सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

बच्चे का मन तो नहीं है बीमार

पैरेंटिंग्स
This article copy right If you want publish please cotact my mail abhishekkantpandey@gmail.com


अभिषेक कांत पाण्डेय


मां होने के नाते आप चाहती हैं कि आपका बच्चा हंसे, ख्ोले और स्वस्थ रहे। पर कभी-कभी हम अवसाद में घिरे बच्चे के मन को नहीं पढ़ पाते हैं। बच्चों का बदला-बदला व्यवहार जैसे, गुमसुम रहना, अकेले में समय बिताना, किसी से बात न करना और उसके चेहरे पर परेशानी दिख्ो तो जाइए कि आपके बच्चे का मन बीमार है। वह कोई मानसिक व्यथा से गुजर रहा है। ऐसे में मां होने के नाते आप बच्चों की उलझनों के बारे में जाने और उसकी काउंसिलिंग कराए ताकी आपका बच्चा फिर से हंसता-ख्ोलता नजर आए।
-------------------------------------------------------------------------------------
रीता 11 साल की है। बार-बार अपनी मां को बताना चाहती है कि उसे ट्राली वाला गली तक छोड़ कर चला जाता है, 'मां ट्राली वाले से कहों की घर तक छोड़ दिया करे।’ लेकिन रीता की मां ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और कहा कि सड़क से गली तक तो दो-मिनट का रास्ता है, थोड़ाè पैदल चलकर आजाया कर। रीता की मां अपने काम में लग जाती है, कुछ देर बाद रीता गुस्से में बोलती है कि मैं स्कूल पढ़ने नहीं जाऊंगी। यह कहकर नीता अपने कमरे में चली जाती है। नीता उदास रहने लगती है। उसका मन किसी काम में नहीं लगता है। वह कमरे में अकेले बैठी रहती
है। उसके व्यवहार में आए परिवर्तन को उसकी मां समझ नहीं पा रही है।
सवाल उठता है कि आखिर रीता क्या कहना चाहती है। बार-बार मां से कहने पर भी रीता की मां कुछ समझ नहीं पा रही है। जाहिर है रीता की इस समय कोई समस्या से जूझ रही है। बाद में पता चलता है कि रीता जब स्कूल से आती है तब गली में उसे लड़के छेड़ते है और फब्तियां कसते हैं। जिसे रीता अपनी मां से खुलकर नहीं बता पाती है। रीता के मन में यही डर बैठ गया और वह बार-बार आपने मां को कहती है लेकिन उसकी मां समझ नहीं पाती है। जब उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाता है, तब यह बात समाने आती है। नीता के मामले में कहा जा सकता है कि
बच्चे इस उम्र में वह कई शारीरिक एवं मानसिक बदलाव की ओर बढ़ रहे होते हैं, ऐसे में माता-पिता को खासतौर पर अपने बच्चों के व्यवहार और उनकी समस्याओं को समझना जरूरी है। देखा जाए तो घर से बाहर स्कूल, गली-मुहल्ले,
परिवार, रिश्तेदार आदि कोई भी बच्चों के साथ गलत व्यवहार कर सकता है। अगर बच्चे किसी व्यक्ति के अनैतिक व्यवहार का शिकार होते हैं तो वह इस बात को बताने में असमर्थ होते हैं। उनके मन में डर बैठ जाता है और वे धीरे-धीरे तनाव में आ जाते हैं।



बच्चों के एकाएक बदले व्यवहार पर रखें नजर

बच्चों के व्यवहार में एकाएक परिवर्तन आता है, जैसे-किसी खास जगह, स्कूल, पार्क या आस-पड़ोस में जाने से कतराते हैं तो हो सकता है कोई बात वे डर के कारण छिपा रहे हो, या बताने में संकोच कर रहे हों। बच्चों का इस तरह से अकेले तनाव में रहने से उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि अगर बच्चों में इस तरह के लक्षण दिखे जैसे, अकेले रहना, किसी से बात नहीं करना, पढ़ाई में मन न लगना आदि तो पैरेंट्स का समझ लेना चाहिए कि बच्चे को किसी न किसी चीज को लेकर समस्या है। जिसका समधान जल्द से जल्द करना जरूरी है। बच्चों में मनोवैज्ञनिक समस्यओं के कारण उनके विकास और सोच पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चों के इस
तरह एकाकए आए व्यवहार में बदलाव की जड़ तक जाए। इसके लिए मनोचिकित्क से काउंसिलिग भी की जा सकती है।

हम घिरे है मनोवैज्ञनिक समस्याओं से
आधुनिकता के इस भागदौड़ वाली जिदगी में हम कई तरह की समस्याओं से घिरे हुए हैं। इन समस्याओं के समाधान में हम तनाव में जीने लगे हैं। यह तनाव एक तरह से हमारे मस्तिष्क पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं, जिससे हम
तनाव में आ जाते हैं। डिफ्रेशन जैसी नई बीमारी से जूझने लगते हैं। जिस तरह से हम शारीरिक रूप से बीमार होने पर तुरंत डाक्टर से परामर्श लेते हैं, इलाज कराते हैं और मेडिसिन खाकर हम शारीरिक बीमारी से ठीक हो जाते हैं। लेकिन तनाव और अवसाद होने पर हम इसे बीमारी समझते नहीं है और इसके उपचार के लिए मनोवैज्ञानिक के पास जाने से कतराते हैं। देखा जाए जब हम किसी एक दिशा में सोचते हैं और यह सोच नाकारत्मकता में बदल जाती है। इस तरह हम स्वयं दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं और हम मानसिक रूप बीमार होने लगते हैं।

साइकोलाजिस्ट के पास है इलाज
मानिसिक बीमारी को लेकर आज भी लोगों में कोई जागरूकता नहीं है। समाज में बढ़ती मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उसके समाधान के लिए अभी बहुत छोटे स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। इन तरह की समस्याओं के कारण डिफ्रेशन यानी तनाव की समस्या आज भारत के शहरी इलाकों में बहुत तेजी से बढ़ा है। दस साल के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में यह समस्या पाई जाती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में बढèती मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक तौर पर योजनाओं का अभाव है। आज की जिदगी में हम काम के कारण अपने ही लोगों से बातचीत करने का समय नहीं निकाल पाते हैं। देखा जाए तो कई ऐसे परिवार हैं, जहां पर माता और पिता दोनों नौकरी करते हैं और ऐसे में उन्हें अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। परिवार के सदस्य आपस में बात केवल फीस जमा करना है, सब्जी लानी है, होमवर्क किया की नहीं आदि निर्देशों और सूचना तक ही सीमित रह जाती है। इस तरह के परिवारों में बच्चे मनोवैज्ञानिक समस्या के शिकार होने की संभावना ज्यादा होती है। ऐसे परिवारों में ज्यादातर बच्चों का समय पढ़ाई के अलावा टीवी देखाना या मोबाइल में बात करना या घंटों अकेले बैठे रहने में बीतता है। मानोवैज्ञानिक बताते हैं कि इस कारण से बच्चों के क्रमिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है। जिस घर में माता-पिता का कम्यूनिकेशन बच्चों के साथ नहीं होता है, उन घरों के बच्चे अपनी फैंटेसी यानी कल्पना के जीवन को ही सच मान लेते हैं। मनोवैज्ञानिकों का
मानना है कि इस तरह की समस्याओं के उपज के कारण बच्चों में हिसात्मक या फिर इसके ठीक उलट दब्बूपन या डर का स्वाभाव उनमें आ जाता है। अगर आपके बच्चें के स्वाभाव में इस तरह की कोई समस्या हो तो मनोवैज्ञनिक परामर्श लेना जरूरी है। लेकिन अफसोस है कि भारत में मानसिक समस्याओं के प्रति माता-पिता में जागरुकता की कमी है, जिसके कारण से हमारे समाज में बच्चों की बीमार मनोदशा को नजर अंदाज किया जाता है।

भारतीय समाज में मनोवैज्ञानिक समस्या को पागलपन की बीमारी से जोड़ दिया जाता है। जोकि सही नहीं है, जैसे हमें बुखार, जुकाम, खांसी जैसी छोटी-छोटी शारीरिक बीमारियां हो जाती हैं तो डॉक्टर से परामर्श लेकर और उचित दवा खाकर हम अपनी बीमारी को ठीक कर लेते हैं लेकिन बच्चों में कोई मनोव्ौज्ञानिक समस्या आती है तो हम इसके समुचित इलाज के लिए साइकोलॉजिस्ट के पास जाने से संकोच करते हैं। वही परिवार के अन्य सदस्य, संगे संबधी, दोस्त इस तरह की समस्या को हंसी के पात्र की नजरों से देखते हैं। इस तरह की बात करने वाले को हमारे समाज में उस व्यक्ति या बच्चे को झक्की या पागल होने से जोड़ दिया जाता है। इसीलिए मनोवैज्ञानिक समस्याओं से ग्रसित बच्चों को उनके माता-पिता साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाने में हिचकिचाते हैं। लकिन एक अच्छे माता-पिता होने के नाते आप इन सब बातों पर ध्यान न दें। अगर आपका बच्चा मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहा हो तो उसकी मदद करें, उसे सही पारामर्श व इलाज के लिए साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाएं।

बॉक्स
बच्चों पर न बनाएं दबाव
प्रतिस्पर्धा के इस युग में माता-पिता पढ़ाई के लिए बच्चों पर अनावश्यक प्रेशर बनाते हैं। अच्छे मार्क्स लाना, विज्ञान और
गणित जैसे विषयों में रूचि न होने पर भी इंजीनियरिग या मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए बाध्य करना आदि सोच से जरा ऊपर उठे। हर बच्चे की अपनी रुचि और उसका व्यक्तित्व होता है, उसे उसकी मनपसंद के विषयों को पढ़ने और कॅरिअर बनाने की आजादी दें। अपने सपने बच्चों के माध्यम से न पूरा करें, उन्हें उनकी रुचि और क्षमता पर छोड़ दें, वहीं आप पढ़ाई और जीवन के हर मोड़ पर उनको सलाह दें, मदद करें लेकिन उन्हें खुद बढ़ने और अपना रास्ता खुद चुनने का मौका दे। हो सकता है कि कल आपका बच्चा संगीत की दुनिया में बड़ा नाम कमाए या वहा वैज्ञानिक बनकर बड़े-बड़े आविष्कार करे।