मंगलवार, 18 सितंबर 2018

कविता क्या होती है

कविता क्या होती है
मुख्यधारा की कविता के अलावा बची खुची खुरचन कविताएं  भी हैं,  जो साहित्य का हिस्सा हो सकती है पर आलोचक की नजर नहीें पडती है, यही है पीडि़त,  छटपटाती, बाहर से जर्जर लेकिन अंदर से मजबूत कविताएं, उनकी या उनके लिए जो मजबूर है,  पिछड़ा है , बिछडा है,  असुर है, असुरक्षित है ।
कविता तो एडिशन के उस बल्ब के अविष्कार की तरह है, जो 1000 प्रयोगों के बाद सफल हुआ।
मन से मन और संवेदना के जन्म के बीच शब्दों की सूची मैं बैठी कई अनगिनत कविताएं जन्म लेती है और खत्म होती जाती है। हजार जन्म-मरण के पश्चात;  कविता कालजयी एडिशन रोशनी वाले बल्ब की तरह जन्म लेती है।
कविता के एक-एक शब्द का वजन और उसका प्रभाव सोच समझ के रखा जाता है या दिल से उतनी ही वजन के शब्दों में लिखी कविता का जन्म होता है।
 लिखने का तरीका आपका लेकिन बयानबाजी, नारा, विज्ञापन कविता नहीं होती है।


करोड़ों दिलों में से कुछ शब्दों में बंधी कविता उन संवेदनशील कवियों के हृदय से निकलती है जो संसार को बिना राग द्वेष से देखते हैं। यही कविता है। बयानबाजी, भड़ास, नारा और उलझी कविता-स्वयं से न्याय नहीं कर पाती; ऐसी कविता किसी विचारधारा के लेखक के द्वारा लिखी जाए, उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए, चाहे वह कम्युनिस्ट विचारधारा का हो या कांग्रेसी विचारधारा का या राष्ट्रवादी विचारधारा का। कविता स्वतंत्र है, जनतंत्र है।
कविता प्रस्तुति कथ्य संवेदना शब्दों के चयन आदि की दृष्टि से अचूक होती है और नई संभावनाएं नए बिंब व प्रतीकों से युक्त होती है, इसलिए वहीं कविता लंबे समय तक जीवित रहती है  जो इन बातों पर, जो इन तथ्यों पर खरा उतरे।
 आप अपनी कविता को लंबा जीवन दें,  लिखने से पहले सौ बार सोचे, सौ बार शब्दों को देखें और दूसरे की कविता पाठक की तरह पढें।
तब आपको खुद ही नयी कविता लिखने के लिए नया संघर्ष करना पड़ेगा और इस संघर्ष के बाद जो कविता जन्म लेगी, वह कालजयी कविता होगी।kavitakeyahi


रविवार, 9 सितंबर 2018

अब मैं कहूं

            अब मैं कहूं
?

कुछ भी कहूं न अब क्यों?
पीडा मन में लिए रिसता  रहूं पहाडों से,
तब भी कुछ नहीं कहूँ।

जब तडपता रहूं
रेत में तपता रहूं
तो क्यों न कहूं?

जिस संसार में तुम हो
उसका मैं हिस्सा हूं।
आंखों में मैं आंसू बनूं
और तुम हंसते रहो
तब भी मैं कुछ न कहूं।

दुनिया न जान ले तब,
क्या ये मर्यादा मैं ही ढोऊं
आखिर कब तक न कहूं।

परछाई सी होती  जिंदगी
जिंदगी को क्यों ढोऊं?
आखिर कब तक यूं,
उडता रहे मजाक।
अब मैं कहूं?

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

अभिषेक कांत पाण्डेय

प्लाट

कविता
प्लाट

कुछ दिन बाद यहां
 बन जाएंगे मकान-दुकान
फिर बिकेगा ईमान
जब होगी बरसात
तो गंगा खोजेगी अपनी जगह
नहीं मिलेगा उसका वह जमीन
 क्योंकि उस पर बन चुके होंगे मकान
आखिर थक हार कर वह बहेगी
शहरों-नालो से होकर
दुकानों, मकानों में
फिर कोसा जाएगा
प्रकृति को
दिया जाएगा नाम
बाढ़ बाढ़ बाढ़ बाढ़़।

अभिषेक कांत पांडेय

बुधवार, 5 सितंबर 2018

समानांतर हिंदी कविता-श्रीरंग

सन 80 के बाद की दलित आदिवासी एवं स्त्री कविता के विशेष संदर्भ में श्रीरंग की ताजा आलोचना पुस्तक समानांतर हिंदी कविता, वास्तव में 80 के बाद की वास्तविक कविता की प्रकृति को प्रकट करती है एक आलोचक के तौर पर श्रीरंग कि यह आलोचनात्मक दृष्टि बिल्कुल पैन है क्योंकि जिस तरह एक समय आधुनिकता के प्रत्यय को साहित्य के क्षेत्र में इतना ज्यादा खींचा गया था कि उसकी व्याप्ति की सीमा का प्रश्न उठाया जाना जरूरी हो गया था। उसी तरह बाद में समकालीनता की परिधि को कितना बढ़ाया जाए यह सवाल आलोचकों के लिए एक समस्या बन कर उपस्थित हो गया अर्थात जिस तरह आधुनिकता की परिधि में बहुत दूर तक रचनात्मक प्रयासों को समेटना संदिग्ध हो उठा। उसी तरह समकालीनता के दायरे में भी नई काव्य प्रवृतियों को रेखांकित करना एक  घिरी पाटी बात हो गई। दलितों और आदिवासियों स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त रूप में होने लगी कि उन्हें केवल समकालीन प्रवृत्ति के नाम पर चिन्हित कर पाना संभव नहीं रह गया।
 श्रीरंग की आलोचना का दायरा इन कविताओं के परिपेक्ष में समकालीन कविताओं से किस तरह से और कैसे अपना नया मुकाम बना रही है यह समझना और समझाना वास्तव में एक दुष्कर कार्य है। पहली नजर में साहित्य इसे खारिज कर सकती है लेकिन नूतन दृष्टि रखने वाले श्रीरंग ने आदिवासी स्त्री पर लिखी गई कविता पर अपनी दृष्टि को एक फलक में प्रस्तुत किया है। यह आलोचना पुस्तक वास्तव में साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने वाली है।

शिक्षा के साथ खिलवाड़

 असल जड़ क्या है यह अखबार में गायब है।आरटीई एक्ट का पालन सरकार स्वयं ही नहीं कर पा रही है।योग्य शिक्षकों का अभाव है क्योंकि शिक्षक पात्रता परीक्षा में तकरीबन  सत्तर प्रतिशत शिक्षक फेल हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य का उदाहरण ले तो यहां पर पिछले 10 साल से सरकारी शिक्षा को वोट बैंक की डोरी सेनापा  गया है।
जो बुनियादी जरूरतें हैं, वह सरकारी स्कूल में नहीं है। देखा जाए तो मीडिया से लेकर अभिभावकों में सरकारी स्कूल के प्रति कोई जागरूकता नहीं है।
 केवल 2 परसेंट प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी शिक्षा मिलती है। उसके अलावा छलावा वाली शिक्षा है क्योंकि अध्यापन के क्षेत्र में प्रतिभाएं जाती नहीं है। यहां आकर्षक वेतनमान नहीं है। गौर करें,  अधिकतर दोयम दर्जे के ही अध्यापक इन सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में है, क्योंकि प्रशिक्षित शिक्षकों की बहुत बड़ी कमी है और जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया है, वह प्रशिक्षण विधि मानक के अनुसार खरा नहीं है। यानी कि  शिक्षा के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है। मीडिया भी प्राइवेट स्कूल को तवज्जो देती है क्योंकि उसके विज्ञापन उनके अखबारों में छपता है इसलिए उनकी खबरों को कई मीडिया हाउस बढ़ा चढ़ाकर दिखाती हैं।वही सरकारी स्कूल में प्रयास से यदि कहीं अच्छी शिक्षा मिलती है तो उन खबरों को इतना स्पेस ही नहीं मिलता है कि उत्साहवर्धन हो। नकरात्मक खबरें उन सरकारी शिक्षकों का मनोबल तोड़ देता है जोकि अपने काबिलियत के बल पर स्कूल को ज्ञान का मंदिर बना रहे हैं।असल में इस क्षेत्र में पढ़ने व पढ़ाने को लेकर प्रतिभाएं नहीं आ रही हैं।
शिक्षण को जबरदस्ती का प्रोफेशन भी कहा जाता है, कैसे? समझ लीजिए, जब शिक्षण-प्रशिक्षण की डिग्रियां बेची जाती हैं तब शिक्षक बनने के खरीददार फर्जी डिग्री के साथ शिक्षक बनते हैं। तो सोचिए!  कैसे  मिल सकता है सरकारी और प्राइवेट स्कूल में अच्छी शिक्षा।

अभिषेक कांत पांडेय

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