मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

लोकसभा चुनाव: बदलनी होगी भाजपा को रणनीति

अभिषेक कांत पाण्डेय

पांच राज्यों के चुनाव के बाद भाजपा के खेमें में मंथन का दौर चल रहा है तो वहीं कांग्रेस इस जीत के प्रति बहुत उत्साहित है। कांग्रेस की यह विजय संजीवनीवटी की तरह काम करेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की स्थिति मजबूत होगी। इन सब बदलते समीकरण से निस्संदेह इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को अपनी रणनीति पर ध्यान देना होगा क्योंकि जनता ने जिस तरह से पांच राज्यों में बदलाव के संकेत दिए है, इससे साबित हो गया की चुनाव विकास के मुद्दे पर ही कोई दल जीत सकता है। मैं मै और तू तू की राजनीति से जनता उब चुकी है। राजनैतिक दल के दोयम दर्जे की सोच रखनेवाले नेताओं को कोई भी राजनैतिक दल अगर ढोती है तो उसे वोटबैंक को गंवाना पड़ सकता है। राजस्थान में वसुंधरा के खिलाफ जबरजस्त आक्रोश को अगर भाजपा समय रहते पहचान लेती और इस चेहरे को हटा देती तो भाजपा को इतना बड़ा नुकसान नहीं होता।
बहरहाल राजनीति में संभावनाएं हैं लेकिन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ने बात दिया कि पुराने पैटर्न पर चलनेवाले दो प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा और कांग्रेस को विकल्प के तौर पर ही देख रही है, अगर जनता के सामने कोई तीसरा विकल्प हो तो जनता इन बड़े दलों की राजनीति को नकार देगी। यह गौर करनेवाली बात है कि सपा और बसपा जैसी पर्टियों ने अपनी एकतरफा सोच को ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में ही लगाया, जिसके कारण इन्हें यहां पर सरकार बनाने का मौका मिला और अपनी ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण कभी भी तीसरा विकल्प नहीं बन पायी।
तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें आने से आनेवाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को फायदा मिल सकता है। यह बात अटपटी लगे लेकिन यह सत्य हो सकता है, भाजपा अगर इन राज्यों में सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाए और चुनाव में किये गए कांग्रेस के वादे को पूरा करने के लिए राजनीतिक दबाव बनाए तो इस तरह विपक्ष की भूमिका में भाजपा की यह पहल राजनीति बहसों को जन्म देगी, जिससे जनता नये तरीके से सोचेगी। यह साफ है कि जनता ने इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसलिए चुनाव है कि उन्हें बेरोजगारी, किसानों की समस्या और बुनियादी सुविधाएं हासिल हो सके। जाहिर है इस समय एक अच्छे विपक्ष की भूमिका की आवश्यकता इन राज्यों में है जो लोकसभा चुनाव में भाजपा की छवि को सही दिशा दे सकता है। याद रखिए राज्यों का चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है लेकिन लोकसभा चुनाव में मुद्दे बदल जाते हैं इसलिए भाजपा को अपने मेन्यूफेस्टों के वादों को पूरा करना चाहिए ताकी लोकसभा के चुनाव में भाजपा अपनी बात रख सके।

जनता ने बदल दी राजनीति दलों की सोच

लोकतंत्र भीड़ नहीं, जनता अपनी ताकत का एहसास चुनाव के वक्त दिखा देती है। भारत की जनता ने 2014 के चुनाव के बाद लगातार मोदी सरकार की कामों का निरीक्षण कर रह रही है। 2014 का चुनाव लुभावने वादों का चुनाव था। मुद्दे जो अब तक नहीं पूरी हुए उन पर सवाल उठाना और जाति, धर्म और आरक्षण के मुद्दों के सहारे वैतरणी पार करने का स्वप्न देख रहें भाजपा के रणनीतिकार पांच राज्यों के चुनाव परिणाम देखकर हतप्रद हैं। सोशल मीडिया पर तरह—तरह के तर्कों से लैस बीजेपी आईटी—सेल आत्मघाती साबित हो रहा है। जनता आज भी विकास को जमीन पर देखना चाहती है। मेन्यूफेस्टों पर काले अक्षर से लिखे वादों को पांच साल में करने के इरादा और परिणाम देखकर ही वर्तमान सत्तापक्ष यानी बीजेपी को वोट देगी। जाहिर है कि भाजपा के रणनीतिकारों को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी क्योंकि उनके विकास के मुद्दे ही इस चुनाव में वोटों में बदल सकती है। अभी छह महीने फैसेले लेने का वक्त गुडगवर्नेंस हकीकत में दिखना चाहए। समान नागरिकता कानून, धारा 370, पुरानी पेंशन की बहाली, शिक्षा व स्वास्थ्य में जमीनी बदलाव की जरूरत है। इस बार विकास की गंगा की बात हो, तू—तू, मैं—मैं की राजनीति से इतर विकास के मुद्दे और किए कामों को जनता के सामने भाजपा को रखना होगा, तभी जीत की ओर भाजपा बढ़ सकती है।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

कविता क्या होती है

कविता क्या होती है
मुख्यधारा की कविता के अलावा बची खुची खुरचन कविताएं  भी हैं,  जो साहित्य का हिस्सा हो सकती है पर आलोचक की नजर नहीें पडती है, यही है पीडि़त,  छटपटाती, बाहर से जर्जर लेकिन अंदर से मजबूत कविताएं, उनकी या उनके लिए जो मजबूर है,  पिछड़ा है , बिछडा है,  असुर है, असुरक्षित है ।
कविता तो एडिशन के उस बल्ब के अविष्कार की तरह है, जो 1000 प्रयोगों के बाद सफल हुआ।
मन से मन और संवेदना के जन्म के बीच शब्दों की सूची मैं बैठी कई अनगिनत कविताएं जन्म लेती है और खत्म होती जाती है। हजार जन्म-मरण के पश्चात;  कविता कालजयी एडिशन रोशनी वाले बल्ब की तरह जन्म लेती है।
कविता के एक-एक शब्द का वजन और उसका प्रभाव सोच समझ के रखा जाता है या दिल से उतनी ही वजन के शब्दों में लिखी कविता का जन्म होता है।
 लिखने का तरीका आपका लेकिन बयानबाजी, नारा, विज्ञापन कविता नहीं होती है।


करोड़ों दिलों में से कुछ शब्दों में बंधी कविता उन संवेदनशील कवियों के हृदय से निकलती है जो संसार को बिना राग द्वेष से देखते हैं। यही कविता है। बयानबाजी, भड़ास, नारा और उलझी कविता-स्वयं से न्याय नहीं कर पाती; ऐसी कविता किसी विचारधारा के लेखक के द्वारा लिखी जाए, उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए, चाहे वह कम्युनिस्ट विचारधारा का हो या कांग्रेसी विचारधारा का या राष्ट्रवादी विचारधारा का। कविता स्वतंत्र है, जनतंत्र है।
कविता प्रस्तुति कथ्य संवेदना शब्दों के चयन आदि की दृष्टि से अचूक होती है और नई संभावनाएं नए बिंब व प्रतीकों से युक्त होती है, इसलिए वहीं कविता लंबे समय तक जीवित रहती है  जो इन बातों पर, जो इन तथ्यों पर खरा उतरे।
 आप अपनी कविता को लंबा जीवन दें,  लिखने से पहले सौ बार सोचे, सौ बार शब्दों को देखें और दूसरे की कविता पाठक की तरह पढें।
तब आपको खुद ही नयी कविता लिखने के लिए नया संघर्ष करना पड़ेगा और इस संघर्ष के बाद जो कविता जन्म लेगी, वह कालजयी कविता होगी।kavitakeyahi


रविवार, 9 सितंबर 2018

अब मैं कहूं

            अब मैं कहूं
?

कुछ भी कहूं न अब क्यों?
पीडा मन में लिए रिसता  रहूं पहाडों से,
तब भी कुछ नहीं कहूँ।

जब तडपता रहूं
रेत में तपता रहूं
तो क्यों न कहूं?

जिस संसार में तुम हो
उसका मैं हिस्सा हूं।
आंखों में मैं आंसू बनूं
और तुम हंसते रहो
तब भी मैं कुछ न कहूं।

दुनिया न जान ले तब,
क्या ये मर्यादा मैं ही ढोऊं
आखिर कब तक न कहूं।

परछाई सी होती  जिंदगी
जिंदगी को क्यों ढोऊं?
आखिर कब तक यूं,
उडता रहे मजाक।
अब मैं कहूं?

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

अभिषेक कांत पाण्डेय

प्लाट

कविता
प्लाट

कुछ दिन बाद यहां
 बन जाएंगे मकान-दुकान
फिर बिकेगा ईमान
जब होगी बरसात
तो गंगा खोजेगी अपनी जगह
नहीं मिलेगा उसका वह जमीन
 क्योंकि उस पर बन चुके होंगे मकान
आखिर थक हार कर वह बहेगी
शहरों-नालो से होकर
दुकानों, मकानों में
फिर कोसा जाएगा
प्रकृति को
दिया जाएगा नाम
बाढ़ बाढ़ बाढ़ बाढ़़।

अभिषेक कांत पांडेय

बुधवार, 5 सितंबर 2018

समानांतर हिंदी कविता-श्रीरंग

सन 80 के बाद की दलित आदिवासी एवं स्त्री कविता के विशेष संदर्भ में श्रीरंग की ताजा आलोचना पुस्तक समानांतर हिंदी कविता, वास्तव में 80 के बाद की वास्तविक कविता की प्रकृति को प्रकट करती है एक आलोचक के तौर पर श्रीरंग कि यह आलोचनात्मक दृष्टि बिल्कुल पैन है क्योंकि जिस तरह एक समय आधुनिकता के प्रत्यय को साहित्य के क्षेत्र में इतना ज्यादा खींचा गया था कि उसकी व्याप्ति की सीमा का प्रश्न उठाया जाना जरूरी हो गया था। उसी तरह बाद में समकालीनता की परिधि को कितना बढ़ाया जाए यह सवाल आलोचकों के लिए एक समस्या बन कर उपस्थित हो गया अर्थात जिस तरह आधुनिकता की परिधि में बहुत दूर तक रचनात्मक प्रयासों को समेटना संदिग्ध हो उठा। उसी तरह समकालीनता के दायरे में भी नई काव्य प्रवृतियों को रेखांकित करना एक  घिरी पाटी बात हो गई। दलितों और आदिवासियों स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त रूप में होने लगी कि उन्हें केवल समकालीन प्रवृत्ति के नाम पर चिन्हित कर पाना संभव नहीं रह गया।
 श्रीरंग की आलोचना का दायरा इन कविताओं के परिपेक्ष में समकालीन कविताओं से किस तरह से और कैसे अपना नया मुकाम बना रही है यह समझना और समझाना वास्तव में एक दुष्कर कार्य है। पहली नजर में साहित्य इसे खारिज कर सकती है लेकिन नूतन दृष्टि रखने वाले श्रीरंग ने आदिवासी स्त्री पर लिखी गई कविता पर अपनी दृष्टि को एक फलक में प्रस्तुत किया है। यह आलोचना पुस्तक वास्तव में साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने वाली है।

शिक्षा के साथ खिलवाड़

 असल जड़ क्या है यह अखबार में गायब है।आरटीई एक्ट का पालन सरकार स्वयं ही नहीं कर पा रही है।योग्य शिक्षकों का अभाव है क्योंकि शिक्षक पात्रता परीक्षा में तकरीबन  सत्तर प्रतिशत शिक्षक फेल हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य का उदाहरण ले तो यहां पर पिछले 10 साल से सरकारी शिक्षा को वोट बैंक की डोरी सेनापा  गया है।
जो बुनियादी जरूरतें हैं, वह सरकारी स्कूल में नहीं है। देखा जाए तो मीडिया से लेकर अभिभावकों में सरकारी स्कूल के प्रति कोई जागरूकता नहीं है।
 केवल 2 परसेंट प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी शिक्षा मिलती है। उसके अलावा छलावा वाली शिक्षा है क्योंकि अध्यापन के क्षेत्र में प्रतिभाएं जाती नहीं है। यहां आकर्षक वेतनमान नहीं है। गौर करें,  अधिकतर दोयम दर्जे के ही अध्यापक इन सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में है, क्योंकि प्रशिक्षित शिक्षकों की बहुत बड़ी कमी है और जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया है, वह प्रशिक्षण विधि मानक के अनुसार खरा नहीं है। यानी कि  शिक्षा के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है। मीडिया भी प्राइवेट स्कूल को तवज्जो देती है क्योंकि उसके विज्ञापन उनके अखबारों में छपता है इसलिए उनकी खबरों को कई मीडिया हाउस बढ़ा चढ़ाकर दिखाती हैं।वही सरकारी स्कूल में प्रयास से यदि कहीं अच्छी शिक्षा मिलती है तो उन खबरों को इतना स्पेस ही नहीं मिलता है कि उत्साहवर्धन हो। नकरात्मक खबरें उन सरकारी शिक्षकों का मनोबल तोड़ देता है जोकि अपने काबिलियत के बल पर स्कूल को ज्ञान का मंदिर बना रहे हैं।असल में इस क्षेत्र में पढ़ने व पढ़ाने को लेकर प्रतिभाएं नहीं आ रही हैं।
शिक्षण को जबरदस्ती का प्रोफेशन भी कहा जाता है, कैसे? समझ लीजिए, जब शिक्षण-प्रशिक्षण की डिग्रियां बेची जाती हैं तब शिक्षक बनने के खरीददार फर्जी डिग्री के साथ शिक्षक बनते हैं। तो सोचिए!  कैसे  मिल सकता है सरकारी और प्राइवेट स्कूल में अच्छी शिक्षा।

अभिषेक कांत पांडेय

रविवार, 13 मई 2018

मां


(कविता मेें मां और मैं।)

कोख से जन्म लेते ही
ब्रह्मांड भी हमारे लिए  जन्म ले चुका होता है
जिंदगी का यह पहला चरण
मां की  सीख के साथ बढता चलता
लगातार अपडेट होते हम
मां की ममता
थाली में रखा खाना
हमारी हर ग्रास में मां प्रसन्न होती
हम अब समझ गये
मां जन्म देती है
धरती खाना देती है
मां का अर्थ पूर्ण है,
हमें जीवन देती
और सिखाती है जीना।
हर मां वादा करती है कुदरत से
हर बच्चे में माएं भरती जीवनराग
लोरी की सरल भाषा में।

तोतली बातें समझनेवाली भाषा वैज्ञानिक मां
मां मेरी डाक्टर भी
मां मेरे लिए ईश्वर भी,
मां सिखाती सच बोलना।
आटे की लोई से लू लू, चिडिया बनाना
चिडचिडाता जब मैं, मां बन जाती बुद्ध
समझ का ज्ञान देती।
नानी  की घर की और
जानेवाली ट्रेन में बैठे ऊब चुके होते हम
शिक्षक बन समझा देती रोचक बातें
कैसे चलती ट्रेन, कैसे उड़ान भरता हवाई जहाज।

अब मेरी मां
नानी भी है दादी भी
बच्चे बोलते अम्मा
तब अपने बच्चों में मुझे अपना बचपन नजर आता।
सच में मां ही है
मां के हाथों का खाना आज भी  लगता है
दिव्य भोजन
इंद्र का रसोईया
नहीें बना पाता होगा
मां से अच्छा भोजन।
मां तुम्हारी वजह से ब्रह्मांड को जाना
इस दुनिया के  इस समय का साक्षी बना हूं,
मेरे पास मां है।

अभिषेक कांत पाण्डेय

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