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मे उनमे इनमे मै मे bindu (अनुस्वार) या chandrabindu (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता

  Me, mai, inme, uname, Bindu ya chandrabindu kyon nahin lagta hai | मे उनमे इनमे मै मे बिन्दु (अनुस्वार))  या चन्द्रबिन्दु (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता है। मे, मै मे चन्द्रबिंदु या बिंदु लगेगा? Hindi mein chandrabindu kab lagana chahie kab nahin? Hindi spelling mistake किसी भी शब्द के पंचमाक्षर पर कोई भी बिन्दी अथवा चन्द्रबिन्दी (Hindi Chandra bindi kya hai) नहीं लगती है। इसका कारण क्या है आइए विस्तार से हम आपको बताएं। क्योंकि ये दोनो अनुनासिक और अनुस्वार उनमे निहित हैं। हिंदी भाषा वैज्ञानिक भाषा है। इसके विज्ञान शास्त्र को देखा जाए तो जो पंचमाक्षर होता है उसमें किसी भी तरह का चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगता है क्योंकि उसमें पहले से ही उसकी ध्वनि होती है। पांचवा अक्षर वाले शब्द पर चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगाया जाता है। जैसे उनमे, इनमे, मै, मे कुछ शब्द है जिनमें चंद्र बिंदु बिंदु के रूप में लगाया जाता है लेकिन म पंचमाक्षर है।  Hindi main panchma Akshar kise kahate Hain? प फ ब भ म 'म' पंचमाक्षर pancman Akshar है यानी पांचवा अक्षर है। यहां अनुनासिक और अनुस्वार नहीं लगेगा। क्यो...

शौपिंग हैबिट कही नशा तो nahee

आजकल अनवाश्यक खरीदारी बढाती जा रही है। बाज़ार की चकाचौंध का असर लोगो के बजट पर भी पड़ रहा है। इस महंगाई में घर चलना क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने के बराबर है। लेकिन हर तरफ विज्ञापन के माया जाल में अगर आप घिर गये है तो निश्चित मानिये की ये विज्ञापन अनवाश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित भी करते है। शोधो से यह पता चलता है की अनवाश्यक खरीदारी की ये आदत शोपींग हैबत बन जाती है जिसके चलते आप मानसिक रूप से बीमार पड़ जाएँगे। स्टेटस सिम्बल की फिक्र रिचमंड और इलिनियोस विश्विद्यालय के अलग -अलग शोधो से मालूम होया है कि धीरे-धीरे शोपिंग हैबिट आदमी में नशे का रूप ले लेता है। इस आदत के चलते लोग शोपिंग करते बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जाते है, फिर भी uhene संतोष नहीं मिलता बहुत से लोगो कि आदत hoti है कि शोपिंग हैबिट के चलते koi kharidi vashu ko chupate है। taki ma hngi ya kharab vastu hone के karan लोग unka majak na banaye। aise लोग adhik adhik pase soping में kahrch करते है अगर inke pas paise nahee है तो dusro के sath unki शोपिंग के लिए बड़ी shvecha से sath में jayenge। के लिए शोपिंग karan कि आदत में ...

मन का अंकुर

मन का अंकुर फूट जाने तक मई प्रतीक्षारत हूँ अपने अस्तित्व के प्रति ध्यैय है मुझे मिटटी के व्यवहार से, जल के शिष्टाचार से अंकुरित होने तक अपने अस्तीत्व के प्रति मझे सावधान रहना है आंकना है मुझे मिटटी में जल की संतुलित नमी को asntulit होने पर मै सड़ सकता हूँ पुराने विचारो के दीमक मै कहीं मैं दब न जाऊं नवीनता अवशोषण मै अंकुरित होने से पहले सत्य की प्रकाश मुझे बचा सकती है टूट जाने से पाले फूटने दो मेरे मन का अंकुर मुझे santulit होने दो vecharo के bech me

विरासत

कई बार चुनाव जीतें हर बार आ बैठें घोसले में बच्चों को सिखाया राजनीति के दाव-पैतरे क्योंकि उनके बाद उन्हें संभालनी थीं विरासत की सत्ता क ्योंकि देश को चलन था वंशो की बैशाखी पर। अभिषेक कान्त पाण्डेय

कल्पना

आधुनिक विकिरण से निकली एक नई उर्जा। उड़ान भरी वह किरण जिसने छू लिया कल्पना के अन्तरिक्ष को वह आंसू पर लिपि राख़ नहीं उर्जा है अणु परमाणु की कैसे गिरती ये बंदेन वह जो चमक उठेगी नभ में। हाथ में कंगन दो चुटकी सेंदूर केवल लक्ष्य नहीं नयी रह नयी चाह है अब यही। अभिषेक कान्त पाण्डेय

तिरंगा कहता है

ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी देश के खातिर परवानो ने चूम लिया फासी बहुतो की क़ुरबानी ने दी हमें आज़ादी, आज़ादी की कीमत पहचानो न करो इसकी बर्बादी । ये देश -शहीदों की भूमि हैं, क्वाबा-काशी ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। स्वार्थी जीवन में हम भूल गएँ अपनी आज़ादी। मर रहा है किसान यहाँ, नेता बेच रहा खादी। लोकतंत्र में बेहाल है, भारत का गरीब निवासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। भ्रष्ट-अधिकारी नेता खा रहें है, देश का पैसा व्यापारी मस्त है मुनाफाखोरी में ये देश है कैसा। भ्रष्टाचार-आतंकवाद देश को बना रहा है दासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। शहीदों के सपनो को हुम न टूटने देंगें। घर-घर शिक्षा का दीपक जलांगे। भारत के युवा तुम हो कर्णधार, लो सपथ ये साहसी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। अभिषेक कान्त पाण्डेय

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