रविवार, 29 मई 2016

उत्तर प्रदेश में अगला कौन

अभिषेक कांत पाण्डेय
संभवत: 2017 के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश में चुनाव हो। ऐसे में यहां पर राजनीतिक हलचल बढ़ना स्वाभाविक है। प्रदेश की सत्ता से लम्बे अर्से से भारतीय जनता पार्टी दूर रही है। इस बार उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने की जुगत में लगी हुई है, वहीं वर्तमान सपा सरकार से युवाओं का आकर्षण भी टूटा है। जिस युवाओं ने यूपी का ताज अखिलेश को पहनाया आज वही युवा ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी नौकरी में कोर्ट कचहरी में मामला पहुंचने पर ये बात जाहिर है ​कि सपा सरकार की नीति कारगर नहीं
है। खासकार युवा बेरोजगार इनके शासनकाल में सबसे ज्यादा परेशान हैं। वहीं केंद्र में काबिज भारतीय जनता पार्टी ने शानदार दो साल की उपलब्धि का जश्न मना रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में बसपा, कांग्रेस, सपा का
पारंपरिक जनाधार भी खिसने वाला है। केंद्र सरकार के कामकाज के कई सर्वे पीएम मोदी को बेहतर बता रही है। ऐसे में माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा वापसी करेगी। जिस तरह केंद्र में विकास का मुद्दा हावी रहा, उस आधार उत्तर प्रदेश में भी विकास की बयार की बात इस चुनाव मेें चलेगी। वर्तमान सरकार उत्तर प्रदेश में लॉ एंड आर्डर चुस्त दुरूस्त करने में पीछे रही है।
वहीं जाति गणित और मुस्लिम वोटों को बटोरने की गणित में सपा व बसपा भी पीछे नजर आ रही है, मुस्लिमों का एक तबका सपा से नाराज है तो वहीं बसपा की ओर मुखातिब हो रही है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मुस्लिम समाज का वोट बिखरे न। देखा जाये तो इधर भाजपा भी पिछड़ों व दलित चेहरों के साथ चुनाव में उतरने की रणनीति पर विचार कर रही है। अमित शाह की नई बिसात में इस बार उत्तर प्रदेश में सही चेहरों को सामने किया जायेगा। देखा जाए लम्बे समय के बाद सत्ता में वापसी करने का भारतीय जनता पार्टी के ​लिए यह सुनहरा मौका है। वहीं मुस्लिम तबके को खुश करने के लिए सपा सरकार अंतिम चरण मेें लोक लुभावन वादे करना शुरू करेगी। आरक्षण जैसे मुद्दों पर राजनीति कर सपा पार्टी इस मसले पर मुसलमानों का हिमायती बताकर उनके वोटों को अपनी ओर खींचने का प्रयास करेगी। लेकिन ये जाहिर है कि चुनावी साल में आरक्षण की ये बात​ केवल चुनावी शिगूफा ही साबित होगा, जो मुस्लिम तबके के वोट बैंक को चुंबक की तरह ख्रींचने का पुराना नुस्खा ही साबित होगा। सवाल तो यह उठता है कि मुस्लिम तबका सपा पर लंबे अर्से से भरोसा करता आया है लेकिन सत्ता पाने के बाद परिवारवाद की राजनीति में मशगूल सपा इटावा व मैनपुरी तक ही सीमित रह गई है। चार साल में जो संदेश उत्तर प्रदेश की जनता में गया है उससे जाहिर है कि दुबारा सत्ता में काबिज होने के लिए प्रदेश में मजबूत पकड़ होनी चाहिए। टीवी, अखबारों, होर्डिंग के जरिये विज्ञापन में अपनी उपलब्धियों का बखान करने पर प्रदेश की जनता चार साल जमीनी काम का तुलनात्मक अध्ययन तो अपने दिमाग में कर लिया है। जाहिर है चुनाव दूर है, इन दिनों में कोई फेरबदल हो सकता है इसकी कवायद में दंभ भर रहे राजनीति खिलाड़ी नई गोट बिछाने के लिए जोड़—तोड़ की रणनीति अपनाने में देर नहीं
करेंगे।

शनिवार, 28 मई 2016

क्या आप कल्पना कर सकते हैं


अभिषेक कांत पाण्डेय

मई की तपती गरमी में पानी की किल्लत आम बात है। वायुमंडल में आग का गोला बरस रहा है। उत्तर भारत के साथ देश के पहाड़ी क्षेत्र भी भीषण गरमी की चपेट में है। पिछले पचास सालों में पर्यावरण को जबरजस्त नुकसान पहुंचा है। आज भी हम क्रंकीट के शहर में खुद को प्रकृति से दूर करते जा रहे हैं। जंगल की आग हो या इसके बाद नदियों में उठने वाला उफान इन प्राकृतिक आपदा के हम ही जिम्मेदार है। पहाड़ों पर हमारी हद से ज्यादा बढ़ती दखलअंदाजी हमने वहां के वातावरण को भी नहीं बक्सा। मैदानी क्षेत्रों में जल की समुचित व्यवस्था की पहल करने में भी हमने कोई रुचि नहीं दिखायी। देखा जाये तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का काम इस सदी में सबसे अधिक हम ही लोगों ने किया है। वाहन से निकलता धुंआ भले सुखसुविधा का प्रतीक हो या हमारी तरक्की को उजागर करता फैक्टरियों से निकलता धुंआ। पर पर्यावरण को बचाने के लिए हम पेड़ों को लगाने व उन्हें जिलाने की अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग रहे हैं।

पिछले पखवारे चीन के बीजिंग शहर और उसके आसपास के इलाके में प्रदूषण के कारण धूल भरी आंधी से पूरा शहर धूंए के बादल और धूल के चपेट में रहा है। वहां के सड़कों पर सांस लेना, मौत को दावत देने के बराबर था। आननफानन में वहां कि सरकार ने वाहनों को चलाने पर रोक लगा दिया ताकि प्रदूषण में कुछ कमी आये। इस समस्या को लेकर चीन परेशान है। पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ से अनदेखा करने वाले देशों को भी आने वाले समय में यही हाल होगा। अधिक कार्बन उत्सर्जन को लेकर कई देशों ने चिंता व्यक्त की लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से बचाने के लिये कोई भी देश पूर्ण इच्छा शाक्ति के साथ सामने नहीं आ रहा है। सभी देशों को आ​र्थिक प्रगति के लिए कार्बन उत्सर्जन को जायज पहुंचाने की होड़ है। कौन कितना कार्बन उत्सर्जन करें, इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में बहस होता है। अब वक्त​ आ गया है कि धरती के खराब हो रहे स्वास्थ पर ठोस पहल की जाये। प्रकृति संसाधन का सही उसी रूप में प्रयोग करके ही हम अपने पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। सौरउर्जा, बायोडीजल, जल से चलने वाले उर्जास्रोतों को सुगम और सस्ता बनाना होगा। मानव सभ्यता के विकास से अब तक जितना भी जीवाश्म उर्जा यानी पेट्रोल या कोयला बचा है उसका लगातार दोहन हो रहा है लेकिन इधर के सौ वर्षों में जिस तरह से हम करोड़ों बरस की प्रकृति द्वारा संरक्षित कार्बन को कुछ वर्षों में जलाकर हम धरती को कार्बनडाइआक्साइड और बढ़ते तापमान में बदल डालेंगे। तब आप कल्पना करें कि बदलों की कोख में पानी नहीं होगा, विरान संमुद्र में रेत होगा, ज्वालामुखी आग उगलते नजर आएंगे, ऐसे में हम कहां होंगे, क्या आप कल्पना कर सकते हैं।

गुरुवार, 26 मई 2016

सामान नागरिकता कानून, प्राइवेट क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन निर्धारण, पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मजीठीया द्वारा गठित वेतन अखबार मालिकों से दिलवाने की पहल, कांग्रेस के लंबे शासनकाल में पुलिस सुधार पर कोई ठोस काम नहीं हुआ, बीजेपी इस पर काम कर सकती है। पुलिस सुधार जरूरी है। अंग्रेजों के समय की पुलिस नियमावली व कानून से आजाद भारतीयों को छुटकारा मिले। कांग्रेस के समय आरटीई यानी अनिवार्य निशुल्क शिक्षा कानून का पालन राज्यों को ठोस रूप से करवाना, इसकी शुरुआत बीजीपीशासित राज्यों से हो तो कितना अच्छा उदाहरण बनें।

बुधवार, 25 मई 2016

प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम वेतन कब


अभिषेक कांत पाण्डेय

हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अनुभव होता है जो सोचने पर मजबूर करता है। ऐसे अनुभवों में मैं पिछले महीने से जूझ रहा हूं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है लेकिन सही मायने में ये दर्द हर उस व्यक्ति का है जो जीना चाहता है, सम्मान की जिंदगी चाहता है। भारत में रहने वाले उन करोड़ों लोगों की कहानी है। इसमें मजदूर से लेकर महीने पगार पाने वाले कामगार, ठेके पर मजदूरी करने वाले या किसी कंपनी में कंप्यूटर वर्क करने वाले यहां तक की पत्रकार, शिक्षक, हर वो कोई जो अपने हाथों से मेहनत करता है, उसके बदले उस बेहतर जिंदगी के लिए उचित वेतन पाने का अधिकार है। लेकिन इन प्राइवेट क्षेत्रों में सही सरकारी नीति का न होना व कामगारों के लिए ठोस कानून का नहीं होना, यहां पर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी होम कर रहे हैं। कम वेतन  व काम के अधिक घंटे उनके प्रकृतिक जीवन के साथ खिलवाड़ है। बेगारी व शोषण के शिकार  ऐसे लोग उन नियोक्ता के लिए काम करते हैं, जो वाता​नुकूलित ढांचों में सांसें लेते हैं और काम कराने के लिए ऐसे वर्गों का उदय किया है जो बिल्कुल अंग्रेजों के जमीदारों के भूमिका में है, ऐसे चुनिंदा मैनेजर जो अपनी अच्छी सैलरी के लिए अपने निचले स्तर के कर्मचारियों का शारीरिक व मान​सिक शोषण करते हैं। बारह से सोलह घंटे का करने वाले ये मानव भले ही लोकतंत्र के छत्रछाया में जी रहे हों लेकिन सही मायने में लोकतंत्र तो इनके नियोक्ता के ​लिए ही है।
प्राइवेट एवं गैर सरकारी क्षेत्रों में स्थिति बद से बदतर है। काम के अधिक घंटे और कम वेतन। बेरोजगारों की लम्बी कतार, नियोक्ता को बार्गनिंग करने का अवसर प्रदान करता है इस लोकतंत्र में। मान लीजिए कि आलू की पैदावार अधिक हो जाए और उसकी कीमत लागत से कम आंकी जाए तो खेतों में जी तोड़ मेहनत करने वाला किसान क्या करेगा। अखबारों की खबरों में किसान की दयनीय हालत उस सरकारी तंत्र की विफलता की हकीकत है, जो हम बार—बार वोट देकर चुनते हैं ऐसी निकम्मी सरकार। कब हम तय करेंगे सरकारों की जिम्मेदारी व जवाबदेही।
बेगारी कराना भारत में ही नहीं दुनिया के हर देश में अपराध घोषित है पर हम जिस देश भारत में रहते हैं, वहां काम के अधिक घंटे काम कराकर अपना काम निकालने वाली कंपनियां, भारतीय कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ऐसे ही कई प्राइवेट और यहां तक की सरकारी संस्थान हैं जो कर्मचारियों का शारीरिक व मानसिक शोषण करते हैं। इनके विरुद्ध अवाज उठाने वाले को प्रताड़ित किया जाता है। आइपीएस अमिताभ ठाकुर हो या प्राथमिक स्कूलों में नियुक्ति के लिए चार वर्षों से सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाने वाले शिवकुमार पाठक को उत्तर प्रदेश सरकार ने बदले की भावना के चलते उन्हें बर्खास्त किया, वहीं सुप्रीम कोर्ट से अपनी बहाली का आदेश लेने के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने फिर वापस नौकरी पर रखा लेकिन बदले की भावना यहां भी अभी खत्म नहीं हुई। कैसे सरकारी नियोक्ता के खिलाफ आवाज उठाया, इसकी सजा समय—समय पर मिलनी है परिणामस्वरूप अभी फिर उन्हेंं मौलिक नियुक्ति देने से इनकार कर दिया।

मई दिवस में रेल संगठन व तरह—तरह के मजदूर संगठन केवल भाषणबाजी का कार्यक्रम कर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। श्रमजीवी पत्रकार संगठन इसका जीता जागता उदाहरण है। यूं तो इस संगठन का दायित्व ये है कि पत्रकारिता से जुुड़े कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना, उन्हें सही वेतन, भत्ते और काम के आठ घंटे जैसे मूलभूत सुविधा दिलाना ताकि​ पत्रकार का मानसिक और शारीरिक शोषण न हो। लेकिन बड़े मीडिया मालिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पत्रकारों को उचित वेतन देने की म​जीठिया की सिफारिशों का खुले आम धज्जिया उड़ा रहे हैं। इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों चुनिंदा प़त्रकार ही हैं, उन्हें संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कामोवेश ऐसी स्थिति प्राइवेट क्षेत्रों में है।
नामी गिरामी पब्लिक स्कूल में हाईफाई फीस देने की स्थिति कितने भारतीयों के पास होगी मुश्किल से चार प्रतिशत अमीर लोगों के पास। इन स्कूलों में अच्छी शिक्षा है, ये शिक्षा गरीब तबके कि क्या बात मध्यम आय वर्गों से ताल्लुक रखने वाले भारतीयों को भी नसीब नहीं, चाहे वे किसी भी जाति के हों, चाहे वे पिछड़े हो या दलित या सामान्य जाति का ही क्यों न हो। सामान शिक्षा का अधिकार कब दिया  जाएगा, आजादी के 69 साल बीत जाने के बाद भी केवल जातिवाद और आरक्षण की बेतुकी राजनीति ही हो रही है। जनता को रोजगार अधिकार और सम्मान से जीने का अधिकार चाहिए, वह एजेंडे वाली सरकार कब आएगी। भले ये आज के समय में राजनीतिक पार्टियों के लिए ये  ज्वलंत सवाल न हो लेकिन देखा जाए जिस तरह बेरोजगारी की बढ़ती समस्या और संसाधन की लूट बढ़ रही है, वो दिन दूर नहीं कि न्यूनतम वेतन क्रांति का अधिकार की आवाज उठाने के लिए युवा आगे आएंगे। 

मंगलवार, 24 मई 2016

रेल पटरियों पर भटकता बचपन

अभिषेक कांत पाण्डेय


रेलगाड़ी में सफर करने का आनंद आपने लिया होगा लेकिन शायद ही कभी आपने गौर किया होगा कि स्टेशन व ट्रेन के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी कहीं खो गई है। खेत-खलियान व शहरों से गुजरती हुई रेलगाड़ी जब स्टेशन पर रूकती है तो अपकी निगाह उन बच्चों पर जरूर ठहरी होगी, जो रेलवे ट्रेक पर पानी की बोतलें इकट्ठा करते हैं, या उन बच्चों की टोलियों को देखा होगा जिनके गंदे-मैले कपड़े उनकी बदहाली को बयां करते हैं। हाथ में गुटखा-खैनी का पाउच लिए टेªन की बोगियों में बेचते हैं, देश के ये नौनिहाल। जहां इन्हें स्कूलों में होना चाहिए लेकिन पापी पेट के कारण यहां इनकी जिंदगी के हिस्से में केवल ट्रेन की सीटी ही सुनाई देती है। इन बच्चों का जीवन सुबह पांच बजे से शुरू होता है, स्कूल की घंटी नहीं ट्रेन की सीटी सुनकर झुंड में निकल पड़ते हैं इनके कदम और ट्रेन की बोगियों में गुटखा-खैनी बेचकर अपने घर का पेट पालते हैं।
स्टेशन में रहने वाले बच्चों का उम्र तो बढ़ता है लेकिन उनका भविष्य यहां अंधकारमय है। रेलेवे स्टेशन में कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था साथी व चाइल्ड लाइन ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए काम कर रही हैं लेकिन सरकारी उपेक्षा के चलते इन बच्चों के लिए स्थायी व ठोस काम नहीं हो पा रहा है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन में आप दर्जनों ऐसे बच्चों को देख सकते हैं जो प्लेटफार्म में भीख मांगते हैं और यही पर रहते हैं। इन बच्चों के माता-पिता व घर का पता नहीं हैं। ये बच्चे ट्रेन व प्लेटफार्म में ही अपनी जिंदगी बिताते हैं। गुजर बसर के लिए ऐसे बच्चे ट्रेनों में घूम-घूमकर गुटखा बेचते हैं। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर ये दुकानदारों से गुटखा खरीदते हैं। बताया जाता है कि 125 रूपये का गुटखा 400 रूपये तक में ये बच्चे आसानी से बेच लेते हैं।
आपको बात दें कि रेलवे स्टेशन व ट्रेनों में गुटखा, बीड़ी, सिगरेट जैसे पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबंध है। वहीं लाइसेंस प्राप्त वेंडर ही रेलवे के नियम व कानून के मुताबिक ही उचित दरों पर ही कोई वस्तु बेच सकता है। लेकिन असल खेल तो यहां से शुरू होता है अवैध वेंडर धड़ल्ले से इलाहाबाद स्टेशन व उसके आसपास के स्टेशनों में सामान बेचते हुए नजर आते हैं। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स यानी आरपीएफ व राजकीय रेलवे पुलिस यानी जीआरपीफ की चेकिंग में अवैध वेंडर और गरीब बच्चे से अवैध वेंडर का काम कराने वाले माफिया कैसे बच निकलते हैं, इसकी गुत्थी आप यहां (इलाहाबाद स्टेशन)पर कुछ घंटे बिताकर आसानी से जान सकते हैं।
बातचीत करने पर 12 साल का राकेश (बदला हुआ नाम) इलाहाबाद स्टेशन के पास एक झुग्गी झोपड़ी में रहता है, ने बताया कि उसके मां-बाप नहीं है। वह 70 साल बूढ़ी अपनी नानी के साथ रहता है। घर का खर्च चलाने के लिए राकेश को गुटखा बेचने का काम सबसे आसान और मुनाफे वाला लगा। वह बताता है कि शुरू में तो वह डरता था लेकिन पुलिस वाले ने कई बार उसे पकड़ा लेकिन 100 रू के नोट के कमाल को बड़ी बखूबी तरीके से बयान करता हुआ उसकी समझदारी को सुनकर आप भी आश्चर्य में पड़ जाएंगे। भइया! जब पकड़ जाते हैं तो सौ-पचास थमा देते हैं, वहीं मामला रफा-दफा हो जाता है, थाने तक बात नहीं पहुंच पाती है। वहीं इन बच्चों की बदहाली और गरीबी को देखकर इन्हें जबरजस्ती स्टेशन से बाहर करना भी एक बड़ी चुनौती है। इलाहाबाद स्टेशन व उसके आसपास रहने वाले बच्चों से बात करने पर पता चला है कि पढ़ने का उनका मन करता है लेकिन परिवार की दयनीय स्थिति के कारण उन्हें ट्रेनों में गुटखा, पानी का बोतल आदि बेचना पड़ता है।
पुनर्वास के लिए हो ठोस नीति
बच्चों के पुनर्वास के मसले पर समाज सेविका नीलम श्रीवास्तव से बात की तो उन्होंने बताया कि जो बच्चे कई साल से स्टेशन पर ही अपना जीवन बिता रहे हैं ऐसे बच्चों को सुधार पाना एक बड़ी चुनौती है। नीलम बताती हैं कि रेलवे को इस काम के लिए आगे आना चाहिए प्रभावी और सही रणनीति बनानाी चाहिए। कई वर्षों से स्टेशन पर रह रहे बच्चों के लिए रेलवे को शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए ताकी इन बच्चों का भविष्य उज्जवल बन सके। नीलम ने बताया कि इनमें से कई ऐसे बच्चे हैं जो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन घूमते रहते हैं, इन्हें पेट भरने के लिए खाना इधर-उधर से मिल जाता है लेकिन नशा करने की लत का शिकार हो जाते हैं। बडे होने पर ये अपराध की राह पकड लेते तब इन्हें सुधार पाना बहुत मुश्किल होता है। नीलम बताती है कि कुछ दिनों से घर से भागकर आए बच्चों को सही रास्ते पर परामर्श के माध्यम लाया जा सकता है। नीलम इन बच्चों की काउंसलिंग करती हैं, इन्होंने सैकड़़ों ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग की है और उन्हें घर तक पहुंचाया है। नीलम बताती है कि स्टेशन में लंबे समय पर रह रहे बच्चों के पुनर्वास के लिए कई एनजीओ जमीनी स्तर पर काम करने से कतराती हैं। उनका काम भी केवल कागजी होता है। अगर सही मे काम होता है तो कई बच्चों का भविष्य बन सकता था।
स्टेशन पर नहीं है बच्चों का भविष्य
एक बात तय है कि स्टेशन पर बच्चों का कोई भविष्य नहीं है यहां पर उनकी उम्र बढ़ती है। उन्हें न अच्छा इंसान बनने का माहौल मिलता है न अच्छी शिक्षा मिलती है और न ही परिवार का प्यार दुलार मिलता है। 12 साल के दीपक यादव इलाहाबाद स्टेशन पर गुटखा बेचता हुआ मिला। वह बांदा का रहने वाला है और घर से बाहर भागकर ग्वालियर गया, जहां पर उसने कुछ दिन होटल मे काम किया, लेकिन होटल के मालिक उससे 16 घंटे काम कराता था। दीपक को अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। उसने ठान लिया कि वह होटल के कैद से खुद को आजादी दिलायेगा। कई रात के बाद उसे एक मौका मिला, एक रात होटल का मेन गेट खुला पाया, बस इस गलती का फायदा उठाया व रात को वहां से निकल गया।
लेकिन उसका बालमन का आकर्षण स्टेशन में रमा और कहीं न कहीं घर में मां-बाप की प्रताड़ना का डर उसे आजादी के बाद भी घर जाने के लिए रोक रहा था। आंखों में आंसू पोछते हुए दीपक ने बताया कि वह इलाहाबाद आ गया और यहीं से गुटखा खरीदकर बेचने लगा। अभी घर छोड़े उसे कुछ दिन हुआ था। दीपक की काउंसिलिंग सामाज सेविका नीलम श्रीवास्तव ने की वह अपने घर जाने के लिए तैयार हो गया। एक संस्था की मदद से उसे घर पहुंचाने के लिए उसके घर का पता लगाया जा रहा है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन में पढ़ाई या मााता-पिता की नाराजगी के कारण रोजाना दर्जनों बच्चे घर से भागकर आते हैं और कुछ दिन तक यही रहते हैं तो कुछ किसी स्टेशन का रूख कर लेते हैं। वहीं वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, रायपुर आदि रेलवे स्टेशनों पर बच्चों के लिए काम करने वाली साथी संस्था कठिन परिस्थितियों में रह रहे इन बच्चों की मदद करती है, ऐसे बच्चों को कांटेक्ट में लेकर उन्हें उनके घर तक पहुंचाने का काम करती है।
आरटीई यानी 14 साल तक के बच्चों को निशुल्क व अनिवावर्य शिक्षा कानून के लागू होने के बाद बदहाली के आंसू में जी रहे स्टेशन पर ये बच्चे पढ़ने व सम्मान से जीने का अधिकार के लिए किसके सामने हाथ फैलाये। गरीबी, बीमारी, नशाखोरी में जी रहे इनके मां-बाप जो इन्हें पैदा तो कर दिया लेकिन शिक्षा क्या, दो वक्त की रोटी भी नहीं दे पा रहे हैं। लाचार मां-बाप पेट पालने के लिए इन बच्चों को स्टेशन के हवाले कर देते हैं। लोहे की पटरियों में दौड़ने वाली ट्रेन की गति चाहे जितनी बढ़ जाए, रेलवे का सफर चाहे जितना सुविधाजनक हो जाए लेकिन ट्रेन की हर खिड़की से दिखने वाला देश का भयानक सच, यही है कि रेलवे ट्रेक पर बड़ा-सा बोरा लटकाये बोतल बिनते ये बच्चे, हमारे तरक्की को खोखला साबित कर रहे हैं। रायपुर, वाराणसी, मुगलसराय, पटना, मुम्बई, दिल्ली, चेन्नई जैसे रेलवे स्टेशन पर आपको ऐसे बच्चे मिल जाएंगे जो अपने सुनहरे भविष्य के सपने नहीं देखते हैं, उनके सपनों में तो बस दिखता है दो वक्त की रोटी और स्टेशन का शोर।
बच्चों से बिकवाया जाता है पानी    
इलाहाबाद स्टेशन में इन दिनों दर्जनों बच्चे रोज सुबह प्रयागराज व यहां से गुजरने वाली दर्जनों ट्रेनों से खाली पानी का बोतल इकट्ठा करते हैं। इन बोतलों को रिफिल कर इन बच्चों से पानी की बोतल बेचवाया जाता है, जिसमें अच्छी खासी आमदनी होती हैं। आश्चर्य की बात है कि रेलवे प्रशासन को इस बात की भनक नहीं लगती है। अवैध वेंडरों में छोटे-छोटे बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। उनकी गरीबी और पैसों के लालच के चलते स्टेशन पर पानी की बोतल बेचने का धंधा जोरों पर है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस खेल के पीछे रेलवे के ही जिम्मेदार लोगों का हाथ है।   
नशे के चंगुल में बच्चे
स्टेशन में घूमते दर्जनों बच्चे, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। सुलेशन, स्प्रिट, व्हाइटनर, गुटखा की लत में इलाहाबाद स्टेशन में रोजना कई बच्चे घूमते हुए देखे जा सकते हैं। इन बच्चों के माता-पिता का पता नहीं है, कहां से आए ये भी नहीं मालूम। व्हाइटनर सूंघकर नशा करने वाले इन बच्चों की मदद करने की पहल के लिए कोई एनजीओ सामने नहीं आती है। चाइल्ड लाइन को अगर ऐसे बच्चे की सूचना फोन के माध्यम से दी जाती है तो वे आते और कुछ घंटे बाद फिर बच्चे को छोड़कर चले जाते हैं। ऐसे बच्चों के जीवन को सुधारने के लिए कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है केवल फाइलों में काम होता है।
लेखक अभिषेक कांत पाण्डेय से संपर्क abhishekkantpandey@gmail.com 


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