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जीव जंतुओं की संवेदना व्यक्त करती बेचैन कविताएं

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काव्यसंग्रह



अभिषेककांतपाण्डेय
मनकोबेचैनकरतीकविताओंकासंसाररचनेवालेश्यामकिशोरबेचैनउनयुवाकवियोंमेंहैंजोकविताकोमिशनकेरूपमेंदेखतेहैं।बससहीसमयपरसहीबातोंकोकविताकेरूपमेंजनसमुदायकेसामनेसरलवप्रभावीभाषामेंअपनीबातकहदेनेवालीप्रतिभाकेधनीहैबैचैन।बैचेनखुदकहतेहैंकिकविताउनकेलिएउसनदीकेसमानहैजोउन्हेंरचनेवालेकेसाथहीपढ़नेवालेकोभीसुखानुभूतिदेतीहै।श्यामकिशोरबेचैनलखीमपुरखिरीजिलेकेरहनेवालेहैं।भारतकेकोनेकोनेमेंमंचोंपरकविताकेजरियेअपनीअलगपहचानबनाईहै।गीत, गजल,

नोटबंदी के बाद राजनीति

अभिषेक कांत पाण्डेय
नोट बंदी के बाद से देश की राजनीति दो खेमों में बंट गई है। सत्ता पक्ष जहां नोटबंदी के फायदे गिना रही है तो वहीं विपक्ष नोटबंदी से जनता को हो रही परेशानी को मुद्दा बनाकर राजनीति कर रही है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नोटबंदी के बाद आम जनता को नोट बदलने के लिए लम्बी लम्बी कतरों में लगना पड़ रहा है। बैंकों में सही मैनेजमेंट न होने के कारण आम लोगों काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। देखा जाए तो नोटबंदी से होने वाले फायदे भी हैं तो नुकसान भी। विपक्ष ने आम जनता की परेशानियों को आगे लाकर राजनीति शुरु किया तो संसद की कार्यवाही भी बाधित रही। वहीं नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के समर्थन पर सर्वे कराकर जनता की राय मांगी, जाहिर है एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में नोटबंदी पर यह सर्वे बेईमानी ही है लेकिन यह तय है कि मोबाइल फोन रखनेवालों में से नब्बे प्रतिशत से अधिक ने नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है। सच्चाई यह है कि भारत में नोटबंदी जैसे फैसला लेना राजनीतिक रूप से जरूरी था और भ्रष्टाचार के जरिये कमाये गए काले धन को ध्वस्त करने के लिए भी। वहीं सवाल यह है कि ज…