शनिवार, 11 जुलाई 2015

समझें आखों की भाषा

रिलेशनशिप
कई बार जो बात हम अपनी जुबान से नहीं कह सकते, हमारी आंखें बयान कर देती हैं या यूं कहें हम अपनी बातों को कई बार इशारों से भी बाखूबी कह सकते हैं। अकसर ऐसा भी होता है कि पति कुछ कह नहीं पाते लेकिन वे इशारों में ही बहुत कुछ कह देते हैं, जिसको समझना आना चाहिए।

आप अपने पति को अच्छी तरह से जानती हैं लेकिन कभी-कभी लगता है कि आप उन्हें बेहतर तरीके से नहीं जानतीं। ऐसा क्यों होता है? कभी-कभी दांपत्य जीवन में नीरसता आ जाती है। पति के व्यवहार में बदलाव को आप समझ नहीं पाती हैं। उसके पीछे छिपी कोई समस्या है, जिसे वे आपसे शेयर नहीं करना चाहते हैं। पति की इस तरह की मनोस्थिति को आप थोड़ा ध्यान दें तो आसानी से समझ सकती हैं। क्या है आंखों और इशारों की भाषा, यह जानकर आप अपने दांपत्य जीवन को सुखमय बना सकती हैं।

आंखों को पढ़ें
कहते हैं कि किसी भी इंसान के मन में क्या चल रहा है, यह जानना मुश्किल है लेकिन आंखों को देखकर कई बार पता चल जाता है। पति के मन में क्या चल रहा है, जो आपसे शेयर नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में कोई धरणा न बनाएं, जब तक सच्चाई न पता चले। आप पति से बात करें, इस दौरान उनकी आंखों को देखें, क्या वे कुछ बताने से कतरा रहे हैं। बात करते समय उनकी आंख इधर-उधर देख रही है। उनके चेहरे को पढ़ें, क्या कोई परेशानी उनके चेहरे पर नजर आ रही है। यहां अपनी परेशानी छिपाने के लिए हंसने की बनावटी एक्टिंग कर रहे हैं। अगर आपको लगे कोई समस्या है तो उनसे बात करें और कहें कि समस्या शेयर करने से ही हल होती है। उन्हें बताएं कि हर हाल में आप उनके साथ हैं।

प्यार भरा स्पर्श
पति के रोमांस के मूड में हैं तो इसे समझें। कैसें? अगर वे आपको प्यार से छूते हैं और चेहरे को स्पर्श करते हैं तो उनके इशारों को समझें कि उनका मन किस तरफ इशारा कर रहा है। आप जानती हैं, इस बिजी लाइफ में पति-पत्नी रिश्ते को मजबूत बनाने वाले प्रेम और एक-दूसरे को केयर करना हम भूल जाते हैं। जब पति आपसे बात करना चाह रहे हैं और आप उसी समय बहुत बिजी हैं तो उस वक्त उनके दिल की भावना को समझें, तुरंत अपना काम छोड़ें और पति पर ध्यान दें। दलअसल रिश्ते मजबूत करने का यही सही वक्त है। साथ बैठे, बातचीत करें, अच्छा खाएं और पिएं।

पति करे आपकी मदद तो समझें इशारे
पति ऑफिस से घर आने के बाद आपके हर काम में आपकी मदद करने लगें या आपके पास बैठकर कुछ ऐसा करने लगें, जिससे आपको अच्छा महसूस हो तो उस दिन अपने पार्टनर के इशारों को समझने का प्रयास करें कि आज वो कुछ अलग करने के मूड
में हैं।=

अच्छे वैवाहिक जीवन के लिए खुद को बदले

रिलेशनशिप

वैवाहिक जीवन सुखी बना रहे, इसके लिए आप हर तरह की कोशिशें करती हैं लेकिन कभी-कभी हम ईमानदारी से खुद से पूछें तो पाते हैं कि कहीं न कहीं रिश्ते को निभाने में चूक रहे हैं। क्या आपकी वैवाहिक जीवन की नैया डगमगा रही है, अगर ऐसा है तो संभलें और खुद पर गौर करें, बदलाव लाएं और अपनी मैरिज लाइफ को बचाएं।

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पिछले कुछ समय से हमारे देश में शादियां टूटने के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अग्नि को साक्षी मानकर जन्म-जन्मांतरों तक साथ रहने की कसमें खाने वाले जीवनसाथी आखिर क्यों साथ निभा नहीं पाते। कुछ स्थितियां हैं, जिनके कारण मैरिज लाइफ पर संकट आता है। इन्हें बस दूर करने की जरूरत है।

हमेशा खुद को सही न ठहराएं
शादी टूटने का ये भी एक कारण हो सकता है कि आप अपनी हर बात को सही साबित करने का प्रयास करें और दूसरे की भावनाओं की कद्र न करें। इस तरह से आप एकांगी सोच की तरफ झुक जाती हैं और पति आपकी इन आदतों से आहत होता हो इसीलिए इस पर गौर करें। जीवन साथी के बातों को भी सुनें और समझें।

पुरानी बातों को कुरेदना छोड़े
अगर आप बार-बार यह ताना देंगी कि पति के रिश्तेदार सही नहीं है या बात-बात पर ससुराल वालों को नीचा दिखाएंगी तो शर्तिया बहस शुरू होगी। इस वजह से दोनों एक-दूसरे को भला-बुरा कहना शुरू करेंगे, पुरानी बातें, गलतियों, आरोप-प्रत्यारोप से स्थिति और बिगड़ेगी। ऐसा बार-बार होता है तो आप ही समझने की कोशिश करें और इस तरह की बहस में न उलझें। जीवनसाथी की गलतियों को नजरअंदाज करें, हो सकता है कि उनमें सुधार आ रहा हो। दांपत्य जीवन में प्रेम का रस घुलेगा तो जीवनसाथी निश्चित ही अपनी गलतियों को दूर करने की भी कोशिश करेगा।

स्वयं बात करने की पहल करें
किसी बात को लेकर हुई नाराजगी के कारण आपका चुप्पी साध लेना, दांपत्य जीवन के लिए कतई सही नहीं है। कई दिनों तक बात न करना भी शादीशुदा रिश्तों के टूटने का बड़ा कारण बन सकता है। अगर आप एक-दूसरे से बोलेंगे नहीं, तो मन में एक-दूसरे के प्रति काल्पनिक नकारात्मक विचार पनपना शुरू होगा, इस कारण से आप मन की बात जीवनसाथी से शेयर नहीं कर पाएंगी। ऐसे में अच्छा यह है कि आप समझदारी दिखाएं और बात करने की पहल करें। यह कदम आपकी मैरिज लाइफ को बचा लेगा और रिश्तों को मजबूत बनाएगा।

सिंगल मदर कामयाब भी, अच्छी मां भी


अभिषेक कांत पाण्डेय
 

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आज महिलाएं खुद फैसले ले रही हैं और क्यों न लें, वे पढ़ी-लिखी हैं, कामयाब हैं, उन्हें अपनी जिंदगी अपनी आजादी से जीने का हक है। आज सिंगल मदर बिना पुरुषों के खुद घर और बाहर की जिम्मेदारी बाखूबी उठा रही हैं। ये जीवन में कामयाब हैं और एक अच्छी मां भी हैं, इन्हें पुरुषों के सहारे की जरूरत नहीं है।


हमारा समाज आज कितना भी आधुनिक हो गया हो, लेकिन भारत में सिंगल मदर होना आसान नहीं है। अकेले एक महिला का जीवन यापन करना और बच्चों की परवरिश करना मुश्किलों से भरा है। सिंगल मदर के लिए सर्वोच्च न्यायालय के हक में अहम फैसला आया है कि सिंगल मदर को अपने बच्चे का कानूनी अभिभावक बनने के लिए बच्चे के पिता का नाम या सहमति की कोई जरूरत नहीं है। यह फैसला ऐसी महिलाओं के लिए राहत भरा है, जो किन्हीं कारणों से सिंगल मदर के रूप में जीवन जी रही हैं। लेकिन आज भी हमारा समाज सिंगल मदर को अच्छी निगाहों से नहीं देखता है। सामाज के दकियानूसी खयाल वाले कुछ ठेकेदार, अकेले जीने वाली महिलाओं के हक की बात पर उनके राहों में हमेशा कांटे बोते रहे हैं। सवाल यह उठता है कि महिलाएं हमेशा पुरुषों के मुताबिक क्यों चले, तलाकशुदा महिला या विधवा महिला या अविवाहित महिला का अपना कोई जीवन नहीं है, उन्हें अपने बच्चे की परवरिश का कोई अधिकार नहीं है। हमारा कानून भी इन महिलाओं की आजादी और हक की बात करता है, तो समाज की सोच में बदलाव क्यों नहीं आ रहा है। वहीं आज आधुनिकता के इस दौर में सामाजिक ताने-बाने में, काम करने के तरीके में और आधुनिक जीवनशैली में बहुत बदलाव आया है। इसलिए महिलाओं को भी पुरुषों के सामान अधिकार दिया जाना जरूरी है।

सुष्मिता सेन सिंगल मदर के लिए मिसाल


सुष्मिता सेन 39 साल की हैं और अभी तक शादी नहीं किया है। कामयाबी की सिढ़ियां चढ़ते वक्त जब मिस यूनिवर्स का खिताब उन्हें मिला तो वर्ष 2००० में सुष्मिता ने अपनी पहली बेटी रिनी को गोद लिया और इसके दस साल बाद दूसरी बेटी अलीशा को गोद लिया। उनका मानना है कि बच्चे के लिए बिना शर्त प्यार ही मायने रखता है। इससे मतलब नहीं कि वह आपके पेट से निकला है या दिल से। वे बताती हैं कि अकेले होने का मतलब यह नहीं कि आप अवसाद में रहें। सुष्मिता ने एक दफा 22 कैरट की डायमंड रिग ली तो यह अफवाह उड़ी कि वह सगाई करने जा रही हैं। इस पर उन्होंने कहा था कि मुझे हीरे खरीदने के लिए किसी पुरुष की जरूरत नहीं है। मैं इसके लिए सक्षम हूं। वह मानती हैं कि हमें अपनी स्वतंत्रता पर गर्व करना चाहिए और खुद का खयाल रखने से चूकना नहीं चाहिए।
सुष्मिता सेन अर्थिक रूप से संपन्न और कामयाब महिला हैं, उन्हें अपने फैसले लेने के लिए किसी के दबाव और जोरजबरदस्ती की जरूरत नहीं है। उन्होंने अविवाहित रहते हुए दो बच्चियों को गोद लेकर इस समाज के सामने खुशहाल जीवन का मिसाल रखा है।

खुश हैं अपनी जिंदगी से दीपाली

Z:\Daily Feature Page\Kalyani\11 July\deepali.jpg25 साल की दीपाली मुबंई में अपने चार साल के बेटे के साथ एक कमरे के मकान में रहती हैं। वह अपने बच्चे की परवरिश खुद करती हैं, वह घरों में सर्वेंट का और शादी के सीजन में वेट्रेस का काम भी करती हैं। उन्होंने पति के उत्पीड़न से तंग आकर तलाक ले लिया है। वहीं मायके वालों ने उन्हें अपने साथ नहीं रखा। दीपाली बताती हैं कि वह अपने पति के बैगेर जीना सीख चुकी है। उस नर्क भरे जीवन से मेरा यह जीवन अच्छा है, मेरे पति मुझे मारते-पीटते थे, मैं ऐसी जिंदगी से तंग आ गई थी। अब दीपाली अकेली हैं और सिंगल मदर की लाइफ जी रही हैं। उनकी मैरिज लाइफ दुखों से भरी थी, इसीलिए उन्होंने तलाक लेने का फैसला लिया था। वहीं अब उनके जीने का कारण उनका बेटा है, उसकी जिंदगी संवारने के लिए दीपाली मेहनत करती हैं। दो वक्त की रोटी कमाने के लिए दीपाली को बहुत संघर्ष करना पड़ता है, इसके बावजूद वो अपनी इस जिंदगी से बहुत खुश हैं। दीपाली बताती हैं कि उन जैसी तालाकशुदा महिला को अकेले रहने पर खासी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। शुरू में आस-पड़ोस के लोगों का व्यवहार उनके प्रति ऐसा रहा, जैसे उन्होंने कोई गुनाह किया है, लेकिन बाद में सब ठीक हो गया। दीपाली ने अपने काम और हौसले से जीने की नई ललक पैदा की है। यही कारण है कि वे मेहनत करके अपने चार साल के बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहती हैं ताकि उनक बेटा बेहतर इंसान बन सके।
दीपाली के लिए सिंगल वूमेन बनने का फैसला बहुत मुश्किल भरा इसीलिए रहा कि वह बहुत पढ़ी-लिखी नहीं हैं और न ही वह कोई सेलिब्रिटी हैं। वहीं टीवी और फिल्मों की ग्ल्ौमर की दुनिया में तलाक आम बात है। ऐसी कामयाब महिलाएं या सेलिब्रिटी जो जीवन साथी के साथ एडजस्ट नहीं कर पाते हैं तो उनके लिए सिंगल वूमेन बनने का फैसला लेना आसान होता है।

बिन ब्याही मां नीना गुप्ता

हिंदी फिल्मों की एक्ट्रेस नीना गुप्ता 9० के दशक में बिन ब्याही मां बनीं। हालांकि उनकी राय उनकी व्यावहारिक जिंदगी से बिल्कुल उलट है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि शादी से पहले बच्चा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरी बेटी हमारे(विवियन रिचड्र्स) के प्यार की निशानी है। दरअसल नीना गुप्ता ने जो किया, शायद उसकी सलाह वे दूसरों को नहीं देना चाहतीं। वे कहती हैं कि हमारे यहां सिगल मदर बनना बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन उनके लिए बिन ब्याही मां बनने का फैसला लेना इसलिए आसान रहा कि वे कामयाब और आर्थिक रूप से संपन्न हैं। यही कारण है कि नीना गुप्ता अपनी बेटी की शानदार परवरिश कर रही हैं। विवियन रिचड्र्स से दिल टूटने के बाद नीना गुप्ता लंबे समय से अकेले रह रही थीं, उन्हें अपनी जिंदगी में जीवनसाथी की जरूरत महसूस हुई। इसीलिए साल 2००8 में दिल्ली के रहने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट विवेक मेहरा से शादी कर लिया।
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पुरुषों की नहीं है जरूरत


आज हम तेजी से तरक्की कर रहे हैं, हमारी सोच बदल रही है। इसके बावजूद हमारे समाज में आज भी बिन ब्याह के मां बनना समाज को स्वीकार्य नहीं है। वहीं कई महिलाएं सामाजिक विरोध के चलते अकेली मां बनती हैं। लेकिन उन्हें सारी जिंदगी दूसरों के कटाक्ष का सामना करना पड़ता है। गीत ओबेराय या सुजाता शंकर ही नहीं बल्कि ऐसी सैकड़ों महिलाएं हैं, जो सिगल मदर हैं। ये महिलाएं आर्थिक रूप से सफल हैं, पुरुषों की जरूरत उन्हें महसूस नहीं होती। लेकिन समाज की निगाहें उनसे बार-बार यही कहती है कि वह असफल हैं। शायद इसीलिए कोई भी पुरुष उनकी जिंदगी में नहीं है। वैसे उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर जिंदगी उनकी है और फैसला उनका है। तलाकशुदा समिता बैंक में क्लर्क हैं, कहती हैं कि मुझे अपनी बेटी की बेहतर परवरिश के लिए किसी मर्द की जरूरत नहीं है। वे इस बात से भी खुश है कि कम से कम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हर फार्म में पिता का नाम भरना, अब जरूरी नहीं है। क्या जिनके पिता नहीं होते, वह हायर, एजुकेशन हासिल नहीं कर सकते? क्या पिता का नाम होना इतना जरूरी है? कहने की बात यह है कि महिलाएं अब खुलकर सामने आ रही हैं। अपने बच्चों की परवरिश के लिए पिता के मुहर की उन्हें जरूरत महसूस नहीं होती है।

रविवार, 5 जुलाई 2015

आओ जानें डायनासोर की दुनिया


अभिषेक कांत पाण्डेय
स्टीवन स्पीलबर्ग की जुरासिक पार्क फ्रेंचाइजी की नई फिल्म 'जुरासिक वर्ल्ड’ इन दिनों खूब धूम मचा रही है। इससे पहले भी एक फिल्म 'जुरासिक पार्क’ आई थी, जिसने पूरी दुनिया में डायनासोर नाम के जीव से परिचय कराया था। तुमने भी वह फिल्म देखी होगी, आखिर कहां चले गए ये डायनासोर, कैसे हुआ इनका अंत... इनके बारे में तुम अवश्य जानना चाहोगे।


कई तरह के थे डायनासोर

स्टीवन स्पीलबर्ग की जुरासिक पार्क फ्रेंचाइजी की नई फिल्म 'जुरासिक वर्ल्ड’ इन दिनों खूब धूम मचा रही है। इससे पहले भी एक फिल्म 'जुरासिक पार्क’ आई थी, जिसने पूरी दुनिया में डायनासोर नाम के जीव से परिचय कराया था। तुमने भी वह फिल्म देखी होगी, आखिर कहां चले गए ये डायनासोर, कैसे हुआ इनका अंत... इनके बारे में तुम अवश्य जानना चाहोगे।

डायनासोर की और बातें

.इनके अब तक 5०० वंशों और 1००० से अधिक प्रजातियों की पहचान हुई है।
.कुछ डायनासोर शाकाहारी, तो कुछ मांसाहारी होते थे जबकि कुछ डायनासारे दो पैरों वाले, तो कुछ चार पैरों वाले थे।
.डायनासोर बड़े होते थे, पर कुछ प्रजातियों का आकार मानव के बराबर, तो उससे भी छोटे होते थे।
.कुछ डायनासोर अंडे देने के पक्षियों की तरह घोसले बनाते थे।
.सबसे छोटे डायनासोर के जीवाश्म की ऊंचाई 13 और लंबाई 16 इंच की है।

टाइटेनोसोरस:
टाइटेनोसोरस का मतलब है, दैत्याकार छिपकली। इसके कुछ हिस्सों के जीवाश्म ही प्राप्त हुए हैं। यह करीब 2० फीट ऊंचा और 3० फीट लंबा था। इसके जीवाश्म क्रेटेशियस काल के हैं। इन्हें जबलपुर के पास से लाइडेकर ने1877 में खोजा था।
इंडोसोरस:
वॉन हुइन एवं मेटली ने 1933 में जबलपुर, मंडला के कई स्थानों पर कई डायनासोर्स के जीवाश्म खोजे थे। जैसे, मेगालोसोर, कारनाटोसोर, आर्थोगानियासोर आदि। इन सभी को थीरोपोड जीव समूह के इंडोसोर उपसमूह में रखा गया है। इनके भी अधूरे जीवाश्म ही प्राप्त हुए हैं। इनकी ऊंचाई करीब 3०-35 फुट और वजन 7०० किलो रहा होगा।
जबलपुरिया टेनियस:
इसके जीवाश्म 1933 में वॉन हुश्न एवं मेटली द्बारा जबलपुर के पास लमेटा से खोजे गए थे। यह छोटे कद का (करीब 3 फुट ऊंचा, 4 फीट लंबा) और 15 किलो वजनी डायनासोर था।

डायनासोर का मतलब होता है दैत्याकार छिपकली। ये छिपकली और मगरमच्छ फैमिली के जीव थे। वैज्ञानिकों ने जीवों की उत्पति के मुताबिक समय को बांटा है। आज से 25 करोड़ साल पहले के समय को ज्यूरासिक युग कहते हैं। डायनासोर लगभग 19 करोड़ साल तक इस धरती पर रहे हैं। तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि उस समय इनकी कुछ ऐसी प्रजातियां भी थीं, जो पक्षियों के तरह उड़ती थीं। ये सभी डायनासोर सरिसृप समूह के थे। इनमें कुछ छोटे (4 से 5 फीट ऊंचे), तो कुछ विशालकाय (5० से 6० फीट ऊंचे) थे। इनकी अधिकतम ऊंचाई 1०० फीट तक नापी गई है। आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व ये पृथ्वी से अचानक विलुप्त हो गए, लेकिन भारत और चीन में ये उसके बाद तक (लगभग 5० से 6० लाख वर्ष तक जिंदा रहे हैं। और हां, ये सब जानकारी उनके अलग-अलग जगहों पर पाए गए जीवाश्म के अध्ययन से मिली है।
आर्कटिक के जंगलों घूमते थे डायनासोर
आज से 1० करोड़ साल पहले आर्कटिक में बर्फ नहीं था, बल्कि यहां पर जंगल था। इन जंगलों में डायनासोर आराम से रहते थे। वैज्ञानकों ने डायनासोर युग के पौधों की वास्तविक तस्वीरें तैयार कर बताया है कि करीब 1० करोड़ साल पहले इस धुव्रीय क्षेत्र में वैसी ही जलवायु थी, जैसी कि आज ब्रिटेन में है।

कभी तैरते थे डायनासोर
डायनासोर न सिर्फ जमीन पर चलते थे, बल्कि वे पानी में भी तैरते थे। ये भोजन के लिए मछलियों और अन्य समुद्री जीवों को निशाना बनाते थे। स्पाइनोसोर परिवार के बैरीयोनिक्स वाकेरी डायनासोर की खोपड़ी लंबी थी और वह मगरमच्छ जैसी दिखाई देती थी। उसके दांत भी चाकू के आकार के थे। टायरनोसोर रेक्स जाति के और धरती पर रहने वाले डायनासोर के दांत कुल्हाड़ी के आकार के होते थे।

भारत में डायनासोर
भारत में भी डायनासोर के कई जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। इनमें नर्मदा घाटी से मिले डायनासोर के जीवाश्म का इतिहास बहुत लंबा है। सबसे पहले आर. लाइडेकर ने 1877 में जबलपुर के पास से लमेटा जगह से डायनासोर के जीवाश्म पाया था। इसे टायटेनोसोर कहा गया।

मिले पंजों के निशान
जीवाश्म विशेषज्ञों ने यूरोप में स्विस पर्वत पर डायनासोर का अब तक का सबसे बड़ा पंजे का निशान खोजा है। नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के एक टीम ने स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े पार्क इला नेचर रिजर्व में 3,3०० मीटर के दायरे में 15 इंच लंबे पंजों के निशान को खोजा है। पंजों के निशान देखकर वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया कि 15 से 2० फीट लंबे तीन पैर वाला जानवर 21 करोड़ साल से भी पहले स्विस आल्पस पर घूमता-फिरता था। 15 इंच लंबे निशान ट्रियासिक काल के मांस भक्षी डायनासोर के हैं, जो उस दौर में पृथ्वी पर सबसे बड़े शिकारी हुआ करते थे।

​कहां गायब हो गएं डायनासोर
6 करोड़ साल पहले धरती पर अचानक बड़े-बड़े उल्का पिड गिरने लगे। इस कारण से डायनासोर का अस्तित्व खत्म होने लगा। वैज्ञानिकों ने डायनासोर के विलुप्त होने और भी कारण बताएं हैं। एकाएक जलवायु परिवर्तन के कारण डायनासोर खुद को मौसम के मुताबिक ढाल नहीं पाए, इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की वजह से भोजन की कमी के कारण ये खत्म हो गए।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

मध्य प्रदेश शासन में बनें ग्रामीण उद्यान अधिकारी

एग्रीकल्चर या इसके समकक्ष ग्रेजुएशन की डिग्री आपके पास है तो मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल के जरिए ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी और इसके समकक्ष कई पदों के लिए जॉब अप्लाई कर सकते हैं। फार्म भरने से लेकर तैयारी करने की सारी जानकारी यहां से लीजिए-
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परीक्षा पैटर्न
विभिन्न पदों के लिए 6 सितंबर को दो पलियों में परीक्षा आयोजित होगी। दोनों प्रश्न पत्र दो घंटे और 1००-1०० अंक के होंगे। यह परीक्षा ऑब्जेक्टिव टाइप का होगी।
पहला पेपर हायर सेकेंडरी लेवल का होगा। 1०० अंकों के प्रश्न पूछे जाएंगे, सही उत्तर को काले बाल प्वाइंट पेन से भरना है। दिए गए सिलेबस अनुसार सामान्य तार्किक योग्यता, सामान्य ज्ञान, सामान्य हिंदी, सामान्य अंग्रेजी, सामान्य गणित, सामान्य विज्ञान, सामान्य कंप्यूटर ज्ञान के विषयों से प्रश्न पूछे जाएंगे। इन सब्जेक्ट की तैयारी के लिए इंटर लेवल की बुक पढ़ें। इसके साथ सही फैक्ट वाले जनरल नॉलेज की बुक की स्टडी भी करना लाभदायी है। दूसरी पाली में दूसरा पेपर होगा, इसमें आपने जिस पद के लिए आवेदन किया है, उससे संबंधित 1०० अंक के ऑब्जेक्टिव टाइप के प्रश्न पूछे जाएंगे। जिनमें एग्रीकल्चर, एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, फॉरेस्टàी, हार्टीकल्चर, सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन की योग्यता रखने वाले कैंडिडेट के लिए दूसरा पेपर ऑप्शनल होगा। इस पेपर में पूछा जाने वाला सवाल संबंधित विषय से स्नातक लेवल का होगा। जबकि मैकनिकल डिप्लोमा योग्यता वाले पद के लिए पेपर में डिप्लोमा स्तर के सवाल पूछे जाएंगे।

इंटरव्यू
रिटेन पेपर के आधार पर मेरिट में आने वाले कैंडिडेट्स को पद के सापेक्ष साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा। अंतिम चयन इंटरव्यू और रिटेन पेपर में प्राप्त अंक के आधार पर होगा।
आयु सीमा:18-4० वर्ष के बीच
कुल पोस्ट: 1519 पद
पद का नाम:
1- ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी: 244 पद
2- कृषि विकास अधिकारी:
198 पद
3- ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी: 675 पद
4- भूमि संरक्षण सर्वे के अधिकारी: 32० पद
5- प्रक्ष्ोत्र विस्तार अधिकारी: 69 पद
6- यांत्रिक सहायक: 13 पद
योग्यता: मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से कृषि/ बागवानी/ कृषि अभियांत्रिकी/ वानिकी में स्नातक की डिग्री।
आयु सीमा: 1 जनवरी-2०15 के आधार पर 18 वर्ष से 4० वर्ष तक।
आवेदन शुल्क: उम्मीदवारों को आवेदन शुल्क 7०० रुपये और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 35० रुपये का भुगतान ऑनलाइन बैंकिंग के माध्यम से करना है।
चयन प्रक्रिया: उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा का आधार और साक्षात्कार में प्रदर्शन पर किया जाएगा।
महत्वपूर्ण तिथियां: ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि:24 जुलाई
परीक्षा की तारीख: 6 सितंबर-2०15 (रविवार)

करें कंबाइड हायर सेकेंडरी लेवल एग्जामिनेशन 2०15 की तैयारी


कर्मचारी चयन आयोग केंद्रीय संस्थानों में ग्रुप सी कैटेगरी के कर्मचारियों की भर्ती करता है। कंबाइड हायर सेकेंडरी लेवल एग्जामिनेशन 2०15 के लिए असिस्टेंट, डाटा एंट्री ऑपरेटर व एलडीसी के 6578 पदों पर भर्ती की अधिसूचना जारी की गई है। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं तो यह बिल्कुल सही समय है। इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 13 जुलाई है। एलिजिबिलिटी, एग्जाम पैटर्न और प्रिपरेशन की सही जानकारी इस नौकरी को हासिल करने में मदद करेगी।
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कर्मचारी चयन आयोग देशभर में केंद्रीय कर्मचारियों की भर्ती करता है। कंबाइड हायर सेकेंडरी लेवल एग्जामिनेशन 2०15 के जरिए ग्रुप सी के पद पर ज्वाइन करने के बाद आप विभागीय परीक्षा देकर गजेटेड ऑफिसर की पोस्ट तक भी पहुंच सकते हैं। अपने मनपसंद विभाग में ऊंचे ओहदे पर काम करने का सपना साकार करने का यह शॉर्टकट तरीका है। बस आप में ध्ौर्य और सही रणनीति को फॉलो करने की समझदारी होनी चाहिए, फिर कामयाबी आपके हाथ में होगी।

एलिजिबिलिटी
1 अगस्त, 2०15 से पहले आपके पास 12वीं या इसके समकक्ष कोई योग्यता होनी चाहिए। आवेदन करने की आयु 18 से 27 वर्ष के बीच होनी चाहिए। अनुसूचित जाति/ जनजाति/ पिछड़ा वर्ग और अन्य आरक्षित वर्गों को नियम के अनुसार अधिकतम आयु में छूट दी जाएगी।

एग्जाम पैटर्न
डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद के लिए रिटेन टेस्ट और स्किल टेस्ट लिया जाएगा। वहीं पोस्टल असिस्टेंट, शॉर्टिंग असिस्टेंट और लोवर डिविजन क्लर्क के लिए रिटेन टेस्ट और इसके बाद कंप्यूटर पर टाइपिंग टेस्ट लिया जाएगा। रिटेन एग्जाम दो घंटे का ऑब्जेक्टिव टाइप का होगा। इसमें 2०० प्रश्न पूछे जाएंगे। क्यूश्चन पेपर चार सेक्शन में डिवाइड है। फस्र्ट सेक्शन में 5० क्यूश्चन जनरल इंटेलिजेंसी से, सेकेंड सेक्शन से इंग्लिश लैंग्वेज के 5० क्यूश्चन, थर्ड सेक्शन से गणित की झमता आंकने के लिए क्वांटिटिव एप्टिट्यूड से 5० क्यूश्चन और फोर्थ सेक्शन से जनरल अवरनेंस से 5० क्यूश्चन पूछे जाएंगे।
निगेटिव मार्किंग
रिटेन एग्जाम में निगेटिव मार्किंग की जाएगी, हर गलत क्यूश्चन के लिए एक चौथाई अंक काटे जाएंगे। इसलिए प्रश्नों को हल करते समय सावधानी बरतें और जिन प्रश्नों का उत्तर सही मालूम हो उसका ही उत्तर दें, तुक्का लगाकर दिया उत्तर अगर गलत हुए तो निगेटिव मार्किंग के कारण मार्क्स कट जाएंगे।

एग्जाम प्रिपरेशन
नवंबर महीने में रिटेन एग्जाम है। इस समय सिलेबस के अनुसार तैयारी शुरू कर दें।
जनरल इंटेलिजेंसी: इसमें रिजनिंग के क्यूश्चन पूछे जाएंगे, जिसमें वर्बल और नानवर्बल टाइप के क्यूश्चन होंगे। चित्र, कोड-डिकोड, तर्क कथन, वर्ड बिल्डिंग, नंबर पैटर्न आदि से सवाल पूछे जाते हैं। अगर आप पहली बार इस परीक्षा में शामिल हो रहे हैं तो पूरी जानकारी प्राप्त कर लें। इस तरह के पहले पूछ गए प्रश्नों का मॉक टेस्ट लें। इसके बाद कोई अच्छी बुक से रिजनिंग के बनने वाले क्यूश्चन को साल्व करने की शार्टकट मेथड सीखें। बार-बार प्रैक्टिस से आपको ये मेथ्ड याद हो जाएंगे और इसके साथ ही खुद का मेथड भी रिजनिंग के सवालों को हल करने के लिए डेवलप हो जाएगा।
अंग्रेजी लैंग्वेज: इस सेक्शन की तैयारी का सबसे अच्छा तरीका है। अंग्रेजी की वोकेबुलरी को अच्छी तरह लर्न कर लें। कारण यह है कि एसएससी के एग्जाम में सिनोनिम्स, होमोनिम्स, एंटानिम्स, स्पेलिंग, मिस-स्पेल वर्ड से आध्ो से ज्यादा क्यूश्चन पूछे जाते हैं। अंग्रेजी वोकेबुलरी पर ध्यान देंगे तो ये सब टॉपिक भी आसानी से कवर होंगे। इसके अलावा हाईस्कूल लेवल की अंग्रेजी ग्रामर की बुक पढ़ें। जितना क्यूश्चन सेट साल्व करने की प्रैक्टिस करेंगे, उतना ही आपका ग्रामर के नियमों पर पकड़ मजबूत बनेगी।
क्वांटिटिव एप्टिटñूड: नंबर बटोरने के लिहाज से यह सेक्शन बहुत मददगार हो सकता है। अगर आप मैथ के नियमों को जानते हैं और क्यूश्चन साल्व करने का सही अप्रोच डेवलप कर ले तो इस सेक्शन में 5० के 5० क्यूश्चन को कम समय में सही-सही साल्व कर लेंगे। यहां से बचा समय अंग्रेजी सेक्शन में लगाकर इस सेक्शन में भी अच्छे नंबर ला सकते हैं। अगर आपकी गणित कमजोर है तो बेसिक से शुरुआत करें। सिलेबस के अनुसार आप आठवीं की बुक से प्रैक्टिस करें, इसके बाद 1०वीं के स्तर की गणित की बुक से पढ़ाई करें। नंबर सिस्टम के सवालों को हल करने के लिए डेसिमल, फै्रक्शन, प्राइम नंबर, इवेन-ऑड नंबर के नियमों को आठवीं की किताब से समझ लेना जरूरी है। एलजेब्रा, ग्रॉफ, लाइनियर इक्यूशन आदि को टàेडिशनल तरीके से सॉल्व करने का तरीका जानें, इसके बाद इस तरह के सवालों को हल करने का शॉर्ट तरीका अप्लाई करें। ध्यान रखें कि सिंपल इंटàेस्ट और कंपाउंड इंटàेस्ट के सवालों को हल करने का शार्टकट मेथड तभी समझ में आएगा, जब डिस्के्रप्टिव मेथड को ध्यान से समझ चुके होंगे। कहने का मतलब है कि मैथ के हर टॉपिक में शार्टकट तरीका अपनाने से पहले उस टॉपिक के सवाल को डिस्क्रेप्टिव तरीके से साल्व करने का तरीका जानना जरूरी है।
जनरल अवरनेंस: इस सेक्शन में देश-विदेश में घटने वाली राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक घटनाओं पर बनने वाले क्यूश्चन होंगे। पुरस्कार-सम्मान, बुक रिलीज, वैज्ञानिक खोज, भारतीय इतिहास, कला-संस्कृति, अर्थशास्त्र, भुगोल, साइंसटिफिक रिसर्च, भारत के पड़ोसी देश से रिलेटेड क्यूश्चन पूछे जाते हैं। इस सेक्शन का टॉपिक बहुत बड़ा है लेकिन एजुकेटेड पर्सन के अपेक्षा के अनुरूप अपने को अप-टू-डेट रखना होगा। इसके लिए न्यूज पेपर, न्यूज पोर्टल को रोजाना पढ़ते रहें। हाईस्कूल स्तर की सामाजिक विज्ञान बुक की स्टडी कारगर साबित होगी।
स्किल टेस्ट
रिटेन टेस्ट की मेरिट में आने के बाद डाटा एंट्री ऑपरेटर के पोस्ट पर अप्लाई करने वाले कैंडिडेट्स का कंप्यूटर पर डॉटा एंटàी स्पीड 8०० की फीडिंग एक घंटे में करनी होगी। पोस्टल असिस्टेंट, शॉर्टिंग असिस्टेंट और एलडीसी के पद के लिए कंप्यूटर पर टाइपिंग टेस्ट लिया जाएगा। अंग्रेजी के लिए टाइपिंग स्पीड 35 और हिंदी में टाइपिंग स्पीड 3० शब्द प्रति मिनट कम से कम होनी चाहिए। ये स्किल टेस्ट क्वॉलिफाइंग होगा।

महत्वपूर्ण बिंदु
कुल पद: 6578
1. पोस्टल असिस्टेंट/ सोîटग असिस्टेंट : 3523 पोस्ट
2. डाटा एंट्री ऑपरेटर: 2०49 पोस्ट
3. लोअर डिविजनल क्लर्क : 1००6 पोस्ट
वेतनमान:
चयनित उम्मीदवारों को रुपये 52००-2०2०० व ग्रेड पे रुपये क्रमश: रुपये 19०० और 24०० के अनुसार वेतन दिया जाएगा।
कैसे आवेदन करें
इन पदों पर आवेदन करने के लिए आयोग की वेबसाइट
ऑनलाइन आवेदन 13 जुलाई से पहले कर सकते हैं।
रिटेन टेस्ट डेट
1, 15, 22 नवंबर को अलग-अलग बैच में आयोजित की जाएगी।

इन महिलाओं ने बदला समाज का नजरिया






इन महिलाओं ने बदला समाज का नजरिया
पुरुषों के क्षेत्राधिकार समझे जाने वाले पेशों को अपनाकर महिलाओं ने बुलंदी हासिल की है, इसके लिए उन्हें समाज की बंदिशों और महिला होने के कारण कमजोर समझी जाने वाली मानसिकता से भी लड़ना पड़ा। मुंबई की महिला जासूस रजनी पंडित हो या देश की पहली महिला फॉयर इंजीनियर हर्षिनी कान्हेकर हो या फिर वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर राधिका रामासामी, इन्होंने कठिन राह चुनी और सफल होकर दिखा दिया की महिलाएं किसी से कम नहीं हैं।
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महिलाएं कमजोर नहीं होती हैं, बल्कि उन्हें कमजोर बनाया जाता है। सामाजिक ताने-बाने में दकियानूसी विचारों को लपेटकर महिलाओं के पैरों में बेड़ियां डालने वाला पुरुष प्रधान समाज अब महिलाओं के हौसले और हिम्मत को नहीं रोक सकता है। अब महिलाएं तमाम मुसीबतों का सामना करते हुए और अपने डर से बाहर निकलकर पुरुषों के एकाधिकार समझे जाने वाले क्ष्ोत्रों में सफलता का परचम लहरा रही हैं। हालांकि वैज्ञानिक शोधों के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं में शारीरिक शक्ति कम होती है, तो दूसरी ओर स्वयं महिलाएं भी अपनी शारीरिक शक्तियों के लिए 'फीमेल हार्मोंस’ को ही दोषी ठहराती रही हैं, लेकिन अब महिलाएं खुद को पुरुषों से किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं समझतीं। महिलाएं सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रही हैं, उनकी कमजोर और नाजुक समझी जाने वाली छवि अब टूट रही है। जासूसी, फायर ब्रिगेड, वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी जैसे पुरुषों के लिए आरक्षित समझे जाने वाले इन प्रोफेशन में भी महिलाएं नाम कमा रही हैं। पुरुषों के वर्चस्व वाले इन क्ष्ोत्रों में इन महिलाओं के लिए अपना कॅरिअर बनाना इतना आसान नहीं था। इन महिलाओं को सबसे पहले अपने परिवार और फिर समाज की रुढ़ियों और मान्यताओं से लड़ना पड़ा, जो महिलाओं को केवल घर की देखभाल या फिर बहुत हुआ तो टीचर जैसे प्रोफशन में जाने भर की आजादी देता था। आज महिलाओं ने खेल में, मिलिट्री सर्विस में, पर्वतारोहण, अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपने दमखम से समाज की सोच बदल कर रख दी है।

राधिका रामासामी के शौक ने बनाया वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर

राधिका रामासामी को देश की पहली प्रोफेशनल वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर होने का गौरव प्राप्त है। फोटोग्राफी का यह शौक 11वीं कक्षा में पढने के दौरान हुआ था। बाद में अंकल ने कैमरा गिफ्ट दिया तो शौक जुनून में बदल गया। जंगल की दुनिया के आकर्षण ने उन्हें पिछले 25 वर्षों बांध रखा है। उनके इस पेशे में आने पर उनके परिवार ने विरोध नहीं किया। उनको बस महिला होने के नाते इस पेशे में आने वाली चुनौतियों का ही सामना करना था और साथ ही खुद को इस क्षेत्र में सफल बनाना था।
वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनने की राधिका की कहानी तब शुरू होती है, जब वह 2००4 में पहली बार परिवार के साथ घूमने भरतपुर नेशनल पार्क गईं, वहीं से उन्हें कुदरत से प्यार हुआ। वे लगभग रोज दो घंटे दिल्ली में ओखला बर्ड सेंक्चुएरी में बिताने लगीं। पक्षियों को देखने, उन्हें पहचानने और उनके व्यवहार को समझने में उनका समय बीतने लगा। हाथ में कैमरा आते ही उन्होंने अपने फोटोग्राफी के शौक को पेशे में बदल दिया। वह अब तक सभी नेशनल पार्कों सहित केन्या, तंजानिया आदि की यात्राएं कर चुकी हैं। उनका काम जोखिम भरा भी है क्योंकि उन्हें आई-लेवल फोटोग्राफी करनी होती है, जानवरों के क्षेत्र में घुसने के लिए सावधानी बरतनी पड़ती है, उनके आने-जाने का समय नोट करना होता है। वह इत्र भी इस्तेमाल नहीं कर सकतीं क्योंकि इसे वे सूंघ सकते हैं। राधिका बताती हैं, 'साल 2००5 में जिम कार्बेट पार्क में अचानक मेरे रास्ते पर हाथी आ गया। किसी तरह जान बचा कर वहां से निकल सकी। जानवरों से एक सुरक्षित दूरी रखनी होती है। पार्क या फॉरेस्ट विभाग में पहले ही कॉन्ट्रैक्ट साइन करना होता है कि कुछ हो जाए तो इसके लिए हम ही जिम्मेदार होंगे।’ आज राधिका ने वाइल्ड फोटोग्राफर के तौर पर खुद को सबित किया है। उन्होंने कभी भी अपने कॅरिअर के साथ समझौता नहीं किया। उन्हें जब परिवार वालों ने बताया कि महिला होने के कारण इस पेशे में कठिनाई का सामना करना होगा, तो भी उन्होंने अपना कदम पीछे नहीं हटाया और आज वे कैमरा उठाकर जंगलों में अपने शौक के कॅरिअर में बुलंदिया छू रही हैं।

जासूसी के क्षेत्र में बड़ा नाम है रजनी पंडित
महिलाओं को हर चीज को देख परख करने की आदत होती है।


वे हर पहलू की जांच करती हैं। मुंबई की रजनी पंडित जासूसी के क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम है। महिला होने के बावजूद उन्होंने जासूसी के पेशे को चुना लेकिन इस पेशे में आने के लिए उन्हें बहुत विरोध का सामना करना पड़ा। वह 25 साल से प्राइवेट जासूस के रूप में काम कर रही हैं। इस पेशे में बहुत-सी परेशानियां आने के बावजूद वे कभी पीछे नहीं हटीं। रजनी पंडित के पिता सीआईडी इंस्पेक्टर थे और वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी जासूसी के पेशे में आए। पिता की पाबंदियों के बावजूद रजनी पंडित ने बचपन के अपने शौक को ही अपना पेशा बनाया। इसके पीछे दिलचस्प कहानी है। वे बताती हैं, 'मुझे बचपन से सच खोजने का शौक था। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी क्लासमेट गलत संगत में पड़ गई। उनकी क्लासमेट घर पर बताती कि कॉलेज में पढ़ाई के लिए रुकती है। रजनी ने पड़ताल की तो पता चला जिन लड़कों के साथ घूमती थी, वे उसे नशा कराते थे। रजनी ने फिर यह बात उसके पैरेंट्स को भी बता दी और इसके बाद उनके मन में जासूसी करने का आत्मविश्वास जागा और फिर उन्होंने घरेलू समस्याएं, कंपनी जासूसी, गुमशुदा लोगों की तलाश से लेकर मर्डर तक के केस सुलझाने शुरू कर दिए और इसमें उनको सफलता भी मिलने लगी।
एक महिला जासूस के तौर पर रजनी ने कभी हार नहीं मानी, आज भी वह सक्रिय हैं। उनके इस प्रोफेशन में 15 लोग जुड़े हुए हैं। काम अधिक होने पर वे लोगों को जासूसी करने की ट्रेनिंग देती हैं। अपने काम से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। मुश्किल हालात में भी उन्हें कभी डर नहीं लगा। छानबीन के दौरान उन्हें कभी घरेलू हेल्पर, प्रेग्नेंट स्त्री, ब्लाइंड तक बनना पड़ा, यह उनके काम का हिस्सा है।

आग से खेलती हर्षिनी कान्हेकर

हमारे समाज में अकसर लड़कियों को खेलने-कूदने और लड़कों जैसा काम करने के लिए टोका जाता रहा है। लड़कियों को कमजोर समझने वाली इस धारणा को तोड़ा है, हर्षिनी कान्हेकर ने। भारी-भरकम उपकरण उठाना, कठिन ट्रेनिंग और घंटों प्रेक्टिस से गुजर कर हर्षिनी कन्हेकर ने पुरुषों के वर्चस्व वाले कॅरिअर को चुना और आज वे भारत की पहली फायर इंजीनियर महिला बन गई हैं। उन्हें शुरू से ही फायर वर्कस की वर्दी लुभाती थी। पहले तो उनके पैरेंट्स को यह फील्ड पसंद नहीं आई लेकिन उनके जज्बे ने पैरेंट्स का मन बदल दिया। आज वह ओएनजीसी में सीनियर फायर ऑफिसर के पद पर नियुक्त हैं। हर्षिनी का यहां तक पहुंचने का सफर बहुत कठिनाई से गुजरा। जब उन्होंने नेशनल फायर सर्विस कॉलेज नागपुर से फायर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया तो इस कोर्स को करने वाली देश की पहली लड़की बनीं। यह उपलब्धि थी, पर एक लड़की के तौर पर इस कोर्स को सफलतापूर्वक करना एक चुनौती भरा काम था। वहां पर प्रोफेसर और छात्र भी सोचते थे कि वे लड़की होने के कारण यह कोर्स कंप्लीट कर पाएगी या नहीं। हर्षिनी ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने कोर्स के दौरान उपकरण उठाने, गाड़ियां चलाने, आग बुझाने और घंटों आपात स्थिति में घिरे रहने का प्रशिक्षण पूरा किया। एक लड़की होने के कारण उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वे बताती हैं कि वर्ष 2००2 में कॉलेज के 2०वें बैच में उन्होंने एडमिशन लिया था। रेजिडेंशियल कॉलेज में गल्र्स हॉस्टल नहीं था। इस कारण से उन्हें रोज घर से कॉलेज आने-जाने की सहूलियत मिल गई। तीन साल के बाद उनकी पहली ट्रेनिंग कोलकाता में हुई। इसके बाद दिल्ली के फायर स्टेशन में रहीं। उन्हें 24 घंटे अलर्ट रहना होता था। दीपावली की रात को दिल्ली में छह जगहों पर आग लगी, वे उन छह जगहों पर अपनी टीम के साथ आग बुझाने गईं। उनका मानना है कि कोई काम लड़का या लड़की के लिए बंटा हुआ नहीं है। जिसके अंदर लगन और मेहनत है, वो अपनी मंजिल हासिल कर लेता है, चाहे वे लड़की ही क्यों न हो।

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