बुधवार, 28 सितंबर 2016

अब बातें नहीं, विकास करके दिखाओ


अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी
इस बार उत्तर प्रदेश में होने वाला आम चुनाव, क्या अमूलचूल परिवर्तन लायेगा। किसकी बनेगी अगली सरकार? क्या सपा की वापसी होगी, या बसपा सत्ता की चाबी पाएगी या क्या कांग्रेस का यूपी में 27 साल का निर्वासन खत्म होगा, या मोदी का करिश्मा भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने में के लिए मददगार सबित होगा। इन सवालों के जवाब जाति, धर्म, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, लचर कानून व्यवस्था बनाम विकास की बातों पर समझ रखने वाला मतदाता के वोटों की ताकत पर निर्भर करता है, कि किसने किया है अब तक यूपी का विकास।
केंद्र में भाजपा की सरकार और यूपी में सपा की सरकार है, पिछले दो वर्षों से विकास की बातें हो रही हैं, पर सबसे बड़ा सवाल है कि अब तक यूपी में विकास क्यों नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व भाजपा ने यहां पर शासन किया लेकिन यूपी की स्थिति आज भी बदतर है। देश की राजनीति में यूपी का एक अहम रोल रहा है। यूपी का समीकरण केंद्र की सत्ता में कौन बैठेगा या किसका पत्ता साफ होगा, यह तय करता है। राजनीति की नर्सरी कहे जाने वाले यूपी ने कई प्रधानमंत्री देश को दिए है, लेकिन इसके बावजूद भी यूपी की तरक्की नहीं हो पायी, न उद्योग-धंधों को ढंग से विकास हुआ, न ही यहां पर फिल्म उद्योग का विकास हुआ, ताकि बेरोजगारों को अधिक से अधिक रोजगार दिला सके। लैपटॉप व बेरोजगारी जैसी योजनाओं के जरिये वोटों को खींचने का तरकीब यही बताता है कि राजनीतिक दल जानते हैं कि उन्हें सत्ता पाने के लिए लोकलुभावन वादे कर मतदाता को आकर्षित करना जरूरी है। लेकिन अब जनता जानती है कि ये सब छलावा है, ठोस तरक्की की जरूरत है जिससे गरीबी व बेरोजगारी से लड़ा जा सके। लेकिन जिस तरह से यहां पर चुनाव के ऐन वक्त पर धर्म, जाति और संप्रदायिकता का जहर बोया जाता है तो दो खेमों में वोटों को आसानी से बांटने की सबसे बड़ी साजिश की जाती है, ताकि तरक्की की बात न की जाए, नहीं ंतो नेताओं को जवाब देते नहीं बनेगा कि यूपी में पहला आम चुनाव 1951 से अब तक, लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारों ने गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्या जैसे मुद्दों पर क्या किया। 68 साल बाद भी समस्या जस की तस है। यूपी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य है, लेकिन यहां पर बेरोजगारी, गरीबी, कानून व्यवस्था की समस्या आज भी बनी हुई है।
27 साल पहले यानी 1989 को नरायण दत्त तिवारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, उसके बाद से यूपी में कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आई। निश्चित ही प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को नकारा, ताकि यूपी में विकास की गति नए दल लेकर आये, लेकिन जैसे ही सपा और बसपा ने यूपी की सत्ता हासिल की, तो लगता था कि राजनीति की दशा बदलेगी, लेकिन यूपी के दसवीं विधानसभा चुनाव 1989 में जनता पार्टी की सरकार बनी, मुलायम सिंह यादव ने सत्ता संभाली, उम्मीद थी कि बदलाव आएगा। यह एक ऐसा बदलाव होगा कि आने वाले 15 वर्षों मंें यूपी देश का नंबर वन राज्य बन जाएगा। खैर, इसके बाद भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में शासन किया लेकिन यूपी की तकदीर नहीं बदली, नहीं बदली तस्वीर। कानून व्यवस्था व संप्रदायिकता को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। वोटों को ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति ने एक और रंग ले लिया, वह था दलितों और पिछड़ों के हिमायती बनने वाले नेताओं का जन्म लेना। वहीं राम मंदिर के जरिये हिंदुत्व कार्ड खेलकर वोट बैंक बनाने का एक नया रास्ता भाजपा को मिला। यूपी बदल रहा था राजनीतिक समीकरण के ताने बाने अब दलितों, पिछड़ों व मुस्लिमों मे ंवोटों को जाति व धर्म के नाम पर राजनीतिक दल साधना जान गए थे। तरक्की की बात कौन करता, जब वोट जाति व धर्म के नाम पर मिलने लगे, मंदिर, मस्जिद, तुष्टीकरण, जातिवाद के साये में यूपी के विकास की फिक्र किसे थी। बेरोजगारों, गरीबों और किसानों की दयनीय स्थिति को जानने की जरूरत किसी दल ने नही समझी। केवल खानापूर्ति की स्थिति रही है। वही स्थिति आज भी बनी हुई है।
विकास के नाम पर दिखावा
केंद्र में 2014 के आम चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन से लोगों में उम्मीदें जगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि क्या आज बदलाव हुआ है? यह तो तय है कि विकास को दिखाने की होड़ राज्यों की सरकारों में तेजी से हुआ है। मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन है, दुबारा मुख्यमंत्री बने शिवराज चौहान की सरकार अपने योजनाओं और विकास के कार्यों का खूब प्रचार कर रही है। केजरीवाल की सरकार भी प्रचार-प्रसार में खूब पैसा खर्च कर रही है। वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने अब प्रचार-प्रसार का दामन थाम लिया। अखिलेश यादव हमेशा कहते रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के अच्छे कामों का प्रचार जनता के सामने नहीं आ पाता है। इसीलिए सरकार के विकास कार्यक्रमों का प्रचार खूब किया जा रहा ताकि जनता जान सके। जाहिर है आने वाला यूपी विधानसभा का चुनाव अखिलेश यादव के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है, वे इस पर खरा उतरना चाहते हैं, लेकिन अब जनता को फैसला करना है कि उनका विकास किसने किया है।

किसानों की कौन सुने

राजनीति दल चुनाव से पहले वादे करते हैं लेकिन जैसे ही सत्ता मिलती है, वे अपने वादे भूल जाते हैं। किसानों से हर दल चुनाव के समय वादा करता है लेकिन सत्ता में आने के बाद वही दल किसानों को छलना शुरू कर देता है। चार-पांच हजार रूपये कर्ज न चुका पाने पर किसान को जेल में डाल दिया जाता है, जबकि अरबों रूपये डकार जानेवाले उद्योगपतियों पर सरकारें महरबान रहती हैं। उन्हें सब्सिडी के तौर पर हर तरह की सुविधा देने में कोई कोताही नहीं बरती जाती है, लेकिन सूखे के कारण खराब हो गई फसल के मुवाब्जे के लिए चंद रूपये देकर सरकार किसानों के साथ मजाक करती रही है। देखा जाए तो 1970 के मुकाबले आज चपरासी तक की तनख्वा में 150 गुना बढ़ोतरी हुई, वहीं शिक्षक व प्रोफेसर की आय में 170 गुना, उच्चे दर्जे के अधिकारियों की आय में हजार गुना का इजाफा हुआ है लेकिन किसान को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में केवल 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दरअसल किसानों की जरूरत और उनके विकास के लिए योजनाओं में अनदेखी की गई है। सूखा, बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदा के कारण उनके खेतों और घरों के नुकसान की भरपाई के लिए मिलने वाली धनराशि इतना कम होता है कि उससे क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती है। वहीं सरकारीतंत्र में फैले भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों की कमीशनबाजी के कारण किसान परेशान रहते हैं। जहां एक ओर किसान को कुदरत की मार सहनी पड़ती है, वहीं सरकारीतंत्र की उदासीनता को भी सहना पड़ता है। गुलाम भारत में किसानों को खूब शोषण हुआ, अंग्रेजों ने किसानों की मेहनत से उगाये फसलों का औने-पौने दामों में जबरजस्ती लेकर इंग्लैंड की तरक्की में लगाया। वहीं जमीदारों ने किसानों का आर्थिक व सामाजिक शोषण किया। लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद उम्मीद थी कि किसानों के अच्छे दिन आएंगे, लेकिन सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारों ने वोट बैंक पाने के लिए किसानों से खोखले वादे किए। आज खेती घाटे का सौदा है, किसानों की मेहनत को बिचौलिये खा रहे हैं, भ्रष्टतंत्र किसानों के हिस्से के सब्सिडी, कर्जमाफी के पैसों को डकार जाते हैं। केवल दिखाने के लिए योजनाएं होती हैं, असल में जरूरतमंद किसानों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचत पाता है। नेता और कर्मचारी मिलकर किसानों को मिलने वाली योजनाओं मंे फर्जीवाड़ा कर अपात्रों को इसका लाभ देकर उनसे अपना कमीशन ले लेते हैं। इस तरह छोटे व मध्यम किसानों का हक मारा जाता है। 
किसानों को महाजनों के कर्ज से मुक्त कराने के लिए 1950 के बाद कोऑपरेटिव सोसायटियंा शुरू की गईं। साठ के दशक में इनकी संख्या दो लाख बारह हजार तक पहुंच गई। इनसे लघु और सीमांत किसानो ंको फायदा भी हुआ, पर 1969 में बैंक के राष्ट्रीयकरण और ग्रामीण बैंक के अस्तित्व में आने के बाद सोसायटियों को बेकार मान लिया गया। यह वही समय था जब भारत में भ्रष्टाचार का उदय हुआ। करप्शन के घुन ने व नकारा नौकरशाहों के नकारेपन ने कोऑपरेटिव सोससायटियों के आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया। वहीं विश्व बाजार से बैंकों ने बहुत कुछ सीख लिया था। इधर किसान अब बैंकों से ऋण लेने लगा, इन बैंकों के लिए किसान एक क्लाइंट ही थे, बैंकों ने किसानों को से लाभ कमाना शुरू कर दिया। इस तरह साहूकार-महाजनों, उसके बाद कॉपरेटिव सोसायटी के बाद बैंकों के मकजड़जाल मे ंकिसान फंसता चला गया। हालांकि सरकारों ने समय-समय पर किसानों के लिए कई योजनाएं चलाती रही हैं लेकिन इसका फायदा बिचौलिये या फिर बैंक उठा लेते हैं।

बेरोजगारों के लिए कौन

सरकारी सेक्टर में रोजगार सीमित है, तो वहीं प्राइवेट सेक्टर में रोजगार की आपार संभावनाएं हैं लेकिन अब तक की सरकारों ने इस दिशा में उचित पहल नहीं की। देखा जाए तो भारत में यूपी व बिहार जैसे राज्यों के बेरोजगारों को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। शिक्षा के जानकार भी मानते हैं कि यूपी व बिहार जैसे राज्यों में स्किल एजुकेशन को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। सरकारी शिक्षा की बदहाली और शिक्षा जैसे महकमें राजनीति के शिकार हैं। उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के नियुक्ति से लेकर ट्रांसफर व प्रमोशन में पैसों की डिमांड होती है। अधिकारी बिना पैसे के काम नहीं करते हैं, वहीं दोषपूर्ण चयननीति के कारण अयोग्य शिक्षकों को भर्ती कर लिया जाता है। इससे आप अंदाजा लाग सकते हैं कि ऐसे शिक्षक बच्चों को क्या शिक्षा देते होंगे। माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा की यही स्थिति है, मानक को नजरअंदाज कर स्कूल व कॉलेजों को मान्यता दे दिया जाता है। इस कारण ऐसे शिक्षण संस्थान केवल डिग्री बांटने की दुकान ही साबित हो रहे हैं, यहां पर गुणवत्ता की बात करना बेईमानी है। यूपी का उदाहरण ले तो चुनाव जीतने मंे ंखर्च होने वाले रूपये की भरपाई के लिए ऐसे शिक्षामाफियों को पैदा किया गया है जो फला पार्टी को चुनाव के वक्त पैसा देते हैं और सत्ता में आने के बाद उस पार्टी की सरकार इन शिक्षामफियों को संरक्षण देती हैं। अब तो सरकार किसी की बने शिक्षामाफियों को संरक्षण आराम से मिलता है। इन पर कोई सरकार कार्यवाई नहीं करना चाहती है क्योंकि नेताओं के लिए ये शिक्षामाफिया दूधारू गाय की तरह हैं। देखा जाए तो यूपी की अब तक की सरकारें बेरोजगारों के हित मे ंरोजगार के अमूलचूल साधन पैदा करने में नाकामयाब ही रही है। सरकारी क्षेत्र में सीमित नौकरियां हैं, वहीं प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार है लेकिन यहां पर शासन करनेवाली सरकार सही कानून व्यवस्था, बिजली, पानी, सड़क व्यवस्था को दुरूस्त नहीं कर पाई है, इसीलिए यूपी में इन्वेस्टर यहां पर पूंजी लगाने से हिचकिचाते हैं। यूपी में 68 साल से ये स्थिति नहीं बन पाई कि यहां पर बाहरी कंपनियां आये और यहां के बेरोजगारों को प्रक्षिशित कर रोजगार मुहइया कराए। बेरोजगारी दूर करने के वादे के नाम वोट हर राजनीति दल मंागती आई है लेकिन कार्यकाल पूरा होने के बाद भी बेरोगारों को रोजगार दिलाने के अपने वादे पूरा नहीं कर पाती है। अपनी नकामयाबी को छिपाने के लिए सीमित सरकारी नौकरियों के कुछ हजारों पद भर कर, उसी का प्रचार-प्रसार कर, बेरोजगारी के नाम अपने चुनाव के समय किये गये अपने वायदों से बचने की कोशिश करती हैं, सरकारें। देखा जाए तो इन सरकारी नौकरी के सौ-दो सौ सीटों के लिए लाखों बरोजगार फार्म भरते हैं। लेकिन जाब कुछ लोगों को मिलती है। साफ है कि सरकारी ठोस नीति बेराजगारों के लिए नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में रोजगार पैदा करने के तरीके में सरकारीतंत्र फेल रही है या कहें कि इस ओर वे दृंढ़ इच्छा शक्ति से काम करने से सरकारें भागती रही हैं।