रविवार, 23 अप्रैल 2017

उत्तरप्रदेश में कहाँ गुम हो गई जोशी भड्डरी भडरी भटरी विमुक्त,घुमन्तू जाति

विमर्श
उत्तर प्रदेश में कहाँ गुम हो गई 
जोशी भड्डरी, भडरी, भटरी विमुक्त  घुमन्तू जाति 
संपादन 
अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी
 

लेख सुमित कुमार जोशी

उत्तर प्रदेश में विमुक्त, घुमन्तू और अर्धघुमन्तु जातियों की समस्याएं आज भी वैसे ही बनी है। मैंने अपने अध्ययन में पाया कि इन जातियों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं सरकारी द्वारा चलाई जा रही है। राष्ट्रीय विमुक्त, घुमन्तू एवं अर्धघुमन्तू जनजाति आयोग राज्य सरकार को अपने उद्देश्यों से अवगत कराने के लिए एक सर्वे कर रहा है। जनजाति आयोग का ने उत्तर प्रदेश में इन जातियों को चिह्नित करने के बाद इनके लिए कल्याणकारी कार्यक्रम चलाने के निर्देश दिये हैं। इस सर्वे में आयोग ने कहा कि इन उपेक्षित जातियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन कर इन्हें समायोजित भी किया जाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के कार्यक्रमों/योजनाओं से इनकोे कितना लाभ पहुँचा इसका भी मूल्यांकन किया जाए। उन्होंने इन जातियों की मानीटरिंग के लिए निदेशालय स्तर पर एक नोडल अधिकारी बनाने के भी निर्देश दिए हैं साथ ही जिला स्तर पर इन जातियों के आँकड़े उपलब्ध कराने और इनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए एक निवारण बोर्ड भी बनाये जाने के साथ ही अलग से निदेशालय की स्थापना की बात कही ताकि इनकी विमुक्त जाति की उत्थान विकास के कार्यों को गति मिले।


अंग्रेजों की सोची समझी चाल

विमुक्त जातियों के इतिहास पर नजर डाले तो पता चलता है कि अंग्रेजी शासनकाल में इन जातियों के लोग कभी अंग्रेजों के आगे झुके नहीं, इन जातियों में गजब की देशभक्ति की भावना रही, जो कभी अग्रेजों के वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया और इसी कारण से अंग्रेज अधिकारी विमुक्त जातियों से हमेशा परेशान ही रहते थे। ये जातियां हमेशा स्वतंत्र योद्धा के रूप में भारतीय संस्कृति रीति रिवाजों को बचाया है। अंग्रेजों के बनाए एक कानून जो कि सन् 1871 में क्रिमिनल ट्राइबल एक्ट के रूप में सामने आया, ताकि इन जातियों की देशभक्ति की भावना को अपराध घोषित कर दिया जाए और अन्य जातियों से अलग थलग कर दिया जाए, इस तरह से अंग्रेजों की यह चाल कामयाब हुई। इन जातियों का अपराधी घोषित की किया गया, इतिहास की संभवता: यह पहली घटना है कि किसी सरकार के द्वारा जाति के सभी लोगों को अपराधी घोषित कर दिया और समाज से बहिष्कृत कर दिया था। यानी इस समाज में महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, बीमारी, असहाय, गरीब सभी अपराधी हो गए थे, तब अंग्रेजों  से क्या उम्मीद की जा सकती थी।
आजादी के बाद भी उपेक्षित
15 अगस्त, 1947 को भारत देश स्वतंत्र हुआ। 1871 से 1947 तक विमुक्त जातियां उपेक्षित रही और इन पर अंग्रेजों द्वारा अत्याचार होना शुरू हो गया था। 70 साल में इस एक्ट के कारण इस जाति के हजारों लोगों की अंग्रेजों ने हत्या कर दिया, जेल में डाल दिया। इनकी देशभक्ति की भावना को कुचलने की बहुत कोशिश की गई लेकिन विमुक्त जाति के लोगों ने छुप छुपकर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और अपने देश जाति के सम्मान के लिए हमेशा लड़ते रहें।
 31 अगस्त, 1952 को भारत सरकार ने इन जातियों को अंग्रेजों के इस बेहूदा कानून से मुक्त कर दिया और इन्हें विमुक्त जाति का दर्जा दिया। आयोग के मुताविक प्रदेश में इन जातियों (डी0एन0टी0) के कोई भी आँकड़े उपलब्ध नहीं है। इस वर्ग की कुछ जातियां प्रदेश की एस0सी0/एस0टी0 तथा 0बी0सी0 जातियों में समाहित हैं और इसी विमुक्त जाति में जोशी, भड्डरी, भडरी, भटरी जाति जो विमुक्त जातियों की सूची में शामिल होने के बाद भी इन्हें आरक्षण में शामिल ही नही किया गया। इस समाज के लोगों की उपेक्षा पहले अग्रेजों ने किया, फिर सरकार ने इन्हें उचित आरक्षण नहीं दिया। शासनादेश संख्या - 859()700(5)-1959 के तहत उत्तरप्रदेश में जोशी भड्डरी, विमुक्त घुमन्तू जातियां- सूची के क्रमांक नं0 13 पर भडरी, भटरी नाम से जिला इलाहाबाद में दर्ज है, जबकि यह जाति उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में निवास करती है। अंग्रेजों के समय से क्रिमिनल एक्ट में घोषित होने के बाद इस समाज के लोग समाज की मुख्यधारा से अलग हो गए, इस कारण से आज भी जोशी भड्डरी विमुक्त/घुमंतू जाति के लोग के साथ भेदभाव और दुर्वव्यवहार हो रहा है, जाहिर है उत्तर प्रदेश में जब तक इन जातियों को आरक्षण की सूची में शामिल नहीं किया जाएगा, इन्हें न्याय नहीं मिलेगा। समाज की मुख्यधारा इन्हें स्थापित करने के लिए आरक्षण की जरूरत है। इस जाति में गरीबी अशिक्षा है जैसे दूसरे शोषित जातियों को आरक्षण देकर उनके जीवन राजनैतिक प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चितकी गई है, ठीक वैसे ही भड्डरी जोशी, भटरी जाति को भी आरक्षण दिया जाए।
 
भड्डरी जोशी, भटरी जाति
अंग्रेजों के खिलाफ बुलंद की थी आवाज
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनेवाले इस जाति के लोगों ने अंग्रेजों के किसी कानून को नहीं माना क्योंकि इस जाति के लोगों का मानना था कि अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने से अच्छा है कि इनके खिलाफ संघर्ष करो, अपनी इसी रणनीति के कारण भड्डरी जोशी यानी भटरी जो कि एक घुमंतु जाति है। इस जाति के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसी तरह की और घुमंतु जातियों ने भी अंग्रेजों की जीना मुश्किल कर दिया, इस सबसे घबराकर अंग्रेजों ने इन जातियों पर 1873 में क्रिमनल एक्ट लगा दिया ताकी दूसरे सामाज से इन जातियों को अलग कर दिया जाये इन पर कानूनी वार करके इन जातियों की देशभक्ति भावना को तोड़ दिया जाए, लेकिन अंग्रेजों के इस कानून के कारण इन जातियों की जोश में कोई कमी नहीं आई बल्कि अंग्रेजों के प्रति उनका आक्रोश और बढ़ गया। वहीं इस कानून के कारण इन जातियों के लोग समाज से उपेक्षित भी होने लगे।
भड्डरी जोशी समाज की स्थिति बद से बदतर होती गई, शिक्षा से दूर होते गए पेट भरने के लिए माँगना, घूमना-फिरना मजदूरी करना इनका मुख्य पेशा बन गया। देशभर इस तरह की जातियों की आबादी लगभग 15 करोड़ है, जिन्हें कोई भी नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं है। आयोग के अनुसार उपेक्षित जातियों को ही विमुक्त, घुमन्तू और अर्द्धघुमन्तू जाति कहा जाता है।

विडंबना जहां के तहां ही है विमुक्त जातियां
आयोग द्वारा एकत्रित की जा रही ऐसी जातियों की जानकारी पर कोई ठोस कार्यवाही नही हो पा रही है बड़ा ही दुखद है कि आजादी के लगभग 70 वर्ष गुजर रहें हैं लेकिन आज तक इस गरीब जाति को आरक्षण नही मिल पाया है बहुत सी सरकारें आई और चली गई लेकिन कभी किसी सरकार ने इस गरीब जाति के लिए कोई भी विकास परक पहल नही की। और ही किसी भी आयोग और सरकारी विभाग ने जोशी भड्डरी जाति के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक आकडे एकत्र किए।
समाजिक उपेक्षा के शिकार हैं
उत्तरप्रदेश की सीमा से सटे मद्यप्रदेश राज्य ने पिछड़ा वर्ग में आरक्षण देने के साथ ही विमुक्त, अर्ध घुम्मकड और घुमक्कड़ जाति की सूची में शामिल किया है लेकिन उत्तरप्रदेश राज्य की सीमा में घुसते ही यह जोशी भड्डरी जाति विलुप्त हो जाती है या जानबूझकर पिछड़े गरीब जाति को उनका हक नही मिलने दिया गया। हालांकि इसी जाति को जोशी, जोशी भड्डरी, डकोचा, डाकोत भतरी, भटरी, भडरी, भठरी, भड्डर, भड़रिया, देशांतरी, रंगासामी, परया पराडे जोशी नंदीवाला, जोशी चित्रकथी, जोशी वाला संतोषी, जोशी हरदा, हरबोला, ज्योतिष, डाकोती, जोशी पिंगला, आर्द पोप, पोपा ब्राह्मण, जोशी, बुडवुडकी, सहदेव जोशी आदि नामों से छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, उड़ीसा, चंडीगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जनजाति, एस0 टी0 की सूची में दर्ज है। वहीं उत्तर प्रदेश में विमुक्त जाति भड्डरी जोशी यानी भटरी जाति को आरक्षण नहीं दिया गया है

महाकवि घाघ भड्डरी इसी जाति केहैं
महाकवि घाघ भड्डरी की जाति के जोशी भड्डरी के लाखों लोग उत्तरप्रदेश में निवास करते हैं, जिन्हें बोलचाल की भाषा में जोशी, भड्डरी, भडरी, भतरी, भटरी, भड़रिये, भद्दर, भडली, पड़िया आदि नाम से जाना जाता है। ये जाति पूरे देश में पायी जाती है जोशी भड्डरी, डाकोत एक ही तरह की जाति है, जो दूसरे नामों से जानी जाती है। डाकोत उत्तर भारत में जोशी भड्डरी के नाम से जाने जाते हैं। जोशी भड्डरी डाकोत का ही पर्याय है, इन्हें पुरबिया या इस्टर्न डाकोत कहते हैं। यह गिरि गोंसाई, भट, भट्ट, महापात्र आदि निचली ब्राह्मणों की तरह की निचली ब्राह्मण जाति है। अंग्रेजों द्वारा इस जाति को क्रिमनल एक्ट में शामिल करने के बाद ये समाजिक रूप से पिछड़ते गए हैं। जोशी भड्डरी जाति का किसी भी दूसरी अन्य ब्राह्मण जाति से कोई रोटी- बेटी का सम्बन्ध नहीं होता। यह अपनी ही जोशी भड्डरी डाकोत जाति में शादी-विवाह करते हैं, इनके मुख्य रूप से 36 गौत्र प्रसिद्द हैं लेकिन और भी गौत्र प्रचलन में हैं, यह जाति ज्योतिष का पैतृक कार्य करती है। शनिवार को शनि का दान लेती है, मूल शांति कराती है, मृत्यु दान लेती है, होलिका को अग्नि देती है, दशहरा में यजमान के कान में जौं खोंसकर उन्नति का आशीर्वाद देते हैं , शगुन विचार एवं शनि महाराज के नाम पर भिक्षवृत्ति करती है।
उत्तरप्रदेश में इस जाति लोग अपने नाम के आगे मूलरूप से जोशी लिखते हैं, अब ज्यादातर लोग जोशी, शर्मा, पाण्डेय लिखते हैं। इस जाति के लोग अब तरह-तरह के ब्राह्मण वाले उपनाम लिखने लगे हैं, कायरण साफ है अंग्रेजों का क्रिमिलन एक्ट कानून इस जाति पर लागू था, बाद में इस जाति के लोगों को सामाजिक रूप से उपेक्षा मिलने लगी, इस कारण से अपनी इस उपेक्षा को छिपाने के लिए भड्डरी जोशी यानी भटरी ब्राह्मणों के उपनाम लगाने लगे अपनी जाति छिपाने लगे, इस कारण से  वे अपने मूल निवास स्थान से दूर जाने लगे।
पहाड़ी जोशी से अलग होते हैं भड्डरी जोशी यानी भटरी

यह जाति कुमायूँनी जोशी ब्राह्मणों से अलग जाति है, उनसे इस जाति का वैवाहिक संबंध नहीं होता है, इस जाति के लोग अपनी ही जाति जोशी भड्डरी में शादी ब्याह करते हैं
प्राचीन काल में खुद को भृगुवंश परम्परा में भद्दर ऋषि के वंशजो के रूप में जोशी भड्डरी ब्राह्मण के रूप में खुद को शामिल किए हुए अपने ज्योतिष सम्बन्धी पैतृक ज्ञान को आगे बढ़ाते चले रहें हैं लेकिन बाद अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेने अंग्रेजी हुकूमत ने इस जाति पर क्रिमिनल एक्ट लगा दिया जिस कारण से ये समाजिक रूप से ब्राह्मण जातियों से अलग थलग हो गए, इस तरह से जोशी भड्डरी जाति के साथ दलितों और वंचितों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। केवल ज्योतिष में उल्लेखित मूल शांति और कठिन ग्रह शनि राहु केतु की शान्ति, जिनको किसी भी अन्य ब्राह्मण द्वारा अपने ज्योतिष कार्य में शामिल नहीं किया जाता है उसे सिर्फ जोशी भड्डरी जाति के लिए छोड़ दिया जाता है, जिसे सामाजिक नजरों से निम्न श्रेणी का ज्योतिष काम जाता है।
उत्तर प्रदेश में हो रहा है विमुक्त जाति भड्डरी जोशी समाज के साथ भेदभाव

वर्तमान समय में उत्तरप्रदेश में भड्डरी जोशी यानी भटरी जाति सबसे गरीब, अशिक्षित और सामाजिक भेदभाव वाली जाति है। उत्तरप्रदेश के हर जिले में इस जाति के लोग रहते हैं। इस बात का प्रमाण है कि इस जाति के नाम से हर शहर में इनके खास मुहल्ले होते हैं, जिसे जोशी टोला या जोशियाना कहा जाता है। केवल मेरठ जिले में इन्हें पड़िया जोशी और इनके मुहल्ले को पड़ियान कहा जाता है, जोकि जोशी भड्डरी यानी भटरी का ही समानार्थी शब्द है। वहीं इटावा, मैनपुरी, एटा, जालौन, फरुखाबाद, अलीगढ़, बुलन्दशहर, मेरठ, बदायूं, पीलीभीत, बरेली, रायबरेली, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, फतेहपुर, झाँसी, बिजनौर आदि में इनकी आबादी हजारों में है।
उत्तरप्रदेश में जोशी भड्डरी जाति के 80 प्रतिशत लोग अशिक्षित, गरीब और बेरोजगार हैं। शनि का दान मांगकर, ज्योतिष कार्य करके, मेहनत मजदूरी, रिक्शा चलाकर और भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं।


जोशी भड्डरी जाति उत्तर प्रदेश में घुमंतु जाति के रूप में है दर्ज

जोशी भड्डरी जाति उत्तरप्रदेश में विमुक्त घुमन्तु जातियां - सूची में क्रमांक नं0 13 पर भडरी, भटरी नाम से जिला इलाहाबाद में दर्ज है। नेशनल कमिशन फार डिनोटिफाईड, नोमाडिक एंड सेमी- नोमाडिक ट्राइब्स,गाव. आफ इंडिया की सूची में उत्तरप्रदेश राज्य की सूची में नोमाडिक ट्राइब्स में भटरी नाम से दर्ज है। विदेशी विद्वान आर0 वी0 रसैल द्वारा लिखित पुस्तक दा ट्राइब्स एंड कास्ट आफ सेंट्रल प्राविन्स आफ इंडियावाल्यूम फस्ट (आफ 4)में भडरी, भड्डरी को जोशी का पर्याय बताया गया है। जोशी भड्डरी, भडरी एक समान जाति है।
जोशी भड्डरी जाति के लोगों को पिछड़ा वर्ग की केन्द्रीय सूची में डाकोत, पराडे नाम से शामिल किया गया है। 1 अप्रैल सन 1993 को नेशनल कमिशन फार वेकवर्ड क्लासेज ने जोशी भड्डरी, डकोचा, डकोता को पिछड़ी जाति माना है।
 हमें चाहिए अपना अधिकार, अपने जाति का सम्मान

जिला स्तर पर इन जातियों का पंजीकरण कराया जाये, इन्हें भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए और इनके बच्चों का स्कूलों में पंजीकरण भी कराया जाय। आयोग ने कहा कि इन जातियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का आॅकलन करने के लिए जिलावार इनकी आबादी का सर्वे कराने के लिए राष्ट्रीय आयोग प्रदेश में टीम भेजी जायेगी। उन्होंने बताया कि देश में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में इन जातियों के आर्थिक सामाजिक उत्थान के लिए काफी काम किया गया है। जबकि आयोग के निर्देशों का पालन कराने तथा कमीशन को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश की इन डी0एन0टी0 जातियों को लाभांवित करने तथा इनके कल्याण के लिए नीतियों का अध्ययन करने के लिए विभागीय अधिकारियों की टीम अन्य प्रदेशों में भी भेजी जायेगी। उन्होंने कहा कि टीम गठित कर शीघ्र ही इन जातियों का सर्वे कराया जायेगा तथा जिलाधिकारियों को इसकी जिम्मेदारी दी जायेगी। उत्तर प्रदेश में विमुक्त जातियों की पहचान कर कल्याणपुर (कानपुर), फजलगंज (मुरादाबाद) तथा साहबगंज (खीरी) में इनके लिए सेटलमेन्ट काॅलोनी बनायी गई है। इसके साथ ही विमुक्त जातियों के बच्चों के शैक्षिक उत्थान के लिए राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय भी संचालित हैं।

जाति छिपाकर रहने पर मजबूर है भड्डरी जोशी
अब कुछ पढ़े लिखे अपनी जाति के अधिकार को प्राप्त करने के लिए आगे आएं हैं, उत्तर प्रदेश के पिछड़ा आयोग में जाति को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कराने के लिए आरक्षण की मांग रखी हैं, जिस पर किसी आयोग या राजनैतिक दल, बुद्धिजीवीवर्ग की तरफ से कोई भी आश्वासन नही मिला है।
जब भी प्रदेश में जातिगत और आरक्षण या सामाजिक स्तर से जुड़ी विभिन्न जातियों की दशा और विकास के स्तर पर गौर किया जाता है तो उसमें जोशी भड्डरी जाति को शामिल नहीं किया जाता। कारण स्पष्ट है कि जोशी भड्डरी जाति इतनी हीन भावना की शिकार है कि वह खुद को भड्डरी संबोधन के कारण दलितों से भी निचले दर्जे का समझने लगते हैं, इसलिए खुलकर अपनी जाति के नाम जोशी भड्डरी को स्वीकार कर जाति छुपाकर रहने को मजबूर हैं।
दूसरा कारण कि अन्य ब्राह्मण जातियों के विद्वानों द्वारा जोशी भड्डरी जाति की उत्पत्ति पर अनेक मनगढ़ंत किवदन्तियां जोड़कर इनकी जाति के इतिहास को छिन्न भिन्न करने का भरसक प्रयास किया। डॉ रामनरेश त्रिपाठी जी द्वारा लिखित महाकवि घाघ भड्डरी नामक पुस्तक में जोशी भड्डरी जाति की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है, उनकी पुस्तक में इनके पिता को ब्राह्मण जाति का बताते हुए उनकी माता को गैर- ब्राह्मण, पिछड़ी और दलित जाति से बताकर इनमें हीन भावना भरने का बखूबी अंजाम दिया है।
तीसरा सबसे बड़ा कारण कि आज तक भारत देश और प्रदेश में बने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक रूप से पिछड़ी और दलित जातियों के विकास के लिए बनाए गए आयोगों ने जोशी भड्डरी जाति सर्वेक्षण के नाम सिर्फ राजनीति की। आजतक उत्तरप्रदेश में जोशी भड्डरी जाति का किसी भी आयोग ने कोई भी सर्वेक्षण भी नही किया।
भड्डरी जोशी महासभा लड़ रही है हक की लड़ाई
उत्तरप्रदेश में जोशी भड्डरी महासभा के नेतृत्व में जोशी भड्डरी जाति के पिछड़े वर्ग में आरक्षण की मांग विगत वर्षों से चल रही हैं। जागरुकता का अभाव और खुद की जाति के नाम से हीन भावना का शिकार लाखों की संख्या में गरीबी में जीवन यापन करने को मजबूर होते हुए भी अपने हक के लिए अपनी आवाज बुलंद नही कर पा रहे हैं। भारत देश में जातिगत आरक्षण में सम्मिलित जातियाँ भी आज भी हीन भावना की शिकार हैं, जिन्होंने समय समय पर अपने राजेनैतिक प्रभाव के चलते अपने जाति के मूल नामों में परिवर्तन कराया। क्योंकि उन्हें अपनी जाति के पढ़े-लिखे समाज और राजनेताओं का सहारा मिला। लेकिन जोशी भड्डरी जाति के साथ उनके समाज के पढ़े-लिखे तबके खुद की जाति को ही धोखा दिया यानी कभी अपने समाज को उसका अधिकार दिलवाने के लिए आगे आएं और ही उनके शैक्षिक, गरीबी और सामाजिक स्तरों में कोई विकास कर सकें। हां, अपना व्यक्तिगत विकास करके वे इस जाति को ही छोड़कर खुद को भृगुंवशी कहने लगे।
आज भी आप देखेगें कि विभिन्न राजनैतिक दलों में कुछ ऐसे नेता भी मिल जायेगें जो ब्राह्मण बोधक सरनेम जोशी, शर्मा, पाण्डेय इत्यादि लगाकर खुद को ब्राह्मणों की श्रेणी में शामिल करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वह ब्राह्मणों जातियों के किसी भी सम्मेलन या बैठक में आमंत्रित ही नहीं किये जाते हैं क्योंकि वे उपेक्षित भड्डरी समाज से आते हैं, अपनी जाति छिपाने के बावजूद भी ये उपेक्षित ही रहते हैं।


गरीब जाति और सामाजिक भेदभाव और अशिक्षा का दंश झेल रहे इस समाज पर कभी कोई राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी वर्ग या सामाजिक संस्था ध्यान नही देती हैं जो जाति आज भी समाज की मुख्यधारा से वंचित हैं, इनका हर जगह मजाक बनाया जाता है।


सुमित कुमार जोशी
जाति- जोशी भड्डरी
अध्यक्ष
जोशी भड्डरी महासभा
जसवंत नगर जिला इटावा
उत्तरप्रदेश
मो--9045547099