सोमवार, 4 जुलाई 2016

जोशी भड्डरी को मिले आरक्षण



भारतीय संस्कृति में ज्योतिष का बड़ा महत्व रहा है। ज्योतिष ज्ञान से नक्षत्र विज्ञान की उत्पति हुई है। ज्योतिष में ग्रहों व नक्षत्रों की सटीक गणना की पद्धति का विज्ञान भृगु ऋ़षि ने दिया था, जो भृगुसंहिता में दर्ज है। ब्राह्मणों में भृगु ऋषि के वशंज जोशी भड्डरी जाति, जो ज्योतिष विज्ञान के प्राकाण्ड विद्वान हैं और ये जनमानस में बिना किसी पूर्वाग्रह के ज्योतिष ज्ञान, ग्रह नक्षत्र, हिंदू रीति रिवाज से कर्म का प्रतिपादन करते रहे हैं। ज्योतिष कर्म व पुरोहिती के माध्यम से जन का कल्याण कलांतर से करते आये हैं। भृगु महाऋ़षि के वंशज में भड्डरी महाऋ़षि ने भड्डर संहिता की रचना की, जो ज्योतिष ग्रंथ है।
भड्डरी वंश शनि का दान लेना, प्रेतबाधा का निवारण, ज्योतिष नक्षत्र का ज्ञान यजमानों को देते रहे हैं व उनकी समस्याओं का हल करते रहे हैं। कालांतर से भारत के अनेकों क्षेत्रों में भ्रमण करते हुए आदिवासी क्षेत्रों में भड्डरी जोशी ब्राह्मण, वहां के आदिवासियों को चेला बनाते थे और उनको सही दिशा दिखाते थे। भड्डरी जोशी कलांतर से इसी जीविका से जुड़े रहे हैं। दान—पुण्य पर जिंदा रहने वाले भृगुवंशीय भड्डरी के मन में समाज सेवा का भाव रहा है। जन कल्याण और हिंदू धर्म के अन्य जातियों के साथ भाईचारे की भावना से जुड़े रहे हैं। लेकिन समय के साथ खुद को आधुनिक शिक्षा और तकनीक से जोड़ नहीं पाए, इसीलिए सामाजिक चेतना में पिछड़ने लगे। परंपरा से चली आ रही पुरोहिती धीरे—धीरे कम होने लगी, इस कारण से इनके लिए रोजी—रोटी की समस्या उत्पन्न होने लगी। ​बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से गंगा या दूसरी नदियों के किनारे मल्लाह नौका विहार जैसे अपनी पुस्तैनी काम से उन्हें कोई खास आमदनी नहीं होती हैं, इस वजह से उनके लिए रोजी रोजगार की समस्या के साथ ही वे आधुनिक शिक्षा से भी पिछड़ते गए उन्हें आरक्षण दिया गया ताकी आधुनिक कसमाज की मुख्यधार में जुडत्र सके। इसी तरह ब्राह्मणों में भड्डरी जाति भी उपेक्षित रही है। आजादी के 68 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। जोशी भड्डरी उत्तर प्रदेश में शर्मा, जोशी, पाण्डेय इत्यादि टाईटिल यानी सरनेम रखते हैं। वहीं आज आधुनिक शिक्षा से वंचित होने के कारण समाज की मुख्यधारा से कट गए हैं।
भड्डरी भारत के अन्य राज्यों में डकोत नाम से भी जाने जाते हैं। मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली राज्यों की सरकार इन्हें आरक्षण दे रही है, इस वजह से इनमें आर्थिक व सामाजिक सुधार भी हो रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि उत्तर प्रदेश में रहने वाले भड्डरी को आरक्षण अभी तक नहीं दिया गया है। जबकि उत्तर प्रदेश में इस समाज के लोगों की हालत बदतर है। आधुनिक शिक्षा से वंचित हैं, इनके समाज में शिक्षा का अभाव है। अब पुरोहिती से आय भी नहीं होती है, इस कारण से पुरोहिती के रोजगार से भी ये लोग दूर होते जा रहे हैं। इस समाज के बच्चे मजबूरी के चलते शहरों के ट्रैफिक चौराहों के सिग्नल पर शानि पात्र में दान मांगते हैं। वहीं भड्डरी समाज के लोग बनारस व इलाहाबाद में मंदिरों के बाहर टीका लगाते हैं तब यजमान दान में चंद पैसे से देते हैं। इसी तरह से सैकड़ों लोगों की कृपा के कारण इनकी जीविका चलती है। इसमें उतनी आमदनी नहीं होती है, वहीं बहुत लोग झिड़क देते हैं। इस जाति के लोगों के पास न ही आधुनिक तकनीकी कुशलता है और न ही सरकार के पास इनके लिए कोई सरकारी योजना है। इस कारण से भड्डरी समाज के लोग पिछड़ गए हैं, वे हजारों साल पुराने तरीके से जी रहे हैं। इस कारण से भड्डरी ब्राह्मणों की स्थिति बदतर है। देखा जाए तो गरीबी, अशिक्षा के कारण शनि के नाम पर दान से जीविका का एकमात्र विकल्प है। उत्तर प्रदेश में आरक्षण का लाभ न मिलने के कारण सरकारी नौकरी में इनकी पहुंच न के बराबर है।
इस समाज के कुछ पढ़े—लिखे के लोग हैं, वे प्राइवेट क्षेत्रों में काम करने जाते हैं तो वहां पर जातिगत उपेक्षा के शिकार होते हैं। अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझने वाले दूसरे जाति वर्ग के लोग जोशी भड्डरी के व्यक्ति को उपेक्षित व हेय दृष्टि से देखते हैं। जोशी भड्डरी ब्राह्मण में थोड़े साधन संपन्न हैं, वे अपनी मानसिकता के कारण खुद को जातिगत पैमाने में सर्वश्रेष्ठ बताते हैं, ताकी दूसरे ब्राह्मण उन्हें मान सम्मान दें, लेकिन उनका भ्रम तब टूटता है जब अन्य उच्च कोटि के साधन संपन्न समझे जाने वाले ब्राह्मण, उनके बारे में जान जाते हैं, तो कहते हैं कि तुम तो भड्डर हो, जो शनि का दान लेते हैं। तब भड्डरी को पता चलता है कि वे जातिगत असमानता का शिकार हो रहे हैं। जोशी भड्डरी से दूसरे जाति के ब्राह्मण विवाह संबध भी नहीं रखते हैं। इसलिए जोशी भड्डरी ज्ञानी होते हुए भी वह सामाजिक और आर्थिक रूप से इस उपेक्षा के कारण पिछड़ता गया है।
लखनउ या रायबरेली जाये तो यहां पर जोशी टोला नाम से जोशी भड्डरी की कई बस्तियां हैं। यहां पर इस समाज के 95 प्रतिशत लोग बहुत गरीबी में रहते हैं। बीड़ी बनाने जैसा छोटा—मोटा काम करके ये अपनी जीविका चलाते हैं। शहरों में बसी इनकी ये बस्तियां इनकी हकीकत बयां करती है। एक—एक कमरे में दर्जनों लोग रहते हैं। न इनके पास कोई खेती है और न ही इनके पास इतना बड़ा मकान है कि किरायेदार भी रख सके, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ के डालीगंज और हैदरगंज में जोशीटोला बस्ती में अधिकांश लोग भड्डर ब्राह्मण रहते हैं। यहां ये छोटा—मोटा रोजगार धंधा करते हैं। इससे बदतर हालात रायबरेली में जोशियाना का पुल नाम की बस्ती का है। बहते हुए गंदे नाले के आस—पास बसी इनकी बस्ती है, यहां पर पुरखों के जमाने से रहते आ रहे हैं। यहां पर 90 प्रतिशत जोशी भड्डरी अशिक्षित है या बहुत कम पढ़े लिखे हैं। रोजगार का कोई साधन नहीं है, और न ही अपना रोजगार करने के लिए पैसा है। आरक्षण न मिलने के कारण ये सामान्य जाति में आने वाले दूसरे वर्गों से प्रतियोगिता नहीं कर पा रहे हैं। जाहिर है बुनियादी जरूरतों, जैसे रोजी—रोजगार के लिए ही दर—ब—दर भटक रहे हैं। यहां के जोशी भड्डरी मुंबई महानगर में कमाने के लिए जाते हैं। वहां पर सड़कों के किनारे बैठकर ज्योतिष कर्म करते हैं, अगर इसमें कमाई नहीं हो पाती है तो मजदूरी तक करते हैं।
धार्मिक नगरी वाराणसी में जोशी भड्डरी पाण्डेय टाइटिल लगाते हैं। इन्हें प्रसिद्ध मंदिरों में पुरोहित का दर्जा नहीं मिलता है लकिन रोजी—रोटी के लिए मंदिर के बाहर ही भक्तों को पूजा दर्शन कराते हैं, एक तरह से धार्मिक गाइड का काम करते है। इस काम में भक्तों द्वारा जो मेनताना मिलता है उसी पर गुजर बसर करते हैं। वहीं इस काम में इतनी कम आमदनी होती है कि दो वक्त की रोटी बामुश्किल से मिल पाता है। वहीं वाराणसी के गंगा किनारे ये घूमकर ही पूजापाठ कराते हैं, इसमें इन्हें दान स्वरूप कुछ आलू व मूठीभर चावल ही मिलता है। जोशी भड्डरी को वहां निचले दर्जे का ब्राह्मण समझा जाता है इसीलिए उन्हें मंदिर में पुरोहिती का काम नहीं दिया जाता है। परंपरा से इनके साथ इसी तरह का शोषण होता चला आया है। ऐसे में बच्चों को अच्छाी शिक्षा नहीं दिला पाते हैं। वाराणसी में जोशी भड्डरी कलांतर से जीविका के लिए पुरोहिती, जन्मपत्री बनाना, श्राद्धकर्म, पिशाचमोचन में प्रेतबाधा हटाने जैसे काम करते आ रहे हैं। वहीं इस जाति के लोग अशिक्षित होने के कारण दुकानों में चार—पांच हजार रुपये की नौकरी करते हैं। वाराणसी में चेतगंज, बड़ी पियरी, लहरतारा जैसे जगहों पर रहने वाले भड्डरी ब्राह्मणों की बस्ती है। यहां पर 90 प्रतिशत जोशी भड्डरी छोटे काम या घाट किनारे यजमानों को पूजा कराते हैं। इनके पास आधुनिक शिक्षा का अभाव है। वहीं इलाहाबाद में जोशी भड्डरी अखबार के हॉकर का काम करते हैं, क्योंकि यहां पर पुरोहिती में इतनी आमदनी नहीं होती की घर व बच्चों की जरूरतों को पूरा कर सके। इनकी बस्ती इलाहाबाद के मीरापुर, द्रोपदी घाट, कटरा आदि है वहीं इलाहाबाद के अन्य जगहों पर मलिन कालोनी में रहते हैं। इसी तरह सीतापुर, मैनपुरी, इटावा आदि जगहों पर जोशी भड्डरी के जीविका संकट से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में लाखों की संख्या में भड्डरी ब्राह्मण रहते हैं, जिनकी नजर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर है कि उनकी बदहाली को देखकर समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें आरक्षण दिया जाये, जिससे वे अपनी गौरव के अनरूप नई आधुनिक जीवन से जुड़ सके और शिक्ष, नौकरी, व्यापार आदि जैसे रोजगारों में जुड़ कर देश प्रदेश की तरक्की का हिस्सा बन सके।
जोशी भड्डरी में पढ़े—लिखे लोग हैं लेकिन सरकारी नौकरी में उनका प्रतिनिधित्व नहीं हैं। शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण व वजीफा नहीं मिलने के कारण इस समाज के बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। जोशी भड्डरी महासभा इस समाज के लोगों के लिए सम्मान भरी जिंदगी व सरकारी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की मांग कर रही है। वहीं पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली वगैरह में राज्य सरकारें सरकारी नौकरी व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दे रही है। इसकी वजह से इनके जीवन में सुधार आ रहा है।