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मे उनमे इनमे मै मे bindu (अनुस्वार) या chandrabindu (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता

  Me, mai, inme, uname, Bindu ya chandrabindu kyon nahin lagta hai | मे उनमे इनमे मै मे बिन्दु (अनुस्वार))  या चन्द्रबिन्दु (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता है। मे, मै मे चन्द्रबिंदु या बिंदु लगेगा? Hindi mein chandrabindu kab lagana chahie kab nahin? Hindi spelling mistake किसी भी शब्द के पंचमाक्षर पर कोई भी बिन्दी अथवा चन्द्रबिन्दी (Hindi Chandra bindi kya hai) नहीं लगती है। इसका कारण क्या है आइए विस्तार से हम आपको बताएं। क्योंकि ये दोनो अनुनासिक और अनुस्वार उनमे निहित हैं। हिंदी भाषा वैज्ञानिक भाषा है। इसके विज्ञान शास्त्र को देखा जाए तो जो पंचमाक्षर होता है उसमें किसी भी तरह का चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगता है क्योंकि उसमें पहले से ही उसकी ध्वनि होती है। पांचवा अक्षर वाले शब्द पर चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगाया जाता है। जैसे उनमे, इनमे, मै, मे कुछ शब्द है जिनमें चंद्र बिंदु बिंदु के रूप में लगाया जाता है लेकिन म पंचमाक्षर है।  Hindi main panchma Akshar kise kahate Hain? प फ ब भ म 'म' पंचमाक्षर pancman Akshar है यानी पांचवा अक्षर है। यहां अनुनासिक और अनुस्वार नहीं लगेगा। क्यो...

नोटा nota, क्या सुधार की तरफ कदम | chunav me nota

अभिषेक कांत पांडेय (स्वतंत्र टिप्पणीकार) जिस संसदीय क्षेत्र में नोटा यदि विजयी हो जाए तो चुनाव आयोग को उस संसदीय क्षेत्र में लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवारों की उम्मीदवारी आजीवन प्रतिबंधित कर देना चाहिए। इससे यह साबित होगा कि नोटा दबाने वालों ने उन प्रत्येक उम्मीदवारों को पसंद ही नहीं किया, जो चुनाव में सम्मिलित हुए थे।  उम्मीदवार के रूप में अगर नोटा को इतनी शक्ति प्रदान कर दी जाए तो 100% मतदान भी हो सकता है।  इसका परिणाम यह होगा कि चुनाव में प्रत्येक पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए बाध्य होगी, जो व्यक्तित्व में उत्कृष्ट होने के साथ ही साथ पढ़े लिखे एवं किसी भी आपराधिक प्रवृत्ति में संलिप्त न हो( स्वच्छ छवि का व्यक्तित्व)। अत: ऐसे व्यक्तियों को पार्टी उम्मीदवार बनाएगी। इस प्रकार चुनाव सुधार की गाड़ी में यह बड़ा लक्ष्य  साबित होगा कि उम्मीदवारों के चयन में विद्वान एवं चारित्रिक व्यक्ति ही आएंगे।  इसलिए कहता हूं कि जब आनेवाली पूरी पीढ़ी हमसे यह पूछेगी कि राजनीतिक सुधार के लिए आप क्या कर रहे थे? तब हम गर्व से यह कहेंगे कि हम तो 'नोटा' दबा रहे थे और सही...

सवाल पूछना जरूरी है

-अभिषेक कांत पांडेय (स्वतंत्र टिप्पणीकार) अनौपचारिक शिक्षा हमें समाज से मिलती है लेकिन मीडिया समाज को प्रभावित कर रही क्योंकि इनके पीछे ऐसे लोग हैं जो अपना एजेंडा लागू करना चाहते हैं लेकिन यह भी सच है कि ऐसे लोगों का सच सामने आ रहा है।  यदि हम ध्यान से देखें और समझें तो पता चलता है कि इस चुनाव में कहीं न कहीं मीडिया  व कॉर्पोरेट सत्ता पक्ष की तरफ  खड़ी है। चुनाव के समय सत्ता पक्ष द्वारा जनता से किए गए वादों को मीडिया और कारपोरेट जगत अपने कैंपेन से आपके मस्तिष्कपटल  से 2014  के मेनिफेस्टो को मिटा रही है। लेकिन यह भी सच है कि यदि हम सच देखना चाहे तो सच दिखेगा। राष्ट्रवाद, हिंदुत्- कैंपेन यह सब मुद्दे 2014 में किए गए मेनिफेस्टो के वादे को भुलाने के लिए ताकि सवाल न किया जा सके। वोट किसी को भी दो लेकिन राजनीतिक दलों से सवाल पूछने की आदत होनी चाहिए क्योंकि कक्षा में भी यही कहा गया कि जो बच्चा सवाल पूछता है, वही आगे बढ़ता है।  मतदाता को 'रोबोटिक्स वोटर' नहीं होना चाहिए बल्कि अपने सवाल के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

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