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कहां भटक गए हम

स्वंतत्रता दिवस पर विशेष लेख



अभिषेक कांत पाण्डेय ‘भड्डरी‘



आज हम आजादी के 70वें साल में सांस ले रहे हैं। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वंतत्र हुआ और लोकतांत्रिक देश के रूप में पूरी दुनिया के सामने आया। गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए देश के वीर सपूतों ने बलिदान दिया। देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर सपूतों ने ये न सोचा होगा कि आजाद भारत के लोगों की तरक्की में जातिप्रथा, भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद रोड़ा बन जाएगा, जो देश को खोाखला बना रहे हैं।
भारत में कई संस्कृति व धर्म के लोग रहते हैं, इनकी मान्यताएं, रीति-रिवाज के बीच टकराहट देश के हित में नहीं है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेता सुभाषचंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई जैसे देशभक्तों ने गुलाम भारत को आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किया, इनका कोई स्वार्थ नहीं था, बस था आंखों में सपना कि मेरा प्यारा वतन भारत आजाद हो ताकि देशवासी सम्मान से जी सके। सवाल उठता है कि आखिर आज हम स्वंतत्र तो हैं लेकिन हमारी सोच आज भी हजारों वर्षों से चली आ रही दकियानूसी रीति-रिवाजों में जकड़ा हुआ है। आजादी के 69 साल में जितना विकास होना चाहिए था, उतना विकास इसी कारण से …