बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोट बंदी


नोट कर लो
ये नोट
वक्त के साथ
आपका साथ छोड़ जाता है,
वक्त चाहे जितना हो
एक दिन वो भी खत्म हो जाता है।
अगर रह जाता है तो वह तुम
पर वह तुम में मैं नहीं रह पाता।
तुम समझ पाते हो
कैसे फर्क पड़ता है उन लोगों पर।
कुछ वक्त पहले तुम
काली तिजोंरी में
झांकते थे इठलाते थे,
जाने कितने इंसानों का मार हक
बंद था तुम्हारी तिंजोरी में,
नोटों की शक्ल में काली करतूत।
वक्त आज एक है
नोट अनेक
पर सब मिट्टी के ढेर।
सोचो जानो
एक बार फिर पढ़ लो
महावीर, गौतम को
क्या पता चले तुम
माया में जोड़ रहे हो नोट
कहीं हक मार रहे हो
कई जिंदगियों का।
काले तिंजोरी में कैद
उन नोटों को मिली अजादी
जिसे तुमने कमाया तिकड़म से।
फिर वक्त आ गया
तुम्हारी तिंजोरी में काली कमाई
वाली नोटे
साथ में रखी उन बेनामी कागजों
को भी क्रांति सिखा गई
अब वे कागज तुम्हारे
खिलाफ हैं
अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी

copy right