शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

जीव जंतुओं की संवेदना व्यक्त करती बेचैन कविताएं

काव्य संग्रह




अभिषेक कांत पाण्डेय

मन को बेचैन करती कविताओं का संसार रचनेवाले श्याम किशोर बेचैन उन युवा कवियों में हैं जो कविता को मिशन के रूप में देखते हैं। बस सही समय पर सही बातों को कविता के रूप में जन समुदाय के सामने सरल प्रभावी भाषा में अपनी बात कह देने वाली प्रतिभा के धनी है बैचैन। बैचेन खुद कहते हैं कि कविता उनके लिए उस नदी के समान है जो उन्हें रचनेवाले के साथ ही पढ़नेवाले को भी सुखानुभूति देती है। श्याम किशोर बेचैन लखीमपुर खिरी जिले के रहनेवाले हैं। भारत के कोने कोने में मंचों पर कविता के जरिये अपनी अलग पहचान बनाई है। गीत, गजल, चौपाई विधा में आधुनिक संसार में उपजे समस्याओं को बखूबी उजागर करती रचनाएं बेचैन की पहचान है। इसी श्रृंखला में श्याम किशोर बेचैन की नई कविता संग्रह वन्य जीव और वन उपवन जनमानस को समर्पित कविता संग्रह है। इस संग्रह में हमारे आसपास जंगलों में रहने वाले जीव जंतुओं पर 70 कविताएं हैं, जो हमें सीख तो देती है वहीं रचनाधर्मिता के उस आयाम को छूती है जहां पर हर विषय में वेदना भी छिपी है तो संवेदना भी। यह जीवन का सत्य है कि प्रकृति ही हमें पालती पोसती है लेकिन आधुनकता के दौर में हम प्रकृति के अन्य भागीदारों जैसे जीव जंतुओं और पेड़ पौधों को भूले जा रहे हैं। नदिया, जंगल, प्रकृति संसाधन ही इस संसार को पालनेवाले हैं जोकि कवि बेचैन की कविता में बार बार बरबस आती है और चेतावनी देती नजर आती है कि हे! मनुष्य अब सावधान हो जाओ, प्रकृति से खिलवाड़ नुकसानदायक साबित होगा। कविता मन की उपज होती है लेकिन जब वह प्रकृति के सच से साक्षात्कार करती है तो वो कविता इंसान को सीख दे जाती है। इस संग्रह में बैचेन जी ने बैल से लोमड़ी तो केंचुए तक की उपयोगिता को प्रभावशाली शब्दों के साथ कविता विधा में उतारा है। सर्प, बिच्छी, गिरगिट के प्रकृति स्वभाव की चेतावनी देती कविता मनुष्य को सीख देती है कि प्रकृति बूरे कार्यों का दंड देती है तो वहीं अच्छे कर्मों के लिए पुरस्कार भी देता है। सरल शब्दो और आमजन की भाषा में जीव जंतुओं और प्रकृति की स्वाभाव के बारे में अद्भुत चित्रण किया गया है।
शत्रु प्रकृति शीर्षक कविता देखियेखून खराबा करने वाले, आतताई हैवानो के। लालच बैठ गया है अन्दर, बेकाबू बेईमानों के।
वनों में इंसानों की दखलअंदाजी से उपजने वाले खतरों को अगाह करती कविता बेचैन के मन में बैठे उस डर को बयान करती है,जहां प्रकृति के साथ खिलवाड़ इंसानों की जाति के लिए खतरा साबित होगा। बेचेन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नजरियों से वन संपदा और वहां के जीव जंतुओं को उनके इस प्रकृति आवास से अलग करने की सीख देते हैं। इनकी कविता का स्वर कहीं कहीं आक्रोशित हो उठता है लेकिन यह जरूरी है।
एक बानगी देखिएजीने दो वन्य जीवों को वन के माहौल में। जीना किसी भी जीव का दुश्वार करो। बंधन से किया जैसे शेर भालू को आजाद। आजाद करो सर्प को विचार करो।।
चिरइया से जुड़ी परंपराओं को बयान करते हैं तो सांप के अस्तित्व को वनों के लिए जरूरी मानते हैं। कवि का हृदय विशाल है मगर चेतना के स्वर को लिए हुए वे मन से नहीं कर्म से जंगल की सेवा करने की बीड़ा उठाने का संकल्प लेता है। लखीमपुर जिले में दुधवा नेश्नल पार्क के अंदर के हाल को बयां करती कविताएं हैं, यहां पर मौजमस्ती के लिए आये इंसानों को चेतावनी देती कविताएं हैं तो वहीं जंगल के जीव जंतुओं के लिए इन्हें यहां शांति से जीने देने की सीख भी है
वन्य शत्रु की सच्चाई शीर्षक कविता की यह बानगी आपके अंतरमन को छू जाएगीमैं हूं खाने का शौकीन/ पीता हूं व्हिस्की रंगीन।/ समय नहीं करता बेकार।/ रहता हूं हरपल तैयार।/ जब मिलता अवसर।/ मार गिराता हूं हिरन सुअर।
वहीं गधा पर लिखी कविता सच्चाई को सामने लाती है
हिंसक हत्यारा।
फिर भी गधा है बेचारा।।
अहित किसी का करें नहीं।
मेहनत से ये डरे नहीं।।
बस्ती में बसता है।
वाहन सबसे सस्ता है।।
ढेंचूढेंचू करता है।
अपनी धुन में रहता है।
श्याम किशोर बेचैन का कविता संग्रह हिंदी काव्य में जन समुदाय की भाषा में बिल्कुल सरल औरचित्रित शब्दों के माध्यम से जन संदेश देती है तो वहीं तुक में लिखी कविता उन नये लोगों को कविता साहित्य से जोड़ती है, जो कविता इसलिए नहीं पढ़ते हैं कि उन्हें कविता क्लिष्ट लगती है। यहां पर सादगी और संजीदगी दोनों है। छिपकली, गैंडा, चींटी, चूहा, बकरा इत्यादि विषयों पर लिखी कविता बताती है कि बेचैन अपनी विषय वस्तु सामान्य से सामान्य समझे जानेवाले जीव जंतुओं में भी खोज लेते हैं।

कविता संग्रह
वन्य जीव और वन उपवन
मूल्य— 80 रुपये
कविश्याम किशोर बेचैन
प्रकाशकनमन प्रकाशन, 2010 चिन्टल्स हा

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

नोटबंदी के बाद राजनीति


अभिषेक कांत पाण्डेय
नोट बंदी के बाद से देश की राजनीति दो खेमों में बंट गई है। सत्ता पक्ष जहां नोटबंदी के फायदे गिना रही है तो वहीं विपक्ष नोटबंदी से जनता को हो रही परेशानी को मुद्दा बनाकर राजनीति कर रही है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नोटबंदी के बाद आम जनता को नोट बदलने के लिए लम्बी लम्बी कतरों में लगना पड़ रहा है। बैंकों में सही मैनेजमेंट न होने के कारण आम लोगों काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। देखा जाए तो नोटबंदी से होने वाले फायदे भी हैं तो नुकसान भी। विपक्ष ने आम जनता की परेशानियों को आगे लाकर राजनीति शुरु किया तो संसद की कार्यवाही भी बाधित रही। वहीं नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के समर्थन पर सर्वे कराकर जनता की राय मांगी, जाहिर है एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में नोटबंदी पर यह सर्वे बेईमानी ही है लेकिन यह तय है कि मोबाइल फोन रखनेवालों में से नब्बे प्रतिशत से अधिक ने नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है। सच्चाई यह है कि भारत में नोटबंदी जैसे फैसला लेना राजनीतिक रूप से जरूरी था और भ्रष्टाचार के जरिये कमाये गए काले धन को ध्वस्त करने के लिए भी। वहीं सवाल यह है कि जिन्होंने काला धन इकट्ठा किया है, वे आम जनता के साथ लाइन में लगे नजर नहीं आए, आखिर कौनसी खामियां रह गई कि सारी परेशानियां आम जनता के खाते में आई। इससे यही जाहिर होता है कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार रूपी दीमक की सफाई के लिए नोटबंदी ही काफी नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी को कुछ और बड़ा करना होगा। सफाई अभियान में भ्रष्टाचार के संक्रमण को जड़ से मिटाना होगा। वहीं नोटबंदी के बाद जब ये खबरें आती हैं कि बैकडोर से पुराने एक हजार व पांच सौ के नोट बदले गए तब जाहिर है कि इस तरह की खबरें नोटबंदी की सफलता पर संदेह उठाती हैं।

नोटबंदी पर घमासान
नोटबंदी की तारीख आठ नवंबर से पहले भाजपा पार्टी ने अलग अलग राज्यों के जिलों में पार्टी के दफ्तर खोलने के लिए पुराने नोटों को ठिकाने लगाया, विपक्ष का यह आरोप संगीन है, इस पर जांच की जानी चाहिए। बहरहाल, ये संयोग भी हो सकता है कि नोटबंदी से पहले संपति की खरीद फरोख्त आदि को इस समय संदेह की निगाह से देखा जा रहा हो लेकिन जांच से दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा कि सच्चाई क्या है? पर विपक्ष की अपनी पीड़ा है कि नोटबंदी लागू होने से उन्हें राजनैतिक व आर्थिक नुकसान हुआ है क्योंकि कई सर्वे भी बाताते हैं कि चुनावों में लगभग हर पार्टी काले धन को खपाती है, वहीं ऐन वक्त में नोटबंदी के कारण चुनावों में गैर कानूनी तरीके से खर्च होने वाले काला धन अब किसी काम का नहीं रहा है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने काले धन को सफेद कर लिया है, नोटबंदी एक बड़ा घोटाला है। इन सब सवालों का उठाना विपक्ष की एक खींझ ही है।
सत्ता पक्ष ने नोटबंदी यानी विमुद्रीकरण का साहसिक फैसला लेकर आम लोगों का विश्वास जीत लिया है तो वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भरतीय जनात पार्टी ने अपने पैसे मैनेज करने का उसे पूरा समय मिला गया हो क्योंकि जिस तरह से राजीनीति भ्रष्ट है उस नजरिये से देखा जाए तो दूध का धुला कोई नहीं है। वहीं इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि मुट्ठीभर अच्छे नेताओं के बदौलत राजनीति में स्वच्छता बची हुई है, लेकिन ऐसे लोगों के अच्छे मनसूबे पर भ्रष्ट राजनीति पानी फेर देता है। नोटबंदी लागू होना जनता के लिए बड़ी जीत इसलिए भी है कि राजनीति में गैर कानूनी तरीके से खर्च होने वाला धन अब कूड़ा हो गया है। भले ये एक तरफा रहा हो लेकिन जो सियासत जनता को वोट बैंक के रूप जातिवादी, भाई भतीजावाद के नजरिये से देखती थी, आज उस पर करारा प्रहार हुआ है। ऐसे भ्रष्ट नेता व अधिकारियों का कालाधन अब किसी काम का नहीं है। देखा जाये तो नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और उनकी रणनीति के पार इस समय कोई नहीं है, विपक्ष गलत मुद्दे उठाती रही है और उन मुद्दों पर बिखर जाती है। इसीलिए नीतीश कुमार ने नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है, नीतीश कुमार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, मौका और नजाकत को समझते हैं इसीलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए विरोध की राजनीति करना सही नहीं समझा। वैसे नीतीश ने बिहार में शराबबंदी का फैसला लेकर नोटबंदी से पहले ही एक साहसिक काम कर चुके हैं। बीजेपी ने इस फैसले की आलोचना भी की। ये तो राजनीति का चाल चरित्र है कि एक दूसरे के विरोधी इसलिए भी अच्छे फैसलों का विरोध करते हैं ताकि उनके वोट बैंक पर सेंध कोई और न मार ले। लेकिन इन सब फैसलों से एक बात साफ हो गई कि भारत की जनता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नशाखोरी, बिजली की समस्या, खराब सड़क, खराब शिक्षा व्यवस्था, असंवेदनशील पुलिस व्यवस्था, रेत माफिया, शिक्षा माफिया, घोटालों से बेहद परेशान है। इसलिए भारत की जनता ठोस सुधार हर कीमत में चाहती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली जैसे राज्यों में वहां की सरकारें सुधार की पहल शुरू कर दिया लेकिन ये पहल ठोस व जमीनी स्तर पर नहीं है, कवेल वोट बैंक को अपनी ओर खींचने और चुनावी भाषण में गिनाने की केवल कवायद है। वहीं सवाल यह है कि मोदी सरकार नये तरीके प्रयोग करके दूसरे राज्यों में गैर भाजपा सरकारों के लिए चुनौती पेश कर रही है, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
विरोध के लिए विरोध की राजीनीति क्यों
विपक्ष नोटबंदी के खिलाफ मोदी सरकार का विरोध इसलिए कर रही है कि वे नोटबंदी से होने वाले नफा और नुकसान के परिधि में ही खुद को देख रही हैं, वहीं ये सवाल लाजिमी है कि आखिर कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए इस तरह के फैसले क्यों नहीं लिए गए। अगर कांग्रेस नोटबंदी का फैसला पिछले 10 साल के शासनकाल में ले लेती तो जाहिर है जैसी राजनीति हम देखते आए उस पर विराम लगता और एक नई पहल का जनता स्वागत करती। साफ है कि नोटबंदी से होने वाले नुकसान के साथ ही फायदे भी है लेकिन केवल विरोध के विरोध की राजनीति ओछी है, इसीलिए विपक्ष के विरोध के कारण अगर संसद की कार्यवाही नहीं हो पा रही है तो जनता के पैसों की बर्बादी ही है। हालांकि देश में राजनीति हर घटना पर होती है लेकिन जब यह राजनीति केवल विरोध के विरोध की जबरजस्ती की हो तो ऐसी राजनीति से उल्टे नुकसान ही होता है।


राजनैतिक दलों में बढ़ेगा काॅम्पटीशन
नोटबंदी के लागू होने के फायदे व नुकसान को लेकर चर्चा हो रही है। राजनीति लाभ में भाजपा को इसका फायदा मिलेगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि मानसून की तरह नोटबंदी से होने वाले लाभ की जगह अगर बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे फैक्टर पर काबू नहीं पाया गया तो जाहिर है, इसका अभी का फायदा लंबे समय तक वोटों में कनवर्ट नहीं हो पायेगा। लोगों ने नोटबंदी को कालेधन पर नकेल कसने का सही तरीका बताया है लेकिन अगर इससे होने वाली परेशानियां नहीं थमी तो विपक्ष यानी एंटी भजपा पार्टी इसका फायदा उठा सकती है। वहीं अगर नोटबंदी के फायदे जनता के सामने प्रत्यक्ष रूप से आने लगे तो कुछ महीने बाद उत्तर प्रदेश व पंजाब का चुनाव है ऐसे में नोटबंदी से खुश हुए लोग भारतीय जनता पार्टी की नैया पार लगा सकती है।
वहीं उत्तर प्रदेश में वर्तमान समाजवादी सरकार ने नोटबंदी से जनता को होने वाली परशानियों को मुद्दा बनाया है। गरीब, किसान, आम लोगों को हो रही दिक्कतों के कारण नोटबंदी का विरोध किया लेकिन बाद में खुद को नोटबंदी के खिलाफ न होने की सफाई भी देना पड़ा है। लेकिन आने वाले समय में राज्य सराकारों के लिए काॅम्पटीशन जबरजस्त होगा। कारण साफ है कि जनधन योजना, नोटबंदी, सोने में खरीदकर काले धन को सफेद करने के धन्धे पर मोदी सरकार ने प्रहार किया है। सोना रखने की सीमा तय कर दिया। वहीं बेनामी जमीन और गलत तरीके से जमीन जायदाद बनाने वाले पर नकेल कसने का इशारा भी कर चुकी है। जाहिर है सुधारवादी नजरिये के साथ नरेंद्र मोदी जनता के सामने आये हैं। इससे एक कदम आगे लोगों को एक मुश्त पैसा देने की योजना को भी अमल कर सकते हैं। माना जा रहा है कि नोटबंदी के बाद पुराने एक हजार व पांच सौ के नोटों पर मिले टैक्स का फायदा आम जनता को मोदी सरकार दे सकती है लेकिन इसके लिए कानूनी तरीके ढूढ़े जा रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो अपने पारंपिरक वोटर के साथ ही अब भाजपा गरीब, किसान, छोटे व्यवसायी, महिलाओं जैसे वर्गों को लुभाना चाहती है, जाहिर है वोट की राजनीति में अब तक जाति वर्ग के पैमाने में क्षेत्रीय दल अपने वोट टटोलती रही है, ऐसे में मोदी के फैसले भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता की कुर्सी का रास्ता आसान बना सकती है।
उत्तर प्रदेश में होने वाले पिछले कई चुनाव में समाजवादी पार्टी व बसपा में खास जाति वर्ग को लुभाकर आसानी से वोट हासिल करने की परंपरा इस चुनाव में टूटेगी इसीलिए भाजपा ने विकास मुद्दे के साथ अब सुधार मुद्दा का राग छेड़ दिया है। नोटबंदी, कैसलश इकोनाॅमी, सोना रखने की तय सीमा इन सब मुद्दे ने वर्तमान गैर भाजपा दल के राज्य सरकारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। राज्य सरकारों को काॅम्पटीशन में टिके रहना है तो मोदी की तरह परफार्म करना होगा। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
यूपी चुनाव पर नजर
वहीं देखा जाए तो अखिलेश यादव की मेट्रों योजना, 108 एम्बूलेंस योजना, आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे, स्मार्ट मोबाइल फोन योजना आदि ऐसे फैसले हैं जो चुनाव में भुनाने वाले हैं। वहीं लखनऊ में पटरियों पर मेट्रो का ट्राॅयल उद्घाटन हुआ, ये अलग बात है कि आम लोगों के लिए अभी मेट्रो से घूमने का मौका छह महीने बाद मिलेगा, वहीं आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उद्घाटन। इन सब विकास की बातों को चुनाव में रख कर अपने कार्यों को बताने की कवायद में सपा भारतीय जनता पार्टी के आमने सामने होगी। लेकिन देखना है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता इसे किस नजरिये से देखते हैं। लेकिन इतना तय है कि मोदी की योजनाओं ने आम लोगों को अपने ओर खींचा है, इसी कारण बीजेपी विरोधी अन्य पार्टियों में भी विकास के कार्यों को जनता तक पहुंचाने की होड़ लगी है। भले वह आधी अधूरी ही क्यों न हो, इससे ये भी तय है कि शिक्षा, पानी, सड़क, बेराजगारी, पुलिस सुधार, भ्रष्टचार आदि पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकारों को भी नोटबंदी जैसे साहस भरे फैसले की जरूरत है।

नोटबंदी तो सही लेकिन कब सुधरेगा सरकारी तंत्र
नोटबंदी क्या सभी समस्याओं का एक मात्र संजीवनी वटी है। नोटबंदी के साइड इफेक्ट के तौर पर आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इन सबके बावजूद सवाल यह कि काले धन का कारोबार घटेगा कि नहीं है? क्या हमारी अर्थव्यवस्था बिना नकदी के हो पायेगी?  इन सवालों के बीच यह भी सवाल है कि क्या यह राजनीति फायदा उठाने के लिए लिया गया फैसला है? जाहिर है देश के लोग भ्रष्टाचार और काली कमाई वाले पर लगाम लगाने के लिए वे हर सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखती है लेकिन जब इस तरह का साहासिक फैसला लिया जाता है तो उस हुक्मरान के प्रति जनता आशा भरी नजरों से देखती है, जिस देश में एक प्रतिशत लोग की हैसियत इतनी अधिक है कि उनमें से ऐसे लोग ही काला धन की सबसे बड़ी कालाबाजारी करते हैं, जिन्हें बड़ी मछलियां कहा जाता है, ऐसे लोगों को पकड़ पान इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार का सिस्टम कितना दुरूस्त व ईमानदार है।
जाली नोटों पर कार्यवाई जरूरी
फर्जी नोटों का शिकंजा भारतीय अर्थव्यवस्था में दूर दूर तक फैला है। फर्जी नोटों को बाहर करने के लिए सरकारें अपने नोटों के फीचर्स में लगातार बदलाव करती रही हैं लेकिन जालसाज इसका तोड़ निकाल लेते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो अचानक एक हजार व पांच सौ के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला काबिले तारीफ है। लेकिन नये दो हजार के जाली नोट जालसाजों ने बनाना शुरू कर दिया है, कई मामले सामने भी आए हैं। इसलिए जाली नोटों पर पुख्ता कार्यवाई करने की जरूरत हमेशा बनी रहती है, ताकी जाली करेंसी जब्त किया जा सके।
जमीन जायदाद की हो जांच
अनुमान यह है कि देश में काला धन का छह प्रतिशत नकद के रूप में है। हालांकि कुछ लोग इसे आठ तक प्रतिशत बताते हैं, बाकी पैसा सोना, रियल एस्टेट के रूप में या बेनामी खातों में या देश से बाहर जमा है। काला धन को नकद के रूप में नहीं रखा जाता क्योंकि इसकी कीमत कम हो जाती है। आयकर विभाग, सीबीआई या किसी सरकारी संस्थान द्वारा की गई छापेमारी की खबरों में पकड़े गए धन-संपत्ति में नकद कम होता है जबकि सोने व जमीन जायदाद के रूप में ज्यादा काला धन इनवेस्ट किया जाता है। ऐसे में नोटबंदी के फैसले से सारा काला धन खत्म हो जाएगा तो यह सोच केवल राजनीतिक फायदा उठाने तक ही सीमित है। असल में नोटबंदी के बाद पूरा प्रहार इस बात पर होना चाहिए कि इसके बाद कालाधन न पनप पाए और अगर कोई काला धन जमीन जायदाद, सोना या धन के रूप में हो तो उसे पकड़ने का बेहतर सिस्टम बनाना होगा।
नोटबंदी के बाद इसका फायदा आम जनता को मिलने लगे तो कहा जा सकता है कि नोटबंदी आम जनता के लिए फायदे में रही है लेकिन इसके लिए अभी इंतजार करना होगा हालांकि नोटबंदी सही से लागू होने के बाद इसके असर दिखने चाहिए। आम लोग लाइन में लगकर दिक्कतों के बावजूद इसलिए खुश है कि उन्हें इसका फायदा आने वाले समय में जरूर मिलेगा। जाहिर है नये सुधार लागू होने के समय दिक्कतों का सामना लोग असानी से कर ले रहे हैं लेकिन तब भी अगर सुधार दिखाई नहीं दिया तो लोगों के आक्रोश सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करेगा, संभव हो इसका फायदा विपक्षी दल एकजुट होकर इसका उठा ले जाए। नोटबंदी के बाद जनता की उम्मीदें मोदी सरकार से बढ़ गई हैं। इन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए मोदी सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदारी से फैसले लेने होंगे।
मोदी सरकार के पास ये हैं चुनौतियां
भ्रष्टाचार से कमाया गया धन या कर-चोरी की रकम भी काला धन होता है। यानी आम लोगों को इस पहल का फायदा इस तरह से मिलना चाहिए कि अब भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, राजनीतिक व्यवस्था पारदर्शी हो जाएगी, कर चोरी नहीं होगी, भ्रष्ट आचरण बंद हो जाएंगे। केवल नोटबंदी से संभव नहीं इसके मोदी सरकार को कई और सुधार करने होंगे-पुलिस-नौकरशाही सुधार, पारदर्शी सरकारी तंत्र, प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम सेलरी, आधार कार्ड को हर जगह पहचान के लिए लागू करना, न्याय को सस्ता व सुगम बनाना, जिनके पास घर नहीं ऐसे लोगों को घर उपलब्ध कराना, शिक्षा व्यवस्था पर एक पाठ्यक्रम व गुणवत्ता वाली शिक्षा हर किसी को देने की नीति, बेनामी सम्पति को अधिग्रहण करना, अपराधिक मामलों से जुड़े व्यक्ति को चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए, अगर इस तरह के सुधार जल्द न किए गए तो नए नोटों से तमाम काले काम फिर होना षुरू हो जाएगा। वहीं नोटबंदी के जरिये भले काला धन का जमा भंडार (छह से आठ फीसदी) खत्म कर देंगे, मगर संपूर्ण सुधार नहीं हुआ तो उसके प्रवाह को रोक पाना संभव नहीं होगा।

बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोट बंदी


नोट कर लो
ये नोट
वक्त के साथ
आपका साथ छोड़ जाता है,
वक्त चाहे जितना हो
एक दिन वो भी खत्म हो जाता है।
अगर रह जाता है तो वह तुम
पर वह तुम में मैं नहीं रह पाता।
तुम समझ पाते हो
कैसे फर्क पड़ता है उन लोगों पर।
कुछ वक्त पहले तुम
काली तिजोंरी में
झांकते थे इठलाते थे,
जाने कितने इंसानों का मार हक
बंद था तुम्हारी तिंजोरी में,
नोटों की शक्ल में काली करतूत।
वक्त आज एक है
नोट अनेक
पर सब मिट्टी के ढेर।
सोचो जानो
एक बार फिर पढ़ लो
महावीर, गौतम को
क्या पता चले तुम
माया में जोड़ रहे हो नोट
कहीं हक मार रहे हो
कई जिंदगियों का।
काले तिंजोरी में कैद
उन नोटों को मिली अजादी
जिसे तुमने कमाया तिकड़म से।
फिर वक्त आ गया
तुम्हारी तिंजोरी में काली कमाई
वाली नोटे
साथ में रखी उन बेनामी कागजों
को भी क्रांति सिखा गई
अब वे कागज तुम्हारे
खिलाफ हैं
अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी

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बुधवार, 28 सितंबर 2016

अब बातें नहीं, विकास करके दिखाओ


अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी
इस बार उत्तर प्रदेश में होने वाला आम चुनाव, क्या अमूलचूल परिवर्तन लायेगा। किसकी बनेगी अगली सरकार? क्या सपा की वापसी होगी, या बसपा सत्ता की चाबी पाएगी या क्या कांग्रेस का यूपी में 27 साल का निर्वासन खत्म होगा, या मोदी का करिश्मा भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने में के लिए मददगार सबित होगा। इन सवालों के जवाब जाति, धर्म, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, लचर कानून व्यवस्था बनाम विकास की बातों पर समझ रखने वाला मतदाता के वोटों की ताकत पर निर्भर करता है, कि किसने किया है अब तक यूपी का विकास।
केंद्र में भाजपा की सरकार और यूपी में सपा की सरकार है, पिछले दो वर्षों से विकास की बातें हो रही हैं, पर सबसे बड़ा सवाल है कि अब तक यूपी में विकास क्यों नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व भाजपा ने यहां पर शासन किया लेकिन यूपी की स्थिति आज भी बदतर है। देश की राजनीति में यूपी का एक अहम रोल रहा है। यूपी का समीकरण केंद्र की सत्ता में कौन बैठेगा या किसका पत्ता साफ होगा, यह तय करता है। राजनीति की नर्सरी कहे जाने वाले यूपी ने कई प्रधानमंत्री देश को दिए है, लेकिन इसके बावजूद भी यूपी की तरक्की नहीं हो पायी, न उद्योग-धंधों को ढंग से विकास हुआ, न ही यहां पर फिल्म उद्योग का विकास हुआ, ताकि बेरोजगारों को अधिक से अधिक रोजगार दिला सके। लैपटॉप व बेरोजगारी जैसी योजनाओं के जरिये वोटों को खींचने का तरकीब यही बताता है कि राजनीतिक दल जानते हैं कि उन्हें सत्ता पाने के लिए लोकलुभावन वादे कर मतदाता को आकर्षित करना जरूरी है। लेकिन अब जनता जानती है कि ये सब छलावा है, ठोस तरक्की की जरूरत है जिससे गरीबी व बेरोजगारी से लड़ा जा सके। लेकिन जिस तरह से यहां पर चुनाव के ऐन वक्त पर धर्म, जाति और संप्रदायिकता का जहर बोया जाता है तो दो खेमों में वोटों को आसानी से बांटने की सबसे बड़ी साजिश की जाती है, ताकि तरक्की की बात न की जाए, नहीं ंतो नेताओं को जवाब देते नहीं बनेगा कि यूपी में पहला आम चुनाव 1951 से अब तक, लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारों ने गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्या जैसे मुद्दों पर क्या किया। 68 साल बाद भी समस्या जस की तस है। यूपी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य है, लेकिन यहां पर बेरोजगारी, गरीबी, कानून व्यवस्था की समस्या आज भी बनी हुई है।
27 साल पहले यानी 1989 को नरायण दत्त तिवारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, उसके बाद से यूपी में कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आई। निश्चित ही प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को नकारा, ताकि यूपी में विकास की गति नए दल लेकर आये, लेकिन जैसे ही सपा और बसपा ने यूपी की सत्ता हासिल की, तो लगता था कि राजनीति की दशा बदलेगी, लेकिन यूपी के दसवीं विधानसभा चुनाव 1989 में जनता पार्टी की सरकार बनी, मुलायम सिंह यादव ने सत्ता संभाली, उम्मीद थी कि बदलाव आएगा। यह एक ऐसा बदलाव होगा कि आने वाले 15 वर्षों मंें यूपी देश का नंबर वन राज्य बन जाएगा। खैर, इसके बाद भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में शासन किया लेकिन यूपी की तकदीर नहीं बदली, नहीं बदली तस्वीर। कानून व्यवस्था व संप्रदायिकता को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। वोटों को ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति ने एक और रंग ले लिया, वह था दलितों और पिछड़ों के हिमायती बनने वाले नेताओं का जन्म लेना। वहीं राम मंदिर के जरिये हिंदुत्व कार्ड खेलकर वोट बैंक बनाने का एक नया रास्ता भाजपा को मिला। यूपी बदल रहा था राजनीतिक समीकरण के ताने बाने अब दलितों, पिछड़ों व मुस्लिमों मे ंवोटों को जाति व धर्म के नाम पर राजनीतिक दल साधना जान गए थे। तरक्की की बात कौन करता, जब वोट जाति व धर्म के नाम पर मिलने लगे, मंदिर, मस्जिद, तुष्टीकरण, जातिवाद के साये में यूपी के विकास की फिक्र किसे थी। बेरोजगारों, गरीबों और किसानों की दयनीय स्थिति को जानने की जरूरत किसी दल ने नही समझी। केवल खानापूर्ति की स्थिति रही है। वही स्थिति आज भी बनी हुई है।
विकास के नाम पर दिखावा
केंद्र में 2014 के आम चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन से लोगों में उम्मीदें जगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि क्या आज बदलाव हुआ है? यह तो तय है कि विकास को दिखाने की होड़ राज्यों की सरकारों में तेजी से हुआ है। मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन है, दुबारा मुख्यमंत्री बने शिवराज चौहान की सरकार अपने योजनाओं और विकास के कार्यों का खूब प्रचार कर रही है। केजरीवाल की सरकार भी प्रचार-प्रसार में खूब पैसा खर्च कर रही है। वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने अब प्रचार-प्रसार का दामन थाम लिया। अखिलेश यादव हमेशा कहते रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के अच्छे कामों का प्रचार जनता के सामने नहीं आ पाता है। इसीलिए सरकार के विकास कार्यक्रमों का प्रचार खूब किया जा रहा ताकि जनता जान सके। जाहिर है आने वाला यूपी विधानसभा का चुनाव अखिलेश यादव के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है, वे इस पर खरा उतरना चाहते हैं, लेकिन अब जनता को फैसला करना है कि उनका विकास किसने किया है।

किसानों की कौन सुने

राजनीति दल चुनाव से पहले वादे करते हैं लेकिन जैसे ही सत्ता मिलती है, वे अपने वादे भूल जाते हैं। किसानों से हर दल चुनाव के समय वादा करता है लेकिन सत्ता में आने के बाद वही दल किसानों को छलना शुरू कर देता है। चार-पांच हजार रूपये कर्ज न चुका पाने पर किसान को जेल में डाल दिया जाता है, जबकि अरबों रूपये डकार जानेवाले उद्योगपतियों पर सरकारें महरबान रहती हैं। उन्हें सब्सिडी के तौर पर हर तरह की सुविधा देने में कोई कोताही नहीं बरती जाती है, लेकिन सूखे के कारण खराब हो गई फसल के मुवाब्जे के लिए चंद रूपये देकर सरकार किसानों के साथ मजाक करती रही है। देखा जाए तो 1970 के मुकाबले आज चपरासी तक की तनख्वा में 150 गुना बढ़ोतरी हुई, वहीं शिक्षक व प्रोफेसर की आय में 170 गुना, उच्चे दर्जे के अधिकारियों की आय में हजार गुना का इजाफा हुआ है लेकिन किसान को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में केवल 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दरअसल किसानों की जरूरत और उनके विकास के लिए योजनाओं में अनदेखी की गई है। सूखा, बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदा के कारण उनके खेतों और घरों के नुकसान की भरपाई के लिए मिलने वाली धनराशि इतना कम होता है कि उससे क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती है। वहीं सरकारीतंत्र में फैले भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों की कमीशनबाजी के कारण किसान परेशान रहते हैं। जहां एक ओर किसान को कुदरत की मार सहनी पड़ती है, वहीं सरकारीतंत्र की उदासीनता को भी सहना पड़ता है। गुलाम भारत में किसानों को खूब शोषण हुआ, अंग्रेजों ने किसानों की मेहनत से उगाये फसलों का औने-पौने दामों में जबरजस्ती लेकर इंग्लैंड की तरक्की में लगाया। वहीं जमीदारों ने किसानों का आर्थिक व सामाजिक शोषण किया। लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद उम्मीद थी कि किसानों के अच्छे दिन आएंगे, लेकिन सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारों ने वोट बैंक पाने के लिए किसानों से खोखले वादे किए। आज खेती घाटे का सौदा है, किसानों की मेहनत को बिचौलिये खा रहे हैं, भ्रष्टतंत्र किसानों के हिस्से के सब्सिडी, कर्जमाफी के पैसों को डकार जाते हैं। केवल दिखाने के लिए योजनाएं होती हैं, असल में जरूरतमंद किसानों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचत पाता है। नेता और कर्मचारी मिलकर किसानों को मिलने वाली योजनाओं मंे फर्जीवाड़ा कर अपात्रों को इसका लाभ देकर उनसे अपना कमीशन ले लेते हैं। इस तरह छोटे व मध्यम किसानों का हक मारा जाता है। 
किसानों को महाजनों के कर्ज से मुक्त कराने के लिए 1950 के बाद कोऑपरेटिव सोसायटियंा शुरू की गईं। साठ के दशक में इनकी संख्या दो लाख बारह हजार तक पहुंच गई। इनसे लघु और सीमांत किसानो ंको फायदा भी हुआ, पर 1969 में बैंक के राष्ट्रीयकरण और ग्रामीण बैंक के अस्तित्व में आने के बाद सोसायटियों को बेकार मान लिया गया। यह वही समय था जब भारत में भ्रष्टाचार का उदय हुआ। करप्शन के घुन ने व नकारा नौकरशाहों के नकारेपन ने कोऑपरेटिव सोससायटियों के आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया। वहीं विश्व बाजार से बैंकों ने बहुत कुछ सीख लिया था। इधर किसान अब बैंकों से ऋण लेने लगा, इन बैंकों के लिए किसान एक क्लाइंट ही थे, बैंकों ने किसानों को से लाभ कमाना शुरू कर दिया। इस तरह साहूकार-महाजनों, उसके बाद कॉपरेटिव सोसायटी के बाद बैंकों के मकजड़जाल मे ंकिसान फंसता चला गया। हालांकि सरकारों ने समय-समय पर किसानों के लिए कई योजनाएं चलाती रही हैं लेकिन इसका फायदा बिचौलिये या फिर बैंक उठा लेते हैं।

बेरोजगारों के लिए कौन

सरकारी सेक्टर में रोजगार सीमित है, तो वहीं प्राइवेट सेक्टर में रोजगार की आपार संभावनाएं हैं लेकिन अब तक की सरकारों ने इस दिशा में उचित पहल नहीं की। देखा जाए तो भारत में यूपी व बिहार जैसे राज्यों के बेरोजगारों को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। शिक्षा के जानकार भी मानते हैं कि यूपी व बिहार जैसे राज्यों में स्किल एजुकेशन को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। सरकारी शिक्षा की बदहाली और शिक्षा जैसे महकमें राजनीति के शिकार हैं। उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के नियुक्ति से लेकर ट्रांसफर व प्रमोशन में पैसों की डिमांड होती है। अधिकारी बिना पैसे के काम नहीं करते हैं, वहीं दोषपूर्ण चयननीति के कारण अयोग्य शिक्षकों को भर्ती कर लिया जाता है। इससे आप अंदाजा लाग सकते हैं कि ऐसे शिक्षक बच्चों को क्या शिक्षा देते होंगे। माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा की यही स्थिति है, मानक को नजरअंदाज कर स्कूल व कॉलेजों को मान्यता दे दिया जाता है। इस कारण ऐसे शिक्षण संस्थान केवल डिग्री बांटने की दुकान ही साबित हो रहे हैं, यहां पर गुणवत्ता की बात करना बेईमानी है। यूपी का उदाहरण ले तो चुनाव जीतने मंे ंखर्च होने वाले रूपये की भरपाई के लिए ऐसे शिक्षामाफियों को पैदा किया गया है जो फला पार्टी को चुनाव के वक्त पैसा देते हैं और सत्ता में आने के बाद उस पार्टी की सरकार इन शिक्षामफियों को संरक्षण देती हैं। अब तो सरकार किसी की बने शिक्षामाफियों को संरक्षण आराम से मिलता है। इन पर कोई सरकार कार्यवाई नहीं करना चाहती है क्योंकि नेताओं के लिए ये शिक्षामाफिया दूधारू गाय की तरह हैं। देखा जाए तो यूपी की अब तक की सरकारें बेरोजगारों के हित मे ंरोजगार के अमूलचूल साधन पैदा करने में नाकामयाब ही रही है। सरकारी क्षेत्र में सीमित नौकरियां हैं, वहीं प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार है लेकिन यहां पर शासन करनेवाली सरकार सही कानून व्यवस्था, बिजली, पानी, सड़क व्यवस्था को दुरूस्त नहीं कर पाई है, इसीलिए यूपी में इन्वेस्टर यहां पर पूंजी लगाने से हिचकिचाते हैं। यूपी में 68 साल से ये स्थिति नहीं बन पाई कि यहां पर बाहरी कंपनियां आये और यहां के बेरोजगारों को प्रक्षिशित कर रोजगार मुहइया कराए। बेरोजगारी दूर करने के वादे के नाम वोट हर राजनीति दल मंागती आई है लेकिन कार्यकाल पूरा होने के बाद भी बेरोगारों को रोजगार दिलाने के अपने वादे पूरा नहीं कर पाती है। अपनी नकामयाबी को छिपाने के लिए सीमित सरकारी नौकरियों के कुछ हजारों पद भर कर, उसी का प्रचार-प्रसार कर, बेरोजगारी के नाम अपने चुनाव के समय किये गये अपने वायदों से बचने की कोशिश करती हैं, सरकारें। देखा जाए तो इन सरकारी नौकरी के सौ-दो सौ सीटों के लिए लाखों बरोजगार फार्म भरते हैं। लेकिन जाब कुछ लोगों को मिलती है। साफ है कि सरकारी ठोस नीति बेराजगारों के लिए नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में रोजगार पैदा करने के तरीके में सरकारीतंत्र फेल रही है या कहें कि इस ओर वे दृंढ़ इच्छा शक्ति से काम करने से सरकारें भागती रही हैं।


रविवार, 18 सितंबर 2016

बीमारी है बार बार सेल्फी खींचना

अभिषेक कांत पाण्डेय ‘भड्डरी‘



दो तीन वर्षों में सोशल मीडिया, व्हाटसअप में खुद से खींची गई तस्वीर यानी सेल्फी का चलन तेजी से बढ़ा है। सेल्फी की दीवानगी के चलते दुर्घटना में मौत होने की खबरों में भी इजाफा हुआ है। जुनून की हद तक खुद को स्मार्ट और खतरनाक तरीके से सेल्फी लेने की चाहत के कारण अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं आज के युवा। रिसर्च बताते हैं कि बार-बार सेल्फी खींचना और उसे सोशल मीडिया में पोस्ट करना एक तरह की बीमारी है। रिसर्च से यह बात सामने आई है कि अगर आप एक दिन में तीन से अधिक सेल्फी खींचकर सोशल मीडिया में पोस्ट करते हैं तो सावधान हो जाइये, ये शुरूआत है, कहीं आप खुद को संुदर, स्मार्ट और अपने को महत्व दिये जाने को लेकर चिंतित तो नहीं रहते हैं। इसलिए हो सकता है खुद को अलग और विशेष बताने के लिए खुद की फोटो पोस्ट करना और उस पर कमेंट और लाइक पाना आपकी चाहत, मनोवैज्ञानिक बीमारी का रूप तो नहीं ले रही है। ऐसी खबरें अक्सर सुनते हैं कि अच्छी सेल्फी लेने के चक्कर में पहाड़ से फिसलने पर मौत हो गई या नदी के किनारे सेल्फी लेने के चक्कर में एक शख्स ने जान गंवा दी।

विज्ञापन का आकर्षण

  आधुनिकता हमारे अंदर हावी होती जा रही है। जैसे-जैसे तकनीक विकास कर रही है, वैसे-वैसे हम अधिक सुविधा संपन्न होते जा रहे हैं। बाजारवाद के कारण लुभावने विज्ञापन ने पहले हमें बिना वजह के किसी उत्पाद को इस्तेमाल करने की जरूरत पैदा की। फिर विज्ञापनों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण, रंग गोरा करने वाली क्रीम से लेकर स्पोर्ट बाइक तक की बेवजह जरूरत हमें होने लगी। यानी अब लोग खुद को सुंदर और स्मार्ट बनाने के चक्कर में इन काॅस्मेटिक प्रोडेक्ट के गुलाम होते चले जा रहे हैं। 80 के दशक के पहले लोग नए फैशन व स्टाइल को दिखाने के लिए महीनों बाद कहीं किसी शादी या सामाजिक इवेंट में ही खुद को आकर्षक रूप में दिखाने का अवसर मिलता था। वहीं अब इंटरनेट के इस युग में सेल्फी के जरिए खुद को सुंदर व स्मार्ट दिखाने के लिए दिनभर सेल्फी खींचकर पोस्ट करते रहते हैं। यहां तक की किसी रेस्टोरेंट में डिनर की तस्वीर या गार्डन में पौधों को पानी देते हुए कोई तस्वीर पोस्ट कर खुद को सुपर लगाने की मानसिकता में घिरे रहते हैं। साॅइकोलाजिस्ट प्रमोद कुमार यादव इस बात को जोर देकर कहते हैं कि अपनी फोटों बार-बार तब तक खींचना व डिलिट करते रहना कि जब तक खुद की एक बेहतर तस्वीर न खींच जाए। ये हरकत एक तरह से केवल खुद की चिंता के बारे में बताता है। बार-बार सेल्फी खींचने की आदत एक तरह से मनोविकार है। खुद को सर्वश्रेष्ठ लगाना और अपनी तारीफ सुनना ही अच्छा लगता है।

देह की सुंदरता की होड़

सेल्फी ने आंतरिक सुंदरता की जगह बाहरी सुंदरता को बढ़ावा दिया है। जो सेल्फी में जितना सुंदर दिखेगा, वह उतनी ही ज्यादा लाइक व कमेंट पाएगा। इस कारण से आज के युवा सेल्फी में खुद को गोरा व आकर्षक बनाने के लिए कई तरह के एप्स का सहारा  लेते हैं। इन ऐप्स से सेल्फी को एडिट कर बनावटी रूप से खुद को सुंदर व आकर्षक बनाते हैं। वह सेल्फी के आकर्षक के कारण लोग वास्तविक सुंदरता के साथ मानवीय मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। इंसान सेल्फी की वजह से सेल्फिश यानी स्वार्थी होत जा रहा है। हाथ मे ंमोबाइल फोन और फिर बार-बार खुद की फोटो खींचना, अपनी तस्वीर को बार-बार देखना लोगों को मानसिक रूप से बीमार और संवेदनहीन बना रहा है। अभी हाल ही में दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर दिन में एक व्यक्ति को टैम्पों ने टक्कर मार दी, वह आदमी सड़क के किनारे तड़पता रहा, वहां से आने-जानेवाले लोगों में से किसी ने मदद नहींे की। वहां से गुजरते हुए एक रिक्शा चालक ने घायल आदमी की जेब से मोबाइल निकालकर चला गया। मानवता को शर्मसार करने वाली यह घटना सीसीटीवी में कैद हो रहा था, घंटेभर बाद किसी ने उसे अस्पताल पहुंचाया और तब तक बहुत देर हो चुकी थी, रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।


अकेले जीने की चाहत     

जैसे-जैसे हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर जा रहें, वैसे-वैसे रिश्ते नातों को भी उतना तव्वजों नहीं दे रहे हैं। इस कारण से लोग अकेले जीना पसंद करने लगे, उन्हें दूसरे के लिए काम करना और उनका अपनी जिंदगी में इंटरफेयर करना अच्छा नहीं लगता है, चाहे वे उनके मां-बाप ही क्यों न हो। इस तरह के लोग शादी के बाद अपने मां-बाप के साथ रहना पसंद नहीं करते है, बहू की जिद हो या बेटे की मजबूरी। आखिरकार औलाद अपने बुजुर्ग मां बाप को ओल्ड एज होम में छोड़ आते हैं, ऐसे औलाद अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचते हैं।

कहीं आप सेल्फी के शिकजें में तो नहीं

खुद को सुंदर दिखाने की होड़ में आप बार-बार सेल्फी खींचते हैं। वहीं खुद के लुक से आप संतुष्ट नहीं है और इस कारण से बार-बार अपना हेयर स्टाइल बदलते हैं, बालों को कलर करते हैं, तरह-तरह की क्रीम का प्रयोग चेहरे पर करते ताकी आप और गोरे हो जाएं। यहां तक की आप प्लास्टिक सर्जरी तक करवाने के बारे में सोचने लगते हैं, तो सावधान हो जाइए आप सेल्फी कि शिकजें में है। साइकोलाॅजिस्ट का मनना है कि आप कहीं बाहर जाते हैं तब डेंजर जोन में सेल्फी लेने का मन करता है, ताकी आपकी सेल्फी सबसे अच्छी हो और इसी जुनून की हद में आप संकरे जगह पर, पहाड़ के किनारे, नदी के डेंजर जोन की तरफ या ऊपर किसी खंडर व जर्जर इमारत को सेल्फी लेने की लिए चुनते हैं, तो यकीनन ही आप खुद को मुसीबत में डाल देंगे, क्योंकि यह लक्षण सेल्फीटिज रोग का है।


क्या है सेल्फीटिस रोग

अमेरिकन साइकेट्रिक एसोसिएशन ने बताया कि अगर आप एक दिन में तीन से अधिक सेल्फी खींचते हैं, तो आप यकीनन बीमार हैं। इस बीमारी का नाम है सेल्फीटिस है। इस बीमारी में इंसान पागलपन की हद तक अपनी फोटो लेने लगता और उसे लगातार सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है। इस कारण से उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और उसकी निजता खत्म हो जाती है। वह एंजाइटी के गिरफ्त में आज जाता है और आत्महत्या तक करने के बारे में सोचने लगता है।खुद पर नहीं रहता कंट्रोल    रिसर्चर  की माने तो जरूरत से ज्यादा सेल्फी लेने की इच्छा के चलते ‘बाॅडी डिस्माॅर्फिक डिसआर्डर‘ नाम की बीमारी हो सकती है। इस बीमारी में खुद को लगता है कि वह अच्छे नहीं दिखते हैं। वहीं काॅस्टमेटिक सर्जन का यह भी कहना है कि सेल्फी के इस दौर में कास्मेटिक सर्जरी करानेवालों की संख्या जबर्दस्त इजाफा हुआ है, जो बेहद चिंता का विषय है। वहीं साइकोलाॅजिस्ट का कहना है कि खुद पर कंट्रोल न होने के कारण बार-बार सेल्फी लेने की समस्या को हलके में न लें। इस तरह की समस्या हो तो किसी अच्छे साइकोलाॅजिस्ट को दिखाएं और परामर्श लेने के कुछ सप्ताह या अधिक से अधिक महीने भर में इस बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। फैक्ट फाइल-आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार सेल्फी शब्द साल 2013 में दूसरे शब्दों की तुलना में 1700 अधिक बार प्रयोग हुआ है।-सेल्फी स्टिक को साल 2014 में टाइम मैगजीन ने सबसे उम्दा अविष्कार बताया था।-अप्रैल 2015 में समाचार ऐजेंसी पीटीआई के हवाले खबर में कहा गया कि साल 1980 को यूरोप की या़त्रा पर गए जापानी फोटोग्राफर ने सेल्फी स्टिक का अविष्कार किया था। उन्हें अपनी पत्नी के साथ फोटों खंचवाने के लिए किसी को कैमरा देना पड़ता था। एक बार उसने अपना कैमरा एक बच्चों को अपनी फोटो खींचने के लिए दिया और वो कैमरा लेकर भाग गया। खुद व पत्नी की फोटो एक साथ खींचने की चाहत ने एक्सटेंडर स्टिक को जन्म दिया। जिसे साल 1983 में पेटेंट कराया गया और आज के दौर में इसे सेल्फ स्टिक कहा जाता है।----------------------------------------------------------------------------

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

कहां भटक गए हम

स्वंतत्रता दिवस पर विशेष लेख



 
अभिषेक कांत पाण्डेय ‘भड्डरी‘



आज हम आजादी के 70वें साल में सांस ले रहे हैं। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वंतत्र हुआ और लोकतांत्रिक देश के रूप में पूरी दुनिया के सामने आया। गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए देश के वीर सपूतों ने बलिदान दिया। देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर सपूतों ने ये न सोचा होगा कि आजाद भारत के लोगों की तरक्की में जातिप्रथा, भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद रोड़ा बन जाएगा, जो देश को खोाखला बना रहे हैं।
भारत में कई संस्कृति व धर्म के लोग रहते हैं, इनकी मान्यताएं, रीति-रिवाज के बीच टकराहट देश के हित में नहीं है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेता सुभाषचंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई जैसे देशभक्तों ने गुलाम भारत को आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किया, इनका कोई स्वार्थ नहीं था, बस था आंखों में सपना कि मेरा प्यारा वतन भारत आजाद हो ताकि देशवासी सम्मान से जी सके। सवाल उठता है कि आखिर आज हम स्वंतत्र तो हैं लेकिन हमारी सोच आज भी हजारों वर्षों से चली आ रही दकियानूसी रीति-रिवाजों में जकड़ा हुआ है। आजादी के 69 साल में जितना विकास होना चाहिए था, उतना विकास इसी कारण से नहीं हो पाया है कि हम अभी भी जातिप्रथा के विचारों में जकड़े हुए हैं। जाति व्यवस्था में दलितों के साथ छुआछूत व उन्हें हेय दृष्टि से देखना, उन्हें प्रताड़ित करने की घटना आज भी थम नहीं रही है। मानव का मानव से यह भेद आज हमें हजारों साल पीछे ढकेल दिया है। वहीं देखा जाए तो जातिप्रथा का दंश झेल रहे दलितों के साथ दुव्र्यवहार की घटनाएं हमारे समाज का घिनौना चेहरा है। सिर पर मैला ढोने की खबरों से सरकार सबक नहीं लेती है। देखा जाए तो हम गणतंत्र का हिस्सा हैं, किसी धर्म व जाति से पहले हम भारतीय हैं।


बांटने की राजनीति का क्यों बने हम हिस्सा

जातिप्रथा समाज में सबसे बड़ी बुराई बनी हुई है। हिंदू समाज अगड़े, पिछड़े व दलित जातियों में बंटा है। यही नहीं अलग-अलग धर्म के लोगों में भी अपनी संस्कृति व विचारों को सर्वश्रेष्ठ बताने की होड़ ने एक दूसरे के बीच कटुता का विष घोल दिया है, इस कारण से मानवीय जीवन मूल्यों को भुला दिया गया है। दो धर्मों के बीच राज करने की नीति के लिए बांटने की लकीर खींचने का नींव अंग्रेजों ने ही डाला था। हिंदू व मुस्लिमों के बीच मतभेद पैदा करने, फूट डालों और शासन करों की नीति ही आज स्वतंत्र भारत की राजनीति में वोट बैंक पाने का आसान तरीका है। दो धर्मों के बीच तुष्टीकरण बनाम अतिवादी नीति ने विकास के मुद्दे को धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। विकास का मुद्दा चुनाव आते आते धर्म और जाति की राजनीति में बदल जाता है। जाहिर है कि राजनीति दलों के लिए सत्ता में वापसी करने के लिए जाति व धर्म विशेष का धु्रवीकरण कर वोट बैंक को साधना आसान है। वहीं मूल समस्या पर जनता की नजर न जाए, इसलिए धार्मिक भावनाओं को भुनाना राजनीतिक दल शुरू करते हैं। लेकिल सच्चा व वाजिब सवाल तो यह है कि हम विकास के पैमाने पर तब तक खरे नहीं उतरेंगे जब तक हम जातीय व धार्मिक भेदभाव को त्याग नहीं देते हैं। राजनीतिक दल हमारे इसी कमी का फायदा उठाकर वे हमसे चुनाव के समय बार्गनिंग करते हैं कि फला दल एक धर्म का हितैषी है तो हम तुम्हारे धर्म के हितैषी है या हम इस जाति की तरक्की को ध्यान में रखेंगे, बस हमें वोट दो, हम तुम्हारी जाति, तुम्हारे धर्म का भला करेंगे। इस तरह की बातें आपको इन राजीनैतिक दलों के भाषण व इनके मैन्यूफेस्टों से आप आसानी से समझ सकते हैं। अगर आप काम व विकास को तवज्जों दे ंतो मजाल नहीं कि राजनीतिक दल का कोई नेता आपको जाति या धर्म के नाम पर बरगला सके। लेकिन विडंबना तो यही है कि चुनाव में अगर उम्मीदवार की जाति या धर्म देखकर हम अपना प्रतिनिधित्व चुनेंगे तो हमें सही विकास के लिए एक और 69 साल के समय का इंतजार करना होगा। जिस तरह से हम बीमार होने पर इलाज के लिए डाॅक्टर की जाति नहीं देखते हैं बल्कि उसकी काबिलियत देख कर इलाज के लिए उसे चुनते हैं, इस तरह बीमारी से जल्द छुटकारा पाते हैं, क्यों न तब हम इस देश के बीमार सिस्टम को दुरूस्त करने के लिए हम अच्छे और कर्मठ प्रतिनिधि का चुनाव करें, न कि उसका धर्म व जाति देखकर। सरकारी सिस्टम को रिपेयर करने के लिए जब तक भारत का नागरिका खुद जिम्मेदारी निभाने के वास्ते सामने नहीं आएगा तब तक हम सही मायने आजाद नहीं है। देश का जिम्मेदार व जागरूक नागरिक ही देश को सही रास्ते में ले जाता है, क्योंकि लोकतंत्र में उसके पास वोट का अधिकार है। वह राजा नहीं प्रतिनिधि चुनता है, अगर उसका प्रतिनिधि उनके वादे पर खरा नहीं उतरे तो उसे बाहर का रास्ता दिखा सकता है। लेकिन जब जाति व धर्म की दीवारें बीच में खिंच जाती हैं तो हम अपने जाति व धर्म के नकारे प्रतिनिधित्व को बाहर का रास्ता दिखाने में पीछे रह जाते हैं, और तब इसी का फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने चुने हुए प्रतिनिधि से हिसाब ले, जानकारी इकट्ठा करें, मोहल्ला या गांव सोसाइटी बनाकर उन्हें चिट्ठी पकड़ाए और उनकी जवाबदेही तय करें कि कितना विकास हुआ। हमारे क्षेत्र की सड़कें, बिजली, पानी की व्यवस्था और किए गए काम की क्वाॅलिटी को भी चेक करें। तब उनको पता चलेगा कि जनता ही है लोकतंत्र में सर्वोपरि। 

महिलाओं को कब मिलेगी आजादी
 
रूढ़ीवादी समाज का चेहरा महिलाओं के प्रति हजारों साल बाद भी नहीं बदला। लोकतंत्र की स्थापना के बाद महिलाओं के संरक्षण में कई कानून बने लेकिन समाज में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव नहीं आया। महिलाओं के प्रति हिंसा व उनसे भेदभाव का नजरिया समाज में बदला नहीं है। महिलाओं की देह को उपभोग समझने वाले पुरूष इसी समाज का हिस्सा है, जो मौका पाकर उन पर हमला करना व अपमानित करने से भी तनिक चूकते नहीं हैं। लोक लाज में लिपटी महिलाओं के इज्जत को सरे आम नीलाम करने से भी अपराधी प्रवृति के लोग जरा भी नहीं हिचकते हैं। वहीं सभ्य समझा जाने वाला समाज महिलाओं के प्रति भेदभाव रखता है, उन्हें दोयम दर्जें का मानता है। जब महिलाएं अपने लिए धर्मिक अधिकारों, समाज में अपनी इच्छा से जीने की आजादी के लिए मांग करती हैं तो इसे पुरूष समाज अपने मान सम्मान के झूठे दंभ में इनकी जायज मांगों को कुचल देते हैं। महिलाओं के प्रति समाज का नजरियां ही महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, उन्हें अपमानित करने और यहां तक की बलात्कार के अपराध को बढ़ावा देता है। इस कारण से महिलाओं के मानसम्मान व उसके इज्जत को तार-तार करने वाला अपराधी जानता है कि महिलाएं कमजोर हैं और समाज बलत्कार जैसे मामलों में भी पीड़ित महिला को ही दोष देती है। यानि लोकलाज के डर से अपने ऊपर हुए दरिंदगी पर खून के आंसू रो लेती है और किसी से नहीं बताती है, इस कारण से अपराधी का मनोबल और बढ़ता है। इस तरह की कई घटनाएं अखबरों की सुर्खियां बनती हैं। जहां पर महिलाओं से अपराधी कई बार अपराध करता है और बदनाम करने की धमकी देता है। पीड़ित महिला लोकलाज व समाजह की डर से वे अपराधी के ब्लैकमेलिंग का बार-बार शिकार होती है। इस तरह के मामले में पुलिस और समाज को संवेदनशीलन होना चाहिए, अपराध की शिकार महिला को हिम्मत और सहानुभूति देनी चाहिए व अपराध के प्रति लड़ने के लिए उसके हौसले बुलंद करने में मदद करनी चाहिए। जबकि वहीं पुलिस व समाज इसके उलट पीड़िता के साथ अपराधी की तरह व्यवहार करता है। महिलाओं के प्रति हिंसा, छेड़छाड़ व बलात्कार जैसे मामलों में असंवेदनशील राजनीति और नेताओं के बयान भी महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का भी एक कारण है। सभी दलों के बड़बोले नेता महिलाओं पर अमर्यादित टीका टिप्पणी करने से भी नहीं चूकते हैं। बीजेपी के नेता दयाशंकर का मायावती पर टिप्पणी निंदनीय है ही, साथ में उसके जवाब में बसपा कार्यकर्ताओं और बसपा नेताओं का दयाशंकर के पत्नी व बेटी पर अभद्र टिप्पणी से यही साबित होता है कि महिलाओं का अपमान होना आम है। ऐसे में जब राजनीति दल संजीदा नहीं हैं तो महिलाओं के प्रति अपराधों की घटना को अंजाम देनेवालों अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। बात साफ है कि दलितों, अल्पसंख्यकों, गरीबों व महिलाओं को पर हो रहे अत्याचार इस बात का सुबूत है कि उन्हें अभी भी समानता का अधिकार नहीं मिला है।
दलितों पर राजनीति नहीं नीति चाहिए
 
संविधान सबके साथ समानता का व्यवहार करने को कहता है, पर समाज में कथित लोग दलित, कमजोर वर्ग व महिलाओं का उत्पीड़न करने से नहीं चूकते हैं। आखिर आजादी के इतने साल बाद भी समाज में महिलाओं व दलितों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार क्यों किया जा रहा है। दलितों पर हो रहे अत्याचार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुप्पी तोड़नी पड़ी, कहा कि दलितों पर हमला करना है तो मुझ पर हमला करें। जाहिर है इन सब के जड़ में जातिवाद की राजनीति, वोट बैंक को अपनी झोली में आसानी से डालने के लिए हिंदूवाद व अल्पसंख्यकवाद की राजनीति है। तो वहीं जातिवाद में आसानी से अगड़ों, पिछड़ों व दलितों में बांटकर वोट बैंक तौलना आसान हो जाता है।
चाय की दुकान से लेकर मीडिया की खबरों और राजनीति पार्टी के सियासी तेवर में सारा विश्लेषण जातिवाद व धर्मिक आधार पर होता है कि ये जाति आमूक पार्टी का वोट बैंक है। दुखद यही है कि इसी आधार पर तय होता है, चुनाव में जीत व हार। तब आप ही सोचिए जब हम जाति और धर्म के आधार पर किसी विशेष दलों को वोट देंगे तो सत्ता पाए सियासी दलों को सभी का विकास करने की क्या जरूरत है, उनका वोट बैंक उनके जाति विशेष प्रेम व किसी धर्म के आधार पर बंटे वोट उन्हें हर चुनाव में मिलना तय है। चाहे फिर महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार की बात हो, या खुदकुशी करते किसान हो, या नौकरी के खातिर दरदर की ठोकरें खा रहा बेरोजगार हो या बिजली, पानी, सड़क की बदहाल व्यवस्था हो। फिर इन मुद्दों पर कोई जनप्रतिनिधि अपना सर क्यों खपायेगा, जबकि उसे मालूम है कि उसे पका पकाया वोट बैंक मिलने वाला है। यही वजह रही है कि लगभग सभी दल टिकट बांटते वक्त जाति व धर्म को ध्यान में रखकर उम्मीदवार खड़ा करते हैं। जाहिर है चुनाव में जीत के लिए जातिगत आधार पर उम्मीदवार खड़ा करना परंपरा बन गई है तो उसी जाति के ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है जो पैसा खर्च करने की कूबत रखता हो। जब कोई नेता पर्टी छोड़ता है या निकाल दिया जाता है तो वह पार्टी पर पैसा लेकर टिकट बांटने का आरोप जड़ देता है। यानी हर हाल में जातिगत व धर्म के बंटवारे में नेता अपने लिए भुनाते हैं, जब टिकट लेना हो और जब पार्टी छोड़नी हो तब। इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि राजनीति दल ने एक ऐसा रास्ता अख्तियार किया है, जो हिंदुस्तान को हजारों साल पीछे ले जा रही है। जातिगत राजनीति ने विकास को बाधित किया है, जिसके कारण राजनीति से भ्रष्टाचार सरकारी कार्यालयों में आम हो गया है। सरकारों ने समाज में जातिवादी की खाई को भरने के बजाय इसे और गहरा व चैड़ किया है। 

चाहिए ठोस विकास, नहीं चाहिए लोक लुभावन वादे

69 साल से गरीबी और बेरोजगारी हटाने के नाम पर वोट लिया जाता रहा है लेकिन गरीबी की परिभाषा बदल गई, लेकिन गरीबों के हालत में कोई सुधार नहीं आया है। बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम न लगा पाने की अपनी नाकामयाबी को छिपाने के लिए लैपटाप व बेरोजगारी भत्ता देने का नया तरीका ईजाद किया, लेकिन ये भत्ता केवल चुनाव जीतने का बहाना ही है। भारत में 70 प्रतिशत युवाओं की तादाद पर इस तरह के नुस्खे कायमयाब भी हो जाते हैं, लेकिन इस बहाने भी जीत के बाद सरकार विकास न करें, उसका काम विशेष जाति वर्ग के लिए हो तो जाहिर उसे दुबारा सत्ता की चैखट पर पहुंचाने वाले हाथ उनसे दूर हो जाएंगे। इसीलिए लोकसभ व विधानसभा चुनाव में जाति व धर्म फैक्टर के अलावा विकास का मुद्दा भी हावी रहता है, जिसे नजरअंदाज करना उस पार्टी के लिए हार का सबब बन सकता है। यही हाल पिछले लोकसभा चुनाव में रहा विकास से शुरू बातें आकर जातिवाद पर अटकी। भारत में धर्म व जाति की राजनीति का यह खेल तुष्टीकरण बनाम अतिवाद पर बखूबी चलता है, इसके लिए बकायदा हर पार्टी बड़बोले नेताओं को छूट भी देते हैं, ताकी जातिवाद व धर्म की भावना के सहारे वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। नेताओं के जातिवाद व धर्म पर दिए भड़काऊ भाषण देते हैं ताकि धु्रवीकरण आसानी से हो सके, और वोट हासिल करना आसान हो जाए। ये तो जनता को समझना है कि वे काम करने वाले प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं कि जाति व धर्म के आधार पर ऐसे लोगों को वोट देंगे जो भारतीयों को जाति व धर्म में बांटते हैं।

कब करेंगे सब तरक्की
 
आजादी के छह दशक तक राजनीति दलों का हर चुनाव में एक ही नारा था, अशिक्षा, गरीबी व बेरोजगारी से निजात दिलाना। उस समय राजनीतिक दल इसी नाम पर वोट मांगती थी। भारत धीरे-धीरे विकास कर रहा था, ये गति धीमी थी, वहीं विश्व के अनेक देश तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहे थे लेकिन भारत के शहर विकास कर रहे थे, गांवों हालत बदतर थी। जाहिर है भारत को जतिप्रथा, कुप्रथा व दकियानूसी विचारों से भी लड़ना था। यह चुनौती थी कि पिछड़ों, वंचितों व दलितों को समाज की मुख्यधारा में बिना शिक्षा के कैसे जोड़ा जा सकता है। लेकिन जिस तरह से विभिन्न संसाधनों और ऊंचे पदों पर ऊंची जातियों का वर्चस्व था, जिन्होंने दलितों के साथ भेदभाव किया, उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया था। ऐसे में समाज की मुख्यधारा से कट गई जातियों ने राजनीति में नेतृत्व करने के लिए आगे आए ताकि वे अपनी जाति व समाज के विकास के लिए सरकार का हिस्सा बन सके। लेकिन सत्ता के लालच में हर बार सत्ता में काबिज रहने की ख्वाहिश के लिए ऐसे नेताओं ने अपने दलित, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के भलाई के लिए काम करने से ज्यादा अपनी कुर्सी को दोबारा पाने के लिए वोट बैंक को जाति व धर्म में बांट दिया। इसीलिए इन जाति वर्ग से वह सुझारू व्यक्ति राजनीति में नहीं आ पाता है क्योंकि राजनीति में परिवारवाद छाया हुआ है। नए लोग राजनीति में  कदम नहीं रखते हैं, और जो भी पाकसाफ नया चेहरा उतरता है, वह विधानसभा या संसद तक पहुंच नहीं पाता क्योंकि वे जातिवाद व धर्म के आधार पर राजनीति नहीं करता है।
 
दलित प्रेम है बस दिखावा
 
उत्तर प्रदेश में चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। दलितो व अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति खूब हो रही है। अब विकास के मुद्दे गर्त में जा रहे हैं, वहीं सभी दल दलितों व अल्पसंख्यकों के पक्षधर वाली राजनीतिक पर्टियां बताने में गुरेज नहीं कर रही हैं। लेकिन अगर इस सच्चाई को जानने के लिए आप आंकड़ों पर नजर डाले तो बता दें कि दलित व पिछड़ों को संविधान के तहत दिया जाने वाला आरक्षण और लगभग पांच लाख योजनाओं के बाद भी उनका पर्याप्त विकास नहीं हो पा रहा है। हिंदू समाज में 64 प्रतिशत दलित हैं लेकिन सच्चाई है कि उन्हें आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है। 54 प्रतिशत दलित बच्चे आज भी कुपोषित हैं। 45 प्रतिशत दलित लिखना पढ़ना नहीं जानते हैं, लगभग 45 प्रतिशत दलितों के गांवों में जमीन नहीं है। 27 प्रतिशत दलित महिलाओं के पास स्वास्थ सुविधा उपलब्ध नहीं है। इतनी दयनीय स्थिति के बाद भी दलितों पर केवल राजनीति हो रही है। दलितों का नेतृत्व करने वाले सत्ता का सुख चाहते हैं लेकिन दलितों की बदहाली के लिए जमीनी स्तर ठोस कदम उठाने में असफल रहे हैं। वहीं दलितों को वोट बैंक समझने वाली पार्टियां दलितों पर राजनीति करती हैं लेकिन मौका आने पर वे दलितों को टिकट बांटने में कोताही बरतती हैं। खुद को दलित रहनूमा बताने के लिए बयानबाजी, दलित प्रेम का उनका दिखावा खबरों में बने रहने तक है, ताकि दलित समुदाय भावना में आकर उन्हें वोट दे दे। जब तक दलित समुदाय से वास्तविक भागीदारी सामने नहीं आएगी तब तक दलितों के नाम अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पंख देने के लिए दलित नेता दलितों के लिए विकास से समझौता करते नजर आएंगे।
 

दलित समुदाय के लोगों को तरह तरह के अत्याचार सहने पड़ते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानि एनसीआरबी के पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि दलितों के खिलाफ अत्याचार लगातार बढ़ रहे हैं। केंद्र में या राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, दलित उत्पीड़न के मामलों में कोई खास अंतर नहीं पड़ता है। देश के कई जगह मामूली सी गलती पर दलितों को नंगा कर घुमाया जाता है या कभी उनका सिर मुंडवा दिया जाता है। मामूली सी बात पर दलित-कमजोर वर्ग के लोगों को पेड़ से बांधकर लटका दिए जाने की घटनाएं भी होती हैं। हालांकि दलितों के उत्पीड़न के मामले में 2012 में मामूली कमी आयी, वहीं  एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट जो साल 2014 की है, उसमें दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामले में 2013 के मुकाबले बढ़ोतरी हुई है। वहीं 2014 में 47,064 अपराध हुए हैं जबकि 2013 में यह आंकड़ा 39,408 था। साल 2012 में दलितों के खिलाफ अपराध के 33,655 मामले सामने आए थे, जबकि इसके एक साल पहले यानि 2011 में हुए 33,719 से थोड़े कम थे। पांच साल पहले 2010 में यह आंकड़ा 33,712 था। अपराधों की गंभीरता को देखें तो इस दौरान हर दिन दो दलितों की हत्या हुई और हर दिन औसतन छह दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं। दलित उत्पीड़न के इन आंकडों को देखकर नहीं लगता कि हम सभ्य समाज का हिस्सा हैं। जबकि भारत में अनसूचित जाति एक्ट जैसे कड़े कानून होने के बावजूद भी दलितों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं। रिसर्च से ये बात भी सामने आई है कि कानून बना देने से दलितों के प्रति अत्याचार कम नहीं होंगे, जब तक सामाजिक चेतना न हो। दलितों व वंचितों पर अपराध की बढ़ती घटना हजारों साल की एक वर्ग को दबाने की मानसिकता है। दलित इसी देश के नागरिक हैं, वे हमारे भाई हैं, इस तरह अपने लोगों के प्रति भेदभाव के कारण क्या हम सच में वास्तविक तरक्की कर रहे हैं। दलितों पर किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ समाज के हर जाति व धर्म के लोगों को एक होना चाहिए, तकि उन लोगों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके जो दलितों पर अत्याचार करते हैं। यानी एक ऐसी क्रांति जहां पर दलितों व वंचितों को सम्मान से जीने का हक मिल सके।

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