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मे उनमे इनमे मै मे bindu (अनुस्वार) या chandrabindu (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता

  Me, mai, inme, uname, Bindu ya chandrabindu kyon nahin lagta hai | मे उनमे इनमे मै मे बिन्दु (अनुस्वार))  या चन्द्रबिन्दु (अनुनासिक) क्यों नहीं लगता है। मे, मै मे चन्द्रबिंदु या बिंदु लगेगा? Hindi mein chandrabindu kab lagana chahie kab nahin? Hindi spelling mistake किसी भी शब्द के पंचमाक्षर पर कोई भी बिन्दी अथवा चन्द्रबिन्दी (Hindi Chandra bindi kya hai) नहीं लगती है। इसका कारण क्या है आइए विस्तार से हम आपको बताएं। क्योंकि ये दोनो अनुनासिक और अनुस्वार उनमे निहित हैं। हिंदी भाषा वैज्ञानिक भाषा है। इसके विज्ञान शास्त्र को देखा जाए तो जो पंचमाक्षर होता है उसमें किसी भी तरह का चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगता है क्योंकि उसमें पहले से ही उसकी ध्वनि होती है। पांचवा अक्षर वाले शब्द पर चंद्रबिंदु और बिंदु नहीं लगाया जाता है। जैसे उनमे, इनमे, मै, मे कुछ शब्द है जिनमें चंद्र बिंदु बिंदु के रूप में लगाया जाता है लेकिन म पंचमाक्षर है।  Hindi main panchma Akshar kise kahate Hain? प फ ब भ म 'म' पंचमाक्षर pancman Akshar है यानी पांचवा अक्षर है। यहां अनुनासिक और अनुस्वार नहीं लगेगा। क्यो...

क्या आप कल्पना कर सकते हैं

  मई की तपती गरमी में पानी की किल्लत आम बात है। वायुमंडल में आग का गोला बरस रहा है। उत्तर भारत के साथ देश के पहाड़ी क्षेत्र भी भीषण गरमी की चपेट में है। पिछले पचास सालों में पर्यावरण को जबरजस्त नुकसान पहुंचा है। आज भी हम क्रंकीट के शहर में खुद को प्रकृति से दूर करते जा रहे हैं। जंगल की आग हो या इसके बाद नदियों में उठने वाला उफान इन प्राकृतिक आपदा के हम ही जिम्मेदार है। पहाड़ों पर हमारी हद से ज्यादा बढ़ती दखलअंदाजी हमने वहां के वातावरण को भी नहीं बक्सा। मैदानी क्षेत्रों में जल की समुचित व्यवस्था की पहल करने में भी हमने कोई रुचि नहीं दिखायी। देखा जाये तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का काम इस सदी में सबसे अधिक हम ही लोगों ने किया है। वाहन से निकलता धुंआ भले सुख — सुविधा का प्रतीक हो या हमारी तरक्की को उजागर करता फैक्टरियों से निकलता धुंआ। पर पर्यावरण को बचाने के लिए हम पेड़ों को लगाने व उन्हें जिलाने की अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग रहे हैं। पिछले पखवारे चीन के बीजिंग शहर और उसके आसपास के इलाके में प्रदूषण के कारण धूल भरी आंधी से पूरा शहर धूंए के बादल और धूल के चपेट में रहा है। वहां...
सामान नागरिकता कानून, प्राइवेट क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन निर्धारण, पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मजीठीया द्वारा गठित वेतन अखबार मालिकों से दिलवाने की पहल, कांग्रेस के लंबे शासनकाल में पुलिस सुधार पर कोई ठोस काम नहीं हुआ, बीजेपी इस पर काम कर सकती है। पुलिस सुधार जरूरी है। अंग्रेजों के समय की पुलिस नियमावली व कानून से आजाद भारतीयों को छुटकारा मिले। कांग्रेस के समय आरटीई यानी अनिवार्य निशुल्क शिक्षा कानून का पालन राज्यों को ठोस रूप से करवाना, इसकी शुरुआत बीजीपीशासित राज्यों से हो तो कितना अच्छा उदाहरण बनें।

प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम वेतन कब

अभिषेक कांत पाण्डेय हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अनुभव होता है जो सोचने पर मजबूर करता है। ऐसे अनुभवों में मैं पिछले महीने से जूझ रहा हूं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है लेकिन सही मायने में ये दर्द हर उस व्यक्ति का है जो जीना चाहता है, सम्मान की जिंदगी चाहता है। भारत में रहने वाले उन करोड़ों लोगों की कहानी है। इसमें मजदूर से लेकर महीने पगार पाने वाले कामगार, ठेके पर मजदूरी करने वाले या किसी कंपनी में कंप्यूटर वर्क करने वाले यहां तक की पत्रकार, शिक्षक, हर वो कोई जो अपने हाथों से मेहनत करता है, उसके बदले उस बेहतर जिंदगी के लिए उचित वेतन पाने का अधिकार है। लेकिन इन प्राइवेट क्षेत्रों में सही सरकारी नीति का न होना व कामगारों के लिए ठोस कानून का नहीं होना, यहां पर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी होम कर रहे हैं। कम वेतन  व काम के अधिक घंटे उनके प्रकृतिक जीवन के साथ खिलवाड़ है। बेगारी व शोषण के शिकार  ऐसे लोग उन नियोक्ता के लिए काम करते हैं, जो वाता​नुकूलित ढांचों में सांसें लेते हैं और काम कराने के लिए ऐसे वर्गों का उदय किया है जो बिल्कुल अंग्रेजों के जमीदारों के भूमिका में है, ऐसे चुनि...

रेल पटरियों पर भटकता बचपन

अभिषेक कांत पाण्डेय रेलगाड़ी में सफर करने का आनंद आपने लिया होगा लेकिन शायद ही कभी आपने गौर किया होगा कि स्टेशन व ट्रेन के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी कहीं खो गई है। खेत-खलियान व शहरों से गुजरती हुई रेलगाड़ी जब स्टेशन पर रूकती है तो अपकी निगाह उन बच्चों पर जरूर ठहरी होगी, जो रेलवे ट्रेक पर पानी की बोतलें इकट्ठा करते हैं, या उन बच्चों की टोलियों को देखा होगा जिनके गंदे-मैले कपड़े उनकी बदहाली को बयां करते हैं। हाथ में गुटखा-खैनी का पाउच लिए टेªन की बोगियों में बेचते हैं, देश के ये नौनिहाल। जहां इन्हें स्कूलों में होना चाहिए लेकिन पापी पेट के कारण यहां इनकी जिंदगी के हिस्से में केवल ट्रेन की सीटी ही सुनाई देती है। इन बच्चों का जीवन सुबह पांच बजे से शुरू होता है, स्कूल की घंटी नहीं ट्रेन की सीटी सुनकर झुंड में निकल पड़ते हैं इनके कदम और ट्रेन की बोगियों में गुटखा-खैनी बेचकर अपने घर का पेट पालते हैं। स्टेशन में रहने वाले बच्चों का उम्र तो बढ़ता है लेकिन उनका भविष्य यहां अंधकारमय है। रेलेवे स्टेशन में कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था साथी व चाइल्ड लाइन...

बुजुर्ग दंपति 45 साल से अकेले रह हैं इस गांव में

   स्पेन में एक ऐसा गांव है जहां पर कोई नहीं रहता लेकिन बुजुर्ग दंपति पिछले 45 साल से अकेले यहां रह रहे हैं। स्ट्रेला नाम का गांव स्पेन के पूर्व में स्थित वैलेंसिया से 2०० किलोमीटर दूर स्थित है। 1936 में स्पेन में सिविल वार के चलते यहां के लोग इस गांव को छोड़ कर चले गए। वहीं 79 साल के जुएन मार्टिन और 82 साल की उनकी पत्नी सिनफोरसा कूलमर इस गांव को छोड़ कर नहीं गए। इस विरान गांव में वे अकेले रह रहे हैं। वे यहां पर ख्ोती करते हैं और दर्जनों बिल्लियों और कुत्तों की देखभाल करते हैं। कभी इस गांव में 2०० लोग रहा करते थ्ो लेकिन ये बुजुर्ग दंपति अकेले यहां पर रहते हैं। जुएन मार्टिन अपनी पत्नी से बेहद प्यार करते हैं वे बताते हैं कि हम लोगों का जन्म इसी गांव में हुआ था, इसीलिए हम दोनेां को ये जगह प्यारी है। इस दंपति पर कई डाक्यूमेंट्री फिल्में बन चुकी है। जएन बताते हैं कि हमारी एक बेटी भी थी लेकिन उसकी एक दुर्घटना में मौत हो गई। क्या आप जानते हैं आसमान नीला क्यों दिखता है पढ़ने के लिए क्लिक करें   https://prakharchetna.blogspot.com/p/blog-page_27.html?m=1

ल्यूकेमिया यानि हड्डी के कैंसर से जूझ रही एक साल की बच्ची का नई तकनीक से किया इलाज

डीएनए कटिंग के जरिए ब्लड कैंसर के इलाज में मिली सफलता ब्लड कैंसर से पीड़ित मरीजो के लिए वरदान साबित होगी ये नई तकनीक कहा जाता है कि अगर धरती पर कोई भगवान है तो वह इंसान के रूप में डॉक्टर हैं। एक साल की इस प्यारी बच्ची लेइला को ल्यूकेमिया एक तरह के कैंसर से पीड़ित थी। ये कैंसर सबसे पहले रक्त में और इसी रक्त के संक्रमण के कारण हड्डी के अन्दर यानि बोन मैरो में होता है। जिस कारण से शरीर में सफेद रक्तकणिकाएं इसीलिए अधिक बनना शुरू हो जाती हैं ताकि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत हो, लेकिन इस कारण से लाल रक्त कणिकाएं जो शरीर के लिए जरूरी होती है उसकी तादाद घटने लगती है इसी वजह से हड्डियों में खून स्पंजी हो जाता है, जिस कारण से धीरे-धीरे शरीर कमजोर होता चला जाता है और इंसान की मौत हो जाती है। पर इस बच्ची को डॉक्टरों ने इस भयानक कैंसर से बचा लिया एक नई तकनीक डीएनए कटिंग के जरिए उसके शरीर में किसी स्वस्थ व्यक्ति के कोशिकाओं को प्रत्यारोपित कर दिया। डॉक्टरों ने बताया कि इस तकनीक से इस बच्ची के प्रतिरक्षातंत्र में खास बदलाव आएगा और कैंसर के लिए जिम्मेदार कोश्किाओं को नए स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली में...

पानी से चलने वाली बाइक

अगर आपकी बाइक पेट्रोल की जगह पानी से चले तो कितना अच्छा होता। आपकी इस कल्पना को हकीकत में बदल दिया है ब्राजील के एक शख्स ने। साओ पाओलो में रहने वाले रिकार्डो एजवेडोइस नाम के इस व्यक्ति ने एक ऐसी बाइक बनाई जो पानी से चलती है। इतना ही नहीं बल्कि इस बाइक का माइलेज भी चौंकाने वाला है। यह बाइक एक लीटर पानी में 5०० किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकती है। इस बाइक में एक बैटरी लगी है। रिकार्डो ने अपनी इस पानी से चलने वाली बाइक का नाम टी पावर एच2ओ रखा है। इस बाइक में पानी डालने पर बैटरी के जरिए यह हाइड्रोजन बनाती है। इसी हाइड्रोजन से बाइक चलती है। बाइक के इंजन में इस हाइड्रोजन को ईधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। रिकार्डो अब अपनी बाइक की टेस्टिंग के लिए तैयार हैं, इसके बाद अगर ये बाइक सफल हुई तो दुपहिया वाहन क्षेत्र में बड़ी सफलता मानी जाएगी। मध्य प्रदेश के शख्स ने भी बनाई पानी से चलने वाली कार वहीं इससे पहले मध्यप्रदेश जिले सागर के रहने वाले रईस महम्मूदी जो पेश्ो से मैकेनिक है, उन्होंने भी पानी से चलने वाली एक कार बनाई थी। अभी इस पर और रिसर्च हो रहा है। एक बात ये है कि जिस तरह से पानी के ...

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