कविता













छतों पर हम


हम बिजली चले जाने पर
रात चांद के तले बिताते हैं
क्रंक्रीट की छत पर
बैठ हम प्रकृति को कोसते हैं
हवाओं से मिन्नते करते
शहरों की छतों पर 
तपती गरमी में नई सभ्यता रचते
दौड़ जाती हमारी आवेशों में बिजली
गुफाओं के मानव 
आग की खोज में इतरा रहा था
एडिसन एक बल्ब में इतना परेशान रहा
हम उस बिजली के लिए शहरों में 
तपते छतों में। 

हवाओं के बहने और पानी के बरसने में
हमने रूकावटे खड़ी कर दी
क्रंक्रीट की छतों और छज्जों में
कोसते हम प्रकृति को
और चांद देखता छतों पर
अपनी ओर बढते इंसानी कदमों पर
रोकने की सोच में डूबा
हम अपनी छतों पर सोचते
चांद पर क्या होगा?
मन में बिजली-सी कौंध जाती 
छतों पर गरमी में तपते हम।

रूटीन 
पेड़ों पर टांग दिये गये आइनें
बर्बरता की ओट में
तय नफा नुकसान के पैमाने 
नापती सरकारें।
चीर प्रचीर सन्नाटा
तय है मरना
जिंदगियों के साथ।
सभ्य सभ्यता के साथ
हाथ पे हाथ रख मौन
वक्त।
पेड़ों पर बर्बता 
लोकतंत्र झूलता
पंक्षी भी आवाक
नहीं सुस्ताना पेड़ों पर
संसद में चूं चूं
रूटीन क्या है
आंसुओं का सैलाब बनना
या उससे नमक बनाना
ताने बाने में मकड़जाल
कांपती जीती आधी आबादी
दर्द मध्यकाल का नहीं
आधुनिकता की चादर ओढ़े
मुंह छुपाए
रूटीन शब्द की हुंकार लिए
ये सरकारें
रूटीन
ये लालफीताशाही
रूटीन
लटकती फीतों वाली रस्सियां
पेड़ों से,
रूटीन
हम और आप।
तैयार हमें होना
रूटीन रूटीन सोच के खिलाफ।


फादर डे 

मैं जब भी देखता तो
उसके पिताजी बड़े दिखते
और मेरे पिताजी छोटे।
पिताजी ने हमें नाम दिया
और उनके पिताजी ने उन्हें काम दिया।
वे वंशों वाले पिताजी हैं अपने बेटों के।
हमारे पिताजी  मेहनतक हैं।
मोमबत्ती में पढ़े हम
हमारे पिताजी ने हमें इंसान बनाया
और उनके पिताजी ने उन्हें ताज पहनाया।
चुनाव जीतवाया।
हम हमारे पिताजी से कहते कि
हमें कितना परिश्रम करना हैए
हमारे पिताजी कहते तुम तुम हो
सबसे अलग हो 
तुम ही बदल सकते हो दुनिया।
मेरी बात समझ में है
मेरे पिताजी ठीक कहते हैं
उनके पिताजी उनके लिए चांदी के चम्मच बने
फिर भी मैं सोचता वंषों की बैषाखी पर 
उनके पिता ने अपने अपने बेटों को बिठाया
ऐसे अनगित हजारों पिता और बेटों ने अपनी डाल चुनली।
मेरे पिताजी  इंतजार कर रहे
माली की तरहए
बेटा. वृक्ष बनेगा लेकिन
वंषों वाले बेटाओं से लड़ रहा बेटा 
उनके पिताओं से और उनके बेटों से
जिन्होंने लोकतंत्र को ढाल बनाया
मैं और मेरे पिताए हम 
एक नई खोज में एक नई सभ्यता विचारों मेंए
चिंगारी पैदा कर रहे 
तैर रहे कल्पनाओं में।

जूठे  मन

कुछ हिस्सा जीवन
बदरंग आदमी
सोच
कृत्य
राजधानी
लगातार बार बार
जंगल में तब्दील
सड़क से संसद।

गलत गलत
चश्मे वाली आखों से
देसी वादे
उतरे नहीं
हजम सब
खत्म खेल।
पुराने मन में
नयापन
नहीं नहीं
भ्रम समझ
वही राजधानी
जंगल
सड़क से संसद
चेहरे मोहरे
बदरंग आदमी
बहुरे छतए
हतप्रभ
बुझा मन
वहीं चश्मे वाली नंगी ऑंखें
लुटेरा
सीधा.साधा
करोडों खाली पेट
तैरती दुगनी आंखे
उठाते इतने सिर।
कहीं अरबों की डकार
बडा  थैला
असरदार मुखिया
टाले  नहीं
हजारो घोटाले।

बदलना जारी  

बदलना जारी
मोबाइल रिंगटोन आदमी
धरती मौसम
आकाशए सरकारी स्कूल
कुआँ उसका कम होता पानी
चैपाल
फैसला
रिश्ते
इंजेक्शन वाली लौकी और दूध
गरीबी गरीब
आस्था प्रसाद
प्रवचन भाषण
नेता अनेता
पत्थर गाँव का ढेला
ओरतें  कामयाबी
साथी एकतरफा प्यार
भीड़ हिंसक चेहरा
सूरज थकता नहीं
चूसता खून
बंजर मन
अवसाद मन
मधुमेह रक्तचाप
प्रकृति प्रेम कापी पन्नों  किताबों में
स्रजन दूर
नीली धरती नील आर्मस्ट्राम की
रिंगटोन मोबाइल आदमी
बदलता समाज  पार्यावरण

यूनिवर्सिटी की डिग्री  

यहीं से सीखा पाया
समाज में उतरने के लिए
फैलाना था पंख
लौट के आने वाली उड़ान
भरी थी मैंने यूनिवर्सिटी की दीवारों में।
दस साल बाद
यूनिवर्सिटी की सीलन भरी दीवार
सब कुछ बयान कर रही 
नहीं ठीक 
सूखे फव्वारे अब किसी को नहीं सुख देते
सलाखों में तब्दील यूनिवर्सिटी।
समय बदल गया
पर मेरी डिग्री वही
याद वहीं 
इमारतों के घोसले भी गायब
पंख नहीं मार सकती चिड़िया
अजादी पैरों में नहीं
विचारों में पैदा नहीं होने दी गई।
विचरने वाले पैसों में ज्ञान को बदल रहें
दस साल का हिसाब मुझसे मांग रहा
यूनिवर्सिटी की इमारतें।
बयान कर रहा है जैसे नहीं बदला
बता रही बदल गए तुम।
मैंने कहा डिग्री सीढ़ा गई
सीलन भरी दीवार में अटकी 
फांक रही है धूले
मैंने सीख लिया है 
नया ताना बाना,
यूनिवर्सिटी सीखने को नहीं 
नहीं बदलने को तैयार
मैंन भी निकाल ली अखबार की कतरने 
दिखा दिया बेरोजगार डिग्री 
गिना दिया दफन हो गई डिग्रियों के नाम 
कल आज में,
बिना डिग्री वाला नाम 
तुझ पर इतिहास बनाएगा 
तुझे नचाएगा
डिग्री वाले ताली बजाएंगे
एक अदद नौकरी के लिए। 
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यथार्थ
वह दीवारों से निकल गई
विचारों से लड़ रही
सही मायने में
मकानों को घरों में तब्दील कर रही
यर्थाथ है उसका जीवन
चूल्हों पर लिपी आंसू नहीं
उर्जा है अणु परमाणु की
आसमान में बादलों की नीर नहीं
केंद्र बिंदु है
समाज की नजरें
लटकती लाष
उस हुक्मरान के खिलाफ
उसके दो टूक खामोषी
उन हिंसक मादक चेहरों के खिलाफ
चेतावनी 
प्रकृति के आंचल में
बैठी उस नारी में
लज्जा की शीतलता है
वात्सल्यता की रोषनी समेटे
हर एक सवाल पुरूष के खिलाफ
पूछ उठती है
सभ्यता के इस मोड़ पर
उसकी आंखे पूछती एक सवाल
हम है इस दुनिया के आधे के हकदार?
_______________ 

हम पिंजड़ों में

हम सब ने एक नेता चुन लिया
उसने कहा उड़ चलो
ये बहेलिया की चाल है
ये जाल लेकर एकता शक्ति है।
हम सब चल दिये नेता के साथ
नई आजादी की तरफ 
हम उड़ रहे जाल के साथ
आजादी और नेता दोनों पर विश्वास
हमें पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास 
अब तक बहेलिया दिखा नहीं 
अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया
एक अजीब आवाज,
कई बहेलिये सामने खड़े थे
नेता उड़ने के लिए तैयार 
बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट
एक सहमति थी ।
हम एक कुटिल चाल के शिकार 
नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था
बहेलिया एक कुशल शिकारी निकला
सारे के सारे कबूतर पिंजड़े में,
हम सब अकेले।
इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किस्मत लिए
किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक
फिर कोई नेता और बहेलिया हमें
पहुंचा देगा पिंजड़ों में।
                 
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पश्चिम में डूबा सूरज दो दिन बाद भी नहीं लौटा
 परेशान पूरब के लोग
अभी अभी एक खबर जारी हुई
सूरज को पेटेंट करा लिया
 अब वह  नहीं लौटेगा।

सभी कविताएं अभिषेक कांत पाण्डेय
बिना अनुमति के कहीं प्रकाशित न करें, कापी राइट एक्ट ।

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