मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

5०० साल बाद कैसा होगा धरती का भविष्य


क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 5०० साल बाद हमारी धरती कैसी दिख्ोगी। कॉलिन एन्डेरसन जोकि पेश्ो से फोटोग्राफर हैं, उनकी ये काल्पनिक फोटो में मानव सभ्यता अंतरिक्ष से अनोखी तरह से दिख रही है। टॉवर के आकार की ऊंची-ऊंची बिल्डिंग से ढकी धरती का ये भविष्य है। कई वैज्ञानिकों और रिसचर्स ने आने वाले 5०० सालों में मानव सभ्यता में बदलाव के बारे में पूर्वानुमान लगाया है।
चारों तरफ होगा बर्फ ही बर्फ
26वीं शताब्दी में भले हम न रहें लेकिन धरती के वातावरण में बहुत बड़ा बदलाव आएगा। रिसर्च से ये बात सामने आई है कि 26वीं शताब्दी में ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमान बढ़ जाएगा। लेकिन उसके बाद धरती पर ठंड इतनी बढ़ जाएगी कि यहां हिम युग की शुरू हो जाएगा। कई रिसर्च से ये अनुमान लगाया गया है कि जब धरती पर मौजूद जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल, कोयला का भंडार खत्म हो जाएगा तो धरती का वातावरण गर्म होना शुरू हो जाएगा। वैज्ञानिकों को कहना है कि धरती पर मौजूद जीवाश्म ईधन का अधिक इस्तेमाल से कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा वायुमंडल में अधिक हो जाएगाी, जो ओजोन पर्त को नुकसान पहुंचाएगा। सूरज की अल्ट्रावयलेट किरण्ों, जो बहुत हानिकारक होती है उसे ओजान परत एक तरह से छानता है, जिससे अधिकांश अल्ट्रावायलेट किरण्ों धरती के वायुमंडल में नहीं पहुंच पाती हैं। लेकिन 23 वीं शताब्दी में जीवाश्म ईंधन के दोहन के कारण बढ़ते कार्बनडाईऑक्साइड के कारण आजोन परत में बड़े-बड़े छेद हो जाएंगे, यानी धरती का औसत तापमान 3 से 4 डिग्री बढ़ जाएगा। 18वीं शताब्दी में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद मशीनीकरण युग की शुरुआत हुई थी और उसके बाद से अब तक ग्लोबल वार्मिंग पर अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक इस निष्कर्स पर पहुंचे हैं कि 5०० साल बाद मिनी आइस युग की शुरूआत होगी, इस कारण से धरती के हर हिस्से में आंटार्टिका जैसा माहौल हो जाएगा।
सौ साल बाद मिल जाएगा ऊर्जा संकट का हल
सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी माइको कैकू ने अनुमान लगाया है कि 1०० साल में मानव सभ्यता धरती पर ऊर्जा संकट का हल दूसरे ग्रह से आयातित ऊर्जा के रूप में खोज लेगा। इस ऊर्जा को नई टेक्निोलॉजी से स्थानांतरण करने में सक्षम हो जाएगा। 26वीं शताब्दी में मानवजाति सौर्य ऊर्जा को इस्तेमाल करने की बेहतर तकनीक को अपनाएगा। धरती के वातावरण को नियंत्रित करने की तकनीक इजाद कर लेगा।
दोगुनी गति से होगा तकनीक का विकास
15वीं शताब्दी से अब तक लगातार तकनीक में बदलाव हो रहा है। आने वाले समय में नई तकनीक और विज्ञान के क्ष्ोत्र में बहुत बड बदलाव देखने को मिलेगा। जाने माने भौतिक वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिन्स ने अपने कई शोध पत्रों में जिक्र किया है कि 6०० साल बाद हम ऐसे आधुनिक टेक्नोलॉजी की दुनिया में होंगे, जहां पर हर 1० सेकेंड में थ्योरिटिकल फिजिक्स पेपर प्रकाशित होगा, यानी विज्ञान तेजी से तरक्की करेगा। वहीं इस समय हर 18 महीने में कंप्यूटर टेक्नोलॉजी और कंप्यूटर की स्पीड दोगुनी तेजी से विकिसत होगी।
चांद और मंगल पर रहने लगेंगे इंसान
वैज्ञानिक और लेखक एड्रियन बेरी के अनुसार 26वीं शताब्दी में इंसान का जीवनकाल बढ़कर 14० साल हो जाएगा। हर इंसान के व्यक्तित्व का डिजिटल डेटा खास तरीके से सुरक्षित रखने की टेक्टनोलॉजी विकिसित हो जाएगी, जो उस इंसान का एक तरह से डिजिटल वर्जन होगा, मरने के बाद भी इंसान का अर्टिफिशियल मेमोरी उसी तरह से सोचेगा, तर्क देगा, जिस तरह से वह व्यक्ति अपने जीवनकाल में रहा है। इंसान महासागरों के ऊपर खेती करने की तकनीक विकसित कर लेगा। मानवजाति ब्रह्मांड की लंबी यात्रा आसानी से करने लगेगा, वहीं रोबोट अंतरिक्ष की खोजों में इंसान की मदद करने में सक्षम हो जाएंगे। चांद और मंगल पर रिहायशी कॉलोनियों में नई तकनीक की बदौलत इंसान यहां पर रहने भी लगेगा।


 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

साहित्य के क्षेत्र में अब तक नोबेल प्राइज से सम्मानित महिलाएं


सेल्मा लागेर्लाफ
जन्म: 2० नवंबर 1858
मृत्यु: 16 मार्च 194०
19०9 में स्वीडन लेखिका सेल्मा लागेर्लाफ को स्वीडिश भाषा में गद्य लेखन के विशिष्ट योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। लिटरेचर (साहित्य) कैटेगरी में पुरस्कार पाने वाली यह दुनिया की पहली महिला हैं। इनके लेखन में उच्च कल्पनाशीलता और आदर्शवाद के विभिन्न आयामों का प्रभाव देखने को मिलता है।
ग्राजी डेलेडा
जन्म: 27 सितंबर, 1871
मृत्यु: 15 अगस्त, 1936
1926 में इटली की ग्राजी डेलेडा को इटेलियन भाषा में गद्य लेखन के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके लेखन में मानवीय जीवन की संवेदनाओं को गहराई से उकेरने की अद्भुद लेखन शिल्प देखने को मिलता है। इन्होंने किन्हीं कारणों से नोबेल प्राइज 1927 में ग्रहण किया था।
 सिग्रिड अंडसेट
जन्म: 2० मई, 1882
मृत्यु: 1० जून, 1949
1928 में नार्वे की लेखिका सिग्रिड अंडसेट को नार्वे भाषा में लेखन के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मध्य युग में नार्देन लाइफ की घटनाओं का सहित्य में स्थान देने के लिए यह पुरस्कार मिला। इनके लेखन में इस युग के जीवन का प्रभावी चित्रण दिखाई देता है।
पर्ल बक
जन्म: 26 जून, 1892
मृत्यु: 6 मार्च, 1973
1938 में अमेरिका की लेखिका पर्ल बक को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनका जन्म चीन में हुआ था और 192० से लेखन की शुरुआत की। चीन की संस्कृति और जनजीवन की पृष्ठभूमि पर कई किताबें लिखी हैं। अंग्रेजी भाषा में चीन की पृष्ठभूमि पर लिख्ो कई उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुए। 'द गॉड अर्थ’ जो कि 193० में लिखी इनकी सबसे चर्चित पुस्तक थी। इन्होंने 7० से अधिक किताबें लिखीं।
गब्रिएला मिस्ट्राल
जन्म: 7 अप्रैल, 1889
मृत्यु: 1० जनवरी, 1957
1945 में चिली की कवयित्री गब्रिएला मिस्ट्राल को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। स्पेनिश भाषा में लिखी इनकी लिरिक पोएट्री (कविता) में शक्तिशाली संवेदना का पुट है, जो लैटिन अमेरिका की दुनिया में आदर्शवादी अकांक्षाओं को स्थापित करती है। इनकी प्रभावी कविता में प्रेम और गंभीरता की ऐसी कड़ी देखने को मिलती है, जो इन्हें महान कवयित्री के रूप में विश्व साहित्य जगत के पहले पायदान में स्थापित करती है।
नेली सचस
जन्म: 1० दिसंबर, 1891
मृत्यु: 12 मई, 197०
1966 में स्वीडन की नेली सचस को जर्मन भाषा में विशिष्ट लिरिकल और ड्रामेटिक पोएट्री राइटिंग के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनकी प्रथम पोएट्री वॉल्यूम (श्रृंखला) 'इन द हाउसेस ऑफ डेथ’ है, जो दुनियाभर में यहूदी लोगों की त्रासदी की आवाज बनी। इनकी कविताओं में मानव के दुख का वास्तविक चित्रण हुआ है, जो विश्व साहित्य की अनुपम कृति है।
नदीन गोर्डिमर

जन्म: 2० नवंबर, 1923
मृत्यु: 13 जुलाई, 2०14
1991 में साउथ अफ्रिका की नदीन गोर्डिमर को मानव संवेदना की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और प्रभावी शिल्प अभिव्यंजना से अंग्रेजी साहित्य को समृद्ध करने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

टोनी मॉरिसन
जन्म: 18 फरवरी, 1931
अमेरिका की लेखिका टोनी मॉरिसन को 1993 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उपन्यास में विजुवलाइजेशन (दृश्यांकन) स्टाइल से कहानी लिखने के बेहतरीन अंदाज के लिए जानी जाती हैं। अमेरिकी के जनजीवन को अपने कथ्य क्षमता से कहने का उनका निराला ढंग अंग्रेजी साहित्य की अमूल धरोहर है।

विस्लावा सिम्बोस्र्का
जन्म: 2 जुलाई, 1923
मृत्यु: 1 फरवरी, 2०12
1996 में विस्लाका सिम्बोस्र्का पोलिश भाषा में कविता के क्ष्ोत्र में अभिन्न योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनकी कविताओं में मानवतावाद के ऐतिहासिक पक्षों का बेहतरीन प्रस्तुति है, जो कथ्य और शिल्प की दृष्टि से समृद्ध है। इनकी पहली कविता जो 'दैट्स वाट वी लाइव फार’ है, जो 1952 में प्रकाशित हुई थी।

एल्फ्रीडे जेलिनेक
जन्म: 2० अक्तूबर, 1946
2००4 में ऑस्ट्रेलिया की एल्फ्रीडे येलिनेक को ड्रामा और प्रोज (गद्य लेखन) में म्यूजिकल फ्लो के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जर्मन भाषा में महिलाओं की समाज में सशक्त भागीदारी पर केंद्रित लेखन के लिए जानी जाती हैं। लीसा श्ौडो कविता इनकी चर्चित रचना है।

डोरिस लेसिग
जन्म: 22 अक्टूबर, 1919
मृत्यु: 17 नवंबर, 2०13
अमेरिका की डोरिस लेसिंग ने अंग्रेजी साहित्य में महिलाओं के अनुभव को अपनी लेखन से विजन दिया। 2००7 में डोरिस को लेसिंग को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनका पहला उपन्यास 'द ग्रास इज सिंगिंग’ था। अपने जीवन में 55 से अधिक किताबें लिख चुकी हैं, जिनमें नोवेल, शार्ट स्टोरी, प्ले और नॉन फिक्शन शामिल है।
हर्टा म्यूलर

जन्म: 17 अगस्त 1953
हर्टा म्यूलर जर्मन उपन्यासकार, कवयित्री और निबंधकार के रूप में जानी जाती हैं। साम्यवादी रोमानिया में निकोलाइ चाउसेस्कु के दमनकारी शासन के दौरान जीवन की कठोर परिस्थितियों का सजीव चित्रण अपने लेखन में किया। 2००9 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

एलिस मुनरो
जन्म: 1० जुलाई 1931
एलिस मुनरो कनाडा की लेखिका हैं, इन्हें 2०13 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अंग्रेजी साहित्य में समकालीन लघु कहानी के प्रस्तुतीकरण में शिल्प और कथ्य में नए प्रयोग के लिए इन्हें 'मास्टर ऑफ द कॉन्टेपोरेरी शॉर्ट स्टोरी’ टाइटिल से अलंकृत किया गया है।

स्वेतलाना एलेक्सियाविच
जन्म: 31 मई 1948
बेलरूस की स्वेतलाना एलेक्सियाविच को 2०15 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान महिलाओं के संघर्ष और साहस पर उनके लेखन के लिए दिया गया है। 67 साल की स्वेतलाना राजनीतिक लेखिका के रूप में जानी जाती हैं और पहली पत्रकार भी हैं जिन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
 

इन महिलाओं को मिला नोबेल प्राइज


नोबेल प्राइज हर साल रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेस, द स्वीडिश एकेडमी, द कारोलिस्का इंस्टीट्यूट एवं द नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी द्बारा दिया जाता है। दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार ऐसे लोगों या संस्था को दिया जाता है, जिन्होंने रसायनशास्त्र, भौतिकीशास्त्र, साहित्य, शांति, एवं औषधि विज्ञान (मेडिकल साइंस) के क्षेत्र में अद्बितीय योगदान दिया हो। नोबेल प्राइज के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल थ्ो। वहीं अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत 1968 में स्वीडन की केंद्रीय बैंक स्वेरिज रिक्सबैंक द्बारा शुरू की गई। यह पुरस्कार अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अद्बितीय कार्य करने वाले लोगों और संस्थाओं को हर साल दिया जाता है। हर कैटेगरी में पुरस्कार अलग-अलग समिति द्बारा दिया जाता है। नोबेल प्राइज विनर को एक मेडल, एक डिप्लोमा, एक मोनेटरी एवार्ड के साथ धनराशि भी दी जाती है। अब तक 48 महिलाओं को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है।
भौतिक विज्ञान में अब तक नोबेल प्राइज से सम्मानित महिलाएं
मैडम क्यूरी
जन्म: 7 नवंबर, 1867
मृत्यु: 4 जुलाई, 1934
पोलेंड की साइंटिस्ट मैडम क्यूरी को वर्ष 19०3 में भौतिक के क्ष्ोत्र में रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए सम्मानित किया गया।

मारिया गोपर्ट मेयर
जन्म: 28 जून, 19०6
मृत्यु: 2० फरवरी, 1972
जर्मनी की वैज्ञानकि मारिया गोपर्ट मेयर को 1963 में न्यूक्लीयर फिजिक्स के क्ष्ोत्र में न्यूक्लीयर सेल स्टàक्चर की खोज के लिए सम्मानित किया गया।
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रसायन विज्ञान में अब तक नोबेल प्राइज से सम्मानित महिलाएं

मैडम क्यूरी
1911 में रसायन के क्ष्ोत्र में आइसोलेशन ऑफ यूरेनियम (यूरेनियम शुद्धीकरण) के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

आइरेन ज्वाइलट क्यूरी
जन्म: 12 सितंबर, 1897
मृत्यु: 17 मार्च 1956
1935 में फ्रांस की साइंटिस्ट आइरेन ज्वाइलट क्यूरी को न्यूक्लीयर कैमिस्ट्री के क्ष्ोत्र में नए रेडियोधर्मी तत्वों के संश्लेषण की खोज के लिए सम्मानित किया गया।

ड्रॉथी क्रोफुट हॉडकिन
जन्म: 12 मई, 191०
मृत्यु: 29 जुलाई, 1994
1964 में ब्रिटेन की साइंटिस्ट ड्रॉथी हॉडकिन को बायो कैमिस्टàी के क्ष्ोत्र में महत्वपूर्ण जैव रासायनिक पदार्थों की संरचनाओं के एक्स-रे तकनीक की खोज के लिए नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया।
एडा ई
जन्म: 22 जून, 1939
2००9 में इजराइल की साइंटिस्ट को बायो कैमिस्ट्री के क्ष्ोत्र में राइबोसोम की संरचना और कार्यप्रणाली के विशिष्ट के अध्ययन के लिए नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया।
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अब तक 9०० नोबेल पुरस्कार विजेता
19०1 से 2०15 तक कुल 573 लोगों को नोबेल प्राइज मिल चुका है। इसमें संयुक्त रूप से मिले नोबेल प्राइज की संख्या जोड़ दी जाए तो कुल 9०० लोगों को यह पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा 26 संस्थाओं को नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया है।
अब तक 48 महिलाओं को मिला नोबेल पुरस्कार
19०1 से 2०15 तक कुल 48 महिलाओं को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। मैडम क्यूरी ऐसी महिला है जिन्हें दो बार नोबेल पुरस्कार मिलने का गौरव प्राप्त है। इन्हें 19०3 में भौतिक के क्ष्ोत्र में रेडियोएक्टिविटी की खोज करने के लिए इन्हें और इनके पति पियरे क्यूरी को संयुक्त रूप से दिया गया। इस तरह से वे नोबेल प्राइज से सम्मानित होने वाली पहली महिला बनी। इसके बाद मैडम क्यरी को 1911 में रसायन के क्ष्ोत्र में आइसोलेशन ऑफ यूरेनियम (यूरेनियम शुद्धीकरण) के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


 

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी

कॉपी राइट अगर आपको यह आर्टिकल प्रकाशन के लिए उपयोग करना है तो मेरे मेल पर संपर्क ​कीजिए। abhishekkantpandey@gmail.com

अभिषेक कांत पाण्डेय
महात्मा गांधी के बारे में तुम बहुत कुछ जानते होगे कि उन्होंने हमारे देश की आजादी के लिए बहुत बड़े-बड़े आंदोलन किया। उनके मार्गनिर्देशन में ही आजादी का आंदोलन चला और उनके सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के कारण ही हमें अंग्रेजों से आजादी मिली। गांधी जयंती के अवसर पर आओ उनकी शिक्षाओं और उनके बारे में जानें-
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सत्य और अहिंसा का पाठ सीखाने वाले सदी के नायक का नाम कौन नहीं जानता है। अंग्रेजों से अहिंसा के बल पर भारत को आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी का नाम सारी दुनिया में जाना जाता है। मोहन करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने की एक लंबी गाथा है। 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर में जन्में गांधीजी अपने विद्यार्थी जीवन में एक औसत छात्र थे। लेकिन अपनी मेहनत और देश के प्रति प्रेम के कारण वे आाजादी के महानायक बनें। सत्य व अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले सबके प्यारे बापू आज भी हमारे लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं।
सत्य के प्रयोग
गांधीजी ने अपना सारा जीवन सच्चाई और ईमानदारी में बिताया है। स्वयं की गलतियों से सीखते हुए, उन्होंने अपने जीवन में किए गए सत्य के प्रयोग पर किताब 'मेरे सत्य के प्रयोग’ लिखी है। यह किताब आंग्रेजी भाषा में लिखी गई, जिसका हिंदी में अनुवाद बहुत लोकप्रिय हुआ। महात्मा गांधी के जीवन की झलक इस पुस्तक में मिलती है। बच्चों, तुम्हें यह किताब जरूरी पढ़नी चाहिए। गांंधी जब युवक थे तो वे पश्चिमी संस्कृति से बहुत ही प्रभावित थे। उनके जीवन में आए कई बदलाव ने उन्हें मानवता का सेवक बना दिया। महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है, 'मुझे आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किए हैं, उसकी कथा लिखी है।’
अनशन और अहिंसा
महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। वे भारत में अंग्रजों के अत्याचार से दुखी थे। वे हर कीमत पर भारत की आजादी चाहते थे। इसीलिए वे भारत की आजादी के लिए दक्षिण अफ्रिका से अपने देश आएं। यहां पर भारतीयों और खासतौर पर दलितों की दुरदशा देखकर बहुत दुखी हुएं। यहीं से उनके जीवन में बदलाव आया और अब वे भारत की आजादी के लिए एक नए तरीके की खोज की, जिसे आज सारी दुनिया ने अपनाया वह था, आहिंसा और अनशन। अहिंसा यानी बिना हिंसा के अपनी बात मनवाने के लिए अनशन करना। सत्य की इस लड़ाई में गांधीजी अब भारतीयों के नायक बन चुके थे। उस समय लाखों लोग उनके साथ भारत की आजादी के संग्राम में कूद पड़े। जिसका परिणाम यह हुआ की आज हम आजाद भारत में रह रहे हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं और इस बात पर हम भारतीयों को गर्व है।
गांधी के सपनों का संसार
गांधीजी ने हमें कुछ बातें बताईं, जिन्हें हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। गांधीजी ने अपने जीवन में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सादगी से जीवन जीना और स्वयं पर विश्वास रखने की बात बताई है। इसीलिए उन्हें 'जन नायक’, 'महात्मा’, 'बाप’ू, 'राष्ट्रपिता’ के उप नाम से हम लोग पुकारते हैं। सत्य के बारे में गांधीजी ने कहा है कि सत्यता का साथ देने पर हमें भय-असुरक्षा से मुक्ति मिलती है। सादा जीवन, उच्च विचार उन्होंने अपने जीवन में उतारा था। उनके मन में एक सच्चे भारत की तस्वीर थी। जहां चारों ओर खुशिहाली और भाईचारा हो। लेकिन आज हम गांधीजी की बातों को भूलते जा रहे हैं। सही अर्थों में अगर हम महात्मा गांधी के विचारों को अपने जीवन में उतार ले तो निश्चित ही ये दुनिया 'गांधी के सपनों का संसार’ बन जाएगी। जहां न कोई युद्ध होगा और न कोई दुखी होगा।

मोहन करमचंद गांधी से महात्मा गांधी
एके पाण्डेय
महात्मा गांधी के बारे में तुम बहुत कुछ जानते होगे कि उन्होंने हमारे देश की आजादी के लिए बहुत बड़े-बड़े आंदोलन किया। उनके मार्गनिर्देशन में ही आजादी का आंदोलन चला और उनके सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के कारण ही हमें अंग्रेजों से आजादी मिली। गांधी जयंती के अवसर पर आओ उनकी शिक्षाओं और उनके बारे में जानें-
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सत्य और अहिंसा का पाठ सीखाने वाले सदी के नायक का नाम कौन नहीं जानता है। अंग्रेजों से अहिंसा के बल पर भारत को आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी का नाम सारी दुनिया में जाना जाता है। मोहन करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने की एक लंबी गाथा है। 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर में जन्में गांधीजी अपने विद्यार्थी जीवन में एक औसत छात्र थे। लेकिन अपनी मेहनत और देश के प्रति प्रेम के कारण वे आाजादी के महानायक बनें। सत्य व अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले सबके प्यारे बापू आज भी हमारे लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं।
सत्य के प्रयोग
गांधीजी ने अपना सारा जीवन सच्चाई और ईमानदारी में बिताया है। स्वयं की गलतियों से सीखते हुए, उन्होंने अपने जीवन में किए गए सत्य के प्रयोग पर किताब 'मेरे सत्य के प्रयोग’ लिखी है। यह किताब आंग्रेजी भाषा में लिखी गई, जिसका हिंदी में अनुवाद बहुत लोकप्रिय हुआ। महात्मा गांधी के जीवन की झलक इस पुस्तक में मिलती है। बच्चों, तुम्हें यह किताब जरूरी पढ़नी चाहिए। गांंधी जब युवक थे तो वे पश्चिमी संस्कृति से बहुत ही प्रभावित थे। उनके जीवन में आए कई बदलाव ने उन्हें मानवता का सेवक बना दिया। महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है, 'मुझे आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किए हैं, उसकी कथा लिखी है।’
अनशन और अहिंसा
महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। वे भारत में अंग्रजों के अत्याचार से दुखी थे। वे हर कीमत पर भारत की आजादी चाहते थे। इसीलिए वे भारत की आजादी के लिए दक्षिण अफ्रिका से अपने देश आएं। यहां पर भारतीयों और खासतौर पर दलितों की दुरदशा देखकर बहुत दुखी हुएं। यहीं से उनके जीवन में बदलाव आया और अब वे भारत की आजादी के लिए एक नए तरीके की खोज की, जिसे आज सारी दुनिया ने अपनाया वह था, आहिंसा और अनशन। अहिंसा यानी बिना हिंसा के अपनी बात मनवाने के लिए अनशन करना। सत्य की इस लड़ाई में गांधीजी अब भारतीयों के नायक बन चुके थे। उस समय लाखों लोग उनके साथ भारत की आजादी के संग्राम में कूद पड़े। जिसका परिणाम यह हुआ की आज हम आजाद भारत में रह रहे हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं और इस बात पर हम भारतीयों को गर्व है।
गांधी के सपनों का संसार
गांधीजी ने हमें कुछ बातें बताईं, जिन्हें हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। गांधीजी ने अपने जीवन में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सादगी से जीवन जीना और स्वयं पर विश्वास रखने की बात बताई है। इसीलिए उन्हें 'जन नायक’, 'महात्मा’, 'बाप’ू, 'राष्ट्रपिता’ के उप नाम से हम लोग पुकारते हैं। सत्य के बारे में गांधीजी ने कहा है कि सत्यता का साथ देने पर हमें भय-असुरक्षा से मुक्ति मिलती है। सादा जीवन, उच्च विचार उन्होंने अपने जीवन में उतारा था। उनके मन में एक सच्चे भारत की तस्वीर थी। जहां चारों ओर खुशिहाली और भाईचारा हो। लेकिन आज हम गांधीजी की बातों को भूलते जा रहे हैं। सही अर्थों में अगर हम महात्मा गांधी के विचारों को अपने जीवन में उतार ले तो निश्चित ही ये दुनिया 'गांधी के सपनों का संसार’ बन जाएगी। जहां न कोई युद्ध होगा और न कोई दुखी होगा।

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डिजिटल इन इंडिया से आइटी सेक्टर में बूम

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अभिषेक कांत पाण्डेय

सरकार के कदम डिजिटलाइजेशन की ओर बढ़ रहे हैं, 'मेक इन इंडिया’ के बाद 'डिजिटल इंडिया’ के कारण भारत के आइटी क्ष्ोत्र में नई नौकरियों के दरवाजे खुलने वाले हैं। यह महत्वाकांक्षी अभियान के जरिए देश के ढाई लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ना और सरकारी योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। कॅरिअर के लिहाज से कंप्यूटर कोर्स करने वाले युवाओं के लिए सरकारी संस्थानों से लेकर प्राइवेट क्ष्ोत्र में नौकरी मिलना आसान होगा। डिजिटल इंडिया क्या है और इसके मुताबिक अपने आपको कैसे करें अपडेट ताकी आने वाले समय में आप बेहतरीन जॉब हासिल कर सके।
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ढाई लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ने के बाद आइटी सेक्टर में नौकरियां भी बढ़ेंगी। जिस तरह से भारत में लगातार इंटरनेट का उपयोग बढ़ता जा रहा है। सूचना के क्ष्ोत्र में भी ग्रोथ देखने को मिल रहा है। डिजिटल इंडिया के कारण कंप्यूटर एजुकेशन, एनजीओ, आइटी सेक्टर, सामुदायिक क्ष्ोत्र, ऑन लाइन एजुकेशन, ऑन लाइन शॉपिंग, वेबसाइट डेवलपिंग, कंटेंट राइटिंग, वेब डिजाइनिंग के क्ष्ोत्र में ढेरों नौकरियां होंगी। इन क्ष्ोत्रों में कॅरिअर बनाने वाले युवाओं को कंप्यूटर स्किल से लैस होना जरूरी है। डिजिटल इंडिया योजना लागू करने के लिए बुनियादी स्तर पर भी काम होगा, जिसमें बिजली, सड़क और उर्जा के अन्य पारंपरिक साधन का विकास होगा, जिसमें विनिर्माण के क्ष्ोत्र में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

क्या है डिजिटल इंडिया?
डिजिटल इंडिया भारत सरकार की ओर से चलाई जा रही एक खूबसूरत योजना है, जिसके जरिए वो देश की जनता को सरकार से सीधे तौर पर जोड़ना चाहती है, वो इंटरनेट के माध्यम से देश के हर नागरिक को सरकारी संस्थान से लिक-अप करना चाहती है और पेपर वर्क पर रोक लगाना चाहती है। देश के हर शहर और गांव में इंटरनेट पहुंचाना। इलेक्ट्रानिक सेवाओं से लोगों को परिचित कराना। इसलिए सरकार डिजिटल साक्षरता पर जोर दे रही है।

डिजिटल इन इंडिया के फायदे
राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा योजना का कड़ाई से पालन होगा, वेबसाइट पर निगरानी रखने के लिए इस क्ष्ोत्र में कंप्यूटर विशषज्ञों की जरूरत होगी। जब कागजी काम बंद होगा तो सारे काम कंप्यूटर के जरिए होगा, ऐसे में कंप्यूटर आपरेटर की जरूरत पड़ेगी। जमीन, मकान की रजिस्ट्री कंप्यूटर होगा और इन्हें ऑनलाइन कोई भी देख सकता है।
डिजटलाइजेशन से नए रोजगार को सृजन होगा। सरकारी आस्पताल, नगर निगम और पुलिस विभाग में सूचना को एकत्रित करना और उसके फीडिंग से रोजगार के नए अवसर उपलबध होंगे। ई बस्ता, ई लॉकर जैसी सुविधा होंगी, जिसमें हमेशा के लिए आपका डाटा सुरक्षित होगा। इस प्रोग्राम के तहत छात्रों को सरकारी छात्रवृत्ति मिलेगी। बीएसएनल अब टेलिफोन एक्सचेंज की जगह नेक्स्ट जेनरेशन नेटवर्क का प्रयोग करेगी। हर बस-टैक्सी में सीसीटीवी कैमरे लगेंगे। देश में बीपीओ और कॉल सेंटरों की संख्या बढ़ेगी तो नौकरी भी बढ़ेगी। ग्रामीण इलाकों में भी कंप्यूटर अनिवार्य हो जाएंगे। 2.5 लाख गांवों में ब्रॉडबैंड और यूनिवर्सल फोन कनेक्टिविटी की सुविधा नई क्रांति को जन्म देगा। रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन, अस्पताल में हर जगह डाटा अपडेट होंगे और सीसीटीवी फुटेज लगेंगे। 2.5 लाख स्कूलों, सभी यूनिवर्सिटीज में वाई-फाई, पब्लिक वाईफाई हॉटस्पॉट। 1.7 करोड़ लोगों को नौकरियां मिलेंगी। 8.5 करोड़ लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। पूरे भारत में ई-गवनेãंस। इस सुविधा के तहत लोग अपने पैन, आधार कार्ड, मार्कशीट्स और अन्य जरूरी दस्तावेजों को डिजिटली स्टोर कर सकते हैं।

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कंप्यूटर कोर्सेस
बैचलर ऑफ कंप्यूटर साइंस
मास्टर आफ कंप्यूटर साइंस

इंफार्मेशन सिस्टम कोर्सेस
मास्टर ऑफ बिजिनेस एडमिस्ट्रेशन इन कंप्यूटर इनफार्मेशन सिस्टम
बैचलर डिग्री इन कंप्यूटर इनफार्मेशन सिस्टम

ग्राफिक व मल्टीमीडिया कोर्स
बैचलर ऑफ साइंस इन ग्राफिक एंड मल्टीमीडिया
एसोशिएट डिग्री इन डिजाइन एंड मल्टीमीडिया

अन्य कोर्स
मॉस्टर ऑफ साइंस इन नेटवर्क सिक्यूरिटी
माइक्रोसॉफ्ट इंजीनियरिंग सर्टिफिकेट
कंप्यूटर सर्टिफिकेट कोस छह माह या एक साल का
कंप्यूटर डिप्लोमा कोर्स
  

खुद को आत्मनिर्भर बनाने की राह में महिलाएं

कामयाबी

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अभिषेक कांत पाण्डेय

किसी देश की तरक्की में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। परिवार को संभालने वाली महिला अब समाज और देश को नई दिशा दे रही हैं। ये सिलसिला आजादी के बाद से अब तक अनवरत चल रहा है। पुरुषों से कमतर समझे जाने वाली महिलाओं ने शिक्षा, विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल और सेना जैसे क्षेत्र में खुद को साबित किया है। जहां कामयाबी पुरुषों का अधिकार समझा जाता था, वहीं महिलाओं ने इस भ्रम को तोड़ दिया है, वे कामयाबी की राह में आगे बढ़ रही हैं। चाहे जितनी मुश्किलें हो लेकिन आगे बढ़ने और खुद को स्थापित करने का जज्बा महिलाओं को कामयाब बना रहा है।
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भारतीय समाज में महिलाओं का विशिष्ट स्थान रहा हैं। पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया है। वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरुष की सदैव सहयोगी रही है। लेकिन पुरुष वर्चस्व मानसिकता वाले समाज ने महिलाओं को घर की दहलीज से बाहर कदम रखने पर पाबंदी लगाता रहा है। महादेवी वर्मा ने कहा था कि नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और प्रेम की प्रतिमूर्ति है। पुरुष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की। शायद इसीलिए अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने वाली महिलाएं कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती हैं, तब उनकी इस सफलता को पुरुष मानसिकता बर्दाश्त नहीं पाता है। घर-बाहर सभी जगह महिलाओं और लड़कियों पर हिंसा इसी का जीता जागता उदाहरण है।
हावी है पुरुष मानसिकता
भारत का इतिहास उठाकर देखें तो सामाजिक तानेबाने का हमारा समाज शुरू से ही महिलाओं की आजादी को दकियानूसी विचारधारा से रोकता रहा है। बाल विवाह, बहुविवाह आदि प्रचलन इतिहास के पन्नों में भरा पड़ा है, यानी महिलाओं को वे आजादी नहीं मिली जो पुरुषों को मिलती रही है। महिलाएं भले परिवार का हिस्सा हों पर वे आज भी स्वतंत्र फैसले नहीं ले सकती हैं। उसे समाज में जीने के लिए पुरुषों की सहारे की जरूरत समझी जाती है। यही कारण है कि आदिकाल से अब तक पुरुषप्रधान समाज महिलाओं को स्वच्छंद रूप से जीने का अधिकार व्यावहारिक धरातल पर देने का हिमायती नहीं रहा है। अब जब समय बदला है तो लोगों की सोच बदली है, अब बहुत से पुरुषों ने महिलाओं को आगे बढ़ाने उन्हें मान-सम्मान और बेहतर जीवन का हकदार बनाने के लिए सामने आ रहे हैं। लेकिन आज भी समाज में ऐसे पुरुष मानिसकता हावी है, जो महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु समझता है। वहीं लोकतंत्र में पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया गया है। महिलाओं के लिए कई विशेष कानून बने हैं, लेकिन इन सबके बावजूद भी महिलाओं की सुरक्षा और उनकी आजादी के लिए ये कानून कारगर नहीं हैं।
बचपन से भरी जाती है भेद-भाव की भावना
भारतीय समाज के संदर्भ में किए गए कई रिसर्च में ये बात सामने आई है कि एक ही परिवार में लड़का और लड़की में भेद किया जाता है। लड़कों की परवरिश लड़कियों के मुकाबले बेहतर होती है। लड़कों को अच्छे स्कूल में पढ़ाई, उनकी सेहत पर लड़कियों की तुलना में ज्यादा ध्यान दिया जाता है। भाई-बहन के बीच में यह भ्ोद-भाव लड़कों के मन व मस्तिष्क पर खुद को श्रेष्ठ मानने की मनोवैज्ञानिक अवधाराणा बचपन से पनने लगती है, जबकि लड़कियों में ठीक इसके उल्टे खुद को कमजोर समझने की भावना उनमें बैठ जाती है। जब लड़के बड़े होते हैं तो खुद को श्रेष्ठ समझने वाली उनकी धारणा, जो उन्हें परिवार में बचपन से मिली है, उसी भावना में जीते हैं। जबकि परिवार में अपने भाई से कमतर समझी जाने वाली भावना लड़कियों में बचपन से भरी गई है, उसके कारण वे जीवनभर अपने लिए स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाती हैं और अपनी मनमर्जी से जी भी नहीं सकती हैं, यहां तक कि वे शादी और कॅरिअर जैसे जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लेने के लिए पहले पिता, फिर पति के इच्छा पर निर्भर रहती हैं।

सशक्त होती महिलाएं
 19वीं सदी में जब पुनर्जागरण शुरू हुआ तो महिलाओं के कल्याण के कई आंदोलन हुए। भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाओं की गौरवमयी भागीदारी रही। कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, कमला नेहरु, सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू जैसी महिलाओं ने भारत की आजादी के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीसवीं सदी की शुरुआत में महिलाएं अपनी प्रगति की नई इबारत लिखना शुरू किया, वे शिक्षा से चिकित्सा के क्ष्ोत्र में खुद को स्थापित करने में लगीं। उनकी यह पहल समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका को प्रतिस्थापित कर रहा था। आजादी के बाद से महिलाएं राजनीति में नया मुकाम बनाना शुरू किया, वे लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभाओं तथा स्थानीय निकायों का सशक्त नेतृत्व करने की भूमिका में आईं। महिला सशक्तिकरण के इस युग में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए सरकारी प्रयास भी सफल होने लगे, महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए महिला आरक्षण भी इस प्रयास का हिस्सा है। आज बिजनेस, इंजीनियरिंग, विज्ञान-अनुसंधान, ख्ोले के क्ष्ोत्र महिलाएं पुरुषों से किसी स्तर पर कम नहीं हैं। पर सवाल यह है कि आज भी महिलाओं को बढ़ने की आजादी समाज क्यों नहीं देता है? जबकि महिलाओं ने ये दिखा दिया कि प्रकृति रूप से पुरुष और महिला के बीच भेद वाले हजारों वर्षों की विचारधारा को झुठलाकर खुद को मजबूत और कामयाब बनाया है। लोकतंत्र सभी नागरिकों को रोजगार, सम्मान से जीने का अधिकार और सुरक्षा प्रदान करने का अधिकार देता है। लेकिन महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा और लगातार महिलाओं के सम्मान और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं। महिलाओं को भोग की वस्तु समझने वाले कथित ऐसे पुरुष मानसिकता के खिलाफ कब समाज जागेगा? महिलाओं की संरक्षा के लिए चाहे जितने कानून बना दिया जाए लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है, महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए में बदलाव आना।
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बिजनेस में बढ़ती महिलाओं की भागीदारी
-व्यावसायिक संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, एक सर्वे के अनुसार भारतीय महिलाओं की भागीदारी कुल उद्योगों में दस प्रतिशत हैं और यह भागीदारी निरंतर गतिशील हो रही है। बैंकिग, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, कॉर्पोरेट जगत, स्वयंसेवी संस्थाओं तकनीकी क्षेत्र आदि में स्किल से लैस महिलाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ा रही हैं। महिलाओं के काम करने की क्षमता जैसे, नेटवर्किंग की क्षमता, काम प्रति समर्पण, सहयोगियों के साथ मधुर व्यवहार, सीखने की जिज्ञासा, सकारात्मक सोच के इन्हीं गुणों के कारण महिलाएं आज इन क्षेत्रों में सफल नेतृत्व भी कर रही हैं।
-दूसरे सर्वे के अनुसार भारत में कुल 9 लाख 95144 लघु उद्योग उद्यमशाील महिलाओं द्बारा संचालित हैं। स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाएं दूसरी सैकड़ों महिलाओं को अत्मनिर्भर बना रही हैं। केरल में ऐसे स्वयं सहायता समूह के कारण आज वहां सौ प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं और अपने अधिकारों के लिए सजग हैं। बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में ग्रामीण महिलाएं आज स्वयं सहायता समूह से अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
-रिसर्च से ये बात सामने आया है कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने से परिवार में खुशहाली और आर्थिक तंगी भी दूर होती है, क्योंकि उस परिवार में अभी तक पुरुष ही कमाते थे और परिवार की बढ़ती जरूरतों को बमुश्किल से पूरा कर पाते हैं। ऐसे में महिलाएं का आत्मनिर्भर बनना, बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छा पोषण दोनों उपलब्ध होता है। मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में ये तथ्य सामने आए हैं। 

बच्चे का मन तो नहीं है बीमार

पैरेंटिंग्स
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अभिषेक कांत पाण्डेय


मां होने के नाते आप चाहती हैं कि आपका बच्चा हंसे, ख्ोले और स्वस्थ रहे। पर कभी-कभी हम अवसाद में घिरे बच्चे के मन को नहीं पढ़ पाते हैं। बच्चों का बदला-बदला व्यवहार जैसे, गुमसुम रहना, अकेले में समय बिताना, किसी से बात न करना और उसके चेहरे पर परेशानी दिख्ो तो जाइए कि आपके बच्चे का मन बीमार है। वह कोई मानसिक व्यथा से गुजर रहा है। ऐसे में मां होने के नाते आप बच्चों की उलझनों के बारे में जाने और उसकी काउंसिलिंग कराए ताकी आपका बच्चा फिर से हंसता-ख्ोलता नजर आए।
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रीता 11 साल की है। बार-बार अपनी मां को बताना चाहती है कि उसे ट्राली वाला गली तक छोड़ कर चला जाता है, 'मां ट्राली वाले से कहों की घर तक छोड़ दिया करे।’ लेकिन रीता की मां ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और कहा कि सड़क से गली तक तो दो-मिनट का रास्ता है, थोड़ाè पैदल चलकर आजाया कर। रीता की मां अपने काम में लग जाती है, कुछ देर बाद रीता गुस्से में बोलती है कि मैं स्कूल पढ़ने नहीं जाऊंगी। यह कहकर नीता अपने कमरे में चली जाती है। नीता उदास रहने लगती है। उसका मन किसी काम में नहीं लगता है। वह कमरे में अकेले बैठी रहती
है। उसके व्यवहार में आए परिवर्तन को उसकी मां समझ नहीं पा रही है।
सवाल उठता है कि आखिर रीता क्या कहना चाहती है। बार-बार मां से कहने पर भी रीता की मां कुछ समझ नहीं पा रही है। जाहिर है रीता की इस समय कोई समस्या से जूझ रही है। बाद में पता चलता है कि रीता जब स्कूल से आती है तब गली में उसे लड़के छेड़ते है और फब्तियां कसते हैं। जिसे रीता अपनी मां से खुलकर नहीं बता पाती है। रीता के मन में यही डर बैठ गया और वह बार-बार आपने मां को कहती है लेकिन उसकी मां समझ नहीं पाती है। जब उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाता है, तब यह बात समाने आती है। नीता के मामले में कहा जा सकता है कि
बच्चे इस उम्र में वह कई शारीरिक एवं मानसिक बदलाव की ओर बढ़ रहे होते हैं, ऐसे में माता-पिता को खासतौर पर अपने बच्चों के व्यवहार और उनकी समस्याओं को समझना जरूरी है। देखा जाए तो घर से बाहर स्कूल, गली-मुहल्ले,
परिवार, रिश्तेदार आदि कोई भी बच्चों के साथ गलत व्यवहार कर सकता है। अगर बच्चे किसी व्यक्ति के अनैतिक व्यवहार का शिकार होते हैं तो वह इस बात को बताने में असमर्थ होते हैं। उनके मन में डर बैठ जाता है और वे धीरे-धीरे तनाव में आ जाते हैं।



बच्चों के एकाएक बदले व्यवहार पर रखें नजर

बच्चों के व्यवहार में एकाएक परिवर्तन आता है, जैसे-किसी खास जगह, स्कूल, पार्क या आस-पड़ोस में जाने से कतराते हैं तो हो सकता है कोई बात वे डर के कारण छिपा रहे हो, या बताने में संकोच कर रहे हों। बच्चों का इस तरह से अकेले तनाव में रहने से उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि अगर बच्चों में इस तरह के लक्षण दिखे जैसे, अकेले रहना, किसी से बात नहीं करना, पढ़ाई में मन न लगना आदि तो पैरेंट्स का समझ लेना चाहिए कि बच्चे को किसी न किसी चीज को लेकर समस्या है। जिसका समधान जल्द से जल्द करना जरूरी है। बच्चों में मनोवैज्ञनिक समस्यओं के कारण उनके विकास और सोच पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चों के इस
तरह एकाकए आए व्यवहार में बदलाव की जड़ तक जाए। इसके लिए मनोचिकित्क से काउंसिलिग भी की जा सकती है।

हम घिरे है मनोवैज्ञनिक समस्याओं से
आधुनिकता के इस भागदौड़ वाली जिदगी में हम कई तरह की समस्याओं से घिरे हुए हैं। इन समस्याओं के समाधान में हम तनाव में जीने लगे हैं। यह तनाव एक तरह से हमारे मस्तिष्क पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं, जिससे हम
तनाव में आ जाते हैं। डिफ्रेशन जैसी नई बीमारी से जूझने लगते हैं। जिस तरह से हम शारीरिक रूप से बीमार होने पर तुरंत डाक्टर से परामर्श लेते हैं, इलाज कराते हैं और मेडिसिन खाकर हम शारीरिक बीमारी से ठीक हो जाते हैं। लेकिन तनाव और अवसाद होने पर हम इसे बीमारी समझते नहीं है और इसके उपचार के लिए मनोवैज्ञानिक के पास जाने से कतराते हैं। देखा जाए जब हम किसी एक दिशा में सोचते हैं और यह सोच नाकारत्मकता में बदल जाती है। इस तरह हम स्वयं दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं और हम मानसिक रूप बीमार होने लगते हैं।

साइकोलाजिस्ट के पास है इलाज
मानिसिक बीमारी को लेकर आज भी लोगों में कोई जागरूकता नहीं है। समाज में बढ़ती मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उसके समाधान के लिए अभी बहुत छोटे स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। इन तरह की समस्याओं के कारण डिफ्रेशन यानी तनाव की समस्या आज भारत के शहरी इलाकों में बहुत तेजी से बढ़ा है। दस साल के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में यह समस्या पाई जाती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में बढèती मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक तौर पर योजनाओं का अभाव है। आज की जिदगी में हम काम के कारण अपने ही लोगों से बातचीत करने का समय नहीं निकाल पाते हैं। देखा जाए तो कई ऐसे परिवार हैं, जहां पर माता और पिता दोनों नौकरी करते हैं और ऐसे में उन्हें अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। परिवार के सदस्य आपस में बात केवल फीस जमा करना है, सब्जी लानी है, होमवर्क किया की नहीं आदि निर्देशों और सूचना तक ही सीमित रह जाती है। इस तरह के परिवारों में बच्चे मनोवैज्ञानिक समस्या के शिकार होने की संभावना ज्यादा होती है। ऐसे परिवारों में ज्यादातर बच्चों का समय पढ़ाई के अलावा टीवी देखाना या मोबाइल में बात करना या घंटों अकेले बैठे रहने में बीतता है। मानोवैज्ञानिक बताते हैं कि इस कारण से बच्चों के क्रमिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है। जिस घर में माता-पिता का कम्यूनिकेशन बच्चों के साथ नहीं होता है, उन घरों के बच्चे अपनी फैंटेसी यानी कल्पना के जीवन को ही सच मान लेते हैं। मनोवैज्ञानिकों का
मानना है कि इस तरह की समस्याओं के उपज के कारण बच्चों में हिसात्मक या फिर इसके ठीक उलट दब्बूपन या डर का स्वाभाव उनमें आ जाता है। अगर आपके बच्चें के स्वाभाव में इस तरह की कोई समस्या हो तो मनोवैज्ञनिक परामर्श लेना जरूरी है। लेकिन अफसोस है कि भारत में मानसिक समस्याओं के प्रति माता-पिता में जागरुकता की कमी है, जिसके कारण से हमारे समाज में बच्चों की बीमार मनोदशा को नजर अंदाज किया जाता है।

भारतीय समाज में मनोवैज्ञानिक समस्या को पागलपन की बीमारी से जोड़ दिया जाता है। जोकि सही नहीं है, जैसे हमें बुखार, जुकाम, खांसी जैसी छोटी-छोटी शारीरिक बीमारियां हो जाती हैं तो डॉक्टर से परामर्श लेकर और उचित दवा खाकर हम अपनी बीमारी को ठीक कर लेते हैं लेकिन बच्चों में कोई मनोव्ौज्ञानिक समस्या आती है तो हम इसके समुचित इलाज के लिए साइकोलॉजिस्ट के पास जाने से संकोच करते हैं। वही परिवार के अन्य सदस्य, संगे संबधी, दोस्त इस तरह की समस्या को हंसी के पात्र की नजरों से देखते हैं। इस तरह की बात करने वाले को हमारे समाज में उस व्यक्ति या बच्चे को झक्की या पागल होने से जोड़ दिया जाता है। इसीलिए मनोवैज्ञानिक समस्याओं से ग्रसित बच्चों को उनके माता-पिता साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाने में हिचकिचाते हैं। लकिन एक अच्छे माता-पिता होने के नाते आप इन सब बातों पर ध्यान न दें। अगर आपका बच्चा मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहा हो तो उसकी मदद करें, उसे सही पारामर्श व इलाज के लिए साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाएं।

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बच्चों पर न बनाएं दबाव
प्रतिस्पर्धा के इस युग में माता-पिता पढ़ाई के लिए बच्चों पर अनावश्यक प्रेशर बनाते हैं। अच्छे मार्क्स लाना, विज्ञान और
गणित जैसे विषयों में रूचि न होने पर भी इंजीनियरिग या मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए बाध्य करना आदि सोच से जरा ऊपर उठे। हर बच्चे की अपनी रुचि और उसका व्यक्तित्व होता है, उसे उसकी मनपसंद के विषयों को पढ़ने और कॅरिअर बनाने की आजादी दें। अपने सपने बच्चों के माध्यम से न पूरा करें, उन्हें उनकी रुचि और क्षमता पर छोड़ दें, वहीं आप पढ़ाई और जीवन के हर मोड़ पर उनको सलाह दें, मदद करें लेकिन उन्हें खुद बढ़ने और अपना रास्ता खुद चुनने का मौका दे। हो सकता है कि कल आपका बच्चा संगीत की दुनिया में बड़ा नाम कमाए या वहा वैज्ञानिक बनकर बड़े-बड़े आविष्कार करे।

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अभिषेक कांत पाण्डेय


आज भारत आजाद है, हम आजादी की सांस ले रहे हैं लेकिन हमने देश में ही मानव-मानव के बीच लंबी रेखाएं खींच रखी हैं। धर्म, जाति, संप्रदाय, अमीरी-गरीबी, गोरे-काले आदि की जबकि हम भारत के निवासी हैं, हम उस देश में रहते हैं, जहां विभिन्न प्रकार के लोग हैं। इनके बीच एकता स्थापित करना और एक देश के निवासी होने का गर्व हमारे मन में होना चाहिए। धर्म, देश, लोकतंत्र इक दूसरे के पर्याय हैं। धर्म का अर्थ मानव प्रेम और देश का अर्थ यहां रहने वाले लोगों में एकता और लोकतंत्र पर विश्वास रखना। लोकतंत्र का मतलब बराबरी से जीने का हक, कोई भ्ोद-भाव नहीं। क्या हम मानव जाति के कल्याण के लिए धर्म, देश और लोकतंत्र को एक दूसरे का पूरक नहीं बना सकते हैं। देश और लोकतंत्र दोनों शरीर और आत्मा है तो धर्म उसमें रहने वाले व्यक्ति के लिए आचरण, नैतिकता, कर्तव्य, विश्व बंधुता के भाव की धारा बहाती है। निश्चय ही देश बड़ा होता है, क्योंकि यह ही सभी देशवासियों को एक सूत्र में पिरोता है और मानव जाति को सुरक्षित और सम्मान से जीने का हक देता है। देश के प्रति हमारे कर्तव्य हैं, जिसके लिए हमें सारे मत-भ्ोद भुलाकर, देश प्रेम के लिए हमेशा समर्पित रहना चाहिए।

मानव प्रेम ही सच्चा धर्म है। मानव केवल मानव होता है, इनमें भ्ोद हम लोग ही करते हैं। इस जगत में सभी धर्म मानव से प्रेम करना ही सिखाता है। लेकिन आज मतिभ्रम के कारण मनुष्यों ने धर्म के नाम पर रक्तपात करने लगा है। स्वामी विवेकानंद का मत था कि सभी धर्म एक ही सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं। एक दिन ऐसा आएगा, जब राष्ट्र-राष्ट्र का भेद दूर हो जायेगा। यदि एक धर्म सच्चा है, तो निश्चय ही अन्य सभी धर्म भी सच्चे हैं। पवित्रता व दयालुता किसी एक संप्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है। प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय-उन्नत चरित्र स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। धर्म का मूल तत्व देश-प्रेम और मानव-प्रेम है। ये बातें विवेकानंद ने11 सितंबर, 1893 को शिकागो में सर्वधमã सम्मेलन में कही थीं।

उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि यदि मानवों में भक्ति है, तो हिदू, मुस्लिम, इसाई एवं सिख एक हैं। ईश्वर को सभी पंथों से प्राप्त किया जा सकता है। सभी धर्मों का एक ही सत्य है और वह है जीवन जीने की राह को बताना। भक्तगण भगवान को विभिन्न नामों से पुकारते हैं। एक तालाब के चार घाट हैं।
हिदू एक घाट पर पानी पी रहे हैं। वे उसे जल कहते हैं। मुसलमान दूसरे घाट पर पानी पीते हैं और वे उसे पानी कहते हैं। तीसरे घाट पर अंग्रेज पानी पीते हैं और वे उसे वाटर कहते हैं। कुछ लोग चौथे घाट पर पानी को अक्वा कहते हैं। यही इस दुनिया के धर्म और संप्रदायों के अनुयायियों की सोच-सोच में फर्क है। दुनिया के विभिन्न धर्म और संप्रदाय के लोग अपने-अपने नजरियों से उसका मूल्यांकन कर रहे हैं, लेकिन उनमें से कोई भी सभी धर्मो और संप्रदायों के मूल तत्व की ओर झांकने का प्रयास नहीं कर रहा है। आज अगर मनुष्यों की सोच में विषमता देखी जा रही है, तो इसका सिर्फ एक ही कारण है और वह मत-विभिन्नता है। आज जरूरत इस बात की नहीं कि धर्म की रक्षा कैसे की जाए, जबकि आज मानवता की रक्षा करना अधिक जरूरी है। इस पूरे ब्रह्मांड में केवल धरती पर ही मानव जीवन है, अगर यह संकट में आ जाएंगे तो इस पूरी सृष्टि का अंत हो जाएगा। हमें स्वार्थ से दूर, सभी की भलाई की बात सोचना चाहिए, सच्चे अर्थों में यही धर्म है, और सभी धर्मों का यह आधार है।

पहचानिए अपने विचारों की शक्ति

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अभिषेक कांत पाण्डेय

ऐसे ही छोटे विचारों को कसौटी में कसना जरूरी होता है, नहीं तो हम सही और गलत पर विचार नहीं कर पाते हैं। यानी अपने विचारों को पहचानिए और उसे एक जोहरी की तरह परखिए, हो सकता है भविष्य के बुद्ध, महावीर जैन, गांधी, न्यूटन, आइंस्टीन बनना आपके विचारों में हो, बस उसे मूर्त रूप देना भर है।
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विचारों की शक्ति ऐसी है जब तक खुद इसका अनुभव नहीं करते हैं तब तक विश्वास नहीं होता है। अपने मन में आने वाले निगेटिव थिंकिंग को हटाने का यह सर्वोत्तम उपाय है। पॉजिटिव थिंकिंग की एनर्जी जीवन में बदलाव लाता है। लेकिन आपके विचारों में दृंढ़तता और सच्चाई होनी चाहिए। पूर्वाग्रह ग्रसित नहीं होना चाहिए। विचार दिमाग में उत्पन्न होता है लेकिन इसका स्रोत अपका अनुभव होता है। विचार की शक्ति की पहचान कई महापुरुषों ने अपने जीवननकाल में कर लिया और वे अपने सदविचारों के माध्यम से ही लोगों में ज्ञान बांटा।

विचार की कसौटी
विचार जो मानव के जीवन को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने वाला हो, जो इंसान की भलाई में काम आने वाला हो ताकी समाज को सही दिशा मिल सके। विचार को अच्छे और बुरे की कसौटी में कसा जाता है। विचार वही सही होता है, जो अच्छे हो, न कि वे विचार जो मानव के लिए दुखदायी हो। अगर आप शिक्षक हैं तो आपके विचार छात्रों के लिए उपयोगी होगा। सकारात्मक सोच जो आपके व्यक्तित्व में झलकता है, उससे छात्र प्रेरणा लेंगे। निराशा के वक्त आपकी सकारात्मका सोच उन्हें आशा की ओर ले जाएगी। इसी तरह आप चिकित्सक हैं तो आपकी सकारात्मक सोच वाला व्यक्तित्व मरीज के जीवन में जीने की आशा जाग्रत करेगी और वह आसाध्य बीमारियों से अतिशीघ्र ठीक होगा। अगर आप लीडर हैं और आपके विचार देश और मानव के कल्याण से जुड़ा है तो आपके व्यक्तित्व में वह स्पष्ट दिख्ोगा। वहीं जनता आपको आदर्श नेता के रूप में जानेगी। विचार कई कार्य अनुभव से उत्पन्न होते हैं। अहिंसा का विचार अंग्रेजों से आजादी पाने के लिए गांधीजी के मन में आया और उसे उन्होंने अपने व्यक्तित्व में उतारा और भारत की आाजदी के लिए एक आंदोलन की तरह इस्तेमाल किया। उन्हें सफलता मिली। अंहिसा का विचार महात्मा बुद्ध को भी जाग्रत किया, जब वे भ्रमण के लिए निकले तो उन्होंने इस संसार में चारों तरफ दुख और माया ही पाया। इन सबसे छुटकारा पाने के लिए माया व मोह का त्याग और अहिंसा का पालन करने का विचार उनके मन में आया। इसी तरह ज्ौन धर्म के प्रवर्तक महावीर जैन ने भी अहिंसा के विचार को अपनाया। कहने का मतलब कि विचार अनुभवजन्य है, यानी अनुभव से उत्पन्न होता है। अनुभव से एक विचार या एक विचार से कोई नया विचार मन के पटल पर जब कौंधता है तो वह विचार जीवन को बदल कर रख देता है।
लेकिन जब खुद के फायदे के लिए कोई बात सोची जाती है, भले वह एक आइडिया हो या विचार वे खुद के फायदे या स्वांत: सुखाय तक केंद्रित रहती है। इस तरह के विचार का कोई महत्व नहीं होता है। इस तरह के विचार कोई नया विचार उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इन पर विचार करने वाला व्यक्ति केवल अपने लाभ के प्रति ही केंद्रित रहता है। इसे ऐसे समझे कि अहिंसा का विचार सभ्यता से पहले यानी जब इंसान गुफाओं में रहता था, घुमतंु था तब ये विचार मानव के लिए कोई काम का नहीं था लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य सामाजिक हुआ और व्यवस्थाओं को जन्म होने लगा तो सामाजिक मूल्यों, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का विचार आया, जो मानव जाति के विकास के लिए जरूरी था। इसके बाद कानून व्यवस्था का विचार हिंसा और अव्यवस्था को रोकने के लिए आया। विचारों का आदान-प्रदान मानव जाति की सबसे बड़ी पूंजी है। आपके विचार जिस तरह से आपका व्यक्तित्व तय करता है, उसी तरह विज्ञान, दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, भूगोल, राजनीति शास्त्र जैसे ज्ञान के क्ष्ोत्र का विकास विचार से ही हुआ है। कई छोटे-छोटे विचारों को सच्चाई की कसौटी में कसने के बाद ही कोई सिद्धांत, नियम या कानून बना। देखा जाए तो मनुष्य विचारों के साथ ही जीता है। पर जरूरी है उसके विचार सही हो, नहीं तो सही और गलत विचार पर निर्णय न लेने के कारण उसका जीवन गर्त में चला जाता है। रावण का विचार स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की उसकी भूल ने उससे अनैतिक काम कराया, उसने अपनी बुद्धि का उपयोग तो किया लेकिन विवेक की तराजू में नहीं तौला कि उसके विचार उसे अनिष्ट की ओर ले जा रहा है। अंतत: सर्वबुद्धिमान होते हुए भी उसका अंत उसके कुटिल विचारों के कारण हुआ। अब तक आप समझ चुके होंगे कि विचार की पवित्रता बहुत जरूरी है।
विज्ञान से समझे विचारों का महत्व
आइंस्टीन ने सापेक्षता के सिद्धांत को प्रकृति के नियम पर परखा तो पाया उसका विचार सही है। उन्होंने साइंस की सबसे बड़ी खोज की। हो सकता है ऐसा विचार कई लोगों के मन में आया हो लेकिन ऐसे लोगों अपने विचार को सही तर्क नहीं दे पाएं हो, इसीलिए वे साइंस की सबसे बड़ी खोज नहीं कर पाएं। विचार जब कौंधता है तो हमें खुद नहीं पता होता है कि जीवन का कौन-सा सत्य खोज लिया है, इसीलिए हमें सही विचारों को पहचानना आना चाहिए। विचार अचानक उत्पन्न होता है? ऐसा नहीं होता है, ये तो उस दिशा म्ों लगतार या उसके विपरीत दिशा में किए गए कार्य के परिणाम के कारण जन्म लेता है, जो अचानक होते हुए भी ये विचार आपके मन-मस्तिष्क और अनुभव से गुजरते हुए विचार के रूप में जन्म लेता है।
गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटेशनल फोर्स) एक पदार्थ द्बारा एक दूसरे की ओर आकृष्ट होने की प्रवृति है। गुरुत्वाकर्षण के बारे में पहली बार कोई गणितीय सूत्र देने की कोशिश आइजक न्यूटन द्बारा की गई थी, जो उनके अनुभवजनित विचार से उत्पन्न हुआ था। यानी न्यूटन ने पेड़ से गिरते सेब जैसी सामान्य घटना से एक नया विचार उत्पन्न कर लिया कि सेब धरती पर ही क्यों गिरता है, आसमान में क्यों नहीं उड़ने लगता है। उनके इस विचार में उन्हें उत्तर मिला कि धरती खींचती है, यानी धरती में फोर्स है। अपने विचार को उन्होंने गणितीय सूत्र में जांचा-परखा और आश्चर्यजनक रूप से सही पाया। और यह विचार बन गया गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत।
मैंने कहा था न कि विचार से एक नया विचार जन्म लेता है, जब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को अलबर्ट आइंस्टाइन ने एक नए विचार में बदला वह था सापेक्षता का सिद्धांत। यानी हर ग्रह का अपना समय होता है, वो इस बात पर निर्भर करता है कि उस ग्रह से सूर्य की दूरी कितनी है, उस ग्रह पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण शक्ति कितनी है। यही सापेक्षता का सिद्धांत है, जो समय को विभिन्न कारणों में बांटता है। आइंस्टीन का यह विचार ब्रह्मांड के नियमों पर लागू होता है। न्यूटन ने भी धरती और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण में अंतर बताया और ये विचार आइंस्टीन के लिए नए विचार में तब्दील हुआ, जो सत्य की कसैटी में सही उतरा। आज ये विचार आधुनिक विज्ञान की काया पलट दी। सारे प्रयोग इसी के आधार पर होने लगे। न्यूटन को यह विचार की धरती में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है, इसे हो सकता है बहुत लोगों ने उनसे पहले ही जान लिया लेकिन वे अपने विचार को सत्य की कसौटी में उतार नहीं पाए, इसलिए इस सही विचार को वे गलत समझ बैठे। ऐसे ही छोटे विचारों को कसौटी में कसना जरूरी होता है, नहीं तो हम सही और गलत पर विचार नहीं कर पाते हैं। यानी अपने विचारों को पहचानिए और उसे एक जोहरी की तरह परखिए, हो सकता है भविष्य के बुद्ध, महावीर जैन, गांधी, न्यूटन, आइंस्टीन बनना आपके विचारों में हो, बस उसे मूर्त रूप देना भर है।

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