखते ही या हल करते समय ये समस्या आ सकती है कि कुछ प्रश्न कोर्स से संबंधित नहीं है या उन्होंने नहीं पढ़ा है। ऐसी स्थिति में कुछ छात्र कन्फ्यूजन, घबराहट, ओवरलर्निंग, अंडरलर्निंग के कारण प्रश्नों का उत्तर लिखने में स्वयं को असमर्थ महसूस करते हैं। उन्हें बार-बार ख्याल आता है कि प्रश्न का कुछ उत्तर भूल गए हैं और उत्तर लिखने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह की स्थिति में छात्र घबरा जाते हैं। ऐसी स्थिति में ये सलाह दी जाती है कि अपने ऊपर घबराहट हावी न होने दें और स्वयं को शांत रख्ों। अधिक तनाव की स्थिति में थोड़ा पानी पीएं। 8-1० बार गहरी सांसे लें और छोड़ें। दिमाग को शांत रखने के लिए 3-4 मिनट तक आंख्ों बंद कर सकते हैं। स्थिति को नियंत्रण में करने के बाद, क्यूश्चन पेपर के सबसे सरल प्रश्नों के उत्तर पहले लिख्ों। बाद में कठिन लगने वाले हर प्रश्न को, जितना उत्तर याद आए लिखों। जहां तक संभव हो सभी प्रश्नों के उत्तर अवश्य लिख्ों।

उत्तर पुस्तिका का रिवीजन जरूर करें
अगर आपने एक से अधिक उत्तर पुस्तिका / ग्राफ का प्रयोग किया है तो रोल नंबर लिखना न भूलें और उसे धागे से अच्छी तरह से बांध लें। रिवजीन करते समय यह निश्चित कर लें कि प्रश्न संख्या सही से लिखा है कि नहीं। यदि कोई प्रश्न किसी कारण से छूट गया है तो उसे पूरा कर लें। प्रत्येक उत्तर के महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेंखांकित करें, व्याकरण के चिह्नों को चेक कर लें। टाइम मैनेजमेंट, सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ छोटी-छोटी सावधानी को ध्यान में रखकर आप परीक्षा में अच्छे मार्क्स ला सकते हैं।
 

क्या तुम जानते हो?

कैसे बनती है नॉदर्न लाइट



तुम जानते हो कि रात में आसमान काला दिखाई देता है लेकिन धरती में कुछ ऐसी जगह है, जहां पर रात में कुदरती रंगीन नजारा दिखता है। यहां रात के समय आसमान में हरा, पीला, नारंगी रंग वाली लाइट नजर आती है। ये अद्भुत घटना नॉर्दन लाइट्स के नाम से जानी जाती है। ऐसी घटना धरती के नॉर्वे, आइसलैंड, कनाडा में दिखाई देती है। आखिर इसका कारण क्या है, क्यों होती है नार्दन लाइट् की ये घटना? वास्तव में, नॉदर्न लाइट नेचर का एक ऐसा कारनामा है, जो धरती के गैसों के अणु और सूर्य के प्रकाश में मौजूद कण के बीच टकराव से पैदा होता है। इससे आसमान में कई रंगों का संयोजन होता है, जो अलग-अलग गैसों के प्रकृति और मात्रा पर निर्भर करता है। जब यह सूर्य के प्रकाश से टकराती है तो आसमान में कई रंगों की रंगीन लाइटें नजर आती हैं। इन नेचुरल रंगों में सबसे कॉमन रंग पीला-हरा होता है, जो धरती से 6० मील ऊपर ऑक्सीजन के अणुओं के टकराने से पैदा होती है।
 
प्रेशर कुकर में खाना जल्दी क्यों बनता है?
 
जब भी तुम्हारी मम्मी खाना बनाती होंगी तो तुम सोचते होगे कि कैसे कुकर में वो जल्दी से चावल या दूसरी चीजें तैयार कर लेती हैं। खुले बर्तन में खाना बनाने की अपेक्षा ढके बर्तन में खाना जल्दी पकता है, पर ये होता कैसा है? ये हम तुम्हें बताते हैं। दरअसल, पानी से बनने वाली भाप कुकर में बेकार नहीं जाती है। ढकने के साथ-साथ अगर दाब भी बढ़ा दिया जाए तो खाना और भी जल्दी पकता है, क्योंकि नियमानुसार जैसे-जैसे दाब बढ़ता है, पानी का क्वथनांक कम होता जाता है। प्रेशर कुकर में दाब अधिक हो जाने के कारण उसमें पकाए जाने वाले पदार्थो का क्वथनांक भी घट जाता है और वे जल्दी पक जाते हैं। इसीलिए तो गैस तेज करते ही कुकर जल्दी-जल्दी सीटी देने लगता है और पलक झपकते ही इसमें पकवान तैयार हो जाते हैं। चूंकि भाप एक शक्ति है और दाब अधिक न हो जाए इसलिए उसमें सेफ्टी वाल्व लगा होता है।

समुद्र का जल खारा क्यों होता है?

तुम जानते हो कि धरती का तीन हिस्सा पानी से घिरा हुआ है, लेकिन क्या तुम जानते हो कि कुल पानी का 9० प्रतिशत पानी समुद्र में पानी के रूप में जमा है। समुद्र का सारा पानी खारा है, यानी पीने लायक नहीं है। आखिर समुद्र का पानी खारा क्यों होता है? समुद्र के पानी का खारा होने का कारण नदियां हैं, कैसे?। धरती पर जितने भी पानी के स्रोत हैं, वे नदियों के पानी से मिलती है और नदियां समुद्र में जाकर मिलती है। नदियां बहते वक्त धरती के ऊपरी भाग की मिट्टी, च




ट्टान को भी अपने पानी में बहा ले जाती है। इसमें ढेर मात्रा में लवण और खनिज होते हैं, जो नदी के जल में घुल जाते हैं। जब नदियां समुद्र से मिलती हैं, तब इनके लवण और खनिज भी समुद्र में घुल जाते हैं। लेकिन जब सूर्य के प्रकाश के कारण समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ता है तो समुद्र का लवण और खनिज वहीं रह जाता है। जब सूर्य के प्रकाश से जल वाष्प बनता है तो यही वाष्प बारिश के बादलों का निर्माण करता है। बारिश होने पर धरती पर मीठा जल गिरता है। वर्षा का यह जल नदियों में और नदियों का जल फिर से खनिज और लवणों को घोलकर, समुद्र में पहुंचा देता है। यह प्रक्रिया लाखों सालों से चलती आई है, समुद्र का पानी वाष्प तो बन जाता है लेकिन लवण और खनिज वहीं का वहीं रह जाता है। इसीलिए समुद्र जल खारा होता है।

रंग बदलने में चेंपियन





जानकारी

रंग बदलने में चेंपियन
बच्चों, इस दुनिया में रंगों का बहुत महत्व है, बिना रंग के इस धरती की कल्पना करना मुश्किल है। धरती में बहुत से ऐसे जीव हैं, जो रंग बदलने या अपने रंग के कारण ही इस प्रकृति में रह पाते हैं, आइए ऐसे ही कुछ जीवों की अनोखी दुनिया के बारे में जानते हैं-
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रंग बदलने में उस्ताद
बच्चों तुम्हें मालूम है कि गिरगिट अपना रंग बदल लेता है। तुम्हें ये बताया गया है कि सांप जैसे शिकारियों से बचने के लिए वे ऐसा करते हैं। लेकिन तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि असल में अपनी अलग-अलग भावनाओं जैसे आक्रामकता, गुस्सा, दूसरे गिरगिटों को अपना मूड दिखाने और इस माध्यम से बातचीत करने के लिए भी गिरगिट रंग बदलते हैं। कई बार गिरगिट रंग नहीं केवल अपनी चमक बदल लेते हैं। खतरे की स्थिति में वह अपने रंग के साथ-साथ आकार भी बदल लेते हैं। फूल कर अपना आकार बड़ा कर लेना भी इनका एक तरीका है। गिरगिट के बहुत ज्यादा प्राकृतिक दुश्मन नहीं हैं। वह आराम से पेड़ों की टहनी पर बिना हिले बैठा रहकर अपने शिकार का इंतजार करता है। कीड़े-मकोड़े दिखते ही जल्दी से अपनी लंबी-सी जीभ फेंक कर उसे निगल लेता है।
रंग ऐसा की सिर चकरा जाए

जेबरा तुमने देखा होगा, काले और सफेद धारीदार रंग का होता है। इन्हें इस रंग का फायदा मिलता है, कैसे? श्ोर को धोखा देने के लिए। जब जेबरा के आस-पास अगर कोई शेर आ जाता है तो उसको भ्रमित करने के लिए वे झुंड में पास-पास आ जाते हैं। ऐसे में शेर को कोई एक जानवर दिखाई नहीं पड़ता और उसका सिर चकरा जाता है। इस तरह जेबरा का रंग तो उसकी जान भी बचा लेता है।
हरा रंग कमाल का
लूपर नाम का यह कीड़ा धोखा देने में उस्ताद है। तितलियों के परिवार से आने वाला यह कीट वातावरण के हिसाब से खुद को बहुत खूबी से बदल लेता है। एक नजर में पेड़ की पतली-सी शाखा की तरह लगने वाला लूपर अपने आपको पास के माहौल में मिला लेता है और इसका हरा रंग ऐसा लगता है कि किसी पेड़ की पतली शाखा है।

किसी भी रंग में रंग जाए

ऑक्टोपस की ये प्रजाति समुद्रतल पर खुद को बहुत खूबसूरती से छिपा लेती है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर यह अपने पास के किसी दूसरे समुद्री जीव, सांप, घोंघा या किसी और जैसा आकार और रंग भी अपना सकता है। दूसरे समुद्री जीव इसे पत्थर या श्ौवाल समझ लेते हैं और वहां से नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं।

रंग बिरंगी तितली
इस तितली को देखें, जो रंग-बिरंगी है लेकिन अपने पंखों पर दो जोड़ी आंखें लेकर उड़ती है। जी हां, आंखों की इस डिजाइन के कारण ये किसी शिकारी को खाने लायक नहीं बल्कि खतरनाक दिखती है। आस-पास के वातावरण में आसानी से छिप जाती है।
नकल में उस्ताद

नकल का सबसे अच्छा उदाहरण शायद होवरफ्लाई करती है। चटकीले पीले और काले रंग की धारियों वाला यह कीड़ा ततैया होने का नाटक करती है। उसके दुश्मन डर जाते हैं क्योंकि जहरीला ततैया उन्हें डंक मार सकता है। यह उपाय होवरफ्लाई को शिका
खतरनाक घात

मॉन्कफिश समुद्रतल से चिपक कर समुद्र तल में जैसे नजर ही नहीं आती है। और इसकी त्वचा पर ऐसी डिजाइन होती है, जो किसी कीड़े जैसी दिखती है। इसे कीड़ा समझकर जब कोई मछली इसकी तरफ आकर्षित होती है तो मॉन्कफिश उसे वापस नहीं जाने देती और अपना शिकार बना लेती है।
रियों से बचा लेता है।

बड़े काम का अविष्कार दूरबीन

बड़े काम का अविष्कार दूरबीन

बच्चों, कुछ अविष्कार ऐसे हैं जो दुनिया को बदल दिया, दूरबीन ऐसा ही अविष्कार है। यह दूर की चीजों को पास ले आती है और पास की चीजों को दूर दिखाती है। ऐसा जादू के कारण नहीं बल्कि विज्ञान के कारण होता है, दूरबीन आखिर बनी कैसे? आइए जानते हैं इसके बारे में-


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बच्चों, क्या तुमने कभी दूरबीन का इस्तेमाल किया है? बहुत काम की चीज है यह दूरबीन, जिससे देखने पर दूर आसमान के छोटे तारे भी साइज में बड़े और बेहद नजदीक नजर आने लगते हैं। शिकार के शौकीन लोगों, खगोलशास्त्री, नाविक, खारे जल की मछलियां पकड़ने वालों के लिए यह बड़ी उपयोगी चीज है। इतना ही नहीं, समुद्री और पहाड़ी क्षेत्रों में घूमने जाने वाले लोग अपने साथ दूरबीन रखना बहुत पसंद करते हैं। खास बात यह है कि बच्चे भी इसे आसानी से संभाल लेते हैं और उनके लिए अपने से बहुत दूर के दृश्यों को पास से देखना संभव हो जाता है। नई-नई तकनीक ने एक आम व्यक्ति के लिए भी इसे प्रयोग करना आसान बना दिया है।


खेल—खेल में बनी पहली दूरबीन

दूरबीन को बनाने वाले यानी फॉदर ऑफ टेलीस्कोप का नाम था, हेंस लिपरेशी। हॉलैंड देश के मिडिल बर्ग शहर में रहने वाले हेंस चश्मो का बिजनेस करते थे। हेंस का बेटा अक्सर कांच के रंग-बिरंगे टुकड़ों के साथ खेलता था। ऐसे ही एक दिन वह पिता लिपरेशी के साथ दुकान पर था। खेल खेल में बेटे ने टोकरी उठाई और बैठ के कांच छांटने लगा फिर उनको उठा के उसने आर-पार देखना शुरू किया। कभी अलग-अलग और कभी सबको साथ मिलाकर देखना शुरू किया। तब उसने देखा कि सामने जो गिरजाघर की मीनार है वो एकदम से पास आ गई है, उसको लगा कोई भ्रम है। फिर से देखा तो फिर से वही नजारा दिखा। उसने चिल्लाकर यह बात पिता को बताई तो लिपरेशी ने उसके हाथ से दोनों कांच के टुकड़े ले लिए। उसने भी कांच के टुकड़ों से मीनार को देखने की कोशिश की। उसको भी मीनार पास दिखाई देने लगी। उसने कई बार ऐसा कर के देखा और फिर उसे कांच का यह विज्ञान समझ आ गया। हेंस लिपरेशी खुशी से झूम उठा। उसने बच्चे को गोद में उठाते हुए कहा कि तुमने एक नई खोज की है। अब तक बच्चा इसे समझ नहीं पाया था। तब हेंस ने उसे समझाया कि तुमने दूर की चीज को पास दिखाने वाली तरकीब खोज दी है। अब हम एक यंत्र बनाएंगे इससे हमारा खूब नाम होगा।हेंस लिपरशी ने वैसे ही कांच को लगा के एक दूरबीन बनाई जो दुनिया की पहली दूरबीन थी। इसी दूरबीन के आधार पर गेलिलियो ने बड़ी दूरबीन बनाई। इस तरह दुनिया की पहली दूरबीन का अविष्कार हुआ।

कैसे काम करती है दूरबीन
दूरबीन में दो समान क्षमता वाले लेंस लगे होते हैं। ये दोनों लैंस एक ही दिशा में एक सीध में होते हैं। ये दोनों लेंय एक ही समय में एक ही दिशा और वस्तु पर फोकस करते हैं, जिससे व्यक्ति को किसी वस्तु को देख पाना बहुत आसान हो जाता है। बाइनोकुलर्स यानी दूरबीन को इस तरह डिजाइन किया गया है, जिससे देखने वालों को किसी वस्तु को सही, साफ और बड़े आकार में देखने में सहायता मिलती है। इससे तुम थ्री डाइमेंशन व्यू देख सकते हो। दूरबीन का इतिहास सबसे पहला दूरबीन टेलिस्कोप के आधार पर विकसित किया गया। आज भी टेलिस्कोप का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। दूरबीन की तुलना में टेलिस्कोप से हम एक आंख से देख पाते हैं।
गैलीलियन बाइनोकुलर्स
इसमें दो अलग-अलग लैंस होते थे। 17वीं शताब्दी से पहले जब टेलिस्कोप का अविष्कार हुआ, तभी से बाइनोकुलर्स की तरह किसी चीज को बनाने का विचार भी जन्म लेने लगा था। पहले बनने वाले बाइनोकुलर्स में गैलीलियन ऑप्टिक्स यानी मिरर थे, जिनमें उत्तल और अवतल लैंस एक साथ लगे होते थे। इसमें किसी वस्तु का विजन काफी साफ दिखाई देता था, लेकिन इसमें आकृति अब के समान बड़ी दिखाई नहीं देती थी।

पोरो प्रिज्म बाइनोकुलर्स
इस दूरबीन का आविष्कार इटेलियन ऑप्टिशियन इग्नैजियो पोरो ने किया था। इसी कारण इसका यह नाम भी पड़ा। उन्होंने 1854 में इस तकनीक को पेटेंट कराया। आगे चलकर कार्ल जेसिस ने 189० में इस तकनीक को रिफाइन किया। पोरो प्रिज्म में प्रिज्म को जेड-शेप दी गई थी, जिससे हम किसी विषय की छवि को साफ देख सकते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़े आकार की दूरबीन का निर्माण होने लगा। जिसमें लैंस एक-दूसरे से काफी अलग होते थे। यह प्रिज्म बाइनोकुलर्स गैलीलियन बाइनोकुलर्स से बेहतर थे इसलिए गैलीलियन बाइनोकुलर की लोकप्रियता घटने लगी थी। इसके बाद रूफ प्रिज्म बाइनोकुलर्स का जन्म हुआ। इस दूरबीन को बनाने का श्रेय एशले विक्टर मिले डॉबरीज को जाता है। रूफ प्रिज्म पोरो प्रिज्म की तुलना में छोटा और कॉम्पैक्ट था। आज दुनियाभर में दूरबीन के कई प्रकार हैं। तो तैयार हो जाओ दूर की चीजों से दोस्ती करने के लिए!

बुधवार, 25 मार्च 2015

ऑस्ट्रेलिया की बेहतरीन चार यूनिवर्सिटी

एब्रॉड एजुकेशन
अभिषेक कांत पाण्डेय
ऑस्ट्रेलिया की बेहतरीन चार यूनिवर्सिटी
ऑस्टलिया में इधर कुछ सालों से शिक्षा के लिए भारतीय छात्र का आकर्षण बढ़ा है, यहां यूरोप जैसी हाई क्वॉलिटी की एजुकेशन कम पैसे खर्च कर प्राप्त कर सकते हैं। ऑस्टàेलिया में बेहतरीन चार यूनिवर्सिटीज के बारे में जानकारी दी जा रही है, यहां पर पढ़ाई कर आप अपना भविष्य संवार सकते हैं।
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ऑस्ट्रेलिया दुनिया का सबसे छोटा महाद्बीप है, यहां की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में वर्तमान में 48००० भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे हैं। दुनिया की 1०० बेस्ट यूनिवर्सिटीज में ऑस्ट्रेलिया की कई यूनिवर्सिटीज शामिल हैं। अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में ऑस्ट्रेलिया में एडमिशन लेना आसान होता है। वोकेशनल कोर्सेज के साथ यहां कॉमर्स और आट्र्स के कोर्सेज के लिए छात्र आते हैं। ऑस्ट्रेलिया की चार बेहतरीन यूनिवर्सिटी जहां पर आप पढ़ाई कर सकते हैं। यहां की बेस्ट यूनिवर्सिटीज हैं- यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी।
यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड
दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी में से एक यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड ऑस्टàेलिया के ब्रिस्बेन शहर में है, इसकी स्थापना सन् 19०9 में हुआ था। रिसर्च के क्ष्ोत्र में नई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने में यह यूनिवर्सिटी सबसे आगे है। 5० हजार से ज्यादा छात्र यहां पर ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई कर रहे हैं। फैकल्टी ऑफ बिजिनस, इकोनामिक्स एंड लॉ, फैकल्टी ऑफ ह्यूमिनिटिस एंड सोशल साइंस, फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, फैकल्टी ऑफ मेडिसीन एंड बायोमेडिकल साइंस, फैकल्टी ऑफ हेल्थ एंड बिहेविरल साइंस और फैकल्टी ऑफ साइंस कुल 6 फैकल्टी हैं। लेकिन रिसर्च के क्ष्ोत्र में खासतौर पर साइंस, मेडिसीन और टेक्नोलाजी में यह यूनिवर्सिटी रिसर्च छात्रों को आकर्षित करती है। इस यूनिवर्सिटी से कई बेहतरीन रिसर्च इंस्टीटñूट और हेल्थ सेंटर जुड़े हुए हैं। बेहतरीन टीचिंग स्टॉफ के साथ यहां की लाइब्रेरी, म्यूजियम, आर्ट म्यूजियम और छात्रों के रहने के लिए हॉस्टल की सुविधा पढ़ाई के साथ एक अच्छा वातावरण प्रदान करती है। विदेशी छात्रों के मैत्रीय कार्यक्रम, स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम और नए छात्रों को पुराने छात्रों से घुलने-मिलने के लिए 'ओरिएटेशन वीक प्रोग्राम’ भी चलाए जाते हैं। मेडिसीन और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई में यह यूनिवर्सिटी सर्वश्रेष्ठ है, वहीं यहां के डिग्री होल्डर के लिए विश्व में कहीं भी जॉब के बेहतर अवसर भी उपलब्ध है। यहां पर कैंपस सेलेक्शन के जरिए विश्व की बेहतरीन कंपनियां, यहां के छात्रों को अच्छा पैकेज देती हैं।
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी सरकार द्बारा संचालित यूनिवर्सिटी है, इसकी स्थापना ऑस्ट्रेलिया की संसद के द्बारा सन् 1946 को हुआ था। ऑस्ट्रेलिया की राजधानी केनबेरा में स्थित यह यूनिवर्सिटी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और अपने शांत वातारण के लिए पहचानी जाती है। ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में 2० हजार से अधिक छात्र यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। रिसर्च के मामले में यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी में से एक है, अमेरिका और यूरोप की यूनिवर्सिटी जैसी शिक्षण पद्धति यहां देखने को मिलती है। यहां के टैलेंटेड टीचिंग स्टॉफ के कारण यह रिसर्च की पढ़ाई के लिए आदर्श जगह है। इस यूनिवर्सिटी से संलग्न छह कॉलेज हैं- कॉलेज ऑफ आर्ट एंड सोशल साइंस, कॉलेज ऑफ एशिया एंड पेसिफिक, कॉलेज ऑफ बिजनेस एंड इकोनामिक्स, कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड कम्प्यूटर साइंस, कॉलेज ऑफ लॉ और ज्वॉइंट कालेज ऑफ साइंस।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न
ऑस्ट्रेलिया की दूसरी सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है, इसकी स्थापना सन् 1853 में हुई थी। अपने 16० साल के इतिहास में इस यूनिवर्सिटी से कई महान हस्तियों ने यहां से पढ़ाई की है, जिनमें सात नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले यहां के छात्र रह चुके हैं। यूनिवर्सिटी से जुड़े 12 रेसिडेंशियल कॉलेज हैं, जो मेन कैंपस के आसपास हैं। इस कारण से यहां पर छात्रों को रहने के साथ ही समग्र शिक्षा का अनुभव भी प्राप्त होता है। यहां के विशाल लाइब्रेरी में नई व पुरानी पुस्तकें, रिसर्च सामग्री और डिजिटल सामग्री भी उपलब्ध है। इस लाइब्रेरी में आर्ट एंड ह्यूमिनिटिस, बायोमेडिकल, लॉ, म्यूजिक, वेंटरनरी साइंस की अलग-अलग पुस्तकों का विश्ोष संग्रह भी है। मेडिसिन के क्ष्ोत्र में यहां पढ़ाई के लिए पोस्ट गेजुएट और रिसर्च में कई कोर्स संचालित होते हैं। इसके साथ ही शिक्षा, कला और पर्यावरण में कई उच्च स्तरीय कोर्स भी हैं। पढ़ाई के साथ एक्सट्रा एक्टिविटी के जरिए छात्रों में नेतृत्व गुण व व्यक्तित्व विकास के लिए कई कार्यक्रमों का संचालन होता है। जिनमें 'प्रोश वीक’ में कई तरह के ख्ोल का आयोजन टीम भावना और नेतृत्व के गुण विकसित करने के लिए किया जाता है। 'मेलबर्न एसिलेटर प्रोग्राम’ में वर्कशॉप, पब्लिक इवेंट का अयोजन किया जाता है, जिसमें छात्रों के अंदर एंटरप्रिन्योर बनने की झमता का विकास किया जाता है
यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी
ऑस्टे्लिया की यह पहली यूनिवर्सिटी है, जिसकी स्थापना सन् 185० में हुआ था। अपनी स्थापना से लेकर अब तक यूनिवर्सिटी अपनी क्वॉलिटी एजुकेशन के लिए दुनिया में जाना जाता है। इस यूनिवर्सिटी की 16 फैकेल्टी है और कॉलेज हैं, जिसके माध्यम से ग्रजुएशन, पोस्टग्रेजुएशन और डॉक्टोरल की डिग्री प्रदान करती है। उद्योग और पर्यटन के शहर सिडनी में इस यूनिवर्सिटी का कैंपस दुनिया में टॉप 1० ब्यूटीफुल यूनिवर्सिटी में से एक है। कैंपरडाउन कैंपस जो सिडनी शहर से 3 किलोमीटर दूर है, इस कैंपस की की खूबसूरत बिल्डिंग का डिजाइन 2०वीं शताब्दी में वास्तुकार एडमंड ब्लैकेट ने किया था। यहां पर यूनिवर्सिटी का प्रशासनिक भवन और आर्ट, साइंस, एजुकेशन एंड सोशलवर्क, फार्मेसी, वेटेरनरी साइंस, इकोनामिक्स एंड बिजनेस, इंजीनियरिंग फैकेल्टी स्थित है। विशालकाय फैकेल्टी ऑफ मेडिसीन यहां के टीचिंग हॉस्पिटलस से जुड़े हुए हैं। यहां की मेन लाइब्रेरी में तीन लाख से अधिक पुस्तकें हैं, डिजिटल बुक की लंबी श्रृंखला है। यहां पर न्यूटन की प्रसिद्ध पुस्तक 'आइसक न्यूटन्स फिलास्फी नेचुरालिस प्रिंसिपिया मैथमेटिका’ का प्रथम संस्करण की एकमात्र मूल कापी है।

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