रविवार, 29 मई 2016

उत्तर प्रदेश में अगला कौन

अभिषेक कांत पाण्डेय
संभवत: 2017 के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश में चुनाव हो। ऐसे में यहां पर राजनीतिक हलचल बढ़ना स्वाभाविक है। प्रदेश की सत्ता से लम्बे अर्से से भारतीय जनता पार्टी दूर रही है। इस बार उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने की जुगत में लगी हुई है, वहीं वर्तमान सपा सरकार से युवाओं का आकर्षण भी टूटा है। जिस युवाओं ने यूपी का ताज अखिलेश को पहनाया आज वही युवा ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी नौकरी में कोर्ट कचहरी में मामला पहुंचने पर ये बात जाहिर है ​कि सपा सरकार की नीति कारगर नहीं
है। खासकार युवा बेरोजगार इनके शासनकाल में सबसे ज्यादा परेशान हैं। वहीं केंद्र में काबिज भारतीय जनता पार्टी ने शानदार दो साल की उपलब्धि का जश्न मना रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में बसपा, कांग्रेस, सपा का
पारंपरिक जनाधार भी खिसने वाला है। केंद्र सरकार के कामकाज के कई सर्वे पीएम मोदी को बेहतर बता रही है। ऐसे में माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा वापसी करेगी। जिस तरह केंद्र में विकास का मुद्दा हावी रहा, उस आधार उत्तर प्रदेश में भी विकास की बयार की बात इस चुनाव मेें चलेगी। वर्तमान सरकार उत्तर प्रदेश में लॉ एंड आर्डर चुस्त दुरूस्त करने में पीछे रही है।
वहीं जाति गणित और मुस्लिम वोटों को बटोरने की गणित में सपा व बसपा भी पीछे नजर आ रही है, मुस्लिमों का एक तबका सपा से नाराज है तो वहीं बसपा की ओर मुखातिब हो रही है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मुस्लिम समाज का वोट बिखरे न। देखा जाये तो इधर भाजपा भी पिछड़ों व दलित चेहरों के साथ चुनाव में उतरने की रणनीति पर विचार कर रही है। अमित शाह की नई बिसात में इस बार उत्तर प्रदेश में सही चेहरों को सामने किया जायेगा। देखा जाए लम्बे समय के बाद सत्ता में वापसी करने का भारतीय जनता पार्टी के ​लिए यह सुनहरा मौका है। वहीं मुस्लिम तबके को खुश करने के लिए सपा सरकार अंतिम चरण मेें लोक लुभावन वादे करना शुरू करेगी। आरक्षण जैसे मुद्दों पर राजनीति कर सपा पार्टी इस मसले पर मुसलमानों का हिमायती बताकर उनके वोटों को अपनी ओर खींचने का प्रयास करेगी। लेकिन ये जाहिर है कि चुनावी साल में आरक्षण की ये बात​ केवल चुनावी शिगूफा ही साबित होगा, जो मुस्लिम तबके के वोट बैंक को चुंबक की तरह ख्रींचने का पुराना नुस्खा ही साबित होगा। सवाल तो यह उठता है कि मुस्लिम तबका सपा पर लंबे अर्से से भरोसा करता आया है लेकिन सत्ता पाने के बाद परिवारवाद की राजनीति में मशगूल सपा इटावा व मैनपुरी तक ही सीमित रह गई है। चार साल में जो संदेश उत्तर प्रदेश की जनता में गया है उससे जाहिर है कि दुबारा सत्ता में काबिज होने के लिए प्रदेश में मजबूत पकड़ होनी चाहिए। टीवी, अखबारों, होर्डिंग के जरिये विज्ञापन में अपनी उपलब्धियों का बखान करने पर प्रदेश की जनता चार साल जमीनी काम का तुलनात्मक अध्ययन तो अपने दिमाग में कर लिया है। जाहिर है चुनाव दूर है, इन दिनों में कोई फेरबदल हो सकता है इसकी कवायद में दंभ भर रहे राजनीति खिलाड़ी नई गोट बिछाने के लिए जोड़—तोड़ की रणनीति अपनाने में देर नहीं
करेंगे।